Tuesday, 30 March 2021

अजनबी लोगों में मुझको मेहरबां की तलाश है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

       अजनबी लोगों में मुझको मेहरबां की तलाश है ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ लोक सेतिया " तनहा " 

अजनबी लोगों में मुझको मेहरबां की तलाश है 
प्यार की दौलत हो जिस में उस जहां की तलाश है। 
 
छोड़ गलियां गांव की जो आ गया शहर भूल से 
खो गया है भीड़ में उस बदगुमां की तलाश है। 
 
दोस्तों को नाम लेकर कब बुलाते हैं दोस्त भी 
आईने जैसे किसी इक हमज़ुबां की तलाश है। 
 
कुछ मुसाफ़िर हैं जिन्हें खुद मंज़िलें ढूंढती रहीं 
और ऐसे लोग भी जिनको मकां की तलाश है। 
 
मौसमों से मिट गए हैं काफ़िलों के निशान तक 
पर सभी को आज तक उस कारवां की तलाश है। 
 
पूछती सब से सड़क की लाश बस ये सवाल है 
क़त्ल होना था हुआ क्योंकर निशां की तलाश है। 
 
गुफ़्तगू आवाम से करनी है "तनहा" निज़ाम ने 
दाद दे  हर बात पर उस बेज़ुबां की तलाश है।
 
 
 
 
 

Saturday, 27 March 2021

मुझे चलना पसंद है ठहरना नहीं ( मेरा परिचय ) डॉ लोक सेतिया

  मुझे चलना पसंद है ठहरना नहीं ( मेरा परिचय ) डॉ लोक सेतिया 

   कभी कभी खुद से अपने बारे चर्चा करता हूं। आत्मचिंतन कह सकते हैं। मुझमें रत्ती भर भी नफरत नहीं है किसी के लिए भी , उनके लिए भी प्यार हमदर्दी है जिनकी आलोचना करना पड़ती है सच कहने को। कोई व्यक्तिगत भावना दोस्ती की न विरोध की मन में रहती है। कुछ अधिक नहीं पढ़ा है मैंने जीवन को जाना समझा है और उसी से सीखा है। किताबों से जितना मिला समझने की कोशिश की है विवेचना की है। बहुत थोड़ा पढ़ा है शायद लिखा उस से बढ़कर है विवेकशीलता का दामन कभी छोड़ा नहीं है और खुद को कभी मुकम्मल नहीं समझा है। क्यों है नहीं जानता पर इक प्यार का इंसानियत का भाईचारे का संवेदना का कोई सागर मेरे भीतर भरा हुआ है। बचपन में जिन दो लोगों से समझा जीवन का अर्थ मुमकिन है उन्हीं से मिला ये प्यार का अमृत कलश। मां और दादाजी से पाया है थोड़ा बहुत उन में भरा हुआ था कितना प्यार अपनापन और सदभावना का अथाह समंदर। दुनिया ने मुझे हर रोज़ ज़हर दिया पीने को और पीकर भी मुझ पर विष का कोई असर हुआ नहीं मेरे भीतर के अमृत से ज़हर भी अमृत होता गया। और जिनको मैंने प्यार का मधुर अमृत कलश भर कर दिया उनके भीतर जाने पर उनके अंदर के विष से वो भी अपना असर खो बैठा। 

  मेरी कोई मंज़िल नहीं है कुछ हासिल नहीं करना है मुझे लगता है मेरे जीवन का मकसद यही है बिना किसी से दोस्ती दुश्मनी समाज और देश की वास्तविकता को सामने रखना। समाज का आईना बनकर जीना। भौतिक वस्तुओं की चाहत नहीं रही अधिक बस जीवन यापन को ज़रूरी पास हो इतना बहुत है। सुःख दुःख ज़िंदगी के हिस्सा हैं कितने रंग हैं बेरंग ज़िंदगी की चाह करना या सब गुलाबी फूल खुशबू और सदाबहार मौसम किसी को मिले भी तो उसकी कीमत नहीं समझ आएगी। हंसना रोना खोना पाना ये कुदरत का सिलसिला है चलता रहता है। लोग मिलते हैं बिछुड़ते हैं राह बदलती हैं कारवां बनते बिगड़ते हैं हमको आगे बढ़ना होता है कोई भी पल जाता है फिर लौटकर वापस नहीं आता है ये स्वीकार करना होता है। जो कल बीता उनको लेकर चिंता करने से क्या होगा और भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है नहीं मालूम फिर जो पल आज है अभी है उसी को अपनाना है जीना है सार्थक जीवन बनाने को। कितने वर्ष की ज़िंदगी का कोई हासिल नहीं है जितनी मिली उसको कितना जीया ये ज़रूरी है। 

