कोई मरे कोई जीवे, सुथरा घोल बताशा पीवे ( हास परिहास )
डॉ लोक सेतिया
ये पंजाबी लोक कहावत , या मुहावरा संत सुथरा शाह से जुड़ी हुई बात है । आग लगे बस्ती में मौज राम मस्ती में की तरह से दूसरों के सुःख दुःख से बेपरवाह अपने फक्क़ड़पन में बेफिक्र होकर ख़ुशी मनाता है । शायद संत सुथरे शाह का आधुनिक स्वरूप इस काल में सत्ता पर बैठा है कुछ भी नहीं करता सिर्फ़ मन की बात करना भाता है । चंचल मन का क्या है पल भर में दुनिया भर में विचरण करता है टिकता नहीं कभी किसी ठिकाने पर । संत सुथरे शाह ने अपने भीतर से आत्मा को कई साल पहले निकाल का छोड़ दिया था , जिसका साथ निभाना था उस आत्मा को अकेली छोड़ दिया था । आत्मा सीता की तरह बन बन भटकती रहती है उसको फुर्सत नहीं ये मोह माया की बात लगती है । लेकिन मोह माया शोहरत ताकत खुद उसे अपने लिए सबसे अधिक पसंद है जितना मिले थोड़ा लगता है सब हासिल है फिर भी ख़ालीपन है मन में लालसाओं का अंबार है । देश से राज्यों तक उनका विस्तार है अपनी सरकार की जय जयकार है मिटता नहीं अहंकार है कदम कदम दिखाई देता इक मझधार है नैया के डूबने का बन गया आसार है तब भी उनको नहीं मिलता चैन करार है नित नया तमाशा उनको दरकार है । कितने दीप जलाये तब भी बाहर रौशनी भीतर घना अंधकार है , लगता है जीत भी हुई बेकार है ऐसी जीत सबसे बड़ी हार है व्यर्थ हुआ हर इश्तिहार है सच अभी खामोश है तब भी झूठ बड़ा बेकरार है । जो उस पार था वही इस पार है अपनी ही कही हर बात खुद का उपहास बन गई है इंसान कितना लाचार है ।
आधी रात को जागते सोते की मदहोशी छाई है तन्हाई में कोई आवाज़ दी सुनाई है जैसे मर चुकी आत्मा फिर जाग गई है दुहाई दुहाई है । कितना कुछ जोड़ लिया है कोई हिसाब नहीं कुछ भी संग नहीं रहता अंधकार मिटाता माहताब नहीं । कर्मफ़ल की बात नहीं है कोई भगवान आखिर किस किस का कितना हिसाब लिखता होगा , उस से छुपा सकते हैं दुनिया से छुपा सकते हैं मगर अपनी जो इक अंतरात्मा है कभी मरने के बाद भी मरती नहीं है बस उसका सामना कैसे करोगे खुद अपने ही साये से डरोगे । जनाब के माथे पर पसीना है अरे ये जीना भी कोई जीना है दिन गुज़रते साल गुज़रते जाते बदलता रहता महीना है ये समय बड़ा ही कमीना है । पर्वत के शिखर से फ़िसलने का भय सताता है तब आगाज़ भूल अंजाम नज़र आता है , कोई कहीं दूर गाता है जो खोता है बस वही पाता है । मगर खोने पाने के हिसाब नहीं आता है असली बही खाता बतलाता है क़र्ज़ बढ़ता जाता है लेकिन उनको चार्वाक ऋषि का संदेश दिल बहलाता है , क़र्ज़ ले कर घी पियो कौन अगले जन्म में क़र्ज़ मांगता है कौन चुकाता है । ज़रा सी आहट से जी घबराता है नींद से कौन बार बार जगाता है उनको अब सही गलत का अंतर नहीं समझ आता है कोई साधु वही बोल दोहराता है उठ जाग मुसाफ़िर भौर भई अब रैन कहां जो सोवत है । क्या क्या कहते थे कितना कुछ कर दिखाना है जनता को धरती पर इक स्वर्ग दिखाना है , मगर कुछ भी किया नहीं करना चाहा ही नहीं सिर्फ़ और सिर्फ़ खुद अपना दिल बहलाते रहे खुद हंसते सबको रुलाते रहे , जाना उधर था और जनाब किधर जाते रहे ।
सबसे शानदार महानायक बनने की हसरत थी लेकिन अभिनय करते करते कहानी को इस तरह बयां किया कि विदूषक बनकर रह गए हैं । दुनिया हंस ही नहीं रही आपका उपहास कर रही है महसूस होता है सही नायक नहीं चुना किरादर निभाने को , जनता को कितना रुलाया है सोचा था कुछ कर दिखाओगे दिल की बेचैनियां मिटाने को । आपको आता नहीं कुछ भी सिवा झूठे आंसू दिखाने और लोगों को रुलाने को । खुशियों का अंबार लगा है गली गली शहर शहर उनका दरबार सजा है फिर भी दिल की उदासी जाती नहीं है , चैन की नींद आती नहीं है । दिया बुझने लगा है तेल ख़त्म हो गया है कोई बाती क्या कोई थाती नहीं है जिसे सौंप कर जाते किसी को देश या समाज को । ख़ाली ख़ाली पिंजरा है बिना चिड़िया का बसेरा है न तेरा है न मेरा है । कोई सागर दिल को बहलाता नहीं बेखुदी में भी करार आता नहीं हालत ऐसी हुई है ।
आज फ़िल्मी अदाकारा तबस्सुम , किरण सचदेव , हास्य कलाकार की बात याद आई , वो अक्सर इक मुक्तक सुनाती थी :
बादलों की तरह बरसते रहे ,
उम्र भर हंसी को तरसते रहे ।
कहकहे सारी दुनिया को हमने दिए
और तबस्सुम को हम ही तरसते रहे ।

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