अगस्त 01, 2026

POST : 2098 फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी ( ग़ज़ल संग्रह ) डॉ लोक सेतिया { पूरी किताब ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं }

   फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी ( ग़ज़ल संग्रह ) डॉ लोक सेतिया  

                ( पूरी किताब ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं  )

 1 
 

कहीं अल्फ़ाज़ सारे खो गये हैं ( ग़ज़ल ) 

कहीं अल्फाज़ सारे खो गये हैं
तभी खामोश लब सब हो गये हैं ।

तड़पते ही रहे सारी उम्र जो
जगाना मत उन्हें  अब सो गये हैं ।

अदीबों में  नहीं कोई भी उनसा
चढ़ाये रोज़ सूली वो गये हैं ।

सुनाने दास्ताँ अपनी लगे जब
नहीं कुछ कह सके बस रो गये हैं ।

अगर है हौसला करना मुहब्बत
लुटे सब इस गली में जो गये हैं ।

उन्हें फिर भी नहीं रोटी मिली है
जो सर पर बोझ सबका ढो गये है ।

यहाँ कुछ फूल आंगन में उगाते
ये कैक्टस  किसलिये सब बो गये हैं ।

नहीं जाते , रकीबों के घरों में
जहाँ जाना नहीं था , लो गये  हैं ।

मनाते और ' तनहा ' मान जाते
नहीं फिर क्यों मनाने को गये हैं । 
 
 
 

 ढूंढते हैं मुझे मैं जहाँ नहीं हूँ ( ग़ज़ल ) 

 

ढूंढते हैं मुझे , मैं जहां  नहीं हूं 
जानते हैं सभी , मैं कहां नहीं हूं ।
  
सर झुकाते सभी लोग जिस जगह हैं
और कोई वहां , मैं वहां नहीं हूं ।

मैं बसा था कभी , आपके ही दिल में
खुद निकाला मुझे , अब वहां नहीं हूं ।
 
दे रहा मैं सदा , हर घड़ी सभी को
दिल की आवाज़ हूं ,  मैं दहां  नहीं हूं ।
 
(   दहां : चेहरा , मुख ,मुहाना )


गर नहीं आपको , ऐतबार मुझ पर
तुम नहीं मानते , मैं भी हां  नहीं हूं ।

आज़माते मुझे आप लोग हैं क्यों
मैं कभी आपका इम्तिहां  नहीं हूं ।

लोग ' तनहा ' मुझे देख लें कभी भी
बस नज़र चाहिए मैं निहां  नहीं  हूं ।
 
(  निहां : गुप्त , छिपा हुआ ओझल या अदृश्य )


 (  खुदा , ईश्वर , परमात्मा , इक ओंकार , यीसु ) 
 
 
 

किसे हम दास्तां अपनी सुनायें ( ग़ज़ल ) 

किसे हम दास्ताँ अपनी सुनायें  
कि अपना मेहरबां किसको बनायें ।

कभी तो ज़िंदगी का हो सवेरा 
डराती हैं बहुत काली घटायें ।

यहाँ इन्सान हों इंसानियत हो
नया मज़हब सभी मिलकर चलायें ।
 
सताती हैं हमें तन्हाईयां अब
यहाँ परदेस में किसको बुलायें ।

हमारा चारागर जाने कहाँ है
कहाँ जाकर ज़ख्म अपने दिखायें ।

जिन्हें जीना ही औरों के लिए हो 
बताओ फिर ज़हर कैसे वो खायें ।

चमकती है शहर में रात "तनहा" 
अँधेरे गावं इक दिन जगमगायें ।
 
 
 

     बिका ज़मीर कितने में , हिसाब क्यों नहीं देते ( ग़ज़ल ) 

                       

बिका ज़मीर कितने में ,हिसाब क्यों नहीं देते
सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते ।


किसी ने घर जलाया था , उसी से जा के ये पूछा
जला के घर हमारा आप आब क्यों नहीं देते ।

 
सभी यहाँ बराबर हैं सभी से प्यार करना तुम
सबक लिखा हुआ जिसमें किताब क्यों नहीं देते ।

छुपा नहीं छुपाने से हुस्न कभी भी दुनिया से
हसीं सभी हटा अपना हिजाब क्यों नहीं देते ।

नहीं भुला सके हम खाव्ब जो कभी सजाये थे
हमें वही सुहाने फिर से ख्वाब क्यों नहीं देते ।

इश्क यहाँ सभी करते , नहीं बचा कभी कोई
न बच सका किसी का दिल जनाब क्यों नहीं देते ।

यही तो मांगते सब हैं हमें भी कुछ उजाला दो
नहीं कहा किसी ने आफताब क्यों नहीं देते ।

अभी तो प्यार का मौसम है और रुत सुहानी है
कभी किसी हसीना को गुलाब क्यों नहीं देते ।

उन्हें अभी बता देना यही गिला है "तनहा" को
हमें कभी सभी अपने अज़ाब क्यों नहीं देते । 
 
 
 

नया दोस्त कोई बनाने चले हो ( ग़ज़ल ) 

नया दोस्त कोई बनाने चले हो
फिर इक ज़ख्म सीने पे खाने चले हो ।

न टकरा के टूटे कहीं शीशा ए दिल
ये पत्थर को क्यों तुम मनाने चले हो ।

उसी शाख पर जिसपे बिजली गिरी थी
नया आशियाँ क्यों बसाने चले हो ।

यकीं कर के मौजों पे अपना सफीना
कहाँ बीच मझधार लाने चले हो ।

छिपे हैं गुलों में हज़ारों ही कांटे
कि जिनसे घर अपना सजाने चले हो ।

सितमगर हैं नश्तर से वो काम लेंगे
जिन्हें दाग़े-दिल तुम दिखाने चले हो ।

ये हंसने हंसाने की तुम चाह लेकर
कहाँ आज आँसू बहाने चले हो । 
 
 
 

      हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा (ग़ज़ल ) 

                       

हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा
दुःख दर्द भरी लहरों में साहिल नहीं समझा ।

दुनिया ने दिये  ज़ख्म हज़ार आपने लेकिन
घायल नहीं समझा हमें बिसमिल नहीं समझा ।

हम उसके मुकाबिल थे मगर जान के उसने
महफ़िल में हमें अपने मुकाबिल नहीं समझा ।

खेला तो खिलोनों की तरह उसको सभी ने
अफ़सोस किसी ने भी उसे दिल नहीं समझा ।

हमको है शिकायत कि हमें आँख में तुमने
काजल सा बसाने के भी काबिल नहीं समझा ।

घायल किया पायल ने तो झूमर ने किया क़त्ल
वो कौन है जिसने तुझे कातिल नहीं समझा ।

उठवा के रहे "लोक" को तुम दर से जो अपने
पागल उसे समझा किये साईल नहीं समझा ।    
 
7  
 
 

    नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई ( ग़ज़ल ) 

                           

नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई 
है अपनी जेब तक खाली कहीं पर घर नहीं कोई ।

चले थे सोच कर कोई हमें उसका पता देगा 
यहाँ पूछा वहां ढूँढा मिला दिलबर नहीं कोई ।

बताना हुस्न वालों को जिन्हें चाहत है सजने की
मुहब्बत से हसीं अब तक बना ज़ेवर नहीं कोई ।

ग़ज़ल की बात करते हैं ज़माने में कई लेकिन
हमें कहना सिखा देता मिला शायर नहीं कोई ।

हमें सब लोग कहते थे कभी हमको बुलाना तुम
ज़रूरत में पुकारा जब मिला आ कर नहीं कोई ।

कहीं मंदिर बना देखा कहीं मस्जिद बनी देखी
कहाँ इन्सान सब जाएँ कहीं पर दर नहीं कोई ।

वहां करवट बदलते रात भर महलों में कुछ "तनहा"
यहाँ कुछ लोग सोये हैं जहाँ बिस्तर नहीं कोई । 
 
 

    रहें खामोश जब तक लब कहा जाता शराफ़त है ( ग़ज़ल ) 

                          

रहें खामोश जब तक लब कहा जाता शराफत है 
ज़ुबां जब खोलता कोई उन्हें लगती बगावत है ।
 
नहीं देता ख़ुदा क्योंकर सभी को सब बराबर है
कभी खुद देखता आकर किसे कितनी ज़रूरत है ।
 
ख़ता उनकी नहीं कोई , हुई जिनको मुहब्बत है 
ज़माने से ज़रा पूछो  तुम्हें कैसी अदावत है ।
 
जमा जितना किया तुमने सभी कुछ छोड़ जाना है  
विरासत सौंप कर जाते लिखी तुमने वसीयत है ।

ज़माने ने मिटा डाला कभी का नाम तक उसका 
कभी दौलत के बदले में नहीं मिलती मुहब्बत है ।
 
बचेगा देश अब कैसे , किसे फुर्सत कभी समझे 
जिधर देखो यही लगता सियासत बस तिजारत है ।
 
अदाओं को हसीनों की समझ पाया नहीं कोई 
दिखा कर फिर छुपा लेना यही उनकी नज़ाकत है ।

हमारे मुल्क के सब देशवासी एक जैसे हैं 
तुम्हारी धर्म को लेकर बड़ी गंदी सियासत है ।
 
बनाते महल ' तनहा ' लोग खुद फुटपाथ पर रहते  
गरीबों की अमीरों पर हमेशा ही इनायत  है ।
 
 
 

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ( ग़ज़ल ) 

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई
ज़िंदगी तुझ से डर गया कोई ।

तेज़ झोंकों में रेत के घर सा
ग़म का मारा बिखर गया कोई ।

न मिला कोई दर तो मज़बूरन
मौत के द्वार पर गया कोई ।

खूब उजाड़ा ज़माने भर ने मगर
फिर से खुद ही संवर गया कोई ।

ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है
उसपे इल्ज़ाम धर गया कोई ।

और गहराई शाम ए तन्हाई
मुझको तनहा यूँ कर गया कोई ।

है कोई अपनी कब्र खुद ही "लोक"
जीते जी कब से मर गया कोई ।  
 
10 
 
 

 हमको ले डूबे ज़माने वाले ( ग़ज़ल ) 

हमको ले डूबे ज़माने वाले
नाखुदा खुद को बताने वाले ।
 
आज फिर ले के वो बारात चले 
अपनी दुल्हन को जलाने वाले ।

देश सेवा का लगाये तमगा
फिरते हैं देश को खाने वाले ।

ज़ालिमों चाहो तो सर कर दो कलम
हम न सर अपना झुकाने वाले ।

हो गये खुद ही फ़ना आख़िरकार 
मेरी हस्ती को मिटाने वाले । 
 
एक ही घूंट में मदहोश हुए 
होश काबू में बताने वाले । 
 
उनको फुटपाथ पे तो सोने दो
ये हैं महलों को बनाने वाले ।

काश हालात से होते आगाह 
जश्न-ए-आज़ादी मनाने वाले । 
 
तूं कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं
मेरी अर्थी को उठाने वाले ।

तेरी हर चाल से वाकिफ़ था मैं
मुझको हर बार हराने वाले ।

मैं तो आइना हूँ बच के रहना
अपनी सूरत को छुपाने वाले ।
 
11 
 

     जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ( वसीयत - नज़्म ) 

                            

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये ।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये ।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये ।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे
मैं भी था कोई , न ये याद दिलाया जाये ।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये ।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये ।  
 
12 
 
 

ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया ( ग़ज़ल ) 

ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया
हमने आंसू बहाना छोड़ दिया ।

अब बहारो खिज़ा से क्या डरना
हमने अब हर बहाना छोड़ दिया ।

जब निभाना हुआ नामुमकिन तब
रूठ जाना ,  मनाना छोड़ दिया ।

हो गये हैं जो कब से बेगाने
उनको अपना बनाना छोड़ दिया ।

कब कहाँ किसने कैसे ज़ख्म दिये
हर किसी को बताना छोड़ दिया ।

उनको कोई ये जा के बतलाये
हमने रोना रुलाना छोड़ दिया ।

मिल गया अब हमारे दिल को सुकून
जब से दिल को लगाना छोड़ दिया ।

ख्याल आया हमारे दिल में यही
हमने क्यों मुस्कुराना छोड़ दिया ।

हमने फुरकत में "तनहा" शामो-सहर
ग़म के नगमें सुनाना छोड़ दिया ।  
 
13 
 
 

इक आईना उनको भी हम दे आये ( ग़ज़ल ) 

इक आईना उनको भी हम दे आये
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं ।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं ।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं ।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं ।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर
बढ़कर एक से एक नज़ीर बनाते हैं ।
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं । 
 
14 
 
 

फैसले तब सही नहीं होते ( ग़ज़ल ) 

फैसले तब सही नहीं होते
बेखता जब बरी नहीं होते ।

जो नज़र आते हैं सबूत हमें
दर हकीकत वही नहीं होते ।

गुज़रे जिन मंज़रों से हम अक्सर
सबके उन जैसे ही नहीं होते ।

क्या किया और क्यों किया हमने
क्या गलत हम कभी नहीं होते ।

हमको कोई नहीं है ग़म  इसका
कह के सच हम दुखी नहीं होते ।

सोच लें , लिखने से ये पहले हम 

फैसले आखिरी नहीं होते ।

जो न इंसाफ दे सकें ' तनहा '
पंच वो , पंच ही नहीं होते ।
 
15 
 
 

शिकवा तकदीर का करें कैसे ( ग़ज़ल ) 

शिकवा तकदीर का करें कैसे
हो खफा मौत तो मरें कैसे ।

बागबां ही अगर उन्हें मसले
फूल फिर आरज़ू करें कैसे ।

ज़ख्म दे कर हमें वो भूल गये
ज़ख्म दिल के ये अब भरें कैसे ।

हमको खुद पर ही जब यकीन नहीं
फिर यकीं गैर का करें कैसे ।

हो के मज़बूर  ज़ुल्म सहते हैं
बेजुबां ज़िक्र भी करें कैसे ।
 
भूल जायें तुम्हें कहो क्यों कर
खुद से खुद को जुदा करें कैसे ।

रहनुमा ही जो हमको भटकाए
सूए - मंजिल कदम धरें कैसे । 
 
16 
 

कैसे कैसे नसीब देखे हैं  ( ग़ज़ल ) 

कैसे कैसे नसीब देखे हैं
पैसे वाले गरीब देखे हैं ।

हैं फ़िदा खुद ही अपनी सूरत पर
हम ने चेहरे अजीब देखे हैं ।

दोस्तों की न बात कुछ पूछो
दोस्त अक्सर रकीब देखे हैं ।
 
ज़िंदगी  को तलाशने वाले
मौत ही के करीब देखे हैं ।

तोलते लोग जिनको दौलत से
ऐसे भी कम-नसीब देखे हैं ।

राह दुनिया को जो दिखाते हैं
हम ने विरले अदीब देखे हैं ।

खुद जलाते रहे जो घर "तनहा"
ऐसे कुछ बदनसीब देखे हैं ।   
 
17 
 

कोई हमराज़ अपना बना लीजिये ( ग़ज़ल )

 
कोई हमराज़ अपना बना लीजिये
एक अपनी ही दुनिया बसा लीजिये ।

खुल के हंसिये तो ऐ हज़रते दिल ज़रा
दर्दो-ग़म अपने सारे  मिटा लीजिये ।

ज़िंदगी की अगर लय पे चलना है तो
साज़े दिल पर कोई धुन बजा लीजिये ।

अपना दुश्मन समझते थे कल तक जिन्हें
आज उनको गले से लगा लीजिये ।

जो कहें आप बेख़ौफ़ हो कर कहें
कुछ तो अल्फाज़े-हिम्मत जुटा लीजिये ।

ताज की बात तो बाद की बात है
खुद को शाहे जहां तो बना लीजिये ।

जो भी होना है अंजाम हो जाएगा
आप उल्फत का बीड़ा उठा लीजिये ।
 
18 
 

चंद धाराओं के इशारों पर ( ग़ज़ल ) 

चंद धाराओं के इशारों पर
डूबी हैं कश्तियाँ किनारों पर ।

अपनी मंज़िल पे हम पहुँच जाते
जो न करते यकीं सहारों पर ।

खा के ठोकर वो गिर गये हैं लोग
जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर ।

