सितंबर 09, 2012

POST : 121 चल रहे हैं धूप में छाया करो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

चल रहे हैं धूप में छाया करो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  ' तनहा '

चल रहे हैं धूप में छाया करो
गेसुओं को हम पे लहराया करो ।

जैसे सूरज को छिपाती है घटा
उस तरह आंचल का तुम साया करो ।

और भी हो जाएंगे पत्ते हरे
प्यार की शबनम से नहलाया करो ।

प्यास के मारों को तुम झरना बनो
यूं न दरिया बन के बह जाया करो ।

तिनके चुन चुन कर बने हैं घौंसले
बिजलियो उनपर तरस खाया करो ।
 
दूर होकर भी हमेशा साथ हैं 
गीत कोई याद में गाया करो । 
 
इस जहां में जो भी ' तनहा ' हो उसे 
आप महफ़िल में बुला लाया करो ।  
 

 


 

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