    लोगों से अच्छे खराब होने का प्रमाणपत्र नहीं चाहता हूं खुद अपनी नज़र में अपने को आंखे मिलाकर देख पाऊं तो बड़ी बात है। मगर यही कठिन है। मैली चादर है चुनरी में दाग़ है और अपना मन जानता है क्या हूं क्या होने का दम भरता हूं। वास्तविक उलझन भगवान से जाकर सामना करने की नहीं हैं अपने आप से मन से अंतरात्मा से नज़र मिलाने की बात महत्वपूर्ण है। और अब यही कर रहा हूं। मैंने खुद को कभी भी बड़ा नहीं समझा है बल्कि बचपन से जवानी तक कुछ हद तक हीनभावना का शिकार रहा हूं। कारण कभी मुझे समझ नहीं आया क्यों हर किसी ने मुझे छोटा होने अपने बड़ा होने और नीचा दिखाने की कोशिश की है। बहुत कम लोग मिले हैं जिन्होंने मेरे साथ आदर प्यार का व्यवहार किया है। जाने कैसे मैंने अपना साहस खोया नहीं और भीतर से टूटने से बचाये रखा खुद को। मुझे कभी किसी ने बढ़ावा देने साहस बढ़ाने को शायद इक शब्द भी नहीं कहा होगा हां मुझे नाकाबिल बताने वाले तमाम लोग थे। मुझे किसी को नीचा दिखाना किसी का तिरस्कार करना नहीं आया और नफरत मेरे अंदर कभी किसी के लिए नहीं रही है। ऐसा दोस्त कोई नहीं मिला जो मुझे अपना समझता मुझे जानता पहचानता और साथ देता। अकेला चलना कठिन था मगर चलता रहा रुका नहीं कभी भी।

    जब भी मुझे निराशा और परेशानी ने घेरा तब मुझे इस से बाहर निकलने को संगीत और लेखन ने ही बचाया और मज़बूत होना सिखाया है। अपनी सभी समस्याओं परेशानियों का समाधान मुझे ग़ज़ल गीत किताब पढ़ने से हासिल हुआ है। इंसान हूं दुःख दर्द से घबराता भी रहा मगर जाने क्यों अपने ग़म भी मुझे अच्छे लगते रहे हैं ग़म से भागना नहीं चाहा ग़म से भी रिश्ता निभाया है। ग़म को मैंने दौलत समझ कर अपने पास छिपाकर रखा है हर किसी अपने ग़म बताये नहीं। इक कमज़ोरी है आंसू छलक आते हैं ज़रा सी बात पर हर जगह मुस्कुराना क्या ज़रूरी है कभी ऐसा हुआ कि हंसने की कोशिश में पलकें भीग जाती हैं। अपने आप को पहचानता हूं और अब तन्हाई अकेलापन मुझे अच्छा लगता है उन महफिलों से जिन में हर कोई अपने चेहरे पर सच्चाई भलेमानस की नकाब लगाए इस ताक में रहता है कि कब अवसर मिले और अपनी असलियत दिखला दे। ये दुनिया और उसकी रौनक मुझे अपनी नहीं लगती हैं।

खुद को आईने में देखना ( आत्म-अवलोकन ) डॉ लोक सेतिया

     खुद को आईने में देखना ( आत्म-अवलोकन ) डॉ लोक सेतिया 

  लोग अपनी पुस्तक के पहले पन्ने पर अपने बारे में लेखन और किताब की बात कहते हैं। मुझे लिखते हुए चालीस साल और अख़बार मैगज़ीन में रचनाएं छपते तीस साल से अधिक समय हो चुका है। ब्लॉग पर ये 1390 वीं पोस्ट है दस साल से नियमित लिख रहा हूं और 199600 संख्या आज तक सभी पोस्ट की पढ़ने वालों की है। किताब छपवाने की हसरत है और काफी रचनाओं का चयन ग़ज़ल , कविता-नज़्म , व्यंग्य , कहानी , हास-परिहास की रचनाओं पांच हिस्सों में किया गया है जो इसी ब्लॉग पर लेबल से समझ सकते हैं। डायरी पर रचनाओं की फ़ाइल में दो पन्नों पर अपने लेखन को लेकर लिखा हुआ है जिसे किसी लेखक दोस्त की कैसे होते हैं साहित्यकार नाम की किताब में और कुछ अन्य साहित्य संबंधी मैगज़ीन में भी छापा गया है। शायद समय है कि ब्लॉग के पाठक वर्ग को भी अपना परिचय लेखक के बारे दिया जाना उचित है। 
 