डोलियाँ राह में लूटीं अक्सर
अब भरोसा नहीं कहारों पर ।

वो अंधेरों ही में रहे हर दम
जिन को उम्मीद थी सितारों पर ।

ये भी अंदाज़ हैं इबादत के
फूल रख आये हम मज़ारों पर ।

उनकी महफ़िल से जो उठाये गये
हंस लो तुम उन वफ़ा के मारों पर ।
 
19 
 
 

यही सोचकर आज घबरा गये हम ( ग़ज़ल ) 

यही सोचकर आज घबरा गये हम
चले थे कहाँ से कहाँ आ गये हम ।

तुम्हें क्या बतायें फ़साना हमारा
किसे छोड़ आये किसे पा गये हम ।

जिया ज़िंदगी को बड़ी सादगी से
दिया जब किसी ने ज़हर खा गये हम ।

खुदा जब मिलेगा कहेंगे उसे क्या
यही सोचकर आज शरमा गये हम ।

रहे भागते ज़िंदगी के ग़मों  से
मगर लौट कर रोज़ घर आ गये हम।

मुहब्बत रही दूर हमसे हमेशा
न पूछो ये हमसे किसे भा गये हम ।

उसी आस्मां ने हमें आज छोड़ा
घटा बन जहाँ थे कभी छा गये हम ।

रहेगी रुलाती यही बात "तनहा"
ख़ुशी का तराना कहाँ गा गये हम । 
 
20 
 

     सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे ( ग़ज़ल ) 

                                 

सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे
अब ज़िंदगी को ज़िंदगी के नाम लिखेंगे ।

जब तक पिलायेंगे सभी पीते ही रहेंगे
लिखने लगे जब हम मुहब्बत, जाम लिखेंगे ।

पाई सज़ाएँ बेखता उनसे तो हमेशा
अब हम मगर उनके लिए ईनाम लिखेंगे ।

उसको लिखेंगे ख़त कभी दिल खोल के हम भी
हम हो गये तेरे लिये बदनाम लिखेंगे ।

साकी से पूछो हम हुए मदहोश नहीं थे
भर - भर पिलाये हैं उसी ने जाम  लिखेंगे ।

होगा सुनाने का नया अंदाज़ हमारा
कोई ग़ज़ल हम जब किसी के नाम लिखेंगे ।

लिखने लगे जब सच तो लिखना छोड़ मत देना
"तनहा" लिखेंगे , और सुबहो-शाम लिखेंगे । 
 
21 
 
 

     दिल पे अपने लिखी दी हमने तेरे नाम ग़ज़ल ( ग़ज़ल ) 

                      

दिल पे अपने लिख दी हमने तेरे नाम ग़ज़ल
जब नहीं आते हो आ जाती हर शाम ग़ज़ल ।

वो सुनाने का सलीका वो सुनने का शऊर
कुछ नहीं बाकी रहा बस तेरा नाम ग़ज़ल ।

वो ज़माना लोग वैसे आते नज़र नहीं
जब दिया करती थी हर दिन इक पैगाम ग़ज़ल ।

आंसुओं का एक दरिया आता नज़र मुझे
अब कहूँ कैसे इसे मैं बस इक आम ग़ज़ल ।

बात किसके दिल की , किसने किसके नाम कही
रह गयी बन कर जो अब बस इक गुमनाम ग़ज़ल ।

जामो - मीना से मुझे लेना कुछ काम  नहीं
आज मुझको तुम पिला दो बस इक जाम ग़ज़ल । 
 
इक यही हसरत है ' तनहा ' इस से इश्क़ किया 
है यही आग़ाज़ , अपना हो , अंजाम ग़ज़ल । 
 
 22 
 
 
 

हम पुरानी लकीरें मिटाते रहे ( ग़ज़ल ) 

हम पुरानी लकीरें मिटाते रहे
कुछ नये  रास्ते खुद बनाते रहे ।

आशियाँ इक बनाया था हमने कहीं
उम्र भर फिर उसे हम सजाते रहे ।

हर ख़ुशी दूर हमसे रही भागती
हादसे साथ अपना निभाते रहे ।

तुम भी मदहोश थे हम भी मदहोश थे
दास्ताँ फिर किसे हम सुनाते रहे ।

ख्वाब देखे कई प्यार के रात भर
जब खुली आँख सब टूट जाते रहे ।

इक ग़ज़ल आपकी क्या असर कर गई
हम उसे रात दिन गुनगुनाते रहे ।

जा रहे हैं मगर फिर मिलेंगे कभी
दीप आशा के "तनहा" जलाते रहे । 
 
23 
 
 

      हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना ( ग़ज़ल ) 

                           

हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना
कोई कभी हिदायत ये आज तक न माना ।

मझधार से बचाकर अब ले चलो किनारे
पतवार छूटती है तुम नाखुदा बचाना ।

कब मांगते हैं चांदी कब मांगते हैं सोना
रहने को झोंपड़ी हो दो वक़्त का हो खाना ।

अब वो ग़ज़ल सुनाओ जो दर्द सब भुला दे
खुशियाँ कहाँ मिलेंगी ये राज़ अब बताना ।

ये ज़िन्दगी से पूछा हम जा कहाँ रहे हैं
किस दिन कहीं बनेगा अपना भी आशियाना ।

मुश्किल कभी लगें जब ये ज़िन्दगी की राहें
मंज़िल को याद रखना मत राह भूल जाना ।

हर कारवां से कोई ये कह रहा है "तनहा"
पीछे जो रह गए हैं उनको था साथ लाना । 
 
24  
 
 

हल तलाशें सभी सवालों का ( ग़ज़ल ) 

हल तलाशें सभी सवालों का
है यही रास्ता उजालों का ।

तख़्त वाले ज़रा संभल जायें
काफिला चल पड़ा मशालों का ।

फूल भेजे हैं खुद रकीबों को
दे दिया है जवाब चालों का ।

प्यास बुझती नहीं कभी उनकी
दर्द समझो कभी तो प्यालों का ।

ख्वाब हम देखते रहे शब भर
मखमली से किसी के बालों का ।

बेच डालें न देश को इक दिन
कुछ भरोसा नहीं दलालों का ।

राज़ दिल के सभी खुले "तनहा"
कुछ नहीं काम दिल पे तालों का । 
 
25 
 
 

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते ( ग़ज़ल ) 

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते
खुद से ऐसे अदावत नहीं करते ।

ज़ुल्म की इन्तिहा हो गई लेकिन
लोग फिर भी बगावत नहीं करते ।

इस कदर भा गया है कफस हमको
अब रिहाई की हसरत नहीं करते ।

हम भरोसा करें किस तरह उन पर
जो किसी से भी उल्फत नहीं करते ।

आप हंस हंस के गैरों से मिलते हैं
हम कभी ये शिकायत नहीं करते ।

पांव जिनके  ज़मीं  पर हैं मत समझो
चाँद छूने की चाहत नहीं करते ।

तुम खुदा हो तुम्हारी खुदाई है
हम तुम्हारी इबादत नहीं करते ।

पास कुछ भी नहीं अब बचा "तनहा"
लोग ऐसी वसीयत नहीं करते । 
 
26 
 
 

हमको जीने की दुआ देने लगे ( ग़ज़ल ) 

हमको जीने की दुआ देने लगे
आप ये कैसी सज़ा देने लगे ।

दर्द दुनिया को दिखाये थे कभी
दर्द बढ़ने की दवा देने लगे ।

लोग आये थे बुझाने को मगर
आग को फिर हैं हवा देने लगे ।

अब नहीं उनसे रहा कोई गिला
अब सितम उनके मज़ा देने लगे ।

साथ रहते थे मगर देखा नहीं
दूर से अब हैं सदा देने लगे ।

प्यार का कोई सबक आता नहीं
बेवफा को हैं वफ़ा देने लगे ।

कल तलक मुझ से सभी अनजान थे
अब मुझे मेरा पता देने लगे ।

मांगता था मौत ' तनहा ' रात दिन
जब लगा जीने , कज़ा देने लगे । 
 
27 
 

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें ( ग़ज़ल ) 

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें
बन गए सब मतलबी हम क्या करें ।

प्यार से देखा हमें जब आपने
ले गई दिल सादगी हम क्या करें ।

अब बताएं सब हुस्न वाले हमें
जब सताए आशिकी हम क्या करें ।

एक दिन हम ढूंढ ही लेते खुदा
खो गई है ज़िंदगी हम क्या करें ।

दिल हमारा लूट कर कल ले गईं
सब अदाएं आपकी हम क्या करें ।

प्यार उनको जब रकीबों से हुआ
फिर हमारी बेबसी हम क्या करें ।

आज कितना दूर देखो हो गया
आदमी से आदमी हम क्या करें ।

सब परेशां लग रहे इस शहर में
हम यहाँ पर अजनबी हम क्या करें ।

आज "तनहा" मार डालेगी तुम्हें
अब किसी की बेरुखी हम क्या करें ।  
 
28 
 
 

  बेचैनी ( नज़्म )  

पढ़ कर रोज़ खबर कोई
मन फिर हो जाता है उदास ।

कब अन्याय का होगा अंत
न्याय की होगी पूरी आस ।

कब ये थमेंगी गर्म हवाएं
आएगा जाने कब मधुमास ।

कब होंगे सब लोग समान
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास ।

चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें
फिर वो न आए हमारे पास ।

सरकारों को बदल देखा
हमको न कोई आई रास ।

जिसपर भी विश्वास किया
उसने ही तोड़ा है विश्वास ।

बन गए चोरों और ठगों के
सत्ता के गलियारे दास ।

कैसी आई ये आज़ादी
जनता काट रही बनवास ।  
 
29 
 
 

 पुष्प ( नज़्म )   

पल दो पल में मुर्झाऊंगा
शाख से टूट के क्या पाऊंगा ।

आज सजा हूँ गुलदस्ते में
कल गलियों में बिखर जाऊंगा ।

उतरूंगा जो तेरे जूड़े से
बासी फूल ही कहलाऊंगा ।

गूंथा जाऊंगा जब माला में
ज़ख्म हज़ारों ही खाऊंगा ।

मेरे खिलने का मौसम है
लेकिन तोड़ लिया जाऊंगा ।

चुन के मुझे ले जायेगा माली
डाली को याद बहुत आऊंगा । 
 
30 
 
 

जीवन राह ( नज़्म ) 

खुद पे ही एतबार कर लो
ज़िंदगी का तुम दीदार कर लो ।

जो मंज़िल की चाह है तुम्हें
मुश्किलों से भी प्यार कर लो ।

बेहतर है ये किनारे बैठने से
डूब जाओ या कि पार कर लो ।

बदल सकते हो हवा का रुख
हौसला तुम एक बार कर लो ।

कौन अपना है कौन बेगाना
प्यार से मिले जो प्यार कर लो ।
 
 
31 
 
 

तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम ( नज़्म ) 

तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम
यही सोच के चल पड़े थे हम ।

न पतवार थी न कोई माझी
हौसलों से हुए बड़े थे हम ।

वक़्त आया जो फैसले का
खुद अपने से भी लड़े थे हम ।

ज़माने की आग से पक गए
वरना कच्चे घड़े थे हम ।

झुक गए तेरी मुहब्बत में
तबीयत से सरचड़े थे हम ।

मोम की तरह पिघल गए
कभी फौलाद से कड़े थे हम ।

फरियाद कातिल से न करेंगे
इसी बात पे अड़े थे हम । 
 
32 
 
 

शीशे सा नाज़ुक घर भी है ( नज़्म ) 

शीशे सा नाज़ुक घर भी है
कुछ तूफानों का डर भी है ।

जीने की चाहत है लेकिन
पीना ग़म का सागर भी है ।

इंसानों की खबर न कोई
शहर का ऐसा मंज़र भी है ।

यूँ तो है खामोश किनारा
लहर गई टकरा कर भी है ।

ढूंढ के उसको लाओ कहीं से
खोया सहर में दिनकर भी है ।
 
33 
 
 

लब पे आई तो मुहब्बत आई ( नज़्म )  

लब पे आई तो मुहब्बत आई
भूल कर भी न शिकायत आई ।

बात कुछ ऐसी चली महफ़िल में
फिर हमें याद वो मूरत आई ।

हम से बिछड़ी जो अभी शाम ढले
रात भर याद वो सूरत आई ।

कश्ती लहरों के हवाले कर दी
बेबसी में जो ये नौबत आई ।

आसमां रंग बदल कर बोला
लो ज़मीं वालो कयामत आई ।
 
 
चाल कोई न कभी हम चलते 
काम लेकिन न शराफ़त आई । 
 
बन गए चोर सिपाही ' तनहा ' 
क्या ग़ज़ब की है सियासत आई ।
 
34 
 
 

याद तुम्हें करता है कोई ( नज़्म ) 

याद तुम्हें करता है कोई
जीते जी मरता है कोई ।

लफ्ज़े-मुहब्बत अपनी जुबां पर
लाने से डरता है कोई ।

दुनिया में इक वो ही हसीं है
इस का दम भरता है कोई ।

सूखे फूल चढ़ा कर कैसी
ये पूजा करता है कोई ।

खुद से तन्हाई में बातें
दीवाना करता है कोई ।

वादा करके भी वो न आया
यूँ भी ज़फा करता है कोई । 
 
35 
 
 

है शहर में बस धुआं धुंआ ( नज़्म )

है शहर में बस धुआं धुआं
न रौशनी का कोई निशां ।

ये पूछती है नज़र नज़र
है आदमी का कोई निशां ।

समझ सके जो यहाँ है कौन
ज़रा सी इक बच्ची की जबां ।

कहीं भी दिल लगता ही नहीं
जो कोई जाये भी तो कहाँ ।

सुनाएँ कैसे किसी को हम
इक उजड़े दिल की ये दास्ताँ । 
 
36 
 
 

बात दिल में थी जो बता न सके ( नज़्म ) 

बात दिल में थी जो बता न सके
आपबीती उन्हें सुना न सके ।

हमने कोशिश हज़ार की लेकिन
बेकरारी ए दिल छिपा न सके ।

बातें करते रहे ज़माने की
बात अपनी जुबां पे  ला न सके ।

चाह कर भी घटा सी जुल्फों को
उनके चेहरे से हम हटा न सके ।

हमने पूछा जो बेरुखी का सबब
वो बहाना कोई बना न सके ।

जाने वाले ने देखा मुड़ मुड़ कर
हम मगर उसको रोक पा न सके ।  
 
दर्द दिल में है , एक ही ' तनहा ' 
क्यों  किसी को कभी मना न सके ।  
 
37 
 

अब हमें दिल की बात कहने दो ( नज़्म ) 

अब हमें दिल की बात कहने दो
हो जो मुमकिन तो अश्क बहने दो ।

सब चले जाएंगे कभी न कभी
कोई महमान अभी तो रहने दो ।

वक़्त इसका इलाज कर देगा
दिल को अब तो ये दर्द सहने दो ।

ख़त्म कर दो खामोशियों को आज
कहना है जो लबों को कहने दो ।

रोक पाई न इश्क को दुनिया
ये तो दरिया है , इसको बहने दो ।

देखो खुद बन के तुम तमाशाई
हिलती दीवार घर की ढहने दो ।
 
इश्क़ करते किताब से   'तनहा '
उन को अनमोल , ऐसे गहने दो ।  
 
38 
 
 

खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं ( नज़्म )  

खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं
फायदा ज़हर भी कर जाते हैं ।

सीख जाते हैं भुलाना उनको
बन के जो गैर गुज़र जाते हैं ।

ख्वाब तो ख्वाब हैं उनका क्या है
नींद जो टूटी बिखर जाते हैं ।

एक तिनके का सहारा पा कर
डूबने वाले भी तर जाते हैं ।

इस से पहले कि उन्हें पहचानें  
वो जो करना था , वो कर जाते हैं ।

फूल यादों पे चढ़ाओ उनकी
जीते जी लोग जो मर जाते हैं ।  
 
दिन चढ़े रोज़ निकलते ' तनहा ' 
जब ढली शाम तो घर जाते हैं । 
 
39 
 
 

वक़्त के साथ जो चलते हैं संवर जाते हैं ( नज़्म ) 

