लब पे आई तो मुहब्बत आई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"
लब पे आई तो मुहब्बत आईभूल कर भी न शिकायत आई ।
बात कुछ ऐसी चली महफ़िल में
फिर हमें याद वो मूरत आई ।
हम से बिछुड़ी जो अभी शाम ढले
रात भर याद वो सूरत आई ।
कश्ती लहरों के हवाले कर दी
बेबसी में जो ये नौबत आई ।
आसमां रंग बदल कर बोला
लो ज़मीं वालो कयामत आई ।
चाल कोई न कभी हम चलते
काम लेकिन न शराफ़त आई ।
बन गए चोर सिपाही ' तनहा '
क्या ग़ज़ब की है सियासत आई ।

Wah हमसे बिछुड़े👌👍
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