जून 18, 2026

POST : 2076 मंदिर में चोरी , भगवान की मर्ज़ी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   मंदिर में चोरी , भगवान की मर्ज़ी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

नारायण-नारायण , नारद जी अपने ही अंदाज़ में बोले , भगवन ये खबर सुनी है मंदिर से करोड़ों रुपया और सोना गायब है । कौन चोरी कर गया कोई रपट तक किसी थाने में नहीं लिखवाई गई । भगवान बोले आपको क्या परेशानी है भला मुझे मंदिर की दौलत से रूपये पैसे से क्या लेना देना है। जो जिसका कर्म है उसे वही करना है चोर चोरी नहीं करेगा तो क्या करेगा , आपको चिंता करनी चाहिए भारत देश की जनता की जिनका सभी कुछ राजनेता अधिकारी उद्योगपति धनवान लोग छीन कर झपट कर चालाकी से नहीं जालसाज़ी से देशसेवा की बात कहकर खुद अपने पर खर्च कर रहे हैं। आपको उनको डकैती की चिंता क्यों नहीं हुई और मंदिर से आपका मेरा क्या वास्ता है , मंदिर जिनका है उनको सब पता है चोर चोर मौसेरे भाई की बात है। सबका साथ सबका विकास है समझ आई उनकी बात है जूतों में बंट रही खैरात है सत्ता की शह है हुई जनता की मात है राजधानी की हक़ीक़त समझो चोरों की निकली नाचती झूमती बरात है।  नारद जी कहने लगे भगवान इतनी गंभीर बात पर आप ठिठोली कर रहे हैं , भगवान बोले नारद जी आपको गलतफ़हमी हुई है मंदिर मेरी जायदाद नहीं है मैं कभी किसी मंदिर में नहीं रहता मैं तो लोगों के दिलों में बसता हूं।  जिस दिन वहां से निकाला मुझे जिस जिस ने मेरा उनसे कोई नाता नहीं रहा है , मुझसे कभी पूछा आपने क्या क्या मैंने सहा है। दुनिया में मेरा अब कुछ भी नहीं रहा है भगवान की बनाई दुनिया को बर्बाद करने वाले शोर मचाते हैं हमने क्या क्या बनवाया है , सब झूठ की माया है शिकारी ने अपना जाल बिछाया है , मैंने सब धर्मराज पर छोड़ दिया है जैसा कोई करता है उसको फल मिलता है , कीचड़ में कमल खिलता है। 
 
नारद जी को अब चैन आया है अपना भजन उनको याद आया है , मूर्ख बंदे क्या तुमने कमाया है भगवान की मर्ज़ी से बिना मेहनत धन पाया है चोरी करता है सीनाज़ोरी करता है क्या सितम तुमने ढाया है।  बोल कितना खाया है कितना गंवाया है ऊपरवाले को भुलाकर अपना अनमोल जीवन व्यर्थ गंवाया है। नारद जी आधुनिक कथा सुनाते हैं लोग बिना बात घबराते हैं भगवान का नाम रटते रटते मरा मरा बोलने लगते हैं खोटा है जो उसको खरा कहने लगते हैं। इस दुनिया में सभी चोर हैं लेकिन कुछ चोर हरामखोर हैं जो अपने ही घर में चोरी करते हैं खुद ही देश का खज़ाना लुटवाते हैं। ये जो अमेरिका वाले हैं कितना ज़ुल्म कमाते हैं सभी को डराते धमकाते हैं और कितने कायर उनके सामने अपना सर झुकाते हैं। आप उनको महान बताते हैं जो नीचता करने से नहीं बाज़ आते हैं उनका अंजाम सभी को दिखाई देता है अब अमेरिका को होश आया है जब ऊंठ पहाड़ तले आया है। ये दुनिया बन गई चोरों का खुला बाज़ार है हर लुटेरा आजकल बन गया साहूकार है , सरकार कुछ भी है झूठ का इश्तिहार है जिसको डुबोया कहती है किया उद्धार है सभी को जाना भवसागर पार है। 
 
खबर है कि यू पी पुलिस का कहना है कि एक करोड़ के सोने के गहने बारिश के पानी में गल गए , और बंदर उनको उठा ले गए। अदालत ने आरोपी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनको बरी किया था और पुलिस को ज़ब्त किए ज़ेवर ससुराल वालों को सौंपने का आदेश दिया था । 2007 में लखीमपुर के मोहल्ला कपूरथला निवासी मुद्रित अग्रवाल की पत्नी रानी अग्रवाल ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अदालत को पुलिस ने बताया कि ज़ेवर भीगने से खराब हो गए थे भीगी पोटली को मालखाने की छत पर सुखाने को रखा था जिसे बंदर उठा कर ले गए । भारतीय पुलिस ही ऐसे तर्क दे सकती है कि किसी की लाश से उतारे गहने बरामद कर सुरक्षित रखने और लौटाने के बजाय खुद हड़पने का शर्मनाक कार्य कर ऐसी बात अदालत में बताती है।  यही पुलिस जांच करेगी मंदिर से पैसा और सोना चुराने या डाका डालने वालों को पकड़ने का काम करेगी तब कुछ ऐसा ही तर्क घड़ा जाएगा । चोरी का इल्ज़ाम बंदरों के सर मढ़ा जाएगा , अलीबाबा चालीस चोर का अगला अध्याय जल्द ही लिखा जाएगा । इक सवाल हमेशा बाकी खड़ा रह जाएगा ।  
 
 

सवाल है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

जूतों में बंटती दाल है
अब तो ऐसा हाल है
मर गए लोग भूख से
सड़ा गोदामों में माल है ।

बारिश के बस आंकड़े
सूखा हर इक ताल है
लोकतंत्र की बन रही
नित नई मिसाल है ।

भाषणों से पेट भरते
उम्मीद की बुझी मशाल है
मंत्री के जो मन भाए
वो बकरा हलाल है ।

कालिख उनके चेहरे की
कहलाती गुलाल है
जनता की धोती छोटी है
बड़ा सरकारी रुमाल है ।

झूठ सिंहासन पर बैठा
सच खड़ा फटेहाल है
जो न हल होगा कभी
गरीबी ऐसा सवाल है ।

घोटालों का देश है
मत कहो कंगाल है
सब जहां बेदर्द हैं
बस वही अस्पताल है ।

कल जहां था पर्वत
आज इक पाताल है
देश में हर कबाड़ी
हो चुका मालामाल है ।

बबूल बो कर खाते आम
हो  रहा कमाल है
शीशे के घर वाला
रहा पत्थर उछाल है ।

चोर काम कर रहे
पुलिस की हड़ताल है
हास्य व्यंग्य हो गया
दर्द से बेहाल है ।

जीने का तो कभी
मरने का सवाल है । 

ढूंढता जवाब अपने
खो गया सवाल है । 
 
 
 भारत के इस मंदिर में जमा है सबसे ज्यादा सोना, कीमत इतनी की छोटी पड़ जाएगी  कई देशों की इकोनॉमी | DNA HINDI
 

जून 13, 2026

POST : 2075 झूठ सच से बड़ा हो गया ( हास्य - व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 झूठ सच से बड़ा हो गया ( हास्य - व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

खोटा सिक्का बाज़ार में चल गया है , चमक दमक कर साबित खरा हो गया है , कैसा ग़ज़ब इधर हो गया है झूठ सच से बड़ा हो गया है। इक व्यंग्यकार ने बहुत पहले लिखा था कि सच और झूठ इक नदी में नहाने गए थे , शायद बनारस की बात थी , सच नहा रहा था झूठ ने उसका लिबास चुराया और पहन कर चल दिया , जब सच बाहर निकला नदी से नहाकर तो वहां झूठ का लिबास पड़ा हुआ था भला सच झूठ का लिबास कैसे पहनता , इसलिए वो नंगा ही खड़ा रह गया अभी तलक भी सच नंगा है तभी कहलाता है । समय के साथ कथाएं कहानियां अपना स्वरूप बदलती रहती हैं आधुनिक युग में झूठ की क्या बात है , राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संतरी बोला रात है , ये सुबह सुबह की बात है । नकली झूठे लोकतंत्र को सभी ने एकमत से असली घोषित कर दिया है सभी संस्थाओं संगठनों ने झूठ का दामन थाम लिया है उसको अपना आका मान लिया है । चुनाव आयोग से सर्वोच्च न्यायालय ने अपना आचरण तौर तरीका बदल लिया है झूठ की शरण में ख़ुद को समर्पित कर अपनी हस्ती को मिटा दिया है , खुद को बेच कर सभी ने सब कुछ पा लिया है , सच किसी काम का नहीं सभी ने आज़मा लिया है बीच मझधार नाख़ुदा को ही अपना ख़ुदा मान लिया है । झूठ बिना इस दुनिया में जीना मुश्किल है इस सच्चाई को जान लिया है , कौन है जो डुबो कर सभी को अपनों की नैया पार लगाता है उसको पहचान लिया है । कोई सभी से पूछता है क्या आपने उसको देखा है जिस के हम मामा हैं जो हमको यहां लेकर आया था खुद को मेरा बतलाया था मुझे मामा कहकर बुलाया था । भरोसा किया था उसको अपना झोला पकड़वाया था उसने हमको मामा नहीं उल्लू बनाया था कोई ठग था बातों से उलझाया था , अंजाम सभी कुछ लुटवाया था । 
 
इधर देश में लगता है कोई भी संजीदा बात किसी गंभीर विषय पर नहीं करता है राजनीति मज़ाक बन गई है चुटकुलेबाज़ी का चलन है । इक पुराना चुटकुला फिर से याद आया है सुनाता हूं , कुछ बच्चे मैदान में खेल रहे थे तभी उनके अध्यापक उधर से गुज़रे , अध्यापक ने पूछा बच्चो क्या खेल खेल रहे हो । बच्चों ने बताया मास्टरजी हमको इक कुत्ते का पिल्ला मिला है और हमने ये शर्त रखी है कि जो भी सबसे बड़ा झूठ बोलेगा ये पिल्ला उसी का हो जाएगा । कैसे झूठ बोलते हैं अध्यापक ने मिसाल देने को कहा तो बताया जैसे देश की राजनीति में सभी झूठी बातें करते हैं और चुनाव जीत कर मौज मस्ती करते हैं । मास्टरजी ने हैरान हो कर कहा क्या ज़माना आ गया है जब हम छोटे बच्चे थे तो हमको झूठ शब्द का मतलब तक मालूम नहीं था । इतनी बात सुनते ही सभी बच्चों ने मिलकर कहा मास्टरजी ले जाएं ये कुत्ते का पिल्ला आपका हुआ आप शर्त में सबसे अव्वल रहे हैं । यकीनन इस से बड़ा कोई झूठ बोल ही नहीं सकता था कि उसको झूठ क्या होता है मालूम तक नहीं । लगता है कोई है जिस ने झूठ की शिक्षा की पढ़ाई में डिग्री हासिल की हुई है तभी जिधर देखते हैं उसका झूठ का ही परचम फहरा रहा है । झूठ सच को छोटा बताकर अपना कद बढ़ा रहा है ऐसे में किसी कवि का लिखा याद आ रहा है , कवि कहता है बौने कद वालों को पहाड़ पर चढ़ने का बड़ा शौक होता है । पहाड़ की ऊंचाई पर खड़े हो कर उनको लगता है उनकी ऊंचाई बढ़ गई है जबकि वास्तव में पहाड़ पर खड़े होकर वो और भी बौने दिखाई देते हैं । आजकल सभी एक से बढ़कर ऊंचे शिखर पर खड़े हैं ऐसे शिखर जिनकी कोई बुनियाद ही नहीं है बस कुछ और कहना व्यर्थ है । झूठ के चाहने वालों को सच कड़वा लगता है उनको मीठा ज़हर पसंद है भले उस से अंजाम जैसा भी हो सामने दिखाई दे तब भी अनदेखा करते हैं चाटुकारिता इक गुण समझा जाने लगा है । मीडिया झूठ को ख़ुदा बताने ही नहीं बनाने को अपने ज़मीर को नीचे गिराने लगा है , सभी को झूठ लुभाने लगा है , ऊंठ पहाड़ को छोटा बताने लगा है।  आखिर में इक पुरानी ग़ज़ल पेश है।  
 
 

 ग़ज़ल  : डॉ लोक सेतिया 

 
पूछते सब ये क्या हो गया
बोलना तक खता हो गया।

आदमी बन सका जो नहीं
कह रहा मैं खुदा हो गया।

अब तो मंदिर ही भगवान से
लग रहा कुछ बड़ा हो गया।

भीख लेने लगे लगे आजकल
इन अमीरों को क्या हो गया।

नाज़ जिसकी वफाओं पे था
क्यों वही बेवफा हो गया।

दर-ब-दर को दुआ कौन दे
काबिले बद-दुआ हो गया।

कुछ न ' तनहा ' उन्हें कह सका
खुद गुनाहगार-सा हो गया। 
 
 
 Pasand: सच और झूठ का महत्व