वक़्त के साथ जो चलते हैं संवर जाते हैं
जो पिछड़ जाते हैं वो लोग बिखर जाते हैं ।

जिनको मिलता ही नहीं कोई जीने का सबब
मौत से पहले ही अफ़सोस वो मर जाते हैं ।

मुश्किलों को कभी आसान नहीं कर सकते
उलझनों से , वो सभी लोग , जो डर जाते हैं ।

जो नहीं मिलता कभी जा के किनारों पे हमें
वो उन्हें मिलता है जो बीच भंवर जाते हैं ।

हम समझते हैं जिन्हें अपना वो गैरों की तरह
पेश आते हैं तो हम जीते जी मर जाते हैं ।

गैर अच्छे जो मुसीबत में हमारी आकर
दोस्तों जैसा कोई काम तो कर जाते हैं ।

आएगा कोई हमारा भी मसीहा बन कर
आस में, उम्र तो क्या , युग भी गुज़र जाते हैं ।  
 
40 
 

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग ( नज़्म )  

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग
आईने से यूँ परेशान हैं लोग ।

बोलने का जो मैं करता हूँ गुनाह
तो सज़ा दे के पशेमान हैं लोग ।

जिन से मिलने की तमन्ना थी उन्हें
उन को ही देख के हैरान हैं लोग ।

अपनी ही जान के वो खुद हैं दुश्मन
मैं जिधर देखूं मेरी जान हैं लोग ।

आदमीयत  को भुलाये बैठे
बदले अपने सभी ईमान हैं लोग ।

शान ओ शौकत है वो उनकी झूठी
बन गए शहर की जो जान हैं लोग ।

मुझको मरने भी नहीं देते हैं
किस कदर मुझ पे दयावान है लोग ।  
 
41 
 

भीगा सा मौसम हो और हम हों ( ग़ज़ल ) 

भीगा सा मौसम हो और हम हों
भूला हुआ हर ग़म हो और हम हों।

फूलों से भर जाये रात रानी 
महकी हुई पूनम हो और हम हों।

झूल के झूले में आकाश छू लें  
रिमझिम की सरगम हो और हम हों।

भूली बिसरी बातें याद करके 
चश्मे वफा पुरनम हो और हम हों।

आकर जाने की सुध बुध भुलायें 
थम सा गया आलम हो और हम हों।

आओ चलें हम उन तनहाइयों में
जिन में सुकूं हरदम हो और हम हों।

मिल न सकें तो मौत ही हमको आये
रूहों का संगम हो और हम हों।
 
42 
 
 

फिर कोई कारवां बनाएं हम ( ग़ज़ल ) 

फिर कोई कारवां बनाएं हम
या कोई बज़्म ही सजाएं हम।

छेड़ने को नई सी धुन कोई
साज़ पर उंगलियां चलाएं हम।

आमदो - रफ्त होगी लोगों की
आओ इक रास्ता बनाएं हम।

ये जो पत्थर बरस गये  इतने
क्यों न मिल कर इन्हें हटाएं हम।

है अगर मोतियों की हमको तलाश
गहरे सागर में डूब जाएं हम।

दर- ब- दर करके दिल से शैतां को
इस मकां में खुदा बसाएं हम।

हुस्न में कम नहीं हैं कांटे भी
कैक्टस सहन में सजाएं हम।

हम जहां से चले वहीं पहुंचे
अपनी मंजिल यहीं बनाएं हम।

लोग सब चुप उदास महफ़िल है 
फिर से "तनहा" को ढूंढ लाएं हम। 
 
43 
 
 

ये सबने कहा अपना नहीं कोई ( नज़्म ) 

ये सबने कहा अपना नहीं कोई
फिर भी कुछ दोस्त बनाए हमने ।

फूल उनको समझ कर चले कांटों पर
ज़ख्म ऐसे भी कभी खाए हमने ।

यूं तो नग्में थे मुहब्बत के भी
ग़म के नग्मात ही गाए हमने ।

रोये हैं वो हाल हमारा सुनकर
जिनसे दुःख दर्द छिपाए  हमने ।

ऐसा इक बार नहीं , हुआ सौ बार
खुद ही भेजे ख़त पाए  हमने ।

उसने ही रोज़ लगाई ठोकर 
जिस जिस के नाज़ उठाए हमने । 

हम फिर भी रहे जहां में "तनहा"
मेले कई बार लगाए  हमने । 
  
44 
 

राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं ( ग़ज़ल ) 

 
राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं
झूठे ख्वाबों पे विश्वास करते नहीं ।

बात करता है किस लोक की ये जहां
लोक - परलोक से हम तो डरते नहीं ।

हमने देखी न जन्नत न दोज़ख कभी
दम कभी झूठी बातों का भरते नहीं ।

आईने में तो होता है , सच सामने
सामना इसका सब लोग करते नहीं ।

खेते रहते हैं कश्ती को वो उम्र भर
नाम के नाखुदा , पार उतरते नहीं । 
 
मोड़ , आते रहेंगे , हमेशा यहां 
पर किसी मोड़ पर हम ठहरते नहीं । 
 
कर के वादा मुकर सब ही ' तनहा ' गए  
हम वो हैं जो कभी भी बदलते नहीं ।  
 
45 
 
 

दिल में आता है सताएं  उनको ( ग़ज़ल ) 

दिल में आता है सताएं उनको
बात ये कैसे बताएं उनको ।

एक मुद्दत हुई दीदार किये
किस बहाने से बुलाएं उनको ।

वो तो हर बात पे हंस देते हैं
कभी रूठें तो मनाएं उनको ।

ये सितम हमसे न होगा हर्गिज़
कि शबे हिज्र रुलाएं उनको ।

हमने पूछा था सवाल उनसे कभी
याद वो कैसे दिलाएं उनको ।

खुद ग़ज़ल हैं वो हमारे दिल की
क्या हम अब और सुनाएं उनको । 
 
एक हसरत है हमारी  ' तनहा '
अपने सीने से लगाएं उनको । 
 
46  
 
 

      तड़पा ही गया हिज्र में बरसात का आलम ( ग़ज़ल ) 

                           

तड़पा ही गया हिज्र में बरसात का आलम
और उसपे उमड़ते हुए जज़्बात का आलम ।

याद आता है वो वक्ते मुलाकात हमारा
बरसात में भीगे हुए हालात का आलम ।

बस भीगते ही रहने में थी खैर हमारी
बौछार से कम न था शिकायात का आलम ।

दीवाना बनाने हमें रिमझिम में चला है
दुजदीदा निगाहों के इशारात का आलम ।

लफ़्ज़ों में बयाँ कर न सकूँगा मैं सुहाना
भीगी हुई जुल्फों की सियह रात का आलम ।
 
47 
 
 

हम तो जियेंगे शान से ( ग़ज़ल ) 

हम तो जियेंगे शान से
गर्दन झुकाये से नहीं ।

कैसे कहें सच झूठ को
हम ये गज़ब करते नहीं ।

दावे तेरे थोथे हैं सब
लोग अब यकीं करते नहीं ।

राहों में तेरी बेवफा
अब हम कदम धरते नहीं ।

हम तो चलाते हैं कलम
शमशीर से डरते नहीं ।

कहते हैं जो इक बार हम
उस बात से फिरते नहीं ।

माना मुनासिब है मगर
फरियाद हम करते नहीं ।
 
48 
 
 

सब से पहले आपकी बारी ( ग़ज़ल ) 

सब से पहले आप की बारी
हम न लिखेंगे राग दरबारी ।

और ही कुछ है आपका रुतबा
अपनी तो है बेकसों से यारी ।

लोगों के इल्ज़ाम हैं झूठे
आंकड़े कहते हैं सरकारी ।

फूल सजे हैं गुलदस्तों में
किन्तु उदास चमन की क्यारी ।

होते सच , काश आपके दावे
देखतीं सच खुद नज़रें हमारी ।

उनको मुबारिक ख्वाबे जन्नत
भाड़ में जाये जनता सारी ।

सब को है लाज़िम हक़ जीने का
सुख सुविधा के सब अधिकारी ।

माना आज न सुनता कोई
गूंजेगी कल आवाज़ हमारी । 
 
49 
 
 

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं ( ग़ज़ल ) 

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं
शख्स जो सच की राह चलते हैं ।

राहे मंज़िल में उनको होश कहाँ
खार चुभते हैं , पांव जलते हैं ।

गुज़रे बाज़ार से वो बेचारे
जेबें खाली हैं , दिल मचलते हैं ।

जानते हैं वो खुद से बढ़ के उन्हें
कह के नादाँ उन्हें जो चलते हैं ।

जान रखते हैं वो हथेली पर
मौत क़दमों तले कुचलते हैं ।

कीमत उनकी लगाओगे कैसे
लाख लालच दो कब फिसलते हैं ।

टालते हैं हसीं में  वो उनको
ज़ख्म जो उनके दिल में पलते हैं ।  
 
50 
 
 

कहीं न कह दें दिल की बात ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

कहीं न कह दें दिल की बात
बन जाये महफ़िल की बात ।

डूब गई अश्कों के
सागर में साहिल की बात ।

मिलती नहीं ये मांगे से
मौत बड़ी मुश्किल की बात ।

एक ज़माना कातिल है
किससे कहें कातिल की बात ।

ज़हन में भूले भटकों के
उतर गई मंज़िल की बात ।

कहीं न लब पर आ जाये 
मदहोशी में दिल की बात ।

पायल की छमछम में भी
होती है दर्दे दिल की बात । 
 
51 
 

       नफरत के बदले प्यार दिया है हमने ( ग़ज़ल ) 

                        

नफरत के बदले प्यार दिया है हमने
शायद ये कोई जुर्म किया है हमने ।

मरना भी चाहा , मर सके न हम लेकिन
लम्हा लम्हा घुट घुट के जिया है हमने ।

दिल में उठती है टीस सी इक रह रह कर
नाम उसका जो भूले से लिया है हमने ।

तू हमसे ज़िंदगी ,क्यों है बता रूठी सी
ऐसा भी क्या अपराध किया है हमने ।

हमको कातिल कहने वाले , ऐ नादां
तुझ पर आया हर ज़ख्म सिया है हमने ।

उसने अमृत या ज़हर दिया है हमको
जाने क्या यारो , आज पिया है हमने । 
 
साकी बन कर "तनहा" भर दो पैमाना
किस्मत से ख़ाली जाम लिया है हमने । 
 
52 
 
 

        राही नई पुरानी उसी रहगुज़र के हैं ( ग़ज़ल ) 

                           

राही नई पुरानी उसी रहगुज़र के हैं
जिस पर निशान गालिबो दाग़ो जिगर के हैं ।

जाने कहां कहां के हमें जानते हैं लोग
हमको तो ये गुमां था कि तेरे नगर के हैं ।

वो काफिले तो जानिबे मंज़िल चले गये 
बाकी रही है गर्द वहां हम जिधर के हैं ।

मिलते हैं अजनबी की तरह लोग किसलिये 
हम सब तो रहने वाले उसी एक घर के हैं ।

ये दर्दो ग़म भी खुद को करें किस तरह जुदा
रिश्ते हमारे इनसे तो शामो - सहर के हैं । 
 
साहिल की रेत को भी भला इसकी क्या खबर 
बिखरे पड़े हैं जो ये महल किस बशर के हैं । 
 
सुनसान शहर सारा अंधेरा गली गली
थोड़ा जिधर उजाला है "तनहा" उधर के हैं । 
 
53 
 
 

     अब सुना कोई कहानी फिर उसी अंदाज़ में ( ग़ज़ल ) 

                        

अब सुना कोई कहानी फिर उसी अंदाज़ में
आज कैसे कह दिया सब कुछ यहां आगाज़ में ।

आप कहना चाहते कुछ और थे महफ़िल में ,पर
बात शायद और कुछ आई नज़र आवाज़ में ।

कह रहे थे आसमां के पार सारे जाएंगे
रह गई फिर क्यों कमी दुनिया तेरी परवाज़ में ।

दे रहे अपनी कसम रखना छुपा कर बात को
क्यों नहीं रखते यकीं कुछ लोग अब हमराज़ में।

लोग कोई धुन नई सुनने को आये थे यहां
आपने लेकिन निकाली धुन वही फिर साज़ में ।

देखते हम भी रहे हैं सब अदाएं आपकी
पर लुटा पाये नहीं अपना सभी कुछ नाज़ में ।

तुम बता दो बात "तनहा" आज दिल की खोलकर
मत छिपाओ बात ऐसे ज़िंदगी की राज़ में । 
 
54 
 
 

नहीं साथ रहता अंधेरों में साया ( ग़ज़ल ) 

नहीं साथ रहता अंधेरों में साया
हुआ क्या नहीं साथ तुमने निभाया ।

किसी ने निकाला हमें आज दिल से
बड़े शौक से कल था दिल में बिठाया ।

कभी पोंछते जा के आंसू उसी के
था बेबात जिसको तुम्हीं ने रुलाया ।

निभाना वफा तुम नहीं सीख पाये 
तुम्हें जिसने चाहा उसी को मिटाया ।

चले जा रहे थे खुदी को भुलाये
किसी ने हमें आज खुद से मिलाया ।

खड़े हैं अकेले अकेले वहीँ पर
जहाँ आशियाँ इक कभी था बसाया ।

उसे याद रखना हमेशा ही "तनहा"
ज़माने ने तुमको सबक जो सिखाया ।
 
55 
 
 

हम सभी इस तरह बंदगी करते ( ग़ज़ल )

हम सभी इस तरह बंदगी करते
दुश्मनी छोड़ कर दोस्ती करते ।

तुम अगर रूठते हम मना लेते
जो किया था कभी फिर वही करते ।

जी सकेंगे नहीं बिन तुम्हारे हम
इस तरह से नहीं दिल्लगी करते ।

क्यों नहीं छू लिया आसमां तुमने
काम मुश्किल नहीं गर कभी करते ।

छोड़ आये जिसे घर तुम्हारा है
बस यही सोचकर वापसी करते ।

ज़ुल्म सहते रहे हम ज़माने के
पर शिकायत किसी से नहीं करते ।

एक हसरत लिये चल दिये "तनहा"
मत लगाते गले बात ही करते । 
 
56 
 
 

सुनो इक कहानी हमारी ज़ुबानी ( ग़ज़ल ) 

सुनो इक कहानी हमारी जुबानी
नई भी नहीं है न है ये पुरानी ।

किसी ने किसी से किया प्यार इक दिन
रखी है छुपा कर अभी तक निशानी ।

वहीँ पर सुबह से हुई शाम अक्सर
सुहाने थे दिन और रातें सुहानी ।

नहीं भूल सकता कभी वो नज़ारा
किसी में थी देखी नदी की रवानी ।

वो क्या दौर था दोस्तो ज़िंदगी का
लुटा दी किसी ने किसी पर जवानी ।

अजब हाल देखा वहां पर सभी का
वहीं प्यास भी थी जहां पर था पानी ।

इसे तुम जुबां पर कभी भी न लाना
सुना दी है "तनहा" तुम्हें जो कहानी ।
 
57 
 
 

हादिसे इसलिए हैं होने लगे ( ग़ज़ल )

हादिसे इसलिये हैं होने लगे
कश्तियां नाखुदा डुबोने लगे ।

ज़ख्म खा कर भी हम रहे चुप मगर
ज़ख्म दे कर हैं आप रोने लगे ।

कल अभी  आपने  जगाया जिन्हें
देख लो आज फिर से सोने लगे ।

आप मरने की मांगते हो दुआ
खुद पे क्यों  एतबार खोने लगे ।

काम अच्छे नहीं कभी भी किये  
बस  नहा कर हैं पाप धोने लगे ।

लोग खुशियां तलाश करते रहे 
दर्द का बोझ और ढोने लगे ।

फूल देने की बात करते रहे 
खार "तनहा" सभी चुभोने लगे ।
 
58 
 

बहुत खूब समझे इशारा तुम्हारा ( ग़ज़ल ) 

बहुत खूब समझे इशारा तुम्हारा
नहीं अब मिलेगा सहारा तुम्हारा ।

नया और साथी तुम्हें मिल गया है
गया टूट नाता हमारा तुम्हारा ।

हुई भूल हमसे भी कोई तो होगी
नहीं दोष होगा ये सारा तुम्हारा ।

भुला कर हमें मत कभी याद करना
तभी हो सकेगा गुज़ारा तुम्हारा ।

हमारे सितारे रहें गर्दिशों में
चमकता रहे पर सितारा तुम्हारा ।

हमारी नज़र में अभी तक बसा है
था कितना हसीं वो नज़ारा तुम्हारा ।

तुम्हें रात सपने में देखा था "तनहा"
वही नाम फिर था पुकारा तुम्हारा । 
 
59 
 

भुला दें चलो सब पुरानी खताएं ( ग़ज़ल ) 

