चिड़िया चुग गई खेत ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया
खाये आम ख़ुद पर हैं बबूल बोये
समझते काम अच्छा कबीरा रोये
जनाज़ा लोकतंत्र का निकाल रहे
नशे में चूर हैं लगते हैं खोये खोये ।
बजाओ ताली कहता हर मदारी
भुलाने को दुःख दर्द जितने ढोये
घूंघट हटा कर के नाचना झूमना है
नंगे हम्माम में हैं लाज शर्म धोये ।
उसूलों पर जिए लोग सब मर गए
उनका नाम लेकर हैं लोग तर गए
पाबंदी सरकारी दिल्ली मत आना
कितने बेगुनाह हैं जेलों में भर गए ।
जनता ख़ामोश रहना बोलना मत
सुनकर आवाज़ शासक भी डर गए
खेलते रहे सभी मिल चोर सिपाही
लुटेरे आये काम अपना वो कर गए ।
साहूकारों को दिया सब कुछ जब बेच
पछताए से क्या चिड़िया चुग गई खेत ।

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