सितंबर 01, 2012

POST : 107 दिल अपना किसी को दिखाएं तो कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 दिल अपना किसी को दिखाएं तो कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

दिल अपना किसी को दिखाएं तो कैसे 
है वीरान कितना बताएं तो कैसे । 
 
करें किस से ज़िक्र अपनी बर्बादियों का 
ये इल्ज़ाम खुद पर लगाएं तो कैसे । 
 
नहीं रूह हम , जिस्म-ए- मुर्दा हैं यारो 
यूं ही चारागर को बुलाएं तो कैसे ।  
 
( चारागर : अर्थ - हक़ीम डॉक्टर )  
 
जो मांगे खुदाई तो मिल जाए वो भी 
हम उस तक रसाई भी पाएं तो कैसे । 
 
( रसाई : अर्थ पहुंच , दाख़िला ) 
 
यकीं दोस्तों पर हमेशा किया है 
किसी दोस्त को आज़माएं तो कैसे ।  
 
है अच्छा बुरा क्या वो सब जानता है 
खुदा से नज़र हम चुराएं तो कैसे । 
 
वहां जा के हम और होते हैं  ' तनहा '
तो हम उनकी महफ़िल में जाएं तो कैसे ।  
 
 
 Gazal
 

 

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