भुला दें चलो सब पुरानी खताएं
नई अपनी पहचान फिर से बनाएं ।

जो शिकवे गिले हैं निकालें दिलों से
करीब आ के हम हाथ अपने मिलाएं ।

न मुरझाएं चाहे बदल जाए मौसम
हम आँगन में कुछ फूल ऐसे खिलाएं ।

न हम जी सकेंगे न तुम दूर रह कर
तो फिर दूरियां ये न क्यूँ हम मिटाएं ।

हो टूटा हुआ सिलसिला फिर से कायम
हमें तुम बुलाओ तुम्हें हम बुलाएं ।

खताएं हमारी जफ़ाएं तुम्हारी
बहुत हो चुकीं अब चलो मान जाएं ।

ज़मीं आस्मां चाँद तारों के नग्में
फिर इक साथ मिलकर तरन्नुम से गाएं । 
 
60 
 
 
 

पास आया नज़र जो किनारा हमें ( ग़ज़ल ) 

पास आया नज़र जो किनारा हमें
मौज ने दूर फेंका दोबारा हमें ।

ख़ुदकुशी का इरादा किया जब कभी
यूँ लगा है किसी ने पुकारा हमें ।

लड़खड़ाये तो खुद ही संभल भी गए
मिल न पाया किसी का सहारा हमें ।

हो गई अब तो धुंधली हमारी नज़र
दूर से तुम न करना इशारा हमें ।

दुश्मनों से न इतना करम हो सका
हमने चाहा जो मरना न मारा हमें ।

हमको मालूम है मौत देगी सुकूं
ज़िंदगी से मिला बोझ सारा हमें ।

बिन बुलाये यहां आप क्यों आ गये
सबने ' तनहा ' था ऐसे निहारा हमें । 
 
61 
 

 जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए ( ग़ज़ल )

 
जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए
ज़हर कोई न कोई दवा चाहिए ।

और कुछ भी तो हमको तम्मना नहीं
सांस लेने को थोड़ी हवा चाहिए ।

हाल -ए -दिल आ के पूछे हमारा जो खुद
ऐसा भी एक कोई खुदा चाहिए ।म 

अपनों - बेगानों से अब तो दिल भर गया
एक इंसान इंसान सा चाहिए ।

देख कर जिसको मिट जाएं दुनिया के ग़म
कोई मासूम सी वो अदा चाहिए ।

और कुछ भी नहीं है ज़रूरत हमें 
ज़िंदगी के लिए हौसला चाहिए । 
 
हर किसी को न जाने ये क्या हो गया 
सब को ' तनहा ' यहां फ़ासला चाहिए । 
 
62 
 
 

     बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ( ग़ज़ल ) 

                   

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है
जो नहाये न कभी इसमें वही चंगा है।

वह अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये
हाथ अगर उसका छुएं आप तो वो दंगा है।

महकमा आप कोई जा के  कभी तो देखें
जो भी है शख्स उस हम्माम में वो नंगा है।

ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर
दामन इंसाफ का या खून से यूँ रंगा है।

आईना उनको दिखाना तो है उनकी तौहीन
और सच बोलें तो हो जाता वहां पंगा है।

उसमें आईन नहीं फिर भी सुरक्षित शायद
उस इमारत पे हमारा है वो जो झंडा है।

उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़
"लोक" राजा को वो कहता है निपट नंगा है।  
 
63 
 
 

         बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही ( ग़ज़ल ) 

                           

बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही
इस ज़माने की ऐसी रिवायत रही ।

इक हमीं पर न थी उनकी चश्मे करम
सब पे महफ़िल में उनकी इनायत रही ।

हम तो पीते हैं ये ज़हर ,पीना न तुम
उनकी औरों को ऐसी हिदायत रही ।

उड़ गई बस धुंआ बनके सिगरेट का
राख सी ज़िंदगी की हिकायत रही ।

भर के हुक्का जो हाकिम का लाते रहे
उनको दो चार कश की रियायत रही । 
 
अनसुनी बेकसों की रही दास्तां 
ज़ुल्म वालों को मिलती हिमायत रही । 
 
जिनकी झोली थी "तनहा" लबालब भरी 
सब मिले उनकी हसरत निहायत रही । 
 
64 
 
 

उस को यूं हैरत से मत देखा करो ( ग़ज़ल ) 

उस को यूं हैरत से मत देखा करो
ज़िंदगी तो हादिसों का नाम है ।

जिसको ठुकराने चले तुम बिन पढ़े
दोस्ती ही का तो वो पैगाम है ।

उठ गया अब तो जहां से ऐतबार
शहर वालों में ये चर्चा आम है ।

काफिले में चल रहे हैं साथ साथ
अपनी अपनी फिर भी तन्हा शाम है ।

देख कर लाशें कभी रोते नहीं
खोदना ही कब्र उनका काम है ।

"सत्यवादी" कह के हंसता है जहां
बस यही सच कहने का ईनाम  है । 
 
बन गए ' तनहा ' मसीहा तो कई 
हर किसी पर कुछ न कुछ इल्ज़ाम है ।  
 
65 
 

 

रंक भी राजा भी तेरे शहर में ( ग़ज़ल ) 

रंक भी राजा भी तेरे शहर में
मैं कहूं यह  बात तो किस बहर में ।

नाव तूफां से जो टकराती रही
वो किनारे जा के डूबी लहर में ।

ज़ालिमों के हाथ में इंसाफ है
रोक रोने पर भी है अब कहर में ।

मर के भी देते हैं सब उसको दुआ
जाने कैसा है मज़ा उस ज़हर में ।
 
सब कहीं सच ही पराजित हो रहा 
बच सका ज़िंदा कहां इस दहर में । 
 
जगमगाने  लग गईं रातें यहां 
कोहरा छाने लगा पर सहर में । 
 
बिक गया ' तनहा ' यहां सब का इमां  
लोग जाते हैं बदल हर पहर में  । 
 
66 
 
 

        तुम ही न मिले एक ज़माना तो मिला है ( ग़ज़ल ) 

                           

तुम ही न मिले एक ज़माना तो मिला है
ये मेरी वफाओं का मिला खूब सिला है ।

इक बूँद को तरसा किये हम प्यास के मारे
ऐसे तो बरसता न ये सावन से गिला है ।

आती रही यूं तो बहारें ही बहारें
बिन तेरे मगर दिल का कोई फूल खिला है ।

मिल जाते हैं हमदर्द यहां कहने को लेकिन
बांटे भी वो हम किससे जो ग़म तुम से मिला है ।

हंसता है खुदा जाने ये क्यूं हम पे ज़माना
आंसू कोई शायद तेरी पलकों पे ढला है ।

दो पल ही गुज़ारे थे तेरे साथ ब - मुश्किल
इक उम्र बड़ी पा के मगर  ' लोक ' चला है । 
 
67 
 
 

न आयें अगर वो करें क्या बताओ ( ग़ज़ल )

न आएं अगर वो , करें क्या बताओ
वो आएं  , बहाना कुछ ऐसा बनाओ ।

कशिश उनके दिल में भी पैदा करो तुम
उन्हें , वरना तुम , कर के कोशिश भुलाओ ।

मुहब्बत कभी , इस तरह भी हुई है
बुलायें तुम्हें पास , तुम दूर जाओ ।

उसे सिज्दा कर के हुए हम तो काफ़िर
अगर हो सके  , उस खुदा को मनाओ ।

जो उम्मीद टूटी तो फिर होगी मुश्किल
न यूं दिल को झूठे दिलासे दिलाओ ।

जगह दो न दो अपने दिल में हमें तुम
बस इक बार हमसे नज़र तो मिलाओ ।

वो अनजान बनते हैं सब जान कर भी
उन्हें हाल-ए-दिल तुम न 'तनहा' सुनाओ ।  
 
68 
 

दर्द दे कर हमें जो सताये कोई ( ग़ज़ल ) 

दर्द दे कर हमें जो सताये कोई
हम किधर जाएं फिर ये बताये कोई ।

रूठ कर हम तो बैठे हैं इस आस में
हम को अपना समझ कर मनाये कोई ।

दर खुला हमने रक्खा है इस वास्ते
कोई वादा नहीं फिर भी आये कोई ।

बेख्याली में कब जाने किस मोड़ पर
राह में हाथ हमसे मिलाये कोई ।

याद आये किसी की तो भर आये दिल
इस तरह भी न हम को रुलाये कोई ।

अश्क पलकों पे आ कर छलकने लगें
इस कदर आज हमको हंसाये कोई ।

शाम ढलते ही इस धुन में रहते हैं हम
काश पुरदर्द नग्मा सुनाये कोई । 
 
69 
 
 

बहस भ्र्ष्टाचार पर वो कर रहे थे ( ग़ज़ल ) 

बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे
जो दयानतदार थे वो डर रहे थे ।

बाढ़ पर काबू पे थी अब वारताएं
डूब कर जब लोग उस में मर रहे थे ।

पी रहे हैं अब ज़रा थक कर जो दिन भर
मय पे पाबंदी की बातें कर रहे थे ।

खुद ही बन बैठे वो अपने जांचकर्ता
रिश्वतें लेकर जो जेबें भर रहे थे ।

वो सभाएं शोक की करते हैं ,जो कल
कातिलों से मिल के साज़िश कर रहे थे ।

भाईचारे का मिला इनाम उनको
बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे ।  
 
मौज-मस्ती रंग-रलियां ऐश कर के 
देश पर अहसान ' तनहा ' कर रहे थे ।  
 
70 
 
 

      महफ़िल में जिसे देखा तन्हा - सा नज़र आया ( ग़ज़ल ) 

                        

महफ़िल में जिसे देखा तन्हा - सा नज़र आया
सन्नाटा वहां हरसू फैला - सा नज़र आया ।

हम देखने वालों ने देखा यही हैरत से
अनजाना बना अपना , बैठा - सा नज़र आया ।

मुझ जैसे हज़ारों ही मिल जायेंगे दुनिया में
मुझको न कोई लेकिन , तेरा - सा नज़र आया ।

हमने न किसी से भी मंज़िल का पता पूछा
हर मोड़ ही मंज़िल का रस्ता - सा नज़र आया ।

हसरत सी लिये दिल में , हम उठके चले आये
साक़ी ही वहां हमको प्यासा - सा नज़र आया ।   
 
71 
 
 

आपने जब पिलाना छोड़ दिया ( ग़ज़ल ) 

आपने जब पिलाना छोड़ दिया
मयकदे हमने जाना छोड़ दिया ।

रोज़ महफ़िल जमाना छोड़ दिया
घर किसी को बुलाना छोड़ दिया ।

अब कहीं आना जाना छोड़ दिया
आपका आशियाना छोड़ दिया ।

दोस्तों का ठिकाना छोड़ दिया
दुश्मनों से निभाना छोड़ दिया ।

ज़िंदगी को डराना छोड़ दिया
अब ज़हर रोज़ खाना छोड़ दिया ।

चारागर को बुलाना छोड़ दिया
दर्द को खुद बढ़ाना छोड़ दिया ।

गैर सारा ज़माना छोड़ दिया
आज "तनहा" ने माना छोड़ दिया ।
                                                    
(  चारागर = डॉक्टर = चिकित्सक )
 
72 
 
 

मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी ( ग़ज़ल )

मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी
दर्द का इक जाम है ये ज़िंदगी।

याद रहता है हमें जो उम्र भर
मौत का पैगाम है ये ज़िंदगी।

मुस्कुराती सुबह आती है मगर
फीकी फीकी शाम है ये ज़िंदगी।

है कभी फूलों सी कांटों सी कभी
नित नया अंजाम है ये ज़िंदगी।

जानते ये राज़ "तनहा" काश हम
इक बड़ा ईनाम है ये ज़िंदगी। 
 
 
73 
 
 

        बिजलियों का भी धड़का है बरसात में ( ग़ज़ल ) 

                        

बिजलियों का भी धड़का है बरसात में
क्या गज़ब ढाये काली घटा रात में।

कुछ कहा सादगी से भी उसने अगर
राज़ था इक छुपा उसकी हर बात में।

कम नहीं है ज़माने के लोगों से वो
बस लिया देख पहली मुलाक़ात में।

राह तकती किसी की वो छत पर खड़ी
देखा जब भी उसे चांदनी रात में।

हारते सब रहे इस अजब खेल में
लोग उलझे रहे यूँ ही शह-मात में। 
 
74 
 
 

आई हमको न जीने की कोई अदा ( ग़ज़ल ) 

आई हमको न जीने की कोई अदा
हम ने पाई है सच बोलने की सज़ा ।

लब पे भूले से किसका ये नाम आ गया
जो हुए बज़्म के लोग मुझ से खफ़ा ।

जो करें भी शिकायत तो किस बात की 
क़त्ल करना किसी को है उनकी अदा ।

हो गया जीना इन्सां का मुश्किल यहां
इतने पैदा हुए हैं जहां में खुदा ।

हैं कुछ ऐसे भी इस दौर के चारागर               
 
ज़हर भी जो पिलाते हैं कह कर दवा ।
 
( चारागर = चिकित्सक )


कौन हैं और रहते कहां आजकल 
भूल हम खुद गए क्या हमारा पता ।
 
सब वफ़ादार खुद को समझते यहां 
हैं सभी लोग ' तन्हा ' मगर बेवफ़ा ।  
 
75 
 
 

         इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का ( ग़ज़ल ) 

                       

इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का
अब तो होने लगा कारोबार सच का ।

हर गली हर शहर में देखा है हमने ,
सब कहीं पर सजा है बाज़ार सच का ।

ढूंढते हम रहे उसको हर जगह , पर
मिल न पाया कहीं भी दिलदार सच का ।

झूठ बिकता रहा ऊंचे दाम लेकर
बिन बिका रह गया था अंबार सच का ।

अब निकाला जनाज़ा सच का उन्होंने
खुद को कहते थे जो पैरोकार सच का ।

कर लिया कैद सच , तहखाने में अपने
और खुद बन गया पहरेदार सच का ।

सच को ज़िन्दा रखेंगे कहते थे सबको
कर रहे क़त्ल लेकिन हर बार सच का ।

हो गया मौत का जब फरमान जारी
मिल गया तब हमें भी उपहार सच का ।

छोड़ जाओ शहर को चुपचाप ' तनहा '
छोड़ना गर नहीं तुमने प्यार सच का ।  
 
76 
 
 

लिखी फिर किसी ने कहानी वही है ( ग़ज़ल )

लिखी फिर किसी ने कहानी वही है
मुहब्बत की हर इक निशानी वही है ।

सियासत में देखा अजब ये तमाशा
नया राज है और रानी वही है ।

हमारे जहां में नहीं कुछ भी बदला
वही चोर , चोरों की नानी वही है ।

जुदा हम न होंगे जुदा तुम न होना
हमारे दिलों ने भी ठानी वही है ।

कहां छोड़ आये हो तुम ज़िंदगी को
बुला लो उसे ज़िंदगानी वही है ।

खुदा से ही मांगो अगर मांगना है
भरे सब की झोली जो दानी वही है ।

घटा जम के बरसी , मगर प्यास बाकी
बुझाता नहीं प्यास , पानी वही है । 
 
77 
 
 

बड़े लोग ( नज़्म )

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और

आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं ।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे

किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं ।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे

ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं ।  
 
78 
 
 

 सभी कुछ था मगर पैसा नहीं था ( ग़ज़ल ) 

सभी कुछ था मगर पैसा नहीं था
कोई भी अब तो पहला-सा नहीं था ।

गिला इसका नहीं बदला ज़माना
मगर वो शख्स तो ऐसा नहीं था ।

खिला इक फूल तो बगिया में लेकिन
जो हमने चाहा था वैसा नहीं था ।

न पूछो क्या हुआ भगवान जाने
मैं कैसा था कि मैं कैसा नहीं था ।

जो देखा गौर से उस घर को मैंने
लगा मुझको वो घर जैसा नहीं था ।
  
 
यही अपना जहां था खूबसूरत 
गरीबी भूख थी रैसा नहीं था ।        
 
( रैसा : कलह , झगड़ा , लड़ाई युद्ध , टंटा )
 
