सितंबर 25, 2026

POST : 2122 सत्ता का हम्माम ( हास्य - व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

   सत्ता का हम्माम ( हास्य - व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया 

सुबह - शाम करते रहते हर हर गंगे थे 
धुल जाते थे पाप सभी बन जाते चंगे थे 
 
जिस्म साफ़ सफ़ेद अंदर से बदरंगे थे 
सत्ता की राजनीति में हुए खुद नंगे थे 
 
मैली चादर थी चुनाव आयोग नाम की 
छुपाए हुए काले कारनामे काले धंधे थे 
 
दरबार था झूठों का झूठे सारे दरबारी थे 
शानदार लिबासों में चोर थे भिखमंगे थे 
 
एक अख़बार की पत्रकार लड़की ने मगर 
फैंक पत्थर कांच की दिवार तोड़ डाली थी 
 
जाने कहां आंधी में उड़ गए सब के सब 
झूठ के पर्दे सत्ता के गलियारों में टंगे थे 
 
अब कैसा शर्माना सभी ही इक जैसे हैं जब 
गऊ माता देख रही बाड़े में बंधे भैंसे हैं सब 
 
गठड़ी पापों की इनकी कौन उठाएगा भला 
कितनी मैली कर दी गंगा बोलते हर हर गंगे थे 
 
 
सुबह -  शाम करते रहते हर हर गंगे थे 
धुल जाते थे पाप सभी बन जाते चंगे थे 
 

 
 

 
   

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