Wednesday, 25 March 2020

कथाओं का आधुनिक स्वरूप ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  कथाओं का आधुनिक स्वरूप ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

हर सुबह आठ बजते टीवी चैनल पर कोई भविष्य बांचने आता है। हर दिन दावा करता है हम आपके साथ हैं उपाय बताते हैं आपका कुछ भी बुरा नहीं होने देंगे। फिर राशिफल बताते है किस का दिन सप्ताह महीना साल कैसा होने वाला है। आखिर में किसी राशि का जैकपॉट खोलने का दावा करते हैं और तमाम लोग उनकी बात पर भरोसा करते हैं ये उनको चिट्ठियां मिलती रहती हैं। इसके बावजूद कोई भी नज़र नहीं आता जिसको कोई समस्या नहीं हो या उनकी सलाह से सब वास्तव में अच्छा हो गया हो। इक और हैं जो जाने क्या सोचकर जब भी कुछ कहना हो शाम को आठ बजे का समय चुनते हैं कोई राज़ छिपा हो सकता है। कई लोग घबराते हैं अबकी बार जाने क्या दूर की कौड़ी लाये हैं।

कड़ियां जोड़ना दर