समझ बैठे थे ' तनहा ' सब को अपना 
था जैसे को मिला तैसा नहीं था । 
 
(   तैसा  :  उस जैसा )
 
79 
 
 

      अपने हो कर भी हम से वो अनजान थे ( ग़ज़ल ) 

                           

अपने हो कर भी हम से वो अनजान थे
बिन बुलाये- से हम एक मेहमान थे ।

रख दिये  इक कली के मसल कर सभी
फूल बनने के उसके जो अरमान थे ।

था तआरूफ तो कुछ और ही आपका
अपना क्या हम तो सिर्फ एक इंसान थे ।

हम समझ कर गये थे उन्हें आईना
वो तो अपनी ही सूरत पे कुर्बान थे ।

ग़म ज़माने के लिखते रहे उम्र भर
खुद जो एहसास-ए-ग़म से भी अनजान थे ।

आदमी नाम हमने उन्हें दे दिया
आदमी की जो सूरत में शैतान थे ।

महफिलों से निकाला बुला कर हमें
कद्रदानों के हम पर ये एहसान थे ।   
 
80 
 
 

झूठ को सच करे हुए हैं लोग ( ग़ज़ल )

झूठ को सच करे हुए हैं लोग
बेज़ुबां कुछ डरे हुए हैं लोग ।

नज़र आते हैं चलते फिरते से
मन से लेकिन मरे हुए हैं लोग ।

उनके चेहरे हसीन हैं लेकिन
ज़हर अंदर भरे हुए हैं लोग ।

गोलियां दागते हैं सीनों पर
बैर सबसे करे हुए हैं लोग ।

शिकवा उनको है क्यों ज़माने से
खुद ही बिक कर धरे हुए हैं लोग ।

जितना उनके करीब जाते हैं
उतना हमसे परे हुए हैं लोग । 
 
आज़माया उन्हें बहुत "तनहा" 
पर न साबित खरे हुए हैं लोग । 
 
81 
 
 

सपने हमारे सच अगर होते नहीं ( ग़ज़ल )

सपने हमारे सच अगर होते नहीं
हम मुस्कुराते हैं कभी रोते नहीं ।

हैं तीरगी से प्यार करने लग गये
अब रात भर कुछ लोग हैं सोते नहीं ।

हो राह ग़म की या ख़ुशी की हो डगर
बस ज़िंदगी में नाखुदा होते नहीं ।

तुम मत समझ लेना उसे इक बागबां
जो फूल चुनते हैं मगर बोते नहीं ।

जीना यहीं है और मरना भी यहीं
पर ज़िंदगी में और समझौते नहीं ।

"तनहा" रहो आज़ाद उनकी कैद से
जैसे भी हो, अपनी खुदी खोते नहीं ।
 
82 
 
 

अनबुझी इक प्यास हैं ( ग़ज़ल ) 

अनबुझी इक प्यास हैं
बन चुके इतिहास हैं ।

जब बराबर हैं सभी
कुछ यहां क्यों ख़ास हैं ।

जुगनुओं को देख लो
रौशनी की आस हैं ।

कह रहा खुद आसमां
हम जमीं के पास हैं ।

नाम उनका है खिज़ा
कह रहे मधुमास हैं ।
       
लोग हर युग में रहे
झेलते बनवास हैं ।

हादिसे आने लगे
अब हमें कुछ रास हैं ।

बेटियां बनने लगी
सास की अब सास हैं ।

कह रहे "तनहा" किसे
हम तुम्हारे दास हैं । 
 
83 
 
 

बस यही इक करार बाकी है ( ग़ज़ल ) 

बस यही इक करार बाकी है
मौत का इंतज़ार बाकी है ।

खेलने को सभी खिलाड़ी हैं
पर अभी जीत हार बाकी है ।

दिल किसी का अभी धड़कता है
आपका इख्तियार बाकी है ।

मय पिलाई कभी थी नज़रों से
आज तक भी खुमार बाकी है ।

दोस्तों में वफ़ा कहां बाकी
बस दिखाने को प्यार बाकी है ।

साथ देते नहीं कभी अपने
इक यही एतबार बाकी है ।

हारना मत कभी ज़माने से
अब तलक आर पार बाकी है ।

लोग सब आ गये जनाज़े पर
बस पुराना वो यार बाकी है ।

चैन आया कहां अभी "तनहा"
कुछ दिले-बेकरार बाकी है । 
 
84 
 

जो देश में हो वो होने दो ( ग़ज़ल ) 

जो देश में हो वो होने दो
पहरेदारों को    सोने दो ।

कानून उधर काम अपना करे
अपराध इधर कुछ होने दो ।

लोग उनको झुक के सलाम करें
ये नशा भी उनको होने दो ।

तब होगा बचाव का काम शुरू
घर बाढ़ को और डुबोने दो ।

वो कुछ न हकीक़त जान सकें
ख्वाबों में उन्हें तो खोने दो ।

रहने दो न क़त्ल का कोई निशां
उन्हें खून के धब्बे धोने दो ।

क्यों फ़िक्र है इतनी जनता की
जनता    रोती है   , रोने दो ।  
 
85 
 

 

सरकार है बेकार है लाचार है ( ग़ज़ल )

सरकार है  , बेकार है , लाचार है
सुनती नहीं जनता की हाहाकार है ।

फुर्सत नहीं समझें हमारी बात को
कहने को पर उनका खुला दरबार है ।

रहजन बना बैठा है रहबर आजकल
सब की दवा करता जो खुद बीमार है ।

जो कुछ नहीं देते कभी हैं देश को
अपने लिए सब कुछ उन्हें दरकार है ।

इंसानियत की बात करना छोड़ दो
महंगा बड़ा सत्ता से करना प्यार है ।

हैवानियत को ख़त्म करना आज है
इस बात से क्या आपको इनकार है ।

ईमान बेचा जा रहा कैसे यहां
देखो लगा कैसा यहां बाज़ार है ।

है पास फिर भी दूर रहता है सदा
मुझको मिला ऐसा मेरा दिलदार है ।

अपना नहीं था ,कौन था देखा जिसे
"तनहा" यहां अब कौन किसका यार है ।  
 
86 
 
 

मिलने को दुनिया में क्या न मिला ( ग़ज़ल )

मिलने को दुनिया में क्या न मिला
मझधार में नाखुदा न मिला ।

सब को दिखाई थी राह मगर
मंज़िल का अपनी पता न मिला ।

हमने बनाये थे घर तो कई
इक दिन हमें आसरा न मिला ।

ढूंढा किताबों में हमने बहुत
जीने का पर फ़लसफ़ा न मिला ।

चलता रहे साथ साथ मिरे
अब तक वही हमनवा न मिला ।

मिल के रहें लोग सब जिस में
उस घर का "तनहा" पता न मिला । 
 
87 
 
 

     सभी को दास्तां अपनी बयां करना नहीं आता ( ग़ज़ल ) 

                         

सभी को दास्तां अपनी ,  बयां करना नहीं आता
कभी आता नहीं लिखना , कभी पढ़ना नहीं आता ।

बड़ी ऊंची उड़ाने लोग भरते हैं , मगर सोचें
जमीं पर आएंगे कैसे अगर गिरना नहीं आता ।

कभी भी मांगने से मौत दुनिया में नहीं मिलती
हमें जीना ही पड़ता है , अगर मरना नहीं आता ।
 
हमेशा दौड़ने वालो , रुको ठहरो कभी सोचो  
सभी को साथ लेकर आपको चलना नहीं आता ।

हमें सूली पे चढ़ने का , नहीं लगता ज़रा भी डर 
हक़ीक़त जानकर यूं ही गुमां कहना नहीं आता ।
 
ख़ुशी के सौ बहाने , लोग कैसे ढूंढ लेते हैं  
परेशां देख कर दुनिया को खुश रहना नहीं आता ।

तमाशा बन गए  ' तनहा '  तमाशा देखने वाले
तमाशे मत दिखाएं  खुद जिन्हें  बनना नहीं आता । 
 
88 
 
 

हमें आज खुद से हुई तब मुहब्बत ( ग़ज़ल ) 

हमें आज खुद से हुई तब मुहब्बत
किसी दिलरुबा की मिली जब मुहब्बत ।

गये भूल जैसे सभी लोग जीना
कहो जा के उनसे करें सब मुहब्बत ।

नहीं मिल रहा है सभी ढूंढते हैं
मिलेगा खुदा जब बनी रब मुहब्बत ।

चले जो मिटाने वो खुद मिट गये थे
कोई लाख चाहे मिटी कब मुहब्बत ।

सिखाया है उनको यही बोलना बस
कहेंगे हमेशा मेरे लब मुहब्बत ।

नहीं नफरतों से मिलेगा कभी कुछ
उसे छोड़ कर तुम करो अब मुहब्बत ।

किसे चाहते हो किसे दिल दिया है
कहेगी किसी से किसी शब मुहब्बत ।

वही ज़िंदगी प्यार जिसमे भरा हो
है जीने का "तनहा" यही ढब मुहब्बत । 
 
89 
 
 

बना लो सभी के दिलों को ठिकाना ( ग़ज़ल )

बना लो सभी के दिलों को ठिकाना
तुम्हें याद करता रहेगा ज़माना।

कभी काम ऐसा नहीं दोस्त करते
जिसे खुद बनाया उसी को मिटाना।

बहुत दूर मंज़िल ,हैं राहें भी मुश्किल
न रुकना कभी तुम तुम्हें चलते जाना।

इबादत तो कोई तिजारत नहीं है
सभी को पता है न कोई भी माना।

हमें कल था आना ,नहीं आ सके पर
यही हर किसी से सुना है बहाना।

अभी साथ तेरा सभी लोग देते
न कोई भी आए हमें तब बुलाना।

वहीं जाल होगा शिकारी किसी का
नज़र आ रहा है जहां पर भी दाना।

बड़ी रौनकें कल यहां पर लगी थी
हुआ आज वीरान क्यों कर बताना।

रहा जगता रात भर आज "तनहा"
अभी सो रहा है न उसको जगाना।
 
90 
 
 

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे ( नज़्म )  

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे
मौत दे मुझको मगर ऐसी सज़ा न दे ।

उम्र भर चलता रहा हूं शोलों पे मैं
न बुझा इनको ,मगर अब तू हवा न दे ।

जो सरे आम बिके नीलाम हो कभी
सोने चांदी से तुले ऐसी वफ़ा न दे ।

आ न पाऊंगा यूं तो तिरे करीब मैं
मुझको तूं इतनी बुलंदी से सदा न दे ।

दामन अपना तू कांटों से बचा के चल
और फूलों को कोई शिकवा गिला न दे ।

किस तरह तुझ को सुनाऊं दास्ताने ग़म
डरता हूं मैं ये कहीं तुझको रुला न दे ।

ज़िंदगी हमसे रहेगी तब तलक खफा
जब तलक मौत हमें आकर सुला न दे ।  
 
91 
 
 

गर्दिश में मुझे यूं छोड़ के जाने वाले ( नज़्म )  

गर्दिश में मुझे यूं छोड़ के जाने वाले
ले ,छोड़ गए तुझको भी ज़माने वाले ।

मुझको भी आया अब तो आंसू पीना
तेरा अहसां है मुझको रुलाने वाले ।

होने वाले वो कब हैं किसी के यारो
बाज़ार मुहब्बत का ये सजाने वाले ।

हो कर बेज़ार ये आखिर क्यों रोते हैं
खुद कर के सितम यूं हमको सताने वाले ।

यूं तो रह जाते न हम सब "तनहा"
जो न रूठे होते वो हमको मनाने वाले । 
 
92 
 
 

 इश्क़ का हो इज़हार , बहुत मुश्किल है ( नज़्म ) 

इश्क का हो इज़हार ,बहुत मुश्किल है
दुहरी इस की धार ,बहुत मुश्किल है ।

जीत न पाया दिल के खेल में कोई
जीत के भी है हार , बहुत मुश्किल है ।

हो न अगर दीदार तो घबराये दिल
होने पर दीदार बहुत मुश्किल है ।

इस को खेल न तुम बच्चों का जानो
दुनिया वालो प्यार बहुत मुश्किल है ।

इश्क का दुश्मन है ये ज़माना लेकिन
कोई नहीं है यार , बहुत मुश्किल है ।

तूने किसी का दिल तोड़ा है बेदर्दी
टुकड़े हुए हैं हज़ार , बहुत मुश्किल है ।

प्यार तो अफसाना है एक नज़र का
होता है एक ही बार , बहुत मुश्किल है ।

देर से आने की है उनकी आदत
हम हैं इधर बेज़ार , बहुत मुश्किल है ।

कहते हैं वो तुम बिन मर जाएंगे
जां देना , सरकार , बहुत मुश्किल है । 
 
93 
 
 

तुम मिरे ग़म में शामिल नहीं हो ( नज़्म ) 

तुम मिरे ग़म में शामिल नहीं हो
इक तुम्हीं मुझ को हासिल नहीं हो ।
 
जान कुर्बान की जिस ने तुम पर
कैसे तुम उसके कातिल नहीं हो ।
 
जो कहे आईना ,  मान लेंगे
तुम मुहब्बत के काबिल नहीं हो ।

जान पाओगे तुम खुद को क्योंकर
खुद ही अपने मुक़ाबिल नहीं हो ।

दिल पे गुज़रती है जो बेरुखी से
उस से तुम भी तो गाफ़िल नहीं हो ।
 
बेमुरव्वत हो ऊपर से लेकिन
सच कहो साहिबे-दिल नहीं हो ।

तुम ज़रा अपने दिल से ये पूछो
मेरी कश्ती के साहिल नहीं हो ।

देख कर तुमको ये सोचता हूं
क्या तुम्हीं मेरी मंज़िल नहीं हो । 
 
94 
 
 

फिर नये सिलसिले क्या हुए ( ग़ज़ल ) 

फिर नये सिलसिले क्या हुए
सब पुराने गिले क्या हुए ।

बीज बोये थे फूलों के सब 
गुल नहीं पर खिले क्या हुए ।

इक अकेला मुसाफिर बचा
थे कई काफिले क्या हुए ।

बात तक जब  नहीं हो सकी 
यार बिछुड़े मिले क्या हुए ।

देखने सब उधर लग गये  
उनके पर्दे हिले क्या हुए ।

इश्क ने तोड़ डाले सभी 
आपके सब किले क्या हुए ।

साथ "तनहा" नहीं रह सके
खत्म फिर फासिले क्या हुए । 
 
95 
 
 

 मत ये पूछो कि क्या हो गया ( ग़ज़ल ) 

मत ये पूछो कि क्या हो गया
बोलना सच ,  खता हो गया ।

जो कहा भाई को भाई तो 
मुझ से बेज़ार-सा हो गया । 
 
आदमी बन सका तो नहीं
कह रहा मैं खुदा हो गया ।

अब तो मंदिर ही भगवान से 
क़द में कितना बड़ा हो गया ।

उस से डरता है भगवान भी 
देख लो क्या से क्या हो गया । 
 
घर ख़ुदा का जलाकर कोई 
आज बंदा ख़ुदा हो गया ।
 
भीख लेने लगे लगे आजकल 
इन अमीरों को क्या हो गया ।

नाज़ जिसकी  वफाओं पे था
क्यों वही बेवफा हो गया ।

दर-ब-दर को दुआ कौन दे
काबिले बद-दुआ हो गया ।

राज़ की बात इतनी सी है 
सिलसिला हादिसा हो गया । 

कुछ न "तनहा" उन्हें कह सका
खुद गुनाहगार-सा हो गया ।  
 
96 
 

 दर्द को गुज़रे ज़माने हैं बहुत ( ग़ज़ल ) 

दर्द को गुज़रे ज़माने हैं बहुत
बेमुरव्वत दोस्ताने हैं बहुत ।

हो गये दो जिस्म यूं तो एक जां
फासले अब भी मिटाने हैं बहुत ।

दब गये ज़ख्मों की सौगातों से हम
और भी अहसां उठाने हैं बहुत ।

मिल न पाए ज़िंदगी के काफ़िये
शेर लिख - लिख कर मिटाने हैं बहुत ।

हादिसे हैं फिर वही चारों तरफ 
हां , मगर किस्से पुराने हैं बहुत । 
 
हम खिज़ाओं का गिला करते नहीं 
फूल गुलशन में खिलाने हैं बहुत । 
 
कह रहे , हमको बुलाओ तो सही 
पर , न आने को बहाने हैं बहुत । 
 
ज़िंदगी ठहरी नहीं अपनी कहीं 
बेठिकानों के , ठिकाने हैं बहुत । 
 
वक़्त की रफ़्तार से "तनहा" चलो 
फिर , सभी मौसम सुहाने हैं बहुत। 
 
97 
 
 

दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये ( ग़ज़ल ) 

दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये 
और क्या चाहिये शायरी के लिये ।

उसके आंसू बहे , ज़ख्म जिसको मिले
कौन रोता भला अब किसी के लिये ।

जी न पाये मगर लोग जीते रहे
सोचते बस रहे ख़ुदकुशी के लिये ।

शहर में आ गये गांव को छोड़ कर
अब नहीं रास्ता वापसी के लिये ।

इस ज़माने से मांगी कभी जब ख़ुशी
ग़म हज़ारों दिये इक ख़ुशी के लिये ।

तब बताना हमें तुम इबादत है क्या
मिल गया जब खुदा बंदगी के लिये ।

आप अपने लिए जो न "तनहा" किया
आज वो कर दिया अजनबी के लिये । 
 
98 
 
 

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर ( ग़ज़ल )

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर
हमारा भी इक दोस्त होगा कहीं पर ।

यही काम करता रहा है ज़माना
किसी को उठा कर गिराना ज़मीं पर ।

गिरे फूल  आंधी में जिन डालियों से 
नये फूल आने लगे फिर वहीं पर ।

वो खुद रोज़ मिलने को आता रहा है
बुलाते रहे कल वो आया नहीं पर ।

किसी ने लगाया है काला जो टीका
लगा खूबसूरत बहुत उस जबीं पर ।

भरोसे का मतलब नहीं जानते जो
सभी को रहा है यकीं क्यों उन्हीं पर ।

रखा था बचाकर बहुत देर "तनहा"
मगर आज दिल आ गया इक हसीं पर । 
 
99 
 
 

गए भूल हम ज़िन्दगानी की बातें ( ग़ज़ल ) 

गए भूल हम ज़िन्दगानी की बातें
सुनाते रहे बस कहानी की बातें ।

तराशा जिन्हें हाथ से खुद हमीं ने
हमें पूछते अब निशानी की बातें ।

गये डूब जब लोग गहराईयों में
तभी जान पाये रवानी की बातें ।

रही याद उनको मुहब्बत हमारी
नहीं भूल पाये जवानी की बातें ।

हमें याद सावन की आने लगी है
चलीं आज ज़ुल्फों के पानी की बातें ।

गये भूल देखो सभी लोग उसको
कभी लोग करते थे नानी की बातें ।

किसी से भी "तनहा" कभी तुम न करना
कहीं भूल से बदगुमानी की बातें । 
 
100 
 

बहाने अश्क जब बिसमिल आये ( ग़ज़ल ) 

बहाने अश्क जब बिसमिल आये 
सभी कहने लगे पागल आये ।

हुई इंसाफ की बातें लेकिन
ले के खाली सभी आंचल आये ।

सभी के दर्द को अपना समझो
तुम्हारी आंख में भर जल आये ।

किसी की मौत का पसरा मातम
वहां सब लोग खुद चल चल आये ।

भला होती यहां बारिश कैसे
थे खुद प्यासे जो भी बादल आये ।

कहां सरकार के बहते आंसू
निभाने रस्म बस दो पल आये ।

संभल के पांव को रखना "तनहा"
कहीं सत्ता की जब दलदल आये । 
 
101 
 
 

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी ( ग़ज़ल ) 

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी
बस सलामत रहे दोस्ती हमारी ।

ग़म किसी के सभी हो गए हमारे
और उसकी ख़ुशी अब ख़ुशी हमारी ।

अब नहीं मांगना और कुछ खुदा से
झूमने लग गई ज़िंदगी हमारी ।

क्या पिलाया हमें आपकी नज़र ने
ख़त्म होती नहीं बेखुदी हमारी ।

याद रखनी हमें आज की घड़ी है
जब मुलाक़ात हुई आपकी हमारी ।

आपके बिन नहीं एक पल भी रहना
अब यही बन गई बेबसी हमारी ।

जाम किसने दिया भर के आज "तनहा"
और भी बढ़ गई तिश्नगी हमारी । 
 
102 
 

खुद को कितना तबाह कर बैठे ( ग़ज़ल )

खुद को कितना तबाह कर बैठे
हम ये कैसा गुनाह कर बैठे ।

कर रही ज़िंदगी यही शिकवा
क्यों उसे हम फनाह कर बैठे ।

देखकर आपके सितम हम पर
आज दुश्मन भी आह कर बैठे ।

उनके आने से जम गई महफ़िल
उस तरफ सब निगाह कर बैठे ।

ग़ज़ल हमने उन्हें सुनाई थी
लोग सारे ही वाह कर बैठे ।

दे रहा हर किसी को धोखा जो
तुम उसी की हो चाह कर बैठे ।

राह चलता रहा वही "तनहा"
लोग सब और राह कर बैठे । 
 
103 
 
 

 हद से अब तो गुज़र गये हैं लोग ( ग़ज़ल )

हद से अब तो गुज़र गये हैं लोग
जाने क्यूँ सच से डर गये  हैं लोग ।

हमने ये भी तमाशा देखा है
पी के अमृत भी मर गये  हैं लोग ।

शहर लगता है आज वीराना
कौन जाने किधर गये  हैं लोग ।

फूल गुलशन में अब नहीं खिलते
ज़ुल्म कुछ ऐसा कर गये  हैं लोग ।

ये मरुस्थल की मृगतृष्णा है
पानी पीने जिधर गये हैं लोग । 
 
104 
 

बात पूछो न हम अदीबों की ( ग़ज़ल )    

बात पूछो न हम अदीबों की
खाक उड़ जाएगी उमीदों की ।

क्यों सज़ा बेगुनाह पाते हैं
आह निकली कई सलीबों की ।

दौलतों से ख़ुशी नहीं मिलती 
बात झूठी नहीं फकीरों की ।
 
घर बनाएं कहीं पहाड़ों पर  
छांव मिलती जहां चिनारों की ।

याद अब तक बहुत सताती है
दिलरुबा की हसीं अदाओं की ।

बात मेरी कभी सुनो मुझ से
फिर सज़ा दो मुझे गुनाहों की ।

तुम जिसे ढूंढते रहे "तनहा" 
उड़ गई राख तक वफ़ाओं की । 
 
105 
 
 

किसे आज जीना , किसे रोज़ मरना   ( ग़ज़ल )  

किसे आज  जीना , किसे रोज़ मरना 
यही काम आता सियासत को करना ।

नहीं आप को गर है बेमौत मरना 
पड़ेगा सभी हुक्मरानों से डरना ।
 
अगर झूठ उनके बुरे लग रहे हैं 
न बोलो कभी सच है उनको अखरना ।

किनारे उन्हीं के हैं पतवार जिन की  
उसी को डुबोते , जिसे पार करना ।
 
भला प्यास सत्ता की बुझती कभी है   
बहाकर लहू जाम उनको है भरना ।

लुभाती सभी को हैं उनकी अदाएं 
बहुत खूब उनका है सजना संवरना ।

बड़ी बेरहम अब सियासत है ' तनहा '
न उनकी गली से कभी तुम गुज़रना ।  
 
106 
 
 

नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी है ( ग़ज़ल )

नाम पर तहज़ीब के ,   बेहूदगी है 
रौशनी समझे जिसे सब , तीरगी है ।

सांस लेना तक हुआ मुश्किल यहां पर
इस तरह जीना भी , कोई ज़िंदगी है ।

सब कहीं आते नज़र हमको वही हैं 
आग उनके इश्क की ऐसी लगी है ।

कह दिया कैसे नहीं कोई किसी का 
तोड़ दिल देती तुम्हारी दिल्लगी है ।

पौंछते हैं हाथ से आंसू किसी के 
और हो जाती हमारी  बंदगी है ।

सब हसीनों की अदाओं पर हैं मरते 
भा गई मुझको तुम्हारी सादगी है ।

मयकदा सारा हमें "तनहा" पिला दो
आज फिर से प्यास पीने की जगी है ।
 
107 
 
 

जनाज़े पे मेरे तुम्हें भी है आना ( ग़ज़ल )   

जनाज़े पे मेरे तुम्हें भी है आना
नहीं भूल जाना ये वादा निभाना ।

लगे प्यार करने यकीनन किसी को
कहां उनको आता था आंसू बहाना ।

तुम्हें राज़ की बात कहने लगे हैं
कहीं सुन न ले आज ज़ालिम ज़माना ।

बनाकर नई राह चलते रहे हैं
नहीं आबशारों का कोई ठिकाना ।

हमें देखना गांव अपना वही था
यहां सब नया है, नहीं कुछ पुराना ।

उन्हें घर बुलाते, थी हसरत हमारी
कसम दे गये, अब हमें मत बुलाना ।

मिले ज़िंदगी गर किसी रोज़ "तनहा"
मनाकर के लाना , हमें भी मिलाना ।
 
108 
 
 

लोग कितना मचाये हुए शोर हैं ( ग़ज़ल )     

लोग कितना मचाये हुए शोर हैं
एक बस हम खरे और सब चोर हैं ।

साथ दुनिया के चलते नहीं आप क्यों
लोग सब उस तरफ , आप इस ओर हैं ।

चल रही है हवा , उड़ रही ज़ुल्फ़ है
लो घटा छा गई ,  नाचते मोर हैं ।

हाथ जोड़े हुए मांगते वोट थे
मिल गई कुर्सियां और मुंहजोर हैं ।

क्या हुआ है नहीं कुछ बताते हमें 
नम हुए किसलिए आंख के कोर हैं ।

सब ये इलज़ाम हम पर लगाने लगे
दिल चुराया किसी का है , चितचोर हैं ।

टूट जाये अगर फिर न "तनहा" जुड़े
यूं नहीं खींचते , प्यार की डोर हैं । 
 
109 
 

  सर कहीं पर झुकाना न आया ( ग़ज़ल )   

सर कहीं पर झुकाना न आया
उस खुदा को मनाना न आया ।

लोग नाराज़ हों या कि खुश हों
झूठ को सच बताना न आया ।

दोस्ती प्यार मज़हब था सबका
फिर वो गुज़रा ज़माना न आया ।

रात दिन याद करते हैं तुझको
प्यार हमको भुलाना न आया ।

ज़ख्म अपने भरें भी तो कैसे 
चारागर को दिखाना न आया ।

प्यार के गीत रहते ज़ुबां पर
और कोई तराना न आया ।

जां उसी की अमानत है "तनहा"
हर किसी पर लुटाना न आया । 
 
110 
 

तुम्हारा सभी से बड़ा दोस्ताना ( ग़ज़ल )    

तुम्हारा सभी से बड़ा दोस्ताना
किसी रोज़ मिलने हमें भी तो आना ।

हुई भूल कैसी ,जुदा हो गये हम
थे जब साथ दोनों समां था सुहाना ।

यही इश्क होता है , मिलने को उनसे
बिना नाखुदा के नदी पार जाना ।

निराली हैं कितनी अदाएं तुम्हारी
हमें देखना , हम से नज़रें चुराना ।

कहा था मेरा हाथ हाथों में लेकर
किया आपने क्या ,पड़ा दिल लगाना ।

हमें चांद तारों से मतलब नहीं था
उन्हें देखने का था बस इक बहाना ।

महीवाल सोहनी मिले आज फिर से
हुआ प्यार "तनहा" कभी क्या पुराना । 
 
111 
 
 

बात हर इक छुपाने लगा मैं ( ग़ज़ल ) 

बात हर इक छुपाने लगा मैं
कुछ हुआ ,कुछ बताने लगा मैं ।

देखकर जल गये लोग कितने
जब कभी मुस्कुराने लगा मैं ।

सब पुरानी भुलाकर के बातें
दिल किसी से लगाने लगा मैं ।

मयकदे से पिये बिन हूं लौटा
किसलिये  डगमगाने लगा मैं ।

बात करने लगे दिलजलों की
फिर उन्हें याद आने लगा मैं ।

बेवफ़ा खुद मिलाता है नज़रें
और नज़रें झुकाने लगा मैं ।

ख़त जलाकर सभी आज "तनहा"
हर निशां तक मिटाने लगा मैं ।  
 
112 
 
 

     ज़माना झूठ कहता है  ज़माने का है क्या कहना ( ग़ज़ल ) 

                

ज़माना झूठ कहता है , ज़माने का है क्या कहना
तुम्हें खुद तय ये करना है , किसे क्यों कर खुदा कहना ।

जहां सूरज न उगता हो , जहां चंदा न उगता हो
वहां करता उजाला जो , उसे जलता दिया कहना ।

नहीं कोई भी हक देंगे , तुम्हें खैरात बस देंगे
वो देने भीख आयें जब , हमें सब मिल गया कहना ।

तुम्हें ताली बजाने को , सभी नेता बुलाते हैं
भले कैसा लगे तुमको , तमाशा खूब था कहना ।

नहीं जीना तुम्हारे बिन , कहा उसने हमें इक दिन
उसे चाहा नहीं लेकिन , मुहब्बत है पड़ा कहना ।

हमें इल्ज़ाम हर मंज़ूर होगा , आपका लेकिन
मेरी मज़बूरियां समझो अगर , मत बेवफ़ा कहना ।

हमेशा बस यही मांगा , तुम्हें खुशियां मिलें  ' तनहा ' 
हुई पूरी तुम्हारे साथ मांगी ,  हर दुआ कहना ।
 
113 
 
 

      खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता ( ग़ज़ल ) 

                     

खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता
हो जीना मौत से बदतर , न इतनी बेबसी देता ।

मुहब्बत दे नहीं सकते अगर , नफरत नहीं करना
यही मांगा सभी से था , नहीं कोई यही देता ।

नहीं कोई भी मज़हब था , मगर करता इबादत था
बनाकर कश्तियां बच्चों को हर दिन कागज़ी देता ।

कहीं दिन तक अंधेरे और रातें तक कहीं रौशन
शिकायत बस यही करनी , सभी को रौशनी देता ।

हसीनों पर नहीं मरते , मुहब्बत वतन से करते
लुटा जां देश पर आते , वो ऐसी आशिकी देता ।

हमें इक बूंद मिल जाती , हमारी प्यास बुझ जाती
थी शीशे में बची जितनी , पिला हमको वही देता ।

कभी कांटा चुभे ऐसा , छलकने अश्क लग जाएं
चले आना यहां "तनहा" है फूलों सी नमी देता । 
 
 
 114 
 
 

आबरू तार तार खबरों में ( ग़ज़ल )      

आबरू तार तार ख़बरों में
आदमी शर्मसार ख़बरों में ।

शहर बिकने चला खरीदोगे
लो पढ़ो इश्तिहार ख़बरों में ।

नींद क्या चैन तक गवा बैठे
लोग सब बेकरार ख़बरों में ।

देख सरकार सो गई शायद
मच रही लूट मार ख़बरों में ।

आमने सामने नहीं लड़ते
कर रहे आर पार ख़बरों में ।

झूठ को सच बना दिया ऐसे
दोहरा बार बार ख़बरों में ।

नासमझ कौन रह गया "तनहा"
सब लगें होशियार ख़बरों में । 
 
115 
 
 

सभी को हुस्न से होती मुहब्बत है ( ग़ज़ल )   

सभी को , हुस्न से होती मुहब्बत है
हसीं कितनी हसीनों की शिकायत है ।

भला दुनिया उन्हें कब याद रखती है
कहानी बन चुकी जिनकी हक़ीकत है ।

है गुज़री इस तरह कुछ ज़िंदगी अपनी
हमें जीना भी लगता इक मुसीबत है ।

उन्हें आया नहीं बस दोस्ती करना
किसी से भी नहीं बेशक अदावत है ।

वो आकर खुद तुम्हारा हाल पूछें जब
सुनाना तुम तुम्हारी क्या हिकायत है ।

हमें लगती है बेमतलब हमेशा से
नहीं सीखी कभी हमने सियासत है ।

वहीं दावत ,जहां मातम यहां "तनहा"
हमारे शहर की अपनी रिवायत है । 
 
116 
 
 

