अगस्त 30, 2012

POST : 103 आई हमको न जीने की कोई अदा ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आई हमको न जीने की कोई अदा ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आई हमको न जीने की कोई अदा
हम ने पाई है सच बोलने की सज़ा ।

लब पे भूले से किसका ये नाम आ गया
जो हुए बज़्म के लोग मुझ से खफ़ा ।

जो करें भी शिकायत तो किस बात की 
क़त्ल करना किसी को है उनकी अदा ।

हो गया जीना इन्सां का मुश्किल यहां
इतने पैदा हुए हैं जहां में खुदा ।

हैं कुछ ऐसे भी इस दौर के चारागर               
 
ज़हर भी जो पिलाते हैं कह कर दवा ।
( चारागर = चिकित्सक )


कौन हैं और रहते कहां आजकल 
भूल हम खुद गए क्या हमारा पता ।
 
सब वफ़ादार खुद को समझते यहां 
हैं सभी लोग ' तन्हा ' मगर बेवफ़ा ।  
 

 




1 टिप्पणी: