अप्रैल 08, 2013

POST : 326 सुन ज़माने बात दिल की खुद बताना चाहता हूं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

     सुन ज़माने बात दिल की खुद बताना चाहता हूं ( ग़ज़ल ) 

                          डॉ लोक सेतिया  ' तनहा '

सुन ज़माने बात दिल की खुद बताना चाहता हूं
पौंछकर आंसू सभी , अब मुस्कुराना चाहता हूं ।

ज़िंदगी भर आपने समझा नहीं अपना मुझे पर 
मैं मगर सब को यहां अपना बनाना चाहता हूं ।

दोस्तों की बेवफ़ाई को भुला कर आ गया हूं
बेरहम लोगों  को फिर से आज़माना चाहता हूं ।

क्या कहूं कैसे कहूं किस से कहूं क्या आरज़ू है 
बस किसी के दिल में रहने को ठिकाना चाहता हूं ।
 
गर  कभी गिरने लगूं तब आप मत देना सहारा 
बोझ अपनी ज़िंदगी का खुद उठाना चाहता हूं ।
 
क्या किसी से अब छुपाना  जानता सारा ज़माना 
आज कोई आईना , खुद  को दिखाना चाहता हूं ।
 
तान  पर दुनिया मुझे ' तनहा ' नचाती ही रही है  
उस को कठपुतली बना मैं भी नचाना चाहता हूं । 
 

 
 



 

1 टिप्पणी:

सुनीता अग्रवाल "नेह" ने कहा…

बेरहम दुनिया को फिर से आज़माना चाहता हूं !
अच्छी ग़ज़ल ।