       नहीं मालूम जिसको खुद पता अपना ( ग़ज़ल ) 

                     

नहीं मालूम जिसको खुद पता अपना
बना आये उसी को तुम खुदा अपना ।

बड़ी बेदर्द दुनिया में हो आये तुम
बनाना खुद पड़ेगा रास्ता अपना ।

न करना आरज़ू अपना बनाने की
यहां कोई किसी का कब हुआ अपना ।

तड़पना उम्र भर होगा मुहब्बत में
बहुत प्यारा नसीबा लिख दिया अपना ।

हमारा वक़्त कुछ अच्छा नहीं यारो
चले जाओ सभी दामन छुड़ा अपना ।

नहीं आता किसी के वार से बचना
ज़माने को लिया दुश्मन बना अपना ।

बतायें शर्त से होता है क्या  "तनहा"
लगाई शर्त इक दिन सब बिका अपना । 
 
117 
 

बड़ा ही मुख़्तसर उसका फ़साना है ( ग़ज़ल )   

बड़ा ही मुख्तसर उसका फसाना है
बना सच का सदा दुश्मन ज़माना है ।

इधर सब दर्द हैं उस पार सब खुशियां
चला जाये जिसे उस पार जाना है ।

कंटीली राह पर चलना यहां पड़ता
यही सबको मुहब्बत ने बताना है ।

गुज़ारी ज़िंदगी आया कहां जीना
नया क्या है वही किस्सा पुराना है ।

जिसे जब जब परख देखा वही दुश्मन
नहीं अब दोस्तों को आज़माना है ।

हमें सारी उम्र इक काम करना है
अंधेरों को उजालों से मिलाना है ।

ये सारा शहर बदला लग रहा "तनहा"
अभी वैसा तुम्हारा आशियाना है । 
 
118 
 
 

    बहुत ढूंढा जमाने में नहीं तुम सा मिला कोई ( ग़ज़ल ) 

                 

बहुत ढूंढा ज़माने में , नहीं तुम सा मिला कोई
तुम्हारे बिन नहीं सुनता , हमारी इल्तिजा कोई ।

इबादत छोड़ मत देना ,परेशां हाल हो कर तुम
यही रखना भरोसा बस , कहीं होगा ख़ुदा कोई ।

हुई वीरान जब महफ़िल , करोगे याद सब उस दिन
वही महफ़िल जमाता था ,कहां उठकर गया कोई ।

किया करते सभी से बेवफ़ाई जो हमेशा हैं
शिकायत क्यों उन्हीं को है नहीं उनका हुआ कोई ।

कभी कह हम नहीं पाये , कभी वो सुन नहीं पाये
शुरू कुछ बात जब करते , तभी बस आ गया कोई ।

छिपा कर इस जहां से तुम  इन्हें पलकों पे रख लेना
तुम्हारे अश्क मोती हैं ,  नहीं ये जानता कोई ।

खताएं भी हुई होंगी , कई हमसे यहां "तनहा"
सभी इंसान दुनिया में , नहीं है देवता कोई ।
 
119 
 
 

    भुला नफरत सभी की हम मुहब्बत याद रखते हैं ( ग़ज़ल ) 

           

भुला नफरत सभी की , हम मुहब्बत याद रखते हैं
सितम जितने हुए भूले इनायत याद रखते हैं ।

तुन्हें भेजे हज़ारों खत , मुहब्बत के कभी हमने
नहीं कुछ भेज पाये हम वही खत याद रखते हैं ।

हमेशा पास रखते हैं , तेरी तस्वीर को लेकिन
ज़माने से छिपाने की हिदायत याद रखते हैं ।

मुहब्बत में कभी कोई , शरारत की नहीं हमने
सताया ख्वाब में आकर शिकायत याद रखते हैं ।

बनेंगे एक दिन मोती , हमारी आंख के आंसू
तेरा दामन इन्हें पौंछे ये हसरत याद रखते हैं ।

किसी को बेवफ़ा कहना , हमें अच्छा नहीं लगता
निभाई थी कभी उसने भी उल्फ़त याद रखते हैं ।

तुम्हारी पास आने , दूर जाने की अदा "तनहा"
वो सारी शोखियां सारी नज़ाकत याद रखते हैं । 
 
 120 
 
 

     उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके ( ग़ज़ल ) 

                         

उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके
अभी तक हौसला बाकी , नहीं झुकते हैं सर उनके ।

यही बस गुफ़्तगू करनी , अमीरों से गरीबों ने
उन्हें भी रौशनी मिलती , अंधेरों में हैं घर उनके ।

उन्हें सूली पे चढ़ने का , तो कोई ग़म नहीं था पर
यही अफ़सोस था दिल में , अभी बाकी समर उनके ।

कहां पूछा किसी ने आज तक साकी से पीने को
रहे सबको पिलाते पर , रहे सूखे अधर उनके ।

हुई जब शाम रुक जाते , सुबह होते ही चल देते
ज़रा कुछ देर बस ठहरे , नहीं रुकते सफ़र उनके ।

दिये कुछ आंकड़े सरकार ने , क्या क्या किया हमने
बढ़ी गिनती गरीबों की , मिटा डाले सिफ़र उनके ।

हमारे ज़ख्म सारे वक़्त ने ऐसे भरे "तनहा"
चलाये तीर जितने सब हुए अब बेअसर उनके । 
 
121 
 
 

     कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं ( ग़ज़ल ) 

                   

कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं
तुम परखना मत कभी खोखले किरदार हैं ।

छोड़कर ईमान को लोग नेता बन गये
दो टके के लोग तक बन गये सरदार हैं ।

देखकर तूफ़ान को, छोड़ दी पतवार तक
डूबने के बन गये अब सभी आसार हैं ।

फेर ली उसने नज़र, देखकर आता हमें
इस कदर रूठे हुए आजकल दिलदार हैं ।

पास पहली बार आये हमारे मेहरबां
और फिर कहने लगे फासले दरकार हैं ।

हम समझते हैं अदाएं हसीनों की सभी
आपके इनकार में भी छुपे इकरार हैं ।

गैर जब अपने बने, तब यही ' तनहा ' कहा
ज़िंदगी तुझसे हुए आज हम दो चार हैं । 
 
122 
 
 

अब लगे बोलने पामाल लोग ( ग़ज़ल )    

अब लगे बोलने पामाल लोग 
देख हैरान सब वाचाल लोग ।
 
कौन कैसे करे इस पर यकीन 
पा रहे मुफ़्त रोटी दाल लोग ।

ज़ुल्म सहते रहे अब तक गरीब 
पांव उनके थे हम फुटबाल लोग ।

मुश्किलों में फंसी सरकार अब है
जब समझने लगे हर चाल लोग ।

कब अधिकार मिलते मांगने से
छीन लेंगे मगर बदहाल लोग ।

मछलियां तो नहीं इंसान हम हैं  
रोज़ फिर हैं बिछाते जाल लोग । 

कुछ हैं बाहर मगर भीतर हैं और
रूह "तनहा" नहीं बस खाल लोग । 
 
पामाल =  दबे कुचले  
 
वाचाल = बड़बोले 
 
123 
 
 

अब यही ज़िंदगी अब यही बंदगी ( ग़ज़ल )   

अब यही ज़िंदगी , अब यही बंदगी
प्यार की जब हमें भा गई बेखुदी ।

आपके वास्ते ग़ज़ल कहने लगे
थी हमारी मगर हो गई आपकी ।

इश्क़ करना नहीं जानते हम अभी
खुद सिखा दो तुम्हीं कुछ हमें आशिक़ी ।

पास आओ करें बात भी प्यार की
छांव कर दो ज़रा खोल दो ज़ुल्फ़ भी ।

वक़्त मिलने का तुम भूल जाना नहीं
रोज़ मिलते वही याद रखना घड़ी ।

किस तरह हम कहें बात दिल की तुम्हें
आप सुनते कहां बात पूरी कभी ।

जब से "तनहा" दिवाना हुआ आपका
भूल जाती उसे बात बाकी सभी । 
 
124 
 
 

      ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है ( ग़ज़ल ) 

                       

ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है
उठा कर हाथ अपने , चांद -तारे तोड़ लाना है ।

कभी महलों की चाहत में , भटकती भी रही हूं मैं
नहीं पर चैन महलों में , वो कैसा आशियाना है ।

मुझे मालूम है , तुम , क्यों बड़ी तारीफ़ करते हो
नहीं कुछ मुझको देना , और सब मुझसे चुराना है ।

इसे क्या ज़िंदगी समझूं , डरी सहमी सदा रहती
भुला कर दर्द सब , बस अब ख़ुशी के गीत गाना है ।

मुझे लड़ना पड़ेगा , इन हवाओं से ज़माने की
बुझे सारे उम्मीदों के चिरागों को जलाना है ।

नहीं कोई सहारा चाहिए मुझको , सुनो लोगो
ज़माना क्या कहेगा , सोचना , अब भूल जाना है ।

नहीं मेरी मुहब्बत में बनाना ताज तुम कोई
लिखो "तनहा" नया कोई हुआ किस्सा पुराना है । 
 
125 
 
 

      सुन लिया , आपने जो कहा , कह दिया ( ग़ज़ल ) 

                     

सुन लिया, आपने जो कहा, कह दिया 
आप अच्छे , ज़माना बुरा, कह दिया । 

मर्ज़ क्या आपने हमसे,  पूछा नहीं 
पी भी जाओ ये कड़वी दवा, कह दिया । 

आपकी बात को जो,  नहीं मानते 
हैं गरीबों का करते बुरा, कह दिया । 

साथ मेरा न दोगे अगर , वक़्त पर 
ढूंढते फिर रहोगे खुदा , कह दिया । 

इक पुरानी कहानी , सुनाई हमें 
और किस्सा सुनो इक नया , कह दिया । 

बेख़ता लोग इतने ,  मरे भीड़ में 
क्या किया आपने , मरहबा , कह दिया । 

सुनके तक़रीर " तनहा " कहे और क्या 
कातिलाना बड़ी है अदा,  कह दिया । 
 
126 
 

  आज खारों की बात याद आई ( ग़ज़ल )    

आज खारों की बात याद आई
जब बहारों की बात याद आई ।

प्यास अपनी न बुझ सकी अभी तक
ये किनारों की बात याद आई ।

आज जाने कहां वो खो गये हैं
जिन नज़ारों की बात याद आई ।

साथ मिल के दुआ थे मांगते हम
उन मज़ारों की बात याद आई ।

कुछ नहीं दर्द के सिवा मुहब्बत
ग़म के मारों की बात याद आई ।

जब गुज़ारी थी जाग कर के रातें
चांद-तारों की बात याद आई ।

दूर रह कर भी पास-पास होंगे
हमको यारों की बात याद आई ।

आज देखा वतन का हाल " तनहा "
उनके नारों की बात याद आई । 
 
127 
 
 

उसको न करना परेशान ज़िंदगी ( ग़ज़ल  )

उसको न करना परेशान ज़िंदगी
टूटे हुए जिसके अरमान ज़िंदगी ।

होने लगा प्यार हमको किसी से जब
करने लगे लोग बदनाम ज़िंदगी ।

ढूंढी ख़ुशी पर मिले दर्द सब यहां
जाएं किधर लोग नादान ज़िंदगी ।

रहने को सब साथ रहते रहे मगर
इक दूसरे से हैं अनजान ज़िंदगी ।

होती रही बात ईमान की मगर
आया नज़र पर न ईमान ज़िंदगी ।

सब ज़हर पीने लगे जानबूझकर
होने लगी देख हैरान ज़िंदगी ।

शिकवा गिला और " तनहा " न कर अभी
बस चार दिन अब है महमान ज़िंदगी ।
 
128 
 
 

 दर्द अपने हमें क्यों बताए नहीं ( ग़ज़ल )

दर्द अपने हमें क्यों बताए नहीं
दर्द दे दो हमें हम पराए नहीं ।

आप महफ़िल में अपनी बुलाते कभी
आ तो जाते मगर बिन बुलाए नहीं ।

चारागर ने हमें आज ये कह दिया
किसलिए वक़्त पर आप आए नहीं ।

लौटकर आज हम फिर वहीं आ गए
रास्ते भूलकर भी भुलाए नहीं ।

खूबसूरत शहर आपका है मगर
शहर वालों के अंदाज़ भाए नहीं ।

हमने देखे यहां शजर ऐसे कई
नज़र आते कहीं जिनके साए नहीं ।

साथ "तनहा " के रहना है अब तो हमें
उन से जाकर कहो दूर जाए नहीं ।
 
129 
 
 

       मधुर सुर न जाने कहां खो गया है ( ग़ज़ल ) 

        

मधुर सुर न जाने कहां खो गया है
यही शोर क्यों हर तरफ हो गया है ।

बता दो हमें तुम उसे क्या हुआ है
ग़ज़लकार किस नींद में सो गया है ।

घुटन सी हवा में यहां लग रही है
यहां रात कोई बहुत रो गया है ।

नहीं कर सका दोस्ती को वो रुसवा
मगर दाग़ अपने सभी धो गया है ।

करेंगे सभी याद उसको हमेशा
नहीं आएगा फिर अभी जो गया है ।

कहां से था आया सभी को पता है
नहीं जानते पर किधर को गया है ।

मिले शूल "तनहा " उसे ज़िंदगी से
यहां फूल सारे वही बो गया है । 
 
130 
 
 

  आया नहीं दाग़ अब तक छुपाना ( ग़ज़ल )   

आया नहीं दाग अब तक छुपाना
मैली है चादर हमें घर भी जाना ।

हम ने किया जुर्म इक उम्र सारी
बस झूठ कहना नहीं सच बताना ।

सुन लो सभी यार मुझको है कहना
की जो  खताएं उन्हें भूल जाना ।

मुझ से बुरा और कोई नहीं है
मैं खुद बुरा हूं भला सब ज़माना ।

दस्तूर मेरा यही तो  रहा है
जीती लड़ाई को खुद हार जाना ।

तुमने निकाला हमें जब यहां से
फिर ठौर अपना न कोई ठिकाना ।

"तनहा" जहां छोड़ जाये कभी जब
सबको सुनाना उसी का फसाना । 
 
131 
 

     खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ( ग़ज़ल ) 

                      

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई
हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई ।

इंसान की कीमत नहीं सिक्कों के इस बाज़ार में
सामान दुनिया का सभी की अब ज़रूरत बन गई ।

बेनाम खत लिक्खे हुए कितने छुपा कर रख दिये
वो शख्स जाने कब मिले जिसकी अमानत बन गई ।

मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां
कैसे बताएं अब तुम्हें ऐसी सियासत बन गई ।

( मतलूब=मनोनित। तालिब=निर्वाचित )

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई ।

सब दर्द बन जाते ग़ज़ल , खुशियां बनीं कविता नई
मैंने कहानी जब लिखी पैग़ामे-उल्फ़त बन गई ।

लिखता रहा बेबाक सच " तनहा " ज़माना कह रहा
ऐसे  किसी की ज़िंदगी कैसी इबादत बन गई ।   
 
132 
 
 

      इन बेज़मीर लोगों के किरदार मत लिखो ( ग़ज़ल ) 

       

इन  बेज़मीर लोगों के किरदार मत लिखो 
बेदर्द शासकों को यूं अवतार मत लिखो । 

मारे गये सभी लोग ,  बस ऐतबार कर  
आईन देश का क्यों गया हार मत लिखो । 

सच झूठ ,झूठ सच , आज सब लोग जानते
झूठे बयान देती ये सरकार मत लिखो । 

मत पूछना हुआ क्या वो वादा बहार का
उनके फरेब की बात सौ बार मत लिखो । 

संतान शासकों की , खुली छूट है मिली
उनके गुनाह सब माफ़ , बदकार मत लिखो । 

उनसे सवाल क्या , और उनके जवाब क्या
कब कौन कर रहा क्या व्यौपार मत लिखो । 

सब चोर कह रहे , बन गये हम शरीफ हैं
"तनहा" इसे किसी का इश्तिहार मत लिखो ।
 
133 
 
 

उन्हें कैसे जीना , हमें कैसे मरना ( ग़ज़ल )   

उन्हें कैसे जीना   ,  हमें कैसे मरना ,
ये मर्ज़ी है उनकी , हमें क्या है करना ।

सियासत हमेशा यही चाहती है ,
ज़रूरी सभी हुक्मरानों से डरना । 

उन्हें झूठ कहना , तुम्हें सच समझना ,
कहो सच अगर तो है उनको अखरना । 

किनारे भी उनके है पतवार उनकी ,
हमें डूबने को भंवर में उतरना । 

भला प्यास सत्ता की बुझती कहीं है ,
लहू है हमारा उन्हें जाम भरना । 

कहीं दोस्त दुश्मन खड़े साथ हों , तुम ,
नहीं भूलकर भी उधर से गुज़रना । 

सभी लोग हैरान ये देख " तनहा "
हसीनों से बढ़कर है उनका संवरना । 
 
134 
 
 

जुर्म हम लोग बस एक करते रहे ( ग़ज़ल )      

जुर्म हम लोग बस एक करते रहे
अश्क़ पीते गये आह भरते रहे ।

किस को झूठा कहें किस को सच्चा कहें
बात कर के सभी जब मुकरते रहे ।

रात तूफान की बन गई ज़िंदगी
बिजलियों की चमक देख डरते रहे ।

मुख़्तसर सी हमारी कहानी रही
जो बुने ख्वाब सारे बिखरते रहे ।

हर कदम पर नये मोड़ आये मगर
हौंसलों के सफर कब ठहरते रहे ।

लोग सब प्यार को जब लगे भूलने
कुछ सितारे ज़मीं पर उतरते रहे ।

वो सितमगर सितम रोज़ ढाते रहे
और इल्ज़ाम "तनहा " पे धरते रहे । 
 
135 
 
 

  तुम बताओ है कहीं ऐसा जहां ( ग़ज़ल )  

तुम बताओ है कहीं ऐसा जहां
राजनेता दर्द को समझें कहां । 

जब सितारा टूट कर गिरने  लगा
चुप रहे दोनों ज़मीं औ आस्मां । 

लोग मानेंगे नहीं कोई कभी 
एक नेता आदमी सा था यहां । 

अब किसी से पूछता कोई नहीं
बस्तियों से उठ रहा कैसा धुआं । 

सबको अपनी बात कहनी आ गई
बेज़ुबांनों  की , नहीं कोई   ज़ुबां । 

कर गया कितना अंधेरा मुल्क में
वो जला करता था खुद बन कर शमां । 

कौन था "तनहा" सभी को कर गया
पूछता है धूल से खुद कारवां ।
 
136 
 
 

ज़िंदगी में ख़ुशी नहीं तो क्या ( ग़ज़ल )   

 
ज़िंदगी में ख़ुशी नहीं तो क्या 
इन लबों पर हंसी नहीं तो क्या । 
 
जानते लोग सब कहानी को  
खुद जुबां से कही नहीं तो क्या ।
 
अब  फ़रिश्ते यहां  बहुत मिलते  
मिल रहा आदमी नहीं तो क्या ।
 
फिर से उनको कभी परखना मत  
कर सके  दोस्ती नहीं तो क्या ।
 
जानपहचान दर्द से गहरी  
आंख में गर नमी नहीं तो क्या ।
 
सब ही आये मेरे जनाज़े पर 
एक आये तुम्हीं नहीं तो क्या ।

यूं ही मशहूर हो गए  ' तनहा '
दास्तानें कही नहीं तो क्या । 
 
137 
 

इधर - उधर सब  धुआं - धुआं ( ग़ज़ल )    

इधर उधर  सब  धुआं - धुंआ
न रौशनी का बचा  निशां । 

ये पूछती है नज़र - नज़र 
है आदमी का कोई मकां  । 

समझ सके जो यहां है कौन 
जरा - सी इक बच्ची की ज़ुबां । 

कहीं भी दिल लगता ही नहीं 
जो कोई जाए भी तो कहां  । 

सुनाएं कैसे किसी को हम 
इक उजड़े दिल की ये दास्तां । 
 
वही चमन ख़ुद जला रहे 
जो बन के बैठे हैं बागबां ।  

तबाह ' तनहा ' करो न अब 
बसा सकोगे न फिर जहां । 
 
138 
 
 

  आग़ पानी को लगानी चाहिए ( ग़ज़ल )    

आग़ पानी को लगानी चाहिए
इश्क़ की ऐसी कहानी चाहिए । 

बेवफ़ाई का सिला देना हो गर
बात उनकी भूल जानी चाहिए । 

पत्थरों के लोग घर शीशे के हैं
और क्या क्या मेहरबानी चाहिए । 

आज तनहाई बहुत अच्छी लगी
रुत सुहानी अब बुलानी चाहिए । 

ज़िंदगी भी मौत को है ढूंढती
मौत को भी ज़िन्दगानी चाहिए । 

फ़ाश उनके राज़ होंगे एक दिन
बात दुनिया को बतानी चाहिए । 

झूठ की तक़रीर , सारे कर गये
सच भी "तनहा" की ज़ुबानी चाहिए । 
 
139 
 
 

  इक गुलाबी रुमाल आया है ( ग़ज़ल )      

इक गुलाबी रुमाल आया है
बन के लेकिन सवाल आया है । 

दरो-दीवार सहमे सहमे हैं
जैसे घर में बवाल आया है । 

खेल सत्ता कई दिखाती है
ये तमाशा कमाल आया है । 

अब परिन्दे लगे समझने हैं
ले के सय्याद जाल आया है । 

गर्दिशे वक़्त और तुम देखो
इक नई चल के चाल आया है । 

खत ये लिक्खा हुआ गुलाबी है
जैसे होली- गुलाल आया है । 

आज ' तनहा ' निखार कलियों पे
देख फिर बेमिसाल आया है । 
 
140 
 
 

   पथ पर सच के चला हूं मैं ( ग़ज़ल )         

पथ पर सच के चला हूं मैं
जैसा अच्छा - बुरा हूं मैं । 

ज़ंजीरें , पांव में बांधे 
हर दम चलता रहा हूं मैं ।

कोई मीठी सुना लोरी
रातों रातों जगा हूं मैं । 

दरवाज़ा बंद था जब जब
जिसके घर भी गया हूं मैं । 

मैंने ताबीर देखी है
इन ख्वाबों से डरा हूं मैं । 

आना वापस नहीं अब तो
कह कर सबसे चला हूं मैं । 

खुद मैं हैरान हूं "तनहा"
मर कर कैसे जिया हूं मैं । 
 
141 
 
 

गली से बच के उनकी अब निकलना है ( ग़ज़ल ) 

                    


गली से बच के उनकी अब निकलना है 
सदा ख़ामोश रह कर दर्द सहना है ।  

पकड़ कर हाथ जब चाहा छुड़ा लेते 
नहीं अब साथ जीना साथ मरना है । 

हुए थे  सादगी पर हम फ़िदा जिनकी 
उन्हें भाता बहुत , सजना संवरना है ।
 
ज़रूरत ही नहीं वादा निभाने की 
बहाना कर के वादे से मुकरना है । 
 
सियासतदान ऐसे लोग बनते हैं 
फ़रिश्ते बन के जिनको जुर्म करना है । 
 
सभी से भूल आखिर हो ही जाती है 
संभल जाना नहीं फिर से फिसलना है । 
 
रहोगे कब तलक ' तनहा ' ऊंचाई पर 
कभी वापस ज़मीं पर ही उतरना है ।
 
142 
 
 

 कभी मस्ती में यारो हम भी होंगे ( ग़ज़ल )     

 
कभी मस्ती में यारो हम भी होंगे
हुए सब दूर रंजो- ग़म भी होंगे ।

सुलगती रेत का दरिया जहां है 
वहीं बारिश के सब मौसम भी होंगे । 

बहुत लंबा जहां फैला हुआ है 
मुसाफिर लोग कुछ पैहम भी होंगे । 

किसी तरहा मना लेंगे उन्हें हम 
अगर रूठे हुए हमदम भी होंगे । 

नहीं आंसू बहेंगे अब कभी भी 
हमारे दर्द आखिर कम भी होंगे । 

न भरने ज़ख्म देंगे लोग बेशक 
मिला जो चारागर मरहम भी होंगे । 

नज़र आते नहीं  "तनहा " कहीं पर 
कभी इक रोज़ हर आलम भी होंगे । 
 
143 
 

       उड़ने की चाह में इरादे बदल जाते हैं ( ग़ज़ल ) 

                       

उड़ने की चाह में इरादे बदल जाते हैं 
पांव चलते हुए अचानक फिसल जाते हैं । 

अब मुहब्बत कहां , तिजारत सभी करते हैं 
अब तो क़िरदार रोज़ सारे बदल जाते हैं । 

ढूंढती हर शमां नहीं मिलते वो परवाने 
आग़ में प्यार की जलाते हैं जल जाते हैं । 

आस्मां पे नहीं ज़मीं पर नज़र रखते हैं 
राह फ़िसलन भरी कदम खुद संभल जाते हैं । 

फिर उसी मोड़ पर मुलाकात नहीं हो उनसे 
हम झुका कर नज़र उधर से निकल जाते हैं । 

दब गई राख में चिंगारी बनी जब शोला 
तेज़ आंधी चले महल तक भी जल जाते हैं । 

अब वहां कुछ नहीं न शीशा न साकी फिर भी 
देख कर मयक़दे को "तनहा" मचल जाते हैं । 
 
144 
 
 

नये दौर की लिख रहे हम कहानी ( ग़ज़ल )        

नये दौर की लिख रहे हम कहानी 
बढ़ी प्यास जितना पिया जिसने पानी । 

कहां खो गईं आज सारी बहारें 
सुनो ये हक़ीक़त खिज़ा की ज़ुबानी । 

खुदा कल जिसे हर किसी ने कहा था 
मिटाने लगा है खुदा की निशानी । 

सियासत की तलवार चलने लगी अब 
मुहब्बत के किस्से थीं बातें पुरानी । 

बगावत दिखाई किया जुर्म कैसे 
तुम्हें मार देगी कभी राजधानी । 

लगा जिस पे इल्ज़ाम लूटा चमन को
सभी कह रहे आपकी मेहरबानी । 

रही खुशनसीबी यही हमने देखे 
वो दिन और "तनहा" वो रातें सुहानी ।
 
145 
 

        उन्हें मिल ही जाते हैं इक दिन किनारे ( ग़ज़ल ) 

         


उन्हें मिल ही जाते हैं इक दिन किनारे 
जो रहते नहीं नाख़ुदा के सहारे । 

कभी तुम भी खेलो मुहब्बत की बाज़ी 
नहीं कोई जीता सभी इस में हारे । 

लिखी जिसने तकदीर हाथों से अपने 
कहो मत उसे तुम नसीबों के मारे । 

हैं खामोशियां छा गईं महफ़िलों में 
कहीं से दे आवाज़ कोई पुकारे । 

सदा अब किसी की नहीं वो भी सुनते 
खड़े किसलिए लोग उनके हैं द्वारे । 

बिना बात देखो सभी लड़ रहे हैं 
सबक प्यार का भूल बैठे हैं सारे । 

ज़रूरत जिसे दोस्ती की है "तनहा"
इनायत करो उसको मुझसे मिला रे । 
 
146 
 
 

अब लगे टूटने सब भरम आपके ( ग़ज़ल )         

अब लगे टूटने सब भरम आपके 
क्या करम आपके क्या थे ग़म आपके । 

वक़्त ने आपकी पोल सब खोल दी 
कितने झूठे थे सारे वहम आपके । 

अब मसीहा नहीं मानते लोग भी 
काम आये नहीं पेचो-खम आपके । 

सोचना एक दिन ओ अमीरे-शहर 
लोग सहते रहे क्यों अलम आपके । 

कब निभाई किसी से वफ़ा आपने 
आप किसके हुए कौन हम आपके । 

ज़हर देते रहे सबको कहकर दवा 
ख़त्म होंगे कभी क्या सितम आपके । 

खून की बारिशें जिसमें "तनहा" हुईं 
लोग देखा करेंगे हरम आपके । 
 
147 
 
 

  मौत के सर यही इल्ज़ाम है ( ग़ज़ल )       

मौत के सर यही इल्ज़ाम है 
खूबसूरत भी  है बदनाम है । 

इक कहानी हक़ीक़त थी कभी
रह गया बिन पढ़ा पैग़ाम है । 

मयकदा मय नहीं साक़ी नहीं 
और टूटा हुआ  हर जाम है । 

राह देखी सुबह से शाम की 
बस यही हर किसी का काम है । 

बुझ गई आग बाक़ी है धुआं
देख लो सब तमाशा आम है । 

मिट गया सब लिखा तकदीर का
सिर्फ़ बाकी रहा इक नाम है  । 

कौन फ़रियाद "तनहा" की सुने
ढल रही ज़िंदगी की शाम है । 
 
148 
 
 

 तुझे हंसना मना है जुर्म रोना है ( ग़ज़ल )     

तुझे हंसना मना है , जुर्म रोना है 
यहां औरत है क्या बस इक खिलौना है ।

नई कोई कहानी लिख नहीं सकते 
तुझे फिर से ज़लीलो-खार होना है । 

समझते लोग खुद को सब फ़रिश्ते हैं 
शराफ़त बोझ तेरा तुझको ढोना है । 

मुहब्बत ढूंढना मत जाके महलों में 
नहीं उसके लिए कोई भी कोना है । 

सरे-बाज़ार बिकना तुझको आखिर है 
तुम्हारी लाश पर चांदी है सोना है । 

बताओ कोख़ हर इक पूछती सब से 
उगाये फूल कांटों का बिछौना है । 

न पूछो हाल "तनहा" क्या हमारा है 
ये आंचल आंसुओं से रोज़ धोना है । 
 
149 
 

      है ज़मीं अपनी है आस्मां अपना ( ग़ज़ल )     

है ज़मीं अपनी है आस्मां अपना
लुट न जाये ये सारा जहां अपना । 
 
तोड़नी हैं हमको फिर से जंज़ीरें
आ गया फिर से इक इम्तिहां अपना । 
 
रहनुमाओं ने भटका दिया तो क्या
हम बना लेंगें फिर कारवां अपना । 
 
चाह महलों की करते नहीं लेकिन
खुद बचायेंगे छोटा मकां अपना । 
 
बंद पिंजरे में होंगे नहीं " तनहा "
सब समझते हैं क्या क्या गुमां अपना ।  
 
150 
 
 

अब किसी को हमारी ज़रूरत नहीं ( ग़ज़ल )    

 
अब किसी को हमारी ज़रूरत नहीं 
और जीने की हमको भी चाहत नहीं । 
 
सुन रहा कौन आवाज़ अपनी मगर 
चुप रहें पर हमारी ये आदत नहीं । 
 
ढूंढते हम मुहब्बत मिलीं नफ़रतें 
हम करें क्या है सीखी अदावत नहीं । 
 
झूठ को सच बताना न आया हमें 
मुल्क़ में सच की कोई भी कीमत नहीं । 
 
राजनेता मसीहा भला कब हुए 
ये बताना तो होती बग़ावत नहीं । 
 
आप मसरूफ़ हैं हम भी मायूस हैं 
बात करने की दोनों को फुर्सत नहीं । 
 
ज़ुल्म कितने सहें लोग "तनहा" अभी 
हमको मंज़ूर उनकी सियासत नहीं । 
 
151 
 
 

गांव का अपना सब मकां ढूंढते हैं ( ग़ज़ल )     

गांव का अपना सब मकां ढूंढते हैं 
गर्मियों की फिर छुट्टियां ढूंढते हैं । 
 
जा के वापस कच्ची गली में वहां पर  
अपने पांवों के  कुछ निशां ढूंढते हैं । 
 
ख़्वाब जितने देखे रहे सब अधूरे 
उम्र भर हम फिरते गुमां ढूंढते हैं । 
 
सुन के खबरें सबकी हुई नींद गायब  
निगहबानी को  , पासबां ढूंढते हैं । 
 
सबक नफरत का भूलने के लिए अब  
प्यार वाली  , इक  दास्तां ढूंढते हैं । 
 
पा के ऊंचे पद लोग थे झुक के रहते 
हम उन्हीं जैसे , रहनुमां ढूंढते हैं । 
 
मतलबी  दुनिया बेरहम लोग कितने   
हम कहां  ' तनहा '  मेहरबां ढूंढते हैं ।
 

 

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