     मेरा जन्म ऐसे परिवार में हुआ जिस में साहित्य या शिक्षा का कोई महत्व नहीं था। गांव के थोड़े पढ़े लिखे और किसान खेतीबाड़ी ठेकेदारी करने वाले बड़े बज़ुर्ग धार्मिक माहौल माता जी सादगी की मिसाल और भजन गाने में रूचि का तथा दादाजी का भगवद कथा अदि सुनने का असर शायद मुझे इस तरफ लाने की शुरुआत थी। पढ़ाई विज्ञान की फिर डॉक्टर बनने की शिक्षा का साहित्य से कोई तालमेल नहीं था। सच कहना है तो मुझे संगीत और गाने का बहुत चाव था जिसे परिवार में खासकर पिता जी पसंद नहीं करते थे उनको ये गाना बजाना मिरासी लोगों की बात लगती थी। 
 
   लिखना डायरी से शुरू किया अपने मन की बात किसी से कहना नहीं आता था खुद अपनी बात अपने साथ करना आदत बन गया। जैसे कोई डरकर चोरी छुपे इक अपराध करता है मैंने अपना लेखन इसी ढंग से किया है मुझे हतोत्साहित करने वाले तमाम लोग थे बढ़ावा देने पीठ थपथपाने वाला कोई भी नहीं। इसलिए मुझे सभी पढ़ने वालों से ये कहना ज़रूरी लगता है कि पढ़ते हुए इस अंतर को अवश्य ध्यान रखना। आपको शायद ये फर्क इस तरह समझ आ सकता है। जैसे कोई इक पौधा किसी रेगिस्तान में उग जाता है जिसे राह चलते कदम कुचलते रहते हैं आंधी तूफान झेलता है कोई जानवर उखाड़ता है खाता है मिटाता है मगर फिर बार बार वो पौधा पनपने लगता है। कुछ लोग जिनको साहित्यिक माहौल और मार्गदर्शन मिलता है बढ़ावा देते हैं जिनको उनके आस पास के लोग , वे ऐसे पौधे होते हैं जिनको कोई माली सींचता है खाद पानी देता है उसकी सुरक्षा को बाड़ लगाता है ऊंचा फलदार पेड़ बन जाते हैं। मेरा बौनापन और उनका ऊंचा कद दोनों को मिले माहौल से है इसलिए मेरी तुलना उनसे नहीं करना। 
 
    मैंने साहित्य पढ़ा भी बहुत कम है कुछ किताबें गिनती की और नियमित कई साल तक हिंदी के अख़बार के संपादकीय पन्ने और कुछ मैगज़ीन पढ़ने से समझा है अधिकांश खुद ज़िंदगी की किताब से पढ़ा समझा है। केवल ग़ज़ल के बारे खतोकिताबत से इसलाह मिली है कोई दो साल तक आर पी महरिष जी से। ग़ज़ल से इश्क़ है व्यंग्य सामाजिक विसंगतियों और आडंबर की बातों से चिंतन मनन के कारण लिखने पड़े हैं। कहानियां ज़िंदगी की सच्चाई है और कविताएं मन की गहराई की भावना को अभिव्यक्त करने का माध्यम। लिखना मेरे लिए ज़िंदा रहने को सांस लेने जैसा है बिना लिखे जीना संभव ही नहीं है। लिखना मेरा जूनून है मेरी ज़रूरत भी है और मैंने इसको ईबादत की तरह समझा है।

Monday, 8 March 2021

संबंध लाल-कालीन का कंटीली राह से ( आईन की बात ) डॉ लोक सेतिया

    संबंध लाल-कालीन का कंटीली राह से ( आईन की बात ) 

                                डॉ लोक सेतिया 

संविधान को कहते हैं आईन जिसे घोषित किया गया है कि हम भारत के लोग इसको अपनाते हैं स्वीकार करते हैं मंज़ूर है। शायद सभी ने पढ़ा तक नहीं बिना पढ़े पढ़े लिखे लोगों ने हस्ताक्षर कर दिए अनपढ़ लोग अंगूठा लगाने को तैयार थे फिर भी मुमकिन नहीं कि इस में ऐसा समझाया गया होगा कि सरकार और जनता का रिश्ता लाल-कालीन का कंटीली राह से संबंध जैसा होगा। भला इस से बढ़कर चिंताजनक दशा क्या हो सकती है कि चुनकर सत्ता पर बिठाने वाले भूखे नंगे बदहाल हैं और जनता की सेवा का वादा करने वाले राजसी शान से ऐशो आराम का मज़ा लूटते राजा बनकर अय्याशी भरा जीवन जीते हैं। विडंबना की बात है संसद विधानसभाओं राजभवन सचिवालय से न्यायलय तक हर कोई देश के गरीबों के खून पसीने की कमाई पर मौज मनाते हुए समझता है ये आज़ादी है उनको मिला अधिकार है। जबकि वास्तव में ये सभी अपना अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाने में असफल ही नहीं हुए और नाकाबिल ही साबित नहीं हुए बल्कि इनका ज़मीर मर चुका है अन्यथा इन सभी को शर्म आती बिना कर्तव्य निभाए मनमर्ज़ी का वेतन सुविधाएं हासिल करने नहीं छीनने के लिए। देशभक्ति जनता की सेवा जनकल्याण की भावना जैसे शब्द इनके लिए कोई अर्थ नहीं रखते हैं इन्होने ऐसे शब्दों को अपने अपकर्म और कर्तव्यविमुख होने को ढकने का आवरण या मुखौटा बना रखा है। जिस देश की आधी आबादी को बुनियादी सुविधाएं जीने की उपलब्ध नहीं उस का शासन चलाने वालों का देश के ख़ज़ाने को अनावश्यक फज़ूल खर्चों पर बर्बाद करना अनुचित अमानवीय और अपराध ही नहीं सबसे बढ़कर अधर्म एवं पाप है। शपथ उठाने का कोई मतलब नहीं रह जाता है जब उठाने वाले की भावना ईमानदारी पूर्वक उस पर खरे उतरने की नहीं होकर केवल औपचरिकता हो पद और सत्ता पर काबिज़ होने को तोते की तरह कही बात को दोहराना। 
 
    आज़ादी के 73 साल बाद बहुत कुछ किया जाना संभव था जो किया नहीं किया बल्कि जो नहीं किया जाना चाहिए था वही निर्लज्जता पूर्वक डंके की चोट पर किया गया विकास के नाम पर सिर्फ ख़ास वर्ग को सभी कुछ उपलब्ध करवाने को। और अधिकांश सामान्य वर्ग को कुछ भी नहीं खोखले वायदे झूठे आंकड़े और उनको ऐसे जाल में फंसाना जिस में लोग गुलामी को भी सत्ता और सरकार की अनुकंपा समझने लगें। आज महिला दिवस है और हम महिलाओं को समानता के अधिकार और आदर मिलने की पैरवी करते हैं लेकिन क्या शासक वर्ग धनवान लोग और देश के एक चौथाई अमीर वो लोग जिनके पास पैसा दौलत का 75 फीसदी से अधिक है उनका बाकी जनता से बड़ा अंतर सबको सब बराबर नहीं मिलने का वास्तविक कारण सरकार की भेदभाव पूर्ण व्यवस्था नहीं है जो गरीब का शोषण और अमीर को और अमीर बनाने की नीतियों पर चल रही है। गांधी जी की सोच और समाजवाद की अवधारणा को दरकिनार कर पूंजीवादी व्यवस्था का नतीजा देश कंगाली के कगार पर खड़ा है। जिनको देश और समाज की समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए था वही खुद सबसे विकराल समस्या बनकर सामने खड़े हैं और उन्होंने चालाकी और छलपूर्वक जनता को उस भंवर में ला दिया है जब कोई विकल्प सामने नहीं दिखाई देता है। जो कश्ती को खेवनहार बनकर पतवार थामकर पार लगाने की बात कहकर चले थे हमको डुबोने का काम कर रहे हैं खुद अपने लिए सुरक्षित बचने के उपाय पहले किए हैं। 
 
  अब हमारे पास बस एक ही रास्ता है ऐसे माझी पर भरोसा करना छोड़ खुद अपने साहस से इन मौजों से टकराना और तैर का पार करना हौंसलों के दम पर। इतिहास गवाह है मखमली बिस्तर पर चैन से सोने वाले ऊंचे महलों में फूलों पर चलने वाले कंटीली राह पर चलने वालों झौंपड़ी में रहने वालों पर कभी रहम नहीं किया करते हैं। उनको मसीहा समझना सबसे बड़ी भूल होती है जिनको सत्ता की हवस होती है बेरहम बन जाते हैं। मगरमच्छ के आंसू गिरगिट की तरह रंग बदलना उनकी फितरत है उनका भरोसा नहीं किया जा सकता है। जिन के शासन में कहा जाता है कि उनके राज में सूर्य कभी अस्त नहीं होता उनको उनकी हैसियत समझा सकते हैं तो ये मुट्ठी भर लोग जो बिना शासकीय अधिकार किसी काम के नहीं देश की जनता के बहुमत के सामने कब तक टिक सकेंगे। अब तलक संविधान को राजनेताओं ने अपने अनुसार स्वार्थ सिद्ध करने को परिभाषित किया और दुरूपयोग किया है अब समय आ गया है उनको संविधान की भावना समझाने और उनकी वास्तविक जगह शासक नहीं जनसेवक है दिखलाने का। 
 
आज हमारे देश और समाज में नैतिकता सच्चाई ईमानदारी खोखले शब्द बन कर रह गए हैं वास्तव में इनका कोई महत्व कोई मूल्य रह नहीं गया है। डॉक्टर शिक्षक स्कूल अस्पताल क्या धर्म उपदेशक तक अपने वास्तविक कर्म से अधिक ध्यान अपने स्वार्थ और धन दौलत हासिल करने पर देते हैं। ऊंचे पद पर बैठ कर मापदंड निम्न स्तर के दिखाई देते हैं। सरकारी कर्मचारी अच्छा वेतन पाकर भी ईमानदारी से कर्तव्य नहीं निभाते हैं। पुलिस अपराध मिटाने पर नहीं अपराध को बढ़ाने पर ध्यान देती है हर कोई अपने मतलब की खातिर दूसरे को धोखा देने को अनुचित नहीं समझता है। जो जिस व्यौपार धंधे कारोबार में है मुनाफा कमाने को सब कुछ करता है। मिलावट ही नहीं ज़हर तक बेचते हैं पैसे की खातिर आसानी से धनवान बनने को लोग। भगवान से कोई भी डरता नहीं है शायद सभी समझते हैं उनके अपकर्मों का हिसाब कोई नहीं करने वाला है। सोचा समझा जाये तो हम मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरिजाघर जाते हैं दिखावे को आडंबर करने को क्योंकि वास्तविक जीवन में हमने धर्म की राह चलना छोड़ दिया है। शायद हमने ईश्वर और धर्म को भी लेन देन का कारोबार समझ लिया है और समझते हैं वहां भी रिश्वत चाटुकारिता चढ़ावे गुणगान आरती से बात बन जाएगी। अर्थात हमने भगवान को भी अपने जैसा मान लिया है जो खुश हो जाएगा उपहार पाकर या स्तुति सुनकर मतलब ये कि हमने भगवान ईश्वर को भी समझा तक नहीं है।  


Monday, 1 March 2021

संवाद विवाह से पहले शादी के बाद ( वार्तालाप ) डॉ लोक सेतिया

 संवाद विवाह से पहले शादी के बाद ( वार्तालाप ) डॉ लोक सेतिया 

      बात घर घर की है जानते हम भी हैं समझते आप भी हैं मानते नहीं ज़माने से छिपाते हैं। पत्नी समझ नहीं पाई बड़ी हैरान है पति किस बात को लेकर परेशान है। बोली अपने नेता जी आपको क्यों भला खराब लगते हैं हमको बड़े लाजवाब लगते हैं उनके रंग ढंग सज धज देखते हैं सभी सच कहो वही असली नवाब लगते हैं। पति कहने लगे कितने झूठे हैं क्या क्या वादे किये थे नहीं निभाए हैं। पत्नी ने समझाया आप समझ नहीं पाये हैं अच्छे दिन उनके खूब आये हैं। वादे क्या आपने मुझसे  निभाए हैं चांद तारे तोड़ कर लाये हैं आपसे अच्छे हैं जो पत्नी को अकेली छोड़ आये हैं खुद कमाती है चैन से रहती है अपनी असलियत समझा आये हैं। नाज़ नखरे नहीं उठाये हैं इतनी सी बात है सितम जीवन भर नहीं ढाये हैं। कहा हमने आत्मनिर्भरता की किताब खुद नहीं पढ़ते जो लोग सबको सबक समझाते हैं। उनकी पढ़ाई में महनतकश लोग परजीवी कहलाते हैं। ये कैसे लोग हैं जो जिनके कांधे पर चढ़कर ऊपर पहुंचे उन्हीं को किनारे लगाते हैं। एहसानों का बदला क्या इसी तरह चुकाते हैं। पत्नी को बहस में कोई नहीं हरा सकता है बोली कोई सच सच बता सकता है , आप सभी पति खुद को गुलाम कहते रहते हैं ज़िंदगी भर शिकवा करते हैं छोड़ते हैं न पत्नी को छोड़ने देते हैं। आपको ज़माने की खबर नहीं है शान उनकी है जिन पर किसी बात का होता असर नहीं है। मुझे अध्यापिका जी ने कहानी सुनाई थी शादी की बात समझाई थी मैं सुनकर शर्माई थी हो चुकी अपनी सगाई थी पीछे कुंवां था सामने खाई थी। मत पूछो राम दुहाई थी जब मिलती मुझे बधाई थी मुसीबत सर पर खड़ी थी बजने लगी शहनाई थी। 
 
    शादी इक झमेला है असल में हर कोई अकेला है दुनिया क्या है इक मेला है मेले में खेल तमाशा होता है खेल जिसने खेला है बस वही अलबेला है। खेलने वाले होते खिलाड़ी हैं हम सभी तमाशाई हैं अनाड़ी हैं। तमाशे में खेल घड़ी भर होता है खेल ख़त्म पैसा हज़्म ये मनोरंजन कहलाता है , उनसे खूबसूरत खेल तमाशे रोज़ नहीं कोई दूसरा दिखलाता है। समझदार वही कहलाता है जो कुछ भी नहीं करता मौज मनाता है यार दोस्तों से यारी निभाता है उसका कोई नहीं बही खाता है। बस वो सभी का हिसाब बताता है अपना हिसाब कभी नहीं बताता है। उल्लू बनाना हुनर नहीं सभी को आता है। कोई बच्चा मिट्टी के खिलौने बनाता है कोई बाज़ार से खिलौने खरीद लाता है जो बच्चा दोनों से खिलौने छीन कर खेलने के बाद दिल भर जाए तोड़ डालता है दबंग कहलाता है। भविष्य में बड़ा होकर नेता बनकर राज चलाता है। ज़िंदगी का असली मज़ा वही उठाता है जो मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं मेरी मर्ज़ी गाकर सबको चिढ़ाता है। नानी ने मुझे समझाया था नारी और पुरुष का अंतर बताया था। महिला पत्नी बनकर सुई से भी घर बना सकती है जिसको पति पुरुष होकर भी कस्सी से भी गिरा नहीं सकता है। मगर अविवाहित जो मिल जाये उसी से काम चलाता है वो किसी बात से नहीं घबराता है। लेकिन जो विवाहित होकर अकेला रहता है कुंवारा नहीं न शादीशुदा कहलाता है बीच में लटका मझधार में नैया लाकर डुबाता है उसको बर्बाद करने का बड़ा मज़ा आता है। शादी वाला लड्डू खाने वाला भी और बिना खाये भी हर शख़्स पछताता है बस कोई कोई इस हाथ लड्डू उस हाथ रस्सगुल्ला लेकर बहती गंगा में डुबकी लगाता है। चार दिन में विवाहित होने का अर्थ समझ कर भाग जाता है। जिसको गुलाम बनाना आता है आज़ाद पंछी पिंजरा छोड़ जाता है। 
 
 सभी विवाहित महिला पुरुष बंद पिंजरे के वासी हैं दिल चाहता है तोड़ कर पिंजरा उड़ने को मगर हिम्मत नहीं जुटाते हैं। पिंजरे से प्यार करने लग जाते हैं बाहर निकलने से डरते हैं घबराते हैं नसीब वालों को सोने का पिंजरा मिलता है मिट्ठू मिंयां समझाते हैं। पति पत्नी लड़ते हैं झगड़ते हैं फिर मिल जाते हैं जिसको सबसे खराब समझते हैं प्यार उसी पर लुटाते हैं। प्यार मुहब्बत इसी को कहते हैं रूठते हैं मनाते हैं मान जाते हैं रिश्ता निभाना है निभाते हैं। साथ साथ रहकर दोस्ती और दुश्मनी दोनों निभाते हैं। आपसे अच्छा कोई दुनिया में नहीं बहुत खराब हैं आप दुविधा को इस तरह बढ़ाते हैं। उनको भूला हुआ नहीं कहते हैं जो सुबह घर से जाते शाम ढले लौट आते हैं। चलो इक गीत सुनते हैं वार्तालाप को विराम लगाते हैं।