अप्रैल 03, 2021

POST : 1481 हम जो चाहत में आह भरते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

हम जो चाहत में आह भरते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

हम जो चाहत में आह भरते हैं 
जैसे कोई गुनाह करते हैं । 
 
मार कर पत्थरों से अहले-जहां 
पेड़ से फल की चाह करते हैं । 
 
याद करके अतीत हम अपना 
अपनी रातें सियाह करते हैं । 
 
हमको उनसे नहीं गिला कोई 
दिल को हम खुद तबाह करते हैं । 
 
एक सहरा में हम - से दीवाने 
ख़्वाब में सैरगाह करते हैं ।  
 
हम  मुसाफ़िर कहां ठहरते हैं  
नित नई एक  राह करते हैं । 
 
दाद मांगी कभी नहीं  ' तनहा '  
लोग ख़ुद  वाह - वाह करते हैं ।
 
 


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