मेरे ब्लॉग पर मेरी ग़ज़ल कविताएं नज़्म पंजीकरण आधीन कॉपी राइट मेरे नाम सुरक्षित हैं बिना अनुमति उपयोग करना अनुचित व अपराध होगा । मैं डॉ लोक सेतिया लिखना मेरे लिए ईबादत की तरह है । ग़ज़ल मेरी चाहत है कविता नज़्म मेरे एहसास हैं। कहानियां ज़िंदगी का फ़लसफ़ा हैं । व्यंग्य रचनाएं सामाजिक सरोकार की ज़रूरत है । मेरे आलेख मेरे विचार मेरी पहचान हैं । साहित्य की सभी विधाएं मुझे पूर्ण करती हैं किसी भी एक विधा से मेरा परिचय पूरा नहीं हो सकता है । व्यंग्य और ग़ज़ल दोनों मेरा हिस्सा हैं ।
ईमान की बात , ईमानदारी के साथ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया
पहले संक्षेप में आज ही की बात। कल रात को किसी व्यक्ति ने जौनपुर से फोन किया राष्ट्रधर्म पत्रिका में मेरा लेख पढ़कर। मेरे पास पत्रिका नहीं आई थी , डाकघर सामने ही है इसलिए सुबह जाकर देखा जहां डाक छांटते हैं मेरी दो पत्रिकाएं रखी थी। तब केवल सफाई करने वाले आये हुए थे और डाकखाना खुलने में अभी समय था। मैंने उस सफाईकर्मी को बताया कि मेरा नाम डॉ लोक सेतिया है और ये मेरे ही नाम की डाक है मैंने ले जा सकता हूं। जी नहीं उसने कहा आप बाद में आकर ले जाना जब डाकिया या और डाकघर के लोग आ गए हों तभी। मुझे बहुत अच्छा लगा उसका वो काम नहीं करना या करने देना जिसका अधिकार उसको नहीं है। उसी डाकघर में दो लोग काम करते हैं एक डाकिया जो डाक बांटने में कुछ देरी कर रहा था अन्यथा मुझे कल ही पत्रिका मिल जाती , और दूसरा ये जो जनता है कि जिस जगह वो काम करता है उस जगह रखी किसी चीज़ को छेड़ना उसका अधिकार नहीं है। सलाम उस सफाईकर्मी को। मुझे कई बातें याद आ गईं हैं पुरानी। बी के चम जी लिखा करते थे अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में कॉलम। अंत में उस लेख की बात बतानी है , पहले आज की बात।
अधिकारों के दुरूपयोग की बात
सरकारें बदलती हैं सरकारी तौर तरीके नहीं बदलते , ढंग नहीं बदलते। कल कोई कर रहा था और कोई और कर रहा है। कल तक अधिकारी उस दल के नेता के लिए अनुचित कार्य करते थे अब इस दल के नेता के लिए करते हैं। बदला कुछ भी नहीं बल्कि और अधिक खराब हालत होती जाती है। हरियाणा रोडवेज़ की खबर आई है कि जो कंडक्टर क्लर्क का काम पर लगा रखे थे उनको अपने काम पर लगाया जायेगा ताकि बस सेवा सही हो सके। ये अकेली घटना नहीं है , शहर के पार्क पर नियुक्त बताये माली बड़े अधिकारी की कोठी पर काम करते हैं , इतना ही नहीं पुलिस के सिपाही अफ्सरों के घरेलू नौकर की तरह काम करते हैं। पुलिस के बड़े अधिकारी अपने विभाग के सिपाही से ऐसा काम लेने देते हैं और अधिकारी भी ऐसा करते संकोच नहीं करते। सत्ता और पद का दुरूपयोग तो है ही साथ में छोटे पद पर नियुक्त सुरक्षाकर्मी कुंठा का शिकार हो जाते हैं। हम सोचते ही नहीं क्यों किसी सिपाही ने ख़ुदकुशी कर ली या किसी को मार डाला। जिन लोगों को नियम कानून लागू करने हैं वो खुद किसी नियम किसी नैतिक मूल्य की परवाह नहीं करते हैं। मगर आम नागरिक पर नियम लागू करने में इनका रुख बदल जाता है। किसी से घूस लेते हैं तो उसकी बड़ी से बड़ी गलती भी नहीं दिखाई देती और किसी को परेशान करना चाहते तो अकारण ही कमियां तलाशते हैं। फिर से इक बात को दोहराना ज़रूरी है कि देश में कोई भी सत्ताधारी नेता कोई भी घोटाला बिना सचिव आईएएस अधिकारी की मिलीभगत नहीं कर सकता है , क्योंकि संविधान में किसी भी चेक या भुगतान पर पहले अधिकारी के हस्ताक्षर होना लाज़मी है। इसका मतलब यही हुआ कि हर नेता के हर घोटाले में अधिकारी वर्ग शामिल होता ही है। ये वास्तव में शर्मनाक है , जिनको आम नागरिक की आमदनी से कई गुना अधिक वेतन मिलता है , सुख सुविधा सुरक्षा मिलती है वही देश और संविधान के लिए ईमानदार और वफादार नहीं होते।
काला धन और नोटबंदी तथा उसका नाकाम होना
अब ये कोई राज़ की बात नहीं है कि नोटबंदी असफल रही है। कारण बहुत हैं और नीयत की भी बात साफ़ नहीं होना इसमें आती है। गरीब लहरों पर बिठाये जाते हैं पहरे , समंदरों की तलाशी कोई नहीं लेता। मगरमच्छ सुरक्षित हैं मछलियां मर गई सभी। मुझे लगा था जैसे कोई बाज़ार से आटा दाल सब्ज़ी घी तेल सब शुद्ध लेकर खाना पकाये और सबको प्यार से खिलाये मगर लोग बिमार हो जाएं। क्योंकि आपने जिन बर्तनों में खाना बनाया और परोसा वही साफ़ नहीं थे , खाना गंदा होना ही था। सरकार की रसोई में सभी बर्तन अर्थात जिन बैंकों से ये सब करवाया गया वही ईमानदार नहीं थे। कितने बैंक वालों ने बहती गंगा में खूब मस्ती की बहुत दिन तक नहाये नंगे होकर। आपके सब नियम बेकार हुए। मगर यहां भी अजीब घोटाला हुआ। सरकारी बैंकों में घोषित किया गया कि इस काम में जितने लोग ओवरटाइम करेंगे उनको उस समय के अतिरिक्त पैसे मिलेंगे। अब सब से अधिक काम उन्होंने किया जो लोग कैश काउंटर पर ड्यूटी देते हैं , लेकिन अधिकतर हुआ ऐसा कि मैनेजर और बड़े अधिकारीयों के लिए लिखा जाता रहा अधिक समय काम किया और जो स्टाफ काउंटर पर भुगतान करता जमा करता जिसे सांस लेने की फुरसत नहीं मिली उनको नहीं मिला कुछ भी या फिर नाम मात्र को। जब तक हस्ताक्षर करना काम समझा जायेगा और वास्तविक काम करने वाले की उपेक्षा की जाती रहेगी सही कामकाज नहीं हो सकता।
बी के चम के लेख की बात
उन्होंने अपने लेख में तीन ईमानदार लोगों को लेकर लिखा था। मुझे दो घटनाएं याद हैं तीसरी भूल गई है। एक बार वो अपने इक अधिकारी दोस्त से मिलने गए तो पता चला वो नौकरी के लिए आये आवेदकों का इंटरव्यू ले रहे हैं। कमरे में जाते उनको फोन पर बात करते देखा सुना और लिख रहे थे कागज़ पर , समझ गया कि नेता जो मंत्री हैं किसी की सिफारिश कर रहे हैं। बेहद निराशा हुई ये भी सिफारिश पर किसी को नौकरी देते हैं। मगर तभी बात समाप्त करते हुए उनहोंने कहा मंत्री जी आपका दिया नाम लिख लिया है और आप उनको बता सकते हैं कि उनको साक्षात्कार के अयोग्य घोषित किया जा रहा है नियमानुसार ऐसा सिफारिश करवाना अयोग्य बना देता है। मान गए उनके हौंसले की बात को , कोई चिंता नहीं थी , क्या होगा अधिक से अधिक तबादला।
दूसरी घटना शिमला की माल रोड की है , इक बड़े अधिकारी कार में जा रहे थे कि इक सुरक्षकर्मी अवरोधक लगा कर खड़ा था , साहब ने ड्राइवर को भेजा बताओ कौन हूं और रास्ता खुलवाओ। नहीं माना वो तो खुद नीचे उतर कर उसके पास जाकर बोले जानते हो मैं अमुक विभाग का आला अधिकारी हूं और कभी किसी दिन तुम्हारी नियुक्ति मेरे आधीन भी हो सकती है। जी मैं जनता हूं उसने कहा। अधिकारी बोले सोचो तब क्या होगा तुम्हारा। उसका जवाब था सर , तब आपको यकीन होगा कि कम से कम एक आदमी आपके आधीन ऐसा है जो अपना कर्तव्य निभाता है ईमानदारी से। मेरी निष्ठा अपने काम और देश के लिए है। सैल्यूट किया था उस अधिकारी ने और धन्यवाद किया था ये सबक समझाने के लिए।
मेरे पास है वह विडिओ अगर आपको कहीं से नहीं मिला तो मुझे बताओ और पाओ। पे टीएम की तरह से नहीं। फेसबुक की तरह से नहीं। व्हाट्सऐप की तरह से नहीं। आपस की बात आपस तक रहेगी। इस बात का भरोसा आपको बहुत लोग दे सकते हैं जिनकी कितनी बातें मेरे भीतर गहरे कुंवे में पड़ी हैं , खुद मैं भी उन्हें भूल चुका हूं। जिस विडिओ की बात करनी है वो सब से अलग है। इतना कि किसी को कल्पना में भी नहीं विचार आया कि ये संभव है , बहुत सारी बातें अविश्वसनीय सच होती हैं। पांच साल पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि इक दल चाहे जितना बदनाम हो जाये घोटालों में , दूसरे दल को इतना बहुमत हासिल हो सकता है और उसके बाद देश से राज्यों तक उसी की विजय हो सकती है। मगर वो अविश्वसनीय बात अब इतिहास बन चुकी है। जब किसी के अच्छे दिन आते हैं तो यही होता है। तकदीर कब किसी को कहां पहुंचा देती है कोई नहीं जानता है। मुलतानी भाषा बेहद रोचक है , और मुलतानी कहावतें बहुत बढ़िया होती हैं। इक ऐसा ही मुहावरा है , किसे दी रन्न मोई किसे दे भाग खुले। हिंदी अनुवाद भी बताना होगा , किसी की पत्नी की मौत हुई और किसी की तकदीर खुल गई। अभी भी नहीं समझे तो पांच साल बाद समझोगे जनता की तरह। भाई सीधी बात है जिस लड़की की शादी नहीं हो रही थी , आयु बढ़ती जा रही थी , जिस की पहली बीवी नहीं रही उसको ज़रूरत थी , खुद ही मांग लिया रिश्ता। राजनीति में ये और ढंग से होता है , बीवी भी होते हैं नेता और रखैल भी बनकर रहते हैं , ये चुनाव के बाद का गठबंधन कहलाता है। कहने को किसी की और निष्ठा किसी और के साथ। अब असली बात पर आते हैं।
जिसकी बात हो रही है उस विडिओ में इक उपकरण है जो आपको आपके सामने आपका अगला पिछले जन्म दिखाता है। विडिओ में टीवी चैनल वाला सच्चाई समझना चाहता है , उपकरण बनाने वाले को बहुत पैसा देने का वादा सरकार की तरह किया हुआ है। लालच भी दिया है कि टीवी पर देख कर हर कोई आपसे बनवाना चाहेगा उपकरण और आप मालामाल हो जाओगे। टीवी वाले ने अपना नाम आधार कार्ड नंबर डाला तो पटल पर इक कुत्ता सड़क पर भागता हुआ दिखाई दिया। बुलाया उस उपकरण बनाने वाले को ये पूछने के लिए कि ये तो कुछ और ही है , भला किसी कुत्ते का नाम और आधार कार्ड नंबर मेरे जैसा कैसे हो सकता है। उपकरण बनाने वाले ने समझाया कि आपने अंकित किया हुआ है इस पहचान वाले का अगला जन्म क्या होगा। भविष्य में आप गाड़ियों के पीछे भागते सड़क के श्वान हो सकते हैं जो स्पीड मैनिया के शिकार हैं। बुरा नहीं मानों तो अभी भी वही हैं , बेकार भौंकते रहते हैं , अनजान अजनबी वाहनों के पीछे भागते रहते हैं। आपको लगता है सब डरते हैं आपसे , मगर किसी को आपकी परवाह नहीं है , सब जानते हैं आपको टुकड़ा डाला तो दुम हिलाने लगते हैं। विज्ञापन देने वाले के पालतू हैं , आपने रखवाली करना छोड़ दिया है। बेकार की बहस जिसका कोई नतीजा नहीं इसी तरह की बात है भौंकने से लोग तंग आ चैनल बदलते रहते हैं मगर हर सड़क पर यही दिखाई देता है। देख लो किसी दिन इसी तरह कोई वाहन आपको कुचल देगा , कुत्ते की मौत मरना कोई नहीं चाहता। लेकिन आपसे ये दौड़ छूटेगी नहीं कभी , पागलपन की सीमा पार कर चुके हैं आप। पिछले जन्म में देखने से घबरा गये , दिखाई दिया सच मगर स्वीकार नहीं कर सकते। आपका उपकरण झूठा है हम इस को टीवी चैनल पर नहीं दिखा सकते। आप बेशक किसी अख़बार में इश्तिहार दे कर कोशिश कर लेना , कोई भी अपना पिछला जन्म ऐसा नहीं पसंद करेगा न भविष्य में ऐसा जन्म लेना चाहेगा। जी आपकी बात ठीक है मगर आप आगे क्या करोगे , मुझ पर मान हानि का मुकदमा तो नहीं करना चाहते। नहीं नहीं बिल्कुल भी नहीं , क्योंकि इस सच को सामने लेकर मुझे हासिल क्या होगा। मानहानि का मुकदमा करने वालों की गति देखी है , माफ़ कर जान छुड़ाते हैं ताकि झूठी इज्ज़त बच जाये जो बचती नहीं है। लोग सच कोई समझते हैं , झूठ पर खामोश रहते हैं , मन ही मन हंसते हैं।
माफ़ करें मुझे बीच में ब्रेक लेना पड़ रहा है , आप साथ बने रहिये , विज्ञापन के बाद आपको दिखाते हैं इस विडिओ की असलियत। कहीं जाना नहीं हमारी टीआरपी की सौगंध।
आपने ये शब्द समझा है , दो ही लोग हुए हैं जिनको ये रुतबा हासिल हुआ है। चाचा नेहरू और चच्चा ग़ालिब। यकीन करें इनसा दूसरा नहीं हो सकता। गांधी जी को लेकर कहा जाता है कि सदियों बाद लोग यकीन नहीं करेंगे कि हाड़-मांस का ऐसा कोई पुतला धरती पर होता था। मगर आज अभी 54 साल बाद कोई उसी कुर्सी पर बैठकर उनको नहीं अपने पद को अपमानित कर रहा है जिनका मुकाबला वो कभी नहीं कर सकता , उन देश के पहले वास्तविक प्रधान सेवक जवाहरलाल नेहरू की बुराई करते समय। उन जैसा नेता जो देश के भविष्य को लेकर बहुत बड़े सपने देखता है और समझता है कि देश से गरीबी भूख मिटानी है मगर उसके साथ आधुनिक विज्ञान और विकास भी करना है। खुद अपने मुंह से कहता है मुझे इतना अधिक प्यार देकर ऊंचा नहीं पहुंचाओ कि मैं तानाशाह बन जाऊं। किसी ने कभी आपको बताई ये बात आज तक। मैं तब 13 साल का बच्चा था और हमारे स्कूल में भीतर जाते ही नेहरू जी की कोट पर गुलाब लगाए हुई तस्वीर दिखाई देती थी। केवल कहने को नहीं हम बच्चे दिल से प्यार करते थे , कौन नहीं रोया था उनके निधन की खबर सुनकर। ये घटना मुझे कभी नहीं भूल सकती है , 1965 को 27 मई को स्कूल में नेहरू जी की याद में सभा हुई थी , केवल बच्चों को ही बोलना था और जो चाहे कर दिखाना था। आज रोज़ लिखता हूं बहुत कुछ , मगर कभी नहीं भूली वो बचपन की दिल की गहराई से निकली भावना की पहली लिखी कविता। मैंने अपनी पहली रचना नेहरू जी की याद में लिखी थी। 27 मई को याद करो चल बसे थे चाचा प्यारे , आंसू भरे सितारे। जो भी हो तुकबंदी भी हो मगर इक दिल से भावना से लगाव से लिखी थी। क्या आजकल किसी नेता के निधन पर किसी को ऐसा दर्द महसूस होता है।
पंचशील को भूल गये हैं जैसे बुरा सपना था , मगर नहीं आज भी सब कहते वही हैं जंग से किसी को कुछ हासिल नहीं होता है। पीठ में छुरा घोंपा था चीन ने और हम उस दोस्ती की आड़ में भरोसा तोड़ने वाले दुश्मन की बात को छोड़ इक सभ्य नेता को दोष देते हैं। आज देश जिस भी मुकाम पर है उद्योग को लेकर विज्ञान को लेकर बांध बनाने से लेकर राज्यों के अधिकार और लोकतंत्र को स्थापित करने तक उनका योगदान है। इस बात को आज़ादी के पचास साल पूरे होने पर संसद में अपने भाषण में अटल बिहारी वाजपेयी जी ने सपष्ट किया था। आज के सत्ताधारी कुत्सित मानसिकता के चलते ये कभी नहीं बोल सकते हैं। किसी ने कभी विचार किया कभी नेहरू ने इंदिरा को सत्ता सौंपने की सोच भी रखी थी , जिनको नहीं मालूम उनको याद दिलवाना ज़रूरी है कि नेहरू जी के निधन के बाद श्री गुलज़ारी लाल नंदा जी को काकाजी प्रधानमंत्री बनाया गया क्योंकि वो सब से वरिष्ठ सांसद थे। मगर उन्होंने अपने पद और वरिष्ठ होने का दुरूपयोग नहीं किया , जबकि उन्हें तीन बार इस तरह का अल्पकालीन प्रधानमंत्री बनाया गया। ये था नेहरू का स्थापित लोकतंत्र , इतना ही नहीं उसके बाद संसद में कोंग्रेस के नेताओं की बैठक हुई जिस में नेहरू जी का स्थान किसे दिया जाये ये तय किया जाना था। हैरान हो जाओगे किसी को पहले कोई पता नहीं था क्या होगा। लाल बहादुर शास्त्री जी सभा में देर से आये और कोई खाली कुर्सी नहीं देख आखिर में सीढ़ियों पर धरती पर बैठ गए। जब उनके नाम का प्रस्ताव सामने आया और सब ने तालियां बजाईं तो ध्यान आया की वो हैं कहां , तब उनको अगली कतार में बिठाया गया। आज किसी दल में ये साहस है कि खुली सभा में विचार कर काबिल व्यक्ति को चुना जाये। चुनाव से पहले घोषित करना कि ये या वो प्रधानमंत्री हों संविधान की भावना की बात नहीं है।
इक कविता है किसी कवि की। बौने लोगों को लगता है , पहाड़ पर चढ़कर , उनका कद , ऊंचा हो जाता है , मगर वास्तव में , पहाड़ पर चढ़कर बौने , और भी बौने दिखाई देते हैं। इसलिए महान लोगों से अपनी तुलना नहीं करें। आखिर में किसी शायर की ग़ज़ल के कुछ शेर अर्ज़ करता हूं।
इस कदर कोई बड़ा हो मुझे मंज़ूर नहीं , कोई बंदों में खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
रौशनी छीन के घर-घर के चिरागों की अगर , चांद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना , आपकी एक अदा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
आज मैं जो भी हूं हूं बदौलत उसकी , मेरे दुश्मन का बुरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
मैं जनता हूं उनको ये ग़ज़ल कभी समझ नहीं आएगी जो हर किसी को खुदा कहने लगते हैं और खुदा बदलते रहते है। अंतिम शेर की बात तो उनको अजीब ही लगेगी। मगर उनको बताना होगा इक महान नेता का कहना था , मैं तुम्हारी बात से असहमत हो सकता हूं , मगर मेरा कर्तव्य है आपकी अपनी बात कहने की आज़ादी की रक्षा करना। इक शेर जगजीत सिंह की गए ग़ज़ल से , हमने देखा है कुछ ऐसे खुदाओं को यहां , सामने जिस के वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं।
नानक समयो रम गयो , अब क्यों रोवत अंध ( मन की बात )
डॉ लोक सेतिया
मैं तो इक मूर्ख हूं जो खुद मोह माया में रम गया है , बंधन से मुक्त होना चाहता हूं हो पाता नहीं। ये आज इक शब्द जो श्लोक मोहल्ला नौ सिख धर्म ग्रंथ की बाणी का बेहद महत्व रखता है जीवन में सही मार्गदर्शन के लिए जिसे काफी अर्से से नियमित सुनता हूं , उसी को साथ लेकर देश और समाज की बात करना चाहता हूं। मेरी विनती है कि मेरे ऐसे करने पर कोई भी मेरे मकसद को अन्यथा नहीं ले। वास्तव में धर्म की किताब चाहे गीता हो कुरान हो बाइबल हो सभी हम को सच की परख और सही जीवन राह पर चलने की ही बात समझते हैं।
सीधी बात करने वाले सच्ची बात नहीं करते और अपना ज़मीर बेचने को राज़ी हैं। कोबरा पोस्ट ने जो आज बताया मुझे वही अख़बार वालों को पत्रिका वालों को लेकर लिखते बीस साल हो गए हैं। मीडिया हो सरकार के नेता हों चाहे अधिकारी सब की बात यही है जो शीर्षक है।
करना हो सो ना कियो , पड़ेओ मोह के संग
नानक समयो रम गयो , अब क्यों रोवत अंध।
पहली बात करना क्या था , जो नहीं किया और जो नहीं करना था करते रहे। इसे शब्द में कहा है जो किसी को भय नहीं देता है और ना ही किसी से भयभीत होता ही है , नानक कहते हैं हे मन सुन ज्ञानी उसी को कहते हैं। दावा करते थे मुझे कोई मोह नहीं लोभ नहीं लालच नहीं , मगर किया क्या अपना गुणगान और झूठी शोहरत हासिल करने को अपनी लकीर बड़ी बनाना नहीं आया और जिनकी लकीर बड़ी लगी उनको छोटा करने लगे। मन की बात से इक भजन याद आया है। तोरा मन दरपन कहलाये उसे भी सुन लेते हैं।
मन की बात इसे कहते हैं , अपने मन को पा लिया भगवान को पा लिया। कोई बात मन से छुपी नहीं है , मन की बात का शोर नहीं होता ख़ामोशी से सुनते हैं। मन की बात सब से नहीं की जाती और खुलेआम तो कभी नहीं। जनता को वादा किया था जो वो अच्छे दिन यही हैं कभी मन से पूछना। धर्म की बात आचरण की बात होती है आडंबर की नहीं। रावण भी सुनते हैं बहुत की थी देवताओं की पूजा , कहते हैं सभी ग्रंथ कंठस्थ थे मगर आचरण में ज्ञानी नहीं था। सोने की लंका की तरह आलीशान भवन बनाने से महान नहीं हो जाते , जलकर राख हो जाती है ऐसी लंका भी। इस देश में हनुमान हर जगह विराजमान हैं , शायद भगवान कृष्ण जी अवतार लेना भूल गए वर्ना पाप की पापियों की अधर्म की कोई कमी तो नहीं बाकी आजकल। नाम की बात को छोड़ो नाम बदनाम लोगों का भी याद रहता है। इक अपना शेर कहना चाहता हूं।
अनमोल रखकर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।
अब इस से अधिक बात क्या होगी कोई बार बार कहता है , उनकी दुकान पर ताला नहीं होता तो हम विधायक रुपी सामान खरीद लेते या नहीं बिकना चाहते तो लूट कर चुरा कर भी अपनी सरकार बनवा लेते। लोकतंत्र किस चिड़िया का नाम है और जनता भले किसी को चुनती है सभी दल अपनी साहूलियत से व्याख्या कर लेते हैं। कोई विचारधारा नहीं कोई नैतिकता नहीं केवल सत्ता के लिए अवसरवादिता है। ये बहुत अजीब बात है आपने किसी भी राज्य में विधायकों को अपना नेता चुनने की आज़ादी नहीं दी , बस अपने ख़ास संगठन से जुड़े लोग मनोनीत करते गए , नतीजा कर्नाटक में राज्यपाल को देश संविधान नहीं अपने आका और संगठन की चिंता थी , सर्वोच्च अदालत कब कब ये करेगी। हरियाणा में पूरी सरकार इक अपराधी के संग खड़ी रही , उच्च न्यायालय और इक न्यायधीश के कारण पीड़ित महिलाओं को न्याय मिला। आप अपराधियों का बचाव ही नहीं करते सच को खरीदने का अधर्म ही नहीं करते , आप सच को डराने धमकाने परेशान करने में किसी गुंडे की तरह हर सीमा पार कर जाते हैं। नहीं ऐसा तो आपत्काल में भी नहीं देखा था।
अब जब समयो रम गयो , अर्थात चुनाव सामने हैं तब , तरह तरह से बता रहे हमने क्या क्या किया है। जो किया जनता को सामने दिखाई देता होगा , अंधी नहीं है जनता। जो किया नहीं वो कैसे दिखाओगे।
ये सब करना था , किया है तो दिखाओ ?
कालेधन वाले जेल नहीं गए , कालाधन मिला नहीं उसे सफेद करवा दिया।
भ्र्ष्टाचार और महंगाई दोनों डायन अभी और विकराल रूप धारण कर चुकी हैं।
सेवक होने की बात कहकर खुद पर देश का धन बर्बाद करना , नौकर का चोरी करना है।
एकतरफा संवाद स्वस्थ लोकतंत्र में उचित नहीं है।
किसान , बेरोज़गार , किसी को कुछ नहीं मिला है।
सीमा पर सैनिक शहीद हो रहे हैं और आम जनता आपके भ्र्ष्टाचारी पल के नीचे दबकर मर गए हैं ।
( ये आपके ही बोले शब्द हैं जब किसी और राज्य में किसी दूसरे दल की सरकार के रहते दुर्घटना घटी )
विकास कहीं नहीं , विनाश करने में कोई कमी है जिसे दोबारा सत्ता हासिल कर पूरा करना है ।
अंत में मीडिया के नाम लिखी तीस साल पुरानी ग़ज़ल पेश है ,
इक आईना उनको भी हम दे आये,
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग,
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।
सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही,
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।
देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह,
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।
कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर,
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं।
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी,
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं।
इंसान हैं , इंसानियत नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया
आज पार्क में सैर करते हुए सोच ही रहा था कुछ इसी तरह के विषय की बात , हमारी कथनी और करनी की बात तथा अधिकतर अपने अधिकारों पद सत्ता धन ताकत के अनुचित उपयोग की बात। पार्क से निकलने को ही था कि तीन चार लोगों की बातें सुनाई पड़ीं। इक व्यक्ति कह रहा था इन सफाई कर्मचारियों की मांगे नहीं मानी जानी चाहिएं थी। रुक गया और उनको भी रोका और सवाल किया क्या उनका शोषण नहीं किया जाता रहा अभी तक , दो वक़्त खाना मिल जाये इतना ही मांगते हैं। बोले ये अपना काम नहीं करते ठीक तरह से। मैंने कहा आपने अधिकारी करते हैं ठीक से काम , नगरपरिषद के सभापति से विधायक मंत्री मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री तक क्या सभी ठीक काम कर रहे हैं। करते तो सब कुछ सुधर सकता था। मगर हम उनके खिलाफ आवाज़ नहीं उठा सकते , जो मुफ़लिस हैं गरीब हैं उनके लिए जो चाहे बोलते हैं। कोई अधिकारी आपको बिना बात डांट देता है मगर आप खामोश सहते हैं , किसी सफाई कर्मचारी ने आपको सलाम नहीं किया तो आपका अपमान हो गया। उसने आपकी बात नहीं मानी तो आप नाराज़ हो गए , मगर जिनको खुद आपने चुना वो आपकी बात को नहीं सुनते तब भी हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। सब से पहले हमें ये कायरता छोड़नी होगी , टकराना है तो अपने से बड़े के साथ टकराओ सही बात पर। यही अधिकतर लोगों का चरित्र है। हम अपने साथ अन्याय होने पर रोते हैं आहें भरते है , किसी और पर अन्याय होता देख विचलित नहीं होते , और खुद किसी पर अन्याय करते भी संकोच नहीं करते हैं। मेरे जीवन में कई बार ऐसी घटनाएं घटी हैं और उसी तरह सब को ऐसे कड़वे अनुभव होते हैं , जब उल्टा चोर कोतवाल को डांटता जैसी बात हो।
किसी ने अपनी कार मेरे घर के गेट के सामने खड़ी कर रखी थी , उनसे कहा आप इसे थोड़ा परे खड़ा कर लो तो वो बोले मैं हुडा विभाग का हूं और मुझे पता है आपने जो रैंप बनाया हुआ है वो कितना अनुमति है। इसे क्या कहोगे , धौंस दिखाना , वो इंसान उसी समय जिस की दुकान पर खड़ा था उसने विभाग के प्लाट पर फुटपाथ पर कब्ज़ा कर रखा था जो उसको दिखाई नहीं दिया मगर मेरा रैंप जो सामन्य सभी की तरह से बना है उसको नियमानुसार नहीं लग रहा था , शायद उसके विभाग के नियम उसको ऐसा अमानवीय आचरण करने के अधिकार देते हों , देश का संविधान तो सब को बराबरी से न्याय की बात करता है।
कुछ ऐसा ही इक और बार हुआ , कार में बैठ शराब पी रहे लोगों को मना किया कि ये क्लिनिक है जहां आपने दरवाज़े के सामने रोक कर कार खड़ी की हुई है और शराब पी रहे हैं। जनाब आये बाहर और बेशर्मी से बोले आप फोटो ले लो और शिकायत कर लो पुलिस को , मैं पुलिस में ही हूं। मैंने कहा तब तो और गलत बात है आपको जिस अनुचित काम को बाकी लोगों को रोकना हैं खुद वही कर रहे हैं , तभी तो देश की हालत ऐसी है। मैं बहुत ईमानदार पुलिस वालों को जनता हूं मगर ये कुछ लोग जो समझते हैं थानेदार हैं तो कुछ भी कर सकते हैं। ऐसे लोगों को देश समाज और नियम कायदा कानून से कोई सरोकार नहीं होता है। जब तक हम सभी अपने आचरण को सही नहीं करते बाकी समाज की कमियां निकालते रहेंगे मगर हासिल कुछ नहीं होगा।
कोई दुकानदार कारोबार करते उचित दाम की बात याद नहीं रखता , मगर किसी और के अधिक दाम मांगने पर लूटता है कहता है , जो सफाई वाले को 400 रूपये दिन के काम के मिलने को सोचता है इतना काम नहीं करता है वो , खुद हज़ारों की दिन की कमाई पर उचित अनुचित की बात नहीं करता। बाज़ार में कम होने पर ब्लैक करते उसको अपराधबोध नहीं होता है। हम सोचते हैं मंदिर जाने से पूजा अर्चना करने से दान करने से हम भगवान के भक्त हो गये , मगर नहीं। नानक जी कहते हैं ये तो सांप का कुंचल स्नान की तरह है। भाई इंसान है नाग नहीं बनिये , कुंचल नहीं बदलिए , सवभाव बदलिए। जपुजी साहिब में लिखा है , सोचे सोच ना होवई , जे सोचे लख वार , भुखियां भूख ना उत्तरी जे बन्ने पूरियां भार। अर्थात नहाने धोने से आप पावन नहीं हो जाते बेशक लाख बार स्नान करते रहो। और लालच की भूख मिटती नहीं चाहे कितना पास जमा किया हुआ हो।
मगर इस देश में जिस में मानवधर्म की बात सदियों से होती रही ये हो क्यों रहा है। क्योंकि हम ने धर्म की किताबों को , जीवन की सही राह दिखाने वाली नीतिकथाओं की बातों को भुला दिया है। ज्ञान हासिल नहीं किया और तोते की तरह राम राम रटते हैं। जब किसी और की गलतियां ढूंढते हैं तो खुद अपनी गलतियां और कमियां भी देख लिया करें। समाज हम सभी से है पहले खुद को बदलना होगा। ये बात शायद आजकल समझना कठिन है , मगर हमने बार बार पढ़ा है कि साधु का काम क्या है चोर को भी इंसान समझना। इक साधु ने देखा इक बिच्छु पानी में डूबता जा रहा , कहानी आपने सुनी होगी , हर बार साधु उसे हाथ बढ़ाकर बचाने को कोशिश करता और हर बार बिच्छू काट लेता। किसी ने कहा ये आप क्या कर रहे हो। साधु बोलै कि जब मर रहा है फिर भी बिच्छू अपना सवभाव नहीं छोड़ता तो मेरा सवभाव है डूबते को बचाना मैं कैसे अपना सवभाव त्याग दूं। कोई आपसे अन्याय करता है तो आप किसी और से उसका बदला नहीं लें किसी अपने से छोटे पर अन्याय कर के। इक बार हम पाप पुण्य और कर्मों के फल की बात को भी छोड़ देते हैं , मगर आप को अपनी आत्मा अपने विवेक का सामना तो करना ही होगा। चाहे सारी दुनिया आपकी बढ़ाई करती हो मगर आपका मन आपकी असलियत जनता है कि जो लोग समझते हैं आप वो नहीं है तो ऐसे झूठे गुणगान का क्या मतलब है। इंसान खुद अपनी नज़र में गिर जाये तो उस से अधिक नीचे नहीं गिर सकता कोई।
ऐसी होगी मेरी शोकसभा कभी ( तीरे-नज़र ) डॉ लोक सेतिया
आप शोक जताने आये हैं या एहसान करने। चलो मेहरबानी की कुछ लोग तो मिल बैठे। मुझे मालूम है कितना कठिन है आपका मुझे अच्छा बतलाना। हमेशा जो बेहद खराब लगता रहा हो उसे अच्छा ही नहीं बेहद भला इंसान कहना सच साहस की बात है। आकर मेरी तस्वीर पर फूल चढ़ाना और हाथ जोड़ मन ही मन कुछ कहना , कमाल ही किया है। पता नहीं था वर्ना कब का मर जाता मैं। ये जो मंच पर भली भली बातें की जा रही हैं सब को पता ही हैं , हर शोकसभा में बार बार दोहराई जाती हैं। सुनाई देती हैं समझ नहीं आती कभी भी। अभी कहते हैं आत्मा नहीं मरती और अगर अच्छे कर्म किये हैं जीवन में तो भगवान से मेल हो जाता है , दुःख की कोई बात नहीं है , फिर इसे शोकसभा क्यों कहते हैं। जश्न होना चाहिए। मैं समझा नहीं सका मगर मैंने हमेशा समझा यही है। मौत से मुझे शायद ही डर लगा हो , ज़िंदगी ने डराया है मुझे हमेशा।
मौत तो दरअसल एक सौगात है , हर किसी ने इसे हादिसा कह दिया।
रस्मे-दुनिया है निभा लेते हैं मगर ऐसे भी नहीं , आप तो भाषण देने लगे , इतनी मुहब्बत होती जिनको उनकी आवाज़ आंसुओं में डूब जाती है। संख्या की बात छोड़ो कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे कितने अधिक आये या थोड़े आये , मगर जितने भी आये हैं सब दावा करते हैं मुझे जानते हैं समझते हैं , ज़िंदा था तब तलक तो मुझे पहचान नहीं सके आप लोग। मुझे लगता था शायद मैं किसी और जहां का हूं गलती से आपकी दुनिया में भटक कर चला आया। उपकार तो किया है आपने घंटा भर मेरे लिए मेरे नाम पर खर्च किया है और बदले में मैं इतना भी नहीं कर सकूंगा कि बदला चुका सकूं , उस जहां से वापसी का रास्ता नहीं मालूम। दोस्त तो दोस्त वो भी आये हैं जो जलते थे मुझसे बिना बात दुश्मन समझ , मैं कब किसी का दुश्मन बना कभी। आया ही नहीं दुश्मनी करना , जो दुश्मनी करते रहे उन्हें ठीक से दुश्मनी निभानी भी नहीं आती। अगर आती होती तो वही लोग इक पार्टी रखते जश्न मनाते गाते झूमते ख़ुशी मनाते। कम से कम इसी तरह मेरी इक इच्छा ही पूरी हो जाती। वो पंजाबी गीत भी सच नहीं हुआ , जदों मेरी अर्थी उठा के चलणगे , मेरे यार सब हमहुमा के चलणगे। चलणगे मेरे नाल दुश्मन वी मेरे , ओ वखरी ए गल मुस्कुरा के चालनगे। आप तो यहां भी झूठ का दिखावा कर रहे हो। झूठी गमगीन सूरत बनाकर किसे बहला रहे हो अपने आप को। या ऐसा तो नहीं कि अभी तक ऐतबार ही हो रहा कि मैं मर गया और मेरी शोकसभा आयोजित की जा रही है , खुद आकर तसल्ली करने पर भी शक बाकी है। अपने भीतर से मुझे निकाल दो और भूल जाओ अदावत की बातों को। मरने के बाद दोस्ती दुश्मनी क्या सभी रिश्ते नाते खत्म हो जाते हैं। औपचारिकता निभाना भी ज़रूरी था जनता हूं। पढ़ते पढ़ते सोचोगे ये लेखक भी कमाल का है मरने के बाद भी इसकी रचना पढ़नी पड़ रही है। वाह इससे अच्छी बात क्या हो सकती है।
कल की बात से आगे
मुझे लगता है कि किसी के भी दुनिया से जाने के बाद अगर उसके अपने और चाहने वाले उसकी याद में कुछ भी करना चाहते हैं तो वह बात करें जो उस मरने वाले को पसंद हो या थी। ऐसा भारत में बेहद कम होता है मगर पश्चमी देशों में होता है ऐसा पढ़ते रहते हैं। अभिनेता अनुपम खेर के पिता की इच्छा थी उनके बाद शोकसभा नहीं इक शानदार पार्टी आयोजित की जाये और ऐसा ही किया भी गया। उनकी अलग दुनिया में कोई सवाल नहीं करता क्यों किसी ने क्या किया। मगर अधिकतर हम लोगों की दुनिया में अपने तरीके से कुछ करने की छूट नहीं होती है। मेरे इक दोस्त के पिता इन सब बातों को नहीं मानते थे ये उनके बेटे जानते थे , इसलिए जब वो सब भाई हरिद्वार अस्थियां लेकर जा रहे थे तो पिता की बात का ध्यान रखकर अस्थियां राह में किसी नदी में प्रवाहित कर खुद कहीं और चले गए हरिद्वार की जगह। मगर उनको नहीं पता चला कि जब वो किसी राह की नदी में अस्थियां डाल रहे थे तब किसी ने उनको ऐसा करते देख लिया था और पहचान लिया था। वापस घर आने पर कोहराम मच गया और लोग बहुत साल तक उनकी आलोचना करते रहे। कुछ ऐसे ही राजकुमार जो हम कहकर मुखातिब हुआ करते थे अपने अंदाज़ में डायलॉग बोला करते थे , नहीं चाहते थे कि उनके मरने की खबर भी किसी को पता चले और उनकी इस इच्छा को पूरा करते हुए उनका अंतिम संस्कार दो चार दोस्तों और परिवार के लोगों ने किया था और फिल्म उद्योग के लोगों तक को नहीं पता चला उनकी मौत कब हुई। अभी साल दो साल पहले की बात है इक बेहद अच्छे व्यंग्यकार की मौत के बाद उनकी इच्छा का आदर करते हुए उनकी रचनाओं का पाठ किया गया था। ये बेहद भावनापूर्ण दृश्य था कि जब उनकी बेटी आंखों में आंसू लिए उनकी हास्य व्यंग्य की रचना पढ़कर सुना रही थी। ऐसा ही कुछ मेरे दोस्त पंजाबी के शायर कवि हरिभजन सिंह रेणु की शोकसभा में दिखाई दिया था सिरसा में ही। किसी भी वास्तविक रचनाकार को इससे बेहतर श्रद्धांजलि नहीं दी जा सकती है।
मैंने कुछ रचनाएं लिखी हैं इसी विषय को लेकर। हास्य व्यंग्य कविता श्रद्धांजलि सभा , इक ग़ज़ल , जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये , इक कविता नाट्यशाला , मैं रहूंगा हमेशा , मेरी खबर। इक बात किसी कवि की कविता की मुझे बहुत पसंद आई थी और उसे मैंने अपनी कविता श्रद्धांजलि सभा के आखिर में लिखा भी है उसको दोहराना चाहता हूं। दोस्तो मेरे लिए स्वर्ग की दुआ मत करना ,न ही मुझे मोक्ष या मुक्ति की चाह है।
भगवान से यही कहना है कि ,
मुक्ति दे देना तुम ,
गरीब को भूख से ,
दिला सको तो दिला दो ,
मानव को घृणा से मुक्ति ,
और नारी को ,
दे देना मुक्ति अत्याचार से ,
मुझे जन्म देते रहना ,
बार बार इनके निमित।
मित्रो ,
मेरे लिये स्वर्ग की ,
प्रार्थना मत करना ,
न ही कभी मेरी ,
मुक्ति की तुम दुआ करना ,
मेरी इस बात को ,
तब भूल मत जाना ,
मेरी श्रधांजली सभा में ,
जब भी आना।
सरकार के चार वर्ष का हिसाब ( श्वेत पत्र ) डॉ लोक सेतिया
जश्न की तैयारी हो रही है। कहा जा रहा है कि बताया जाएगा क्या क्या किया हमने चार वर्ष के शासन में। जनाब चार साल से यही तो करते आ रहे हैं। खुद अपनी महिमा का गुणगान तो भगवान भी कभी नहीं कर सके , अच्छा नहीं लगता। वैसे भगवान को भी तूती पसंद है मेरे इक दोस्त ऐसा कहा करते हैं। अर्थात ये माना जाता है कि ईश्वर अपनी स्तुति अपनी अर्चना अपनी महिमा का वर्णन सुन कर खुश होते हैं। मैं धर्मों की बहुत थोड़ी जानकारी रखता हूं और भगवान और धर्म को लेकर जब लिखता हूं तो सच लिखते डरता नहीं अपनी धर्मपत्नी जी की तरह। ऐसा इसलिए कि मुझे बचपन से गुरुग्रंथ साहिब से लगाव रहा है , और बाकी धर्म की किताबों को भी पढ़ा ज़रूर है मगर समझा नानक जी की बातों को अधिक अच्छी तरह से है। जिस धर्म की पहली बात ही सच ही ईश्वर है ऐसा बोलने वालों पर कृपा हो , जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल। उसे मानना है तो सच कहना ही होगा। भगतसिंह जी भी बेबाक कहते थे कि जिस भगवान के होते इतना अन्याय अत्याचार होता हो मैं उसकी पूजा नहीं करता। सब से बड़ी बात जो शायद सिख धर्म के अनुयाइयों को भी समझनी है वो ये कि गुरु जी की बानी है कि उस खुदा ईश्वर परमात्मा की आरती तो हर पल हो रही है , गगन में थाल ...... जिसे आरती बना लिया है। अर्थ क्या है कि आकाश में चांद सितारे सूरज दीप की तरह ज्योति जलाये हैं और धरती की सारी वनस्पति सुगंधित फूल आदि उसी को अर्पित हैं भला हम कैसे उसकी आरती कर सकते हैं। जो सबको सब कुछ देता है उसको किसी से क्या चाहिए और जो समझता भगवान को कुछ भी धन या सामान भेंट किया है उसे सोचना होगा , तेरा तुझको देवत क्या लागत है मोरा। फिर भी श्मशानभूमि तक नाम लिखवा लेते हैं तस्वीरें लगवा लेते हैं। इस सब का अर्थ भी समझाना होगा , तो सुनिए बंधु देश का सब कुछ किसका है , जनता का ही है तो फिर आपने सरकार बनाकर जनता को क्या दिया है। किस बात का इश्तिहार किस बात का ढिंढोरा किस बात का अहंकार है। वास्तविकता तो ये है कि जैसे भगवान आपको लाखों देता है और आप उसी में से सौ या हज़ार देकर दानी कहलाना चाहते हो , यही सरकार करती है। मगर इक बात और है ऊपर वाले का भी हिसाब किताब है और धार्मिक लोग कहते हैं कि ऊपर वाले की चक्की बहुत बारीक पीसती है। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है , ये मुकेश जी का गया गीत उस भजनों से अच्छा और सच्चा है जो धार्मिक स्थलों पर फ़िल्मी धुनों पर गाये बजाए जाते हैं। भमिका लंबी हो जाये तो पाठक उकता जाता है इसलिए असली बात पर आते हैं।
तमाम लोग उपलब्धियों की बात लिख लिख जोड़ रहे हैं मगर जो जो वास्तव में किया किसी को भी ध्यान ही नहीं। इससे पहले कि विपक्षी श्वेत पत्र की मांग करें झूठ को सच बताने पर , मैंने बिना किसी से कोई मेहनताना मांगे उनका काम करना शुरू कर दिया है। मेहनताना मिलने की उम्मीद भी नहीं है , जो लोग कहने को स्वच्छ भारत अभियान की बात करते हैं मगर राज्य में सफाई करने वालों को बराबर वेतन नहीं देने की ज़िद पर अड़ जाते हैं वो किसी को क्या देंगे। मगर उन्होंने जो जो किया उसे इतिहास में दर्ज तो करना लाज़मी है। पहले उनकी बात जो काला सफेद करते हैं। बताया नहीं अभी तक कितने काले धन वालों को घोटाले करने वालों को जेल में डाला है। जो आपकी नाक के नीचे विदेश भाग गए उनकी बात सब को मालूम ही है। ये राज़ भी बताना चाहिए कि कितने अपराधी और दाग़ी नेता आपके दल में शामिल होकर गटरगंगा के स्नान से स्वच्छ भारत का हिस्सा बन गए , कितनी सरकारें आपने नैतिकता और संविधान की मर्यादा को ताक पर रखकर बनाई हैं। ये सब आप पिछली सरकारों पर डालकर बच नहीं सकते हैं। वो अच्छे दिन तो आपके नेता बेशर्मी से घोषित कर ही चुके हैं कि इक चुनावी जुमला था। जिस बात से आपको जनता ने बनाया अगर वही कोरी भाषण देकर जनता को ठगने की बात थी तो आप वास्तव में महान हैं। फिर भी आपने बताया है अठारह घंटे काम करते हैं तो हिसाब लगाना चाहिए इतनी अटूट मेहनत की किस काम को।
आप पीएमओ कितने दिन गए कितने घंटे ये राज़ आप ही जानते हैं। मगर आपने 150 देशों की सैर की है और ठसक के साथ जाते रहे हैं , जैसे बादशाह मिलते थे गले और हाथ में हाथ डालकर दोस्ती करते थे उसी तरह। किसी को नहीं पता देश को क्या हासिल हुआ और इस से जनता की कैसी भलाई हुई , मगर सब जानते है आपने हर बार विदेश जाने से पहले उस देश की बहुत बातों को और कई अपने देश के लोगों की भलाई के विपरीत शर्तों को स्वीकार किया केवल अपनी जयजयकार करवाने को। ये कैसी भूख है शोहरत हासिल करने की जिसकी कीमत देश की गरीब जनता को भविष्य में चुकानी होगी। क्या सज धज क्या शान से दिन में सुंदर परिधान बदलना , लगता ही नहीं किसी अविकसित देश का तथाकथित सेवक है। ये सब क्या है , रोड शो की बात मुझे समझ नहीं आई क्यों किये जाते हैं ये तमाशे। किसी विदेशी को साथ लेकर किसे प्रभावित करना है। धर्म की बात करना ज़रूरी है , धर्म कहता है अपना कर्तव्य निभाओ अपने किये वादे पूरे करो , राम की ही बात है , कोई वचन निभाया आपने। संविधान की रक्षा की शपथ तक याद नहीं शायद। धर्म में साफ है पूजा अर्चना दान आदि अपनी कमाई से करते हैं। आपने पद संभालते ही किसी देश में पूजा की और एक करोड़ रूपये मूल्य की चंदन की लकड़ी दान कर आये , जबकि आपने घोषित किया था आपके पास सीएम रहते जो धन जमा था महिलाओं को दे आये हैं। कितने मंदिरों में कितना धन आपकी पूजा अर्चना पर इस गरीब देश का बर्बाद किया गया , भगवान जानता है मगर भगवान उससे खुश नहीं हो सकता है।
आपने सब से बड़ा अनुचित कार्य जो किया वो है , हर धर्म समझाता है अपने से पहले के उन लोगों जो ज़िंदा नहीं हैं उनकी बुराई कभी नहीं करते हैं। आपको उनकी अच्छाई कभी नज़र ही नहीं आई और बुराईयां जो शायद ही सच थीं। इक सवाल है , उनके समय आपका शासन होता या उनका तौर तरीका ढंग आपसा होता तो क्या भारत देश में लोकतंत्र बचा रहता। ये उन्हीं की बदौलत है जो देश में कोई भी दल कोई भी व्यक्ति ऊंचे पद तक पहुंच सकता है। जिस तरह से तब के प्रधानमंत्री ने विपक्ष के अटलबिहारी वाजपेयी जी की खुले दिल से तारीफ की थी , करने का हौसला है आप में से किसी एक में। आपको सब याद आये मगर जिन जयप्रकाशनारायण के आंदोलन से आपको राह मिली उनको भुला दिया। भुलाना ही था अन्यथा आपको कैसे पसंद आती उनकी कही खरी बात , जो उन्होंने 25 जून 1975 को अपने भाषण में कही थी। मुझे याद है , क्योंकि मैं उस सभा में मौजूद रहा हूं और गवाह हूं उनकी बात का। उन्होंने कहा था शांति पूर्वक विरोध करना देश की जनता का अधिकार है और सुरक्षा बल देश के प्रति उत्तरदायी हैं न कि किसी सत्ताधारी नेता या अधिकारी के प्रति और अगर कोई उन्हें दमनकारी आदेश देता है अपने विरोध करने वालों पर लाठी गोली चलाने के तो शांति पूर्वक प्रदर्शन करने वालों पर ऐसा अनुचित आदेश नहीं मानें। आज आपत्काल घोषित नहीं है मगर जिस तरह आपने सभी जगह पर अपनी पसंद के लोगों को मनोनीत करने का कार्य निरंतर किया है वो तानाशाही का संकेत है। आपने तमाम ऐसे कार्य किये हैं जिनकी नुकसान की भरपाई कोई नहीं कर सकता। इस श्वेत पत्र की हर बात आईने की तरह साफ है।
आपकी ख़ामोशी मेरी जान ले लेगी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया
इक आशिक़ को महबूबा से इतनी शिकायत है कि चुप नहीं रहे हां बोले चाहे ना बोले। ख़ामोशी जान ले लेती है। बस कुछ वही हाल है। लोग बात ही नहीं करते। दोस्त हैं फोन करो तो मिलने से कतराते हैं , आपके दल की सरकार है तो क्या हुआ। कब से हम खुलकर चर्चा किया करते थे हर सरकार की कामकाज की। कोई तो ऐसे भी थे जो खुद नहीं साहस करते थे तो मुझी से कहते भाई इस पर कुछ तो लिखो। वो और बात है कि मैंने किसी के कहने पर कभी कुछ नहीं लिखा। अब कोई चाहता हो नहीं लिखूं तो वो भी नहीं कर सकता या मुझसे नहीं होता है। अखबार वाले सच नहीं लिखना चाहते , टीवी वाले बचते हैं सच बोलने से। उस पर भी कहते हैं हम आज़ाद हैं , कौन आज़ाद है। आपको टीवी वाले बुलाते हैं इस विषय पर कविता पढ़ना। सरकारी राग दरबारी राग से अब अखबारी राग तक बात पहुंच गई है। शासक की समझाई बात को दरबार में कहना सरकारी राग , शासक को खुश करने को किसी नेता के नाम का गुणगान दरबारी राग सुनते थे , अख़बार टीवी चैनल मीडिया क्या अब साहित्य अकादमी सत्ता की आलोचना से घबराती है और निर्देश देते हैं ऐसा कुछ भी नहीं लिखा बोला जाये जिस से शासक नाराज़ हो जाये। इसको ख़ुदकुशी करना कहते हैं जब कोई कहता है :-
माना आवाज़ है मेरा नाम , मगर आप ही कहो लाशों का बोलने से क्या काम।
ये लाइन मेरी इक व्यंग्य कविता की है , आंखो देखा हाल। वास्तविक घटना की बात है। इक अख़बार की ही बात है। उसे फिर से पढ़ना होगा। क्या हम वापस वहीं पहुंच गए हैं। आपात्काल में भी ऐसा सन्नाटा नहीं था। साहित्य अकादमी से लेकर सरकारी अधिकारी तक विरोध के स्वर को खामोश करना चाहते हैं। बंद कमरों में चीखते हैं ताकि बाहर आवाज़ नहीं सुन ले कोई। आज़ादी के इतने सालों बाद आज़ाद हुए नहीं हम लोग , लगता है गुलामी आदत बन चुकी है। खुदा बदल लेते हैं इबादत करने को। मेरा इक शेर है :-
तुम खुदा हो , तुम्हारी खुदाई है , हम तुम्हारी इबादत नहीं करते।
ज़ुल्म की इन्तिहा हो गई लेकिन , लोग फिर भी बगावत नहीं करते।
कोई बता रहा था राजधानी गया था , दो लाख का इनाम मिला है , सम्मानित किया गया है। इधर समझ नहीं आता सम्मान अपमान का भेद भी। ये बाज़ारी दस्तूर है बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता। इक गीत से ली है ये लाइन भी। जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझ में , राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है। लेकिन ऐसा होता है कभी राख में दबी कोई चिंगारी हवा से आग बन जाती है और कोहराम मच जाता है। आप भी देखोगे इक दिन इस राख में दबी हुई चिंगारी को शोला बनते हुए।
कभी सब कुछ कभी कुछ नहीं करते ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया
ये इक मिसाल है , कर्नाटक में विधानसभा में बहुमत की बात , सरकार बनाने - गिराने की बात। कहने को लोकतंत्र बचाने की बात मगर वास्तव में व्यवस्था के होने नहीं होने की बात। सब ठीक हो गया या अभी होना बाकी है मुझे इस की चर्चा नहीं करनी है। कोऊ नृप होय मोहे क्या हानि , हम जनता तो शासित होने को हैं शासक कौन है क्या फर्क पड़ता है। सत्ता की छुरी ने जनता रुपी आम को काटना है और उसे खाना है अपना पेट भरना है स्वाद चखना है। फाडियां बनाकर खाएं या चूस कर या चाहे शेक बनाकर सब उनकी इच्छा पर है। फिर इसकी चर्चा का मकसद क्या है , मकसद है हर दिन हम देखते हैं राजनेताओं अधिकारियों और देश की सारी व्यवस्था जिस में न्यायपालिका से मीडिया तक चैन की बांसुरी बजाते रहते हैं अचानक कितने एक्टिव हो जाते हैं कि हर पल कुछ हो रहा कुछ बदल रहा सभी को समझ भी आता है और दिखाई भी देता है। मगर ऐसा होता हमेशा इक ख़ास वर्ग की खातिर ही है। आम नागरिक की बड़ी छोटी छोटी समस्या पर सालों साल होता कुछ भी नहीं। आखिर क्यों ? क्या देश और राज्य में सरकार बनाना एक मात्र कार्य है या सरकार होने का कोई और अर्थ भी है कि जो जो सामन्य रूप से होना है किया जाता रहे और जो नहीं होना चाहिए उसे करने नहीं दिया जाये और न ही कोई वो कार्य करे जो उसे नियमानुसार ईमानदारी से नहीं करना चाहिए। इसी को फिर से देखें तो बहुत कुछ है जो नहीं किया जाना चाहिए था। जिनको मालूम था उनके पास संख्या बल नहीं है उनको सरकार बनाने का दावा करने के साथ राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद का मनमाने ढंग से दुरूपयोग नहीं करना चाहिए था और अगर सरकार बनाना चाहते भी थे तो उसके लिए विधायकों को खरीदना या लालच देना अथवा डराना धमकाना जैसे आपराधिक ढंग नहीं अपनाने चाहियें थे। सोचो अगर सर्वोच्च न्यायालय कठोर कदम नहीं उठाता और कुछ दिन की मोहलत उनको मिल जाती तो जो नहीं हुआ और नहीं होना चाहिए वही हुआ होता। ये नौबत आई ही इसलिए कि देश में हर कोई अपनी सुविधा और स्वार्थ की खातिर जब जो मर्ज़ी करता है , किसी को लाज नहीं आती , कोई शर्मसार नहीं होता अपने आचरण पर। जो पीछे से निर्देश देकर इस देश की व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने का काम कर रहे थे उन पर आंच नहीं आई और उनके गंदे मनसूबे सामने आकर भी ढके छुपे रह गए। दो दिन में दूसरा पक्ष सरकार बना लेगा और बहुत हद तक वो भी अवसरवादी गंदी राजनीति से किनारा नहीं करेगा ऐसा अक्सर होता है। सत्ता की पदों की बंदरबांट होगी और वास्तविक जनादेश की चर्चा को विराम दे दिया जाएगा।
ये सब तब क्यों नहीं होता।
ये केवल भूमिका थी जिसे थोड़ा विस्तार से बताना पड़ा ताकि समझा जा सके। आम नागरिक की समस्याएं वास्तव में बहुत बड़ी नहीं होती हैं और अगर सरकार और सरकारी अधिकारी खुद ही जो उचित है उसे करते रहें और जो अनुचित हो उसे रोकते रहें तो हम सभी को शिकायत करनी ही नहीं पड़े। हम विवश होकर शिकायत करते हैं और अपने अधिकार मांगते हैं जो अधिकारी नेता देते नहीं हक की तरह और जब देना पड़े तो खैरात की तरह उपकार बतला कर देना चाहते हैं। वो ऐसा कर सकते हैं क्योंकि हमारे बीच में से कुछ लोग खुद अपने स्वार्थ के लिए ऐसे कार्य करते हैं जो उनको पता होता है कि करना अनुचित है। सब से पहले अगर देश के नगरिक ही सभ्य ढंग से नियम कानून का पालन करें तो अधिकतर मुश्किलें खड़ी ही नहीं हों। सड़क पर वाहन चलाते बहुत लोग औरों के लिए खतरा बने होते हैं , लाल बत्ती पर किसी को जिस तरफ टर्न लेना उस तरफ नहीं दूसरी तरफ वाहन खड़ा कर जब ह्री बत्ती हो तब गलत ढंग से अपनी सड़क को मुड़ते हैं और पुलिस वाला चुपचाप देखता रहता है रोकता नहीं समझाता नहीं। लोग अगर औरों को असुविधा नहीं होने की बात पर ध्यान दें तो ये कोई समस्या ही नहीं है।
इसी तरह गंदगी की बात है , हमारे अधिकतर शहर बेहद गंदे दिखाई देते हैं। स्वच्छता अभियान के नाम पर इश्तिहार ही दिखाई देते हैं। जिन को सफाई का ध्यान रखना है और शहर की गंदगी मिटानी है वो नगरपरिषद के प्रधान से सीईओ तक हद दर्जे के लापरवाह और गैर ज़िम्मेदार लोग हैं। किसी ने सरकारी प्लॉट्स को रोका हुआ है किसी ने सड़क को किसी ने पार्क को किसी ने फुट पाथ को। कोई नहीं विचार करता पार्किंग की जगह अपना धंधा करोगे तो लोग वाहन सड़क पर खड़ा करेंगे। ठीक है कुछ लोग विवश होकर रोटी कमाने को ऐसा करते हैं मगर बहुत हैं जो न केवल किराये की जगह ले सकते हैं बल्कि उनकी अपनी दुकानें हैं जो किराये पर उठा रखी हैं और खुद अनधिकृत कब्ज़ा आदतन करते हैं। जो गरीब मज़बूरी में किसी जगह धंधा करते हैं उनको भी अपनी गंदगी का प्रबंध खुद करना तो चाहिए। सड़क पर पार्क में फुट पाथ को गंदा करना मज़बूरी नहीं कहला सकता। आप के कारण गंदगी बदबू ही नहीं लोगों को रोग तक होने का अंदेशा है। आपके कारण कोई बीमार हो ये कैसे आपका अधिकार हो सकता है। जब कोई इसकी शिकायत करता है तो विभाग के लोग और अधिकारी अनुचित कार्य रोकने का उपाय नहीं करते उल्टा आम लोगों को आपस में भिड़वा देते हैं। किसी ने किसी की शिकायत निजि कारण नहीं की , जनहित और शहर में अपने आस पास सब की परेशानी और स्वस्थ्य को वातावरण को प्रदूषित होने को लेकर की है। आपको उचित काम नहीं करना क्योंकि आपके स्वार्थ जुड़े हैं अनुचित काम करने वालों से संबंध हैं , मतलब आप किस तरफ हैं गंदगी करने वालों का बचाव करते हैं मगर स्वच्छ भारत अभियान को असफल करते हैं।
ये एक दो समस्याओं की बात है। मगर बहुत ऐसी समस्याएं हैं जो सरकार और सरकारी विभाग अपना कर्तव्य निभाएं तो पैदा ही नहीं हों। कर्नाटक की बात करने का मकसद यही था कि जिस तरह सब ख़ास लोगों की समस्या पर तेज़ी से कार्य करते हैं आम जनता की समस्याओं को लेकर होते तो कितना अच्छा होता।
जो दवा के नाम पे ज़हर दे ( उल्टा सीधा ) डॉ लोक सेतिया
आपने कहानियां पढ़ी नहीं भी हों तब भी दादी-नानी से सही सुनी ज़रूर होंगी। परिकथा के साथ साथ विषकन्या की भी कहानी हुआ करती थी। जैसे आजकल लोग नेताओं की मीठी मीठी बातों में सुध बुध भुला देते हैं और इक तरह के सम्मोहन में फंस कर वही देखते सुनते बोलते ही नहीं सोचते समझते तक वही हैं जो ऐसे जादूगर चाहते हैं। जादू का खेल आजकल बाज़ार में चलन में कम बेशक हो जादू का खेल खेलने वाले खेल रहे हैं। सरकार कहती रहती है कभी कभी कि उसके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है गरीबी मिटाने को , मगर सत्ता मिलते खुद सत्ताधारी नेता कैसे मालामाल हो जाते हैं और कैसे उनका दल अचानक अमीर हो जाता है और हर राज्य हर शहर में उनके दफ्तर की ऊंची ऊंची आलीशान इमारतें खड़ी हो जाती हैं जो पचास साल में नहीं हुआ पांच साल में संभव हो जाता है तो कोई जादू की छड़ी होती ज़रूर है। मगर बात कुछ और है आज विषय है कि कैसे कोई ज़हर देता रहता है फिर भी लोग उसी को दुआ देते दिखाई देते हैं। ज़रूर उसके ज़हर में कुछ ख़ास है जो लोगों को मज़ा देता है।
राजा लोग दुश्मन को दोस्त बनाकर अपनी विषकन्या से कत्ल करवाते थे। देखने में बला की खूबसूरत मगर भीतर बदन पर विष ऐसा जो छूते ही मार डाले। आजकल महिलाओं के लिए पार्लर नाम की इक जगह है जो लैला को जूलियट बना देते हैं रंग बदल कर , फ़िल्मी किसी रंगभेद की बात नहीं है , उदाहरण का सीधा मकसद काले को सफेद कर दिखाना है। कुछ ऐसा ही होता है राजनीति में जिसको कोई चिमटे से नहीं छूना चाहता था उसे गले लगाते हैं जब दृश्य बदल जाता है। दागी अपराधी सब शरीफ हो जाते हैं सत्ता के साबुन से नहाने के बाद। जब कोई शासक बन जाता है तो उसकी तस्वीर हर जगह हर दीवार पर सरकारी दफ्तरों में इतनी प्यारी लगती है जैसे उसने चुनाव नहीं जीते सुंदरता की प्रतियोगिता में अवल आये हैं।
महलों में राजसी शान ठाठ मिलते ही बात भले गरीब परिवार में जन्म लेने की करते हैं ढंग और तौर तरीके महाराजा जैसे दिखने लगते हैं। इन्हें देख कर वो कहानी झूठी लगती है जिस में इक भिखारिन रानी बन कर भी भीख मांगने की आदत नहीं बदल पाती है। सत्ता पर आसीन होते ही जनता से वोट भी भीख की तरह नहीं मांगते हैं , गब्बरसिंह की तरह धमकाते हैं कि तुम्हारे पास बचने का एक ही उपाय है मेरी शरण में आना। रामगढ़ वाले भी ऐतबार करने लगते हैं यही उपाय अच्छा है , शायद इसी से अच्छे दिन का जुमला निकला होगा। शोले फिल्म इतिहास है और इतिहास दोहराया जा सकता है। अभिनय में दलीपकुमार से अमिताभ बच्चन तक नेताओं के सामने पानी भरते हैं। वास्तव में फ़िल्मी लोगों को नेताओं से सबक सीखना चाहिए। जब कभी भी फ़िल्मी महानयक और नायिका अपने दम पर राजनीति में आये हैं कमाल कर दिखाया है। सभी दल वाले उनको सभाओं में तभी बुलाया करते हैं। मगर बड़ा अंतर यही है कि फिल्म में अकेला नायक बीस गुंडों को मार गिराता है जबकि राजनीती में बड़बोले लोग बड़ी बड़ी बातें करते हैं मगर वास्तव में नतीजा शून्य होता है। ये शून्य भी अजीब है अकेला कोई हैसियत नहीं रखता लेकिन सौ के बाद हज़ार हज़ार के बाद दस हज़ार से अरबों की संख्या बना सकता है। ज्योतिष वाले शून्य के भाग्य को कभी नहीं बांच सके। शून्य कुछ नहीं है फिर भी सब कुछ है। आज की देश की राजनीति का ज़रूरी पाठ यही है।
मुहब्बत की नहीं जाती हो जाती है , मुझे भी उस से इश्क़ हो गया। कब क्यों कैसे हुआ कभी किसी को पता चला है। आप जो समझ रहे हैं वैसा नहीं है , मेरा विवाह प्रेम विवाह नहीं है। साफ बात है कि जिस मुहब्बत की बात कर रहा हूं वो मेरी बीवी नहीं है। ये भी झूठ नहीं है कि मुझे उस से आज भी मुहब्बत है और हमेशा रहेगी भी। आपने इश्क़ नहीं किया अगर आप सोचते हैं कि इश्क़ करना छोड़ दूं , भला इश्क़ कभी मर्ज़ी से किया जाता है या छोड़ा जाता है। बस हो जाता है तो हो ही जाता है और उसके बाद चैन नहीं आता बिना मुहब्बत के। जान के साथ जाता है और बाद में भी निशानी छोड़ जाता है। जानता हूं मिलना चाहते हो मेरी महबूबा से , थोड़ा इंतज़ार तो करो अभी। नाम जान कर क्या करोगे , खूबसूरत बहुत है। बला का हुस्न है बयां करना आसान नहीं है। ग़ज़ल जैसी नाज़ुक कविता जैसी दिलकश और कहानी जैसी भी जो शुरू कहां से हुई और खत्म कब कहां कोई बता नहीं पाता। कोई कहानी कभी खत्म नहीं हुआ करती , केवल विराम दे देते हैं। और उसके बाद , याद आया उपन्यास का नाम यही तो था , और उसके बाद। बहुत साल संभाल कर रखा था पर न जाने कहां खो गया , दत्त भारती मेरी पसंद के उपन्यासकार थे। कितना रुलाया उनकी लिखी कहानी ने मुझे , बार बार पढ़ता था। जिल्द फट गई थी उपन्यास की किताब की , बिना जिल्द की किताब कब तक रहती बचकर। बिक गई हो शायद रद्दी में अनजाने में , नहीं नहीं मैं भला बेच सकता हूं किताबों को रद्दी में , कभी नहीं। चाहता हूं दिलोजान से।
अब लगता है कुछ कुछ समझ गये हो तो छुपाना क्या , बता ही देता हूं मैंने बस इसी से मुहब्बत की है , अपनी कलम से लेखनी से और लिखना ही मेरी इबादत है जूनून है। ये बुरी आदत है इक पागलपन है नशा है जो छोड़े नहीं छूटता किसी भी लेखक से। जो लिखना छोड़ देते हैं वो ज़िंदा नहीं रहते बाद में , कोई लिखने वाला लिखना छोड़ देता है तो वो सच्चा आशिक़ नहीं है उसका इश्क़ इश्क़ था ही नहीं। झूठी मुहब्बत की कहानी सुनाते हैं वो लोग। मुहब्बत में सब से बड़ी मुश्किल यही तो है आशिक खुद नहीं जनता मुहब्बत क्यों हुई , महबूबा को क्या जवाब दे , दिल को है तुझ से प्यार क्यों ये न बता सकूंगा मैं। ये मेरा दिवानापन है या मुहब्बत का सुरूर , तू न पहचाने तो है ये तेरी नज़रों का कसूर। इन प्यार के कुछ गीतों ही ने कितने आशिक पैदा किये होंगे। जगमोहन जी का गया ये गीत बहुत लोकप्रिय रहा है , इक बार की बात है वो इक कार्यकर्म में शामिल होने आये किसी शहर तो किसी ने मंच पर जाने से पहले कहा जगमोहन जी आपने मुझे बर्बाद कर दिया , वापस उतरने लगे कार्यकर्म के अंत में तो फिर वही बोल सुनाई दिये। रहा नहीं गया उनसे , बुलाया उसे पास और पूछा भाई मैं नहीं जनता आपको , भला क्या किया मैंने जो आप इल्ज़ाम धर रहे हो अपनी बर्बादी का मुझपर। वो बोला आपका ये जीत रेडिओ पर बजता रहता था , और सामने की खिड़की में इक हसीन लड़की बैठी रहती थी , गीत सुनते नज़रें मिलती और मुहब्बत हो गई थी। अब बीवी है मेरी हमने शादी कर ली थी , अब पछताता हूं तभी आपको सच कहा आप ही ने मुझे बर्बाद किया है। हंस दिए जगमोहन जी भी उसके साथ साथ। मुहब्बत बर्बाद तो करती ही है , इश्क़ करने वालों को , आशिकी का यही मज़ा है। इक आशिक़ गाता है वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बर्बाद किया है इल्ज़ाम किसी और के सर जाये तो अच्छा। ये क्या बात हुई मुजरिम कोई और झूठा इल्ज़ाम किसी पर। इक पंजाबी ग़ज़ल है , उसका इक शेर है , तुम कहते हो मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है , नहीं हेराफेरी नहीं। मैनूं इश्क़ दा लगेया रोग मेरे बचणे दी नहींयों उम्मीद।
मुहब्बत कर किसी को कुछ भी मिला नहीं कभी , वो कहते हैं ना , इश्क़ ने ग़ालिब निक्क्मा कर दिया , वरना हम भी आदमी थे काम के। मेरी ज़िंदगी भी मेरे लिखने के जूनून ने कम बर्बाद नहीं की। लोग पागल समझते हैं और बच कर दूर रहते हैं इस डर से कि कहीं उनको भी ये नामुराद रोग नहीं लग जाये। आसान नहीं है इश्क़ करना और होना , ज़माने में अजी ऐसे कई नादान होते हैं , वहां ले जाते हैं कश्ती जहां तूफ़ान होते हैं। मुहब्बत सबकी महफ़िल में शमां बनकर नहीं जलती , हसीनों की नज़र सब पर छुरी बनकर नहीं चलती , जो हैं तकदीर वाले बस वही कुर्बान होते हैं। हर किसी को नहीं मिलता यहां प्यार ज़िंदगी में ,खुशनसीब है जिसको मिली ये बहार ज़िंदगी में। इक शायर की बहुत पुरानी ग़ज़ल है।
रंग जब आसपास होते हैं , रूह तक कैनवास होते हैं।
खून दे दे के भरना पड़ता है , दर्द खाली गलास होते हैं।
सैंकड़ों में बस एक दो शायर , गहरी नदियों की प्यास होते हैं।
हमने यूं ही मिजाज़ पूछे थे , आप नाहक उदास होते हैं।
कल यूं ही बैठे बैठे इक चुटकुला बना लिखा अपनी फेसबुक वाल पर। मास्टरजी समझाते हैं इश्क़ कभी मत करना। ठीक है विद्यार्थी मान जाता है। मास्टरजी आशिर्वाद देते हैं लंबी आयु जीने का। विद्यार्थी कहता है मास्टरजी इश्क़ नहीं करना तो जी कर करेंगे क्या।
इक दोस्त ने कमेंट किया खतरनाक चुटकुला है। भाई खतरनाक क्या नहीं है। इस देश में खतरा ही खतरा है। और सच बोलने से अधिक खतरा किसी बात में नहीं है। खतरों में बीता है अपना हर दिन नहीं हर पल भी। तभी तो अपने लिखने को और बेबाक सच बोलने को अपनी मुहब्बत कहता हूं , नहीं छोड़ सकता चाहे जो भी अंजाम हो। जगजीत सिंह की गाई इक ग़ज़ल हाज़िर है।
सच्ची बात कही थी मैंने , लोगों ने सूली पे चढ़ाया ,
मुझको ज़हर का जाम पिलाया , फिर भी उनको चैन न आया।
वक़्त जहां भी ले के गया है , ज़ुल्म मिला है ज़ुल्म सहा है ,
सच का ये इनाम मिला है , सच्ची बात कही थी मैंने।
सबसे बेहतर कभी न बनना , जग के रहबर कभी न बनना ,
पीर पैयंबर कभी न बनना , सच्ची बात कही थी मैंने।
चुप रहकर भी वक़्त गुज़ारो , सच कहने पे जां मत वारो ,
कुछ तो सीखो मुझसे यारो , सच्ची बात कही थी मैंने।
अभी मुहब्बत की कहानी बहुत बाकी है आखिरी सांस तक जारी रहेगी। अपनी इक ग़ज़ल के शेर से विराम लेता हूं।
कल ही की बात है सुबह लड्डू खा खिला रहे थे , दोपहर तक ख़ुशी अधूरी लगने लगी जब जीत भी थोड़ी कम रह गई और बहुमत नहीं मिला। जीत का सेहरा जिनके सर बंधना था उन्हीं के संसदीय क्षेत्र में इक हादिसा भी इसी दिन हो गया। ग़म भी थोड़ा मिला तो ख़ुशी मनानी मुश्किल हो गई। बहुमत का जुगाड़ कर सत्ता मिलते ही चुनावी दुःख दर्द भूल जाएगा मगर जो लोग बेमौत मारे गए उनकी याद किसे रहेगी। दो पांच लाख मिल गए सरकार की मेहरबानी कम नहीं है। उधर कुछ गिद्ध लाशों पर अपनी असलियत दिखला रहे थे मुर्दाघर से लाश मिलने को रिश्वत की मांग कर रहे थे। भला भ्र्ष्टाचार कैसे हो सकता है उनके अपने क्षेत्र में अपने दल के शासन में। जांच होगी और हमेशा की तरह पुल गिरने से लेकर लाश की कीमत मांगने तक होगा कुछ भी नहीं। आज तक सरकारी विभागों के गलत काम करने या उचित काम नहीं करने की कोई सज़ा किसी को मिली है। बदलता कुछ भी नहीं है। सरकार बदलने से सरकारी लोग नहीं बदलते न ही उनके तौर तरीके बदलते हैं। छोड़ो शेरो शायरी , है लाश वही सिर्फ कफ़न बदला है। ये कफ़न भी सफ़ेद नहीं किसी रंग से रंगा है।
राजनेता तो मगरमच्छ के आंसू बहाना जानते हैं मगर सरकारी अमला तो बाढ़ हो सूखा हो या कोई आपदा हो , कभी उनसे फायदा उठाने में पीछे नहीं रहते। ये कुछ अलग तरह के पत्थर से बने लोग होते हैं जिनमें मानवीय संवेदना नाम की भावना नहीं होती , पाप पुण्य का अपराधबोध नहीं होता। वेतन भले लाखों रूपये मिलते हों और सुविधाएं करोड़ों की मुफ्त में फिर भी ऊपर की कमाई का मोह जाता ही नहीं है। अब रिश्वत अपराधी ही देंगे सहयोग पाने के लिए या आम नागरिक को अकारण परेशान करने से मिल सकती है , अपना कर्तव्य निभाने से केवल वेतन मिलता है। इक विशेष बात होती है बड़े बड़े अफसरों की कोई उनसे विभाग में हो रहे अनुचित कार्यों की बात करे तो ऐसे भाव दिखलाते हैं जैसे उनको कुछ अता पता ही नहीं। इतने भोले लगते है कि उन पर न्यौछावर होने को दिल करता है। हुस्न वाले कातिल होते है तो ये भोलेपन की आड़ में क्या नहीं कर जाते।
कौन कहता है गिद्ध कम हो रहे हैं , सरकारी दफ्तरों की कुर्सियों पर कितने गिद्ध विराजमान हैं। ये किसी इंसान की मौत का इंतज़ार नहीं करते , जीते जी इंसानों के जिस्म की बोटी बोटी नोच खाते हैं। ये सभी पल भर में चेहरा बदल लेते हैं। हादिसे में मरे लोगों को सांत्वना देते दुःखी लगते हैं और उस जगह से बाहर निकलते ही किसी बात की ख़ुशी में जाम छलकाने लगते हैं। दोनों मिलने से सत्ता का नशा और बढ़ जाता है तभी नेता जी थोड़ी अधिक जीत मिलते ही किसी दल को नीचे दिखलाने वाले बयान देने लगते हैं। थोड़ी लाज शर्म बचाकर रखनी चाहिए और अपने अतीत को कभी नहीं भुलाना चाहिए। शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है , जिस शाख पे बैठे हो वो टूट भी सकती है।
इन राजनेताओं की परेशानी बढ़ गईं हैं जबसे इनकी बातें विडिओ में रिकॉर्ड होने लगी हैं , बार बार उपहास होता है देश के सब से बड़े पद का जब कोई बात नेता जी सत्ता में आने के बाद बोलते हैं और मीडिया वाले उस की उल्ट कही बात भी याद करते हैं जब किसी और की सत्ता थी और आपने कही थी। मगर टीवी चैनल वाले कभी इसको तूल नहीं देते क्यिंकि उनको सत्ता साथ मिलकर विज्ञापनों की मलाई खानी है। इस को मनोरंजन की तरह खबरों के बाद कार्टून बना दिखला हवा में उड़ा देते हैं। ये हंसी ठठा भी नेताओं को अपना गुणगान जैसा लगे ये भी देखा जाता है। कभी अख़बार में इक कार्टून बहुत बेचैन कर दिया करता था। अब इस पुल गिरने पर भी नेता जी का पुराना बयान सुनाया गया जिस में वो तब की सरकार पर आरोप लगते हैं कि ये एक्ट ऑफ गॉड नहीं है भ्र्ष्टाचार है। ये सच है ऐसे हादिसे भगवान नहीं करवाता , कुछ लोगों की लापरवाही और अपराध के कारण होते हैं। मगर इन नेता जी की समस्या दूसरी है हर अवसर पर कोई न कोई विशेष पूजा करते रहते हैं मंदिर मंदिर जाकर और सब को मानना होगा उनसे बड़ा भगवान का भक्त कोई नहीं है। बेशक पहली बार सुन रहे हैं उनके खुद के भक्त लोग हैं जो उनके नाम पर लड़ भिड़ सकते हैं और हंगामा कर देते हैं जब कोई सत्ता धारी नेता की सरकार की आलोचना करे।
आपने कभी किसी धर्म को समझा है , किसी भी धार्मिक किताब को पढ़ते तो मालूम होता कि पूजा पाठ अर्चना खुद अपने साधन और धन अदि से की जा सकती है। ये जनाब तो सत्ता मिलते किसी मंदिर में पूजा करते करोड़ रूपये की चंदन की लकड़ी दान में दे आये थे सरकारी कोष से। इसको आप भ्र्ष्टाचार भले नहीं कहोगे भगवान से डर कर मगर पद का दुरूपयोग और धर्मानुसार पाप ही होगा। ये अजीब धार्मिकता है जो जानवरों के नाम पर इंसानों की हत्या करवाती है। दैरो हरम में रहने वालो , मयखारों में फूट न डालो। आप पुण्यात्मा हम सब मुजरिम आपके हिसाब से मगर संविधान सब को बराबर मानता है। मंदिर और भगवान के नाम पर दंगे करवाना देश भक्ति नहीं है। व्यक्तिवाद परिवारवाद से खतरनाक है और किसी एक संगठन के लोगों को ही मनोनीत कर बड़े बड़े पदों पर बिठाने का अर्थ भी संविधान और लोकतंत्र के लिए खतरा है। देश को किसी मसीहा की ज़रूरत शासन करने को नहीं है , मसीहा होते हैं जो लोग वो सत्ता और शासन की हवस के भूखे नहीं हुआ करते। जिनको मसीहा लगता है कोई वो भी उनके सत्ता से बाहर होते कोई और मसीहा तलाश करते मिलेंगें।
ये कानून नहीं है , कानून की आड़ में गलत लोगों के हथकंडे हैं सच को दबाने खामोश करने और खुद सरकार और उसके विभाग के आपराधिक कार्यों पर पर्दा डालने के। 67 साल के इक वरिष्ठ नागरिक पर उसके रहने के एक मात्र स्थान पर तलवार खड़ी करना बदले की भावना से मानसिक परेशानी देना इंसानियत नहीं है। जो सरकार और उसका विभाग और प्रशासन के लोग मेरी शिकायत पर ढाई साल तक कुछ नहीं करते और खुद अपने ही सरकारी विभाग के खाली बिन बिके प्लॉटों से अवैध कब्ज़े नहीं हटवाते हैं और बार बार केवल एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर पात्र लिखते रहते हैं कि अभी तक आपने करवाई नहीं की आपको अमुक अमुक संख्या पत्र नंबर का जवाब देना है वही अब मुझे शिकायत करने वाले को कटघरे में खड़ा करना चाहते हैं। जुर्म क्या है आपकी सरकार को उसी के प्लॉट्स पर गैरकानूनी कब्ज़े की बात बताना। तीस साल से अधिक समय बाद नोटिस भेजते हैं जिस में नाम गलत कब किसे किसने अलॉट किया किस तारीख को और क्या अनुचित कर रहे साफ कुछ भी नहीं। इक छपे छपाये फॉर्म में तमाम अनियमितता की बात लिखी हुई , आपकी साहूलियत है जो भी सही गलत साबित करें। किसी अदालत किसी न्यायधीश को नहीं समझ आएगा आपके नोटिस का मतलब क्या है। ये इक आपराधिक ढंग है सरकारी विभागों का , ऐसा मान लिया जाता है कुछ न कुछ तो गलत होगा , कहीं तो कोई नियम पालन नहीं हुआ होगा। ऐसा इसलिए कि सरकारी विभाग के नियम दोहरे मापदंड वाले बनाये हुए होते हैं। सरकार जब मर्ज़ी नियम बदल सकती है और आम नागरिक को कुछ भी बदलने की आज़ादी नहीं। जिस भवन की बात की जा रही है पहले उसकी बात समझना ज़रूरी है।
ये विभाग जो आज नियम कानून की आड़ में ये सब कर रहा है उसे 1978 के एक एक्ट में बनाया गया था लोगों को आवास उपलब्ध करवाने के मकसद से बेघर करने को नहीं। 1972 में इक सरकारी विभाग न्यू मंडी टाउनशिप ने खुली बोली पर राज्य भर में रिहायशी , दुकानों के , उद्योगों के और सभी तरह के प्लॉट्स विकसित कर बेचे थे। शायद इस विभाग को भी हैरानी होगी कि उस विभाग का एक नियम ये भी था कि बाद में कोई आर्थिक तंगी से किश्तें नहीं दे सकता हो तो उसके ऐसा लिख कर देने से जो किश्त जमा करवाई थी पूरी वापस मिल जाती थी। ये न्यायकारी नियम था , जो आजकल के विभाग को उचित नहीं लगेगा। इस विभाग में या तो दस फीसदी रकम ज़ब्त कर ली जाती है या सालों बाद कैंसल किये प्लॉट्स की कीमत बढ़ने पर मिलीभगत से फिर से अलॉट कर दिए जाते हैं। उनके अनुसार गलत सही कुछ नहीं होता सब मनमानी है। अपने खुद के द्वारा बेचे प्लॉट्स में जब रिहायशी में कारोबार करने लगे लोग तब विभाग कोई करवाई नहीं करता यहां तक कि उच्च न्यायालय के आदेश भी पालन नहीं करते और सब कागज़ी करवाई झूठी बताई जाती है।
जो प्लाट किसी ने 1972 में बोली पर खरीदा और ज़रूरत पड़ने पर मुझे आगे बेचा 1986 में , विभाग से लिखवा कर कि कोई राशि बकाया नहीं देनी है , विभाग के अधिकारी कब्ज़ा दे गए और 1987 में मैंने भवन का निर्माण कर लिया। सरकार या विभाग को इस से कोई सरोकार नहीं लेकिन फिर भी मैं बताना चाहता हूं कि ये प्लाट और उसका निर्माण मैंने कोई दो नंबर की काली कमाई से नहीं किया , बल्कि तब अपनी विरासत में मिली खेती की ज़मीन को बेच कर लिया और बनवाया था। जिसने बोली पर खरीदा और मुझे बेचा था उसे सरकारी विभाग के कारण से पंजीकरण में साल भर लगा था लेकिन उसके पंजीकरण के चार दिन बाद ही उसने मेरे नाम पंजीकरण करवा दिया था। लोग विश्वास के काबिल और ईमानदार हुआ करते थे तब भी और आज भी मिल जाते हैं कहीं कहीं। तभी न्यू मंडी टाउनशिप विभाग को हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण के साथ मिला दिया गया। ये विभाग बाद में बना और प्लाट पहले बिके थे। मालूम नहीं इस विभाग को जिसका नाम फिर से बदल दिया गया है , को पहले विभाग के वास्तविक मास्टर प्लान की जानकारी थी या नहीं मगर इस विभाग ने बहुत कुछ उस प्लान के अनुसार नहीं किया बदल लिया। ये इक अजीब तरीका है जनहित के कारण या कुछ भी ऐसा बताकर सरकार सब कुछ कर लेती है और उसे अवैध नहीं माना जाता। इसी विभाग ने मॉडल टाउन के आवासी लोगों के लिए रखे कामनुयटी सेंटर की जगह को किसी और को बेचा डाला , उस से पहले भी न्यू मंडी टाउनशिप विभाग ने दुकानों के प्लॉट्स को किसी संस्था को धर्मशाला के लिए आबंटित किया जो गैर कानूनी था , पार्क की जगह को कई संस्थाओं को आंबटित किया गया। सब मास्टर प्लान को ताक पर रखकर मनमानी से किया गया।
मगर अब तीस साल बाद मुझे नोटिस भेजते हैं। फोन पर बात की इक अधिकारी से जिसने विभाग को झूठ बताया कि वो मुझे मिला और अतिक्रमण पर बात की , अतिक्रमण करने वालों अपने ही विभाग के प्लाटों पर कब्ज़ा करने वालों पर करवाई नहीं करना वाला उल्टा शिकायती को ही खामोश करवाना चाहता है। मगर यहां सवाल खड़े होते हैं क्या ये बदले की भावना से नहीं किया जा रहा है। उस समय के इस शहर में और कितने भवन बने हुए हैं लेकिन आप केवल मुझ जैसे लोगों को चुनते हैं सभी को क्यों नहीं भेजते नोटिस। सब से पहली बात तीस साल बाद आपको याद आया ये सब वो भी उस प्लाट के बारे जो इस एरिया के आपके विभाग के आधीन आने से पहले बना लिया गया था। अंधा होगा वो कानून जो आपके विभाग के 1978 में बने नियम को सालों पहले दूसरे विभाग द्वारा बेचे प्लाट पर लागू करे।
आम नागरिक को सीता की अग्निपरीक्षा देनी होगी मगर आप खुद राम नहीं हैं कोई तो सवाल करेगा। राम और रावण में अंतर कौन करे।