झूठ सच से बड़ा हो गया ( हास्य - व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
खोटा सिक्का बाज़ार में चल गया है , चमक दमक कर साबित खरा हो गया है , कैसा ग़ज़ब इधर हो गया है झूठ सच से बड़ा हो गया है। इक व्यंग्यकार ने बहुत पहले लिखा था कि सच और झूठ इक नदी में नहाने गए थे , शायद बनारस की बात थी , सच नहा रहा था झूठ ने उसका लिबास चुराया और पहन कर चल दिया , जब सच बाहर निकला नदी से नहाकर तो वहां झूठ का लिबास पड़ा हुआ था भला सच झूठ का लिबास कैसे पहनता , इसलिए वो नंगा ही खड़ा रह गया अभी तलक भी सच नंगा है तभी कहलाता है । समय के साथ कथाएं कहानियां अपना स्वरूप बदलती रहती हैं आधुनिक युग में झूठ की क्या बात है , राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संतरी बोला रात है , ये सुबह सुबह की बात है । नकली झूठे लोकतंत्र को सभी ने एकमत से असली घोषित कर दिया है सभी संस्थाओं संगठनों ने झूठ का दामन थाम लिया है उसको अपना आका मान लिया है । चुनाव आयोग से सर्वोच्च न्यायालय ने अपना आचरण तौर तरीका बदल लिया है झूठ की शरण में ख़ुद को समर्पित कर अपनी हस्ती को मिटा दिया है , खुद को बेच कर सभी ने सब कुछ पा लिया है , सच किसी काम का नहीं सभी ने आज़मा लिया है बीच मझधार नाख़ुदा को ही अपना ख़ुदा मान लिया है । झूठ बिना इस दुनिया में जीना मुश्किल है इस सच्चाई को जान लिया है , कौन है जो डुबो कर सभी को अपनों की नैया पार लगाता है उसको पहचान लिया है । कोई सभी से पूछता है क्या आपने उसको देखा है जिस के हम मामा हैं जो हमको यहां लेकर आया था खुद को मेरा बतलाया था मुझे मामा कहकर बुलाया था । भरोसा किया था उसको अपना झोला पकड़वाया था उसने हमको मामा नहीं उल्लू बनाया था कोई ठग था बातों से उलझाया था , अंजाम सभी कुछ लुटवाया था ।
इधर देश में लगता है कोई भी संजीदा बात किसी गंभीर विषय पर नहीं करता है राजनीति मज़ाक बन गई है चुटकुलेबाज़ी का चलन है । इक पुराना चुटकुला फिर से याद आया है सुनाता हूं , कुछ बच्चे मैदान में खेल रहे थे तभी उनके अध्यापक उधर से गुज़रे , अध्यापक ने पूछा बच्चो क्या खेल खेल रहे हो । बच्चों ने बताया मास्टरजी हमको इक कुत्ते का पिल्ला मिला है और हमने ये शर्त रखी है कि जो भी सबसे बड़ा झूठ बोलेगा ये पिल्ला उसी का हो जाएगा । कैसे झूठ बोलते हैं अध्यापक ने मिसाल देने को कहा तो बताया जैसे देश की राजनीति में सभी झूठी बातें करते हैं और चुनाव जीत कर मौज मस्ती करते हैं । मास्टरजी ने हैरान हो कर कहा क्या ज़माना आ गया है जब हम छोटे बच्चे थे तो हमको झूठ शब्द का मतलब तक मालूम नहीं था । इतनी बात सुनते ही सभी बच्चों ने मिलकर कहा मास्टरजी ले जाएं ये कुत्ते का पिल्ला आपका हुआ आप शर्त में सबसे अव्वल रहे हैं । यकीनन इस से बड़ा कोई झूठ बोल ही नहीं सकता था कि उसको झूठ क्या होता है मालूम तक नहीं । लगता है कोई है जिस ने झूठ की शिक्षा की पढ़ाई में डिग्री हासिल की हुई है तभी जिधर देखते हैं उसका झूठ का ही परचम फहरा रहा है । झूठ सच को छोटा बताकर अपना कद बढ़ा रहा है ऐसे में किसी कवि का लिखा याद आ रहा है , कवि कहता है बौने कद वालों को पहाड़ पर चढ़ने का बड़ा शौक होता है । पहाड़ की ऊंचाई पर खड़े हो कर उनको लगता है उनकी ऊंचाई बढ़ गई है जबकि वास्तव में पहाड़ पर खड़े होकर वो और भी बौने दिखाई देते हैं । आजकल सभी एक से बढ़कर ऊंचे शिखर पर खड़े हैं ऐसे शिखर जिनकी कोई बुनियाद ही नहीं है बस कुछ और कहना व्यर्थ है । झूठ के चाहने वालों को सच कड़वा लगता है उनको मीठा ज़हर पसंद है भले उस से अंजाम जैसा भी हो सामने दिखाई दे तब भी अनदेखा करते हैं चाटुकारिता इक गुण समझा जाने लगा है । मीडिया झूठ को ख़ुदा बताने ही नहीं बनाने को अपने ज़मीर को नीचे गिराने लगा है , सभी को झूठ लुभाने लगा है , ऊंठ पहाड़ को छोटा बताने लगा है। आखिर में इक पुरानी ग़ज़ल पेश है।
ग़ज़ल : डॉ लोक सेतिया
पूछते सब ये क्या हो गया
बोलना तक खता हो गया।
आदमी बन सका जो नहीं
कह रहा मैं खुदा हो गया।
अब तो मंदिर ही भगवान से
लग रहा कुछ बड़ा हो गया।
भीख लेने लगे लगे आजकल
इन अमीरों को क्या हो गया।
नाज़ जिसकी वफाओं पे था
क्यों वही बेवफा हो गया।
दर-ब-दर को दुआ कौन दे
काबिले बद-दुआ हो गया।
कुछ न ' तनहा ' उन्हें कह सका
खुद गुनाहगार-सा हो गया।

जबरदस्त तंज
जवाब देंहटाएंAaj ki sachchai bayan krta badhiya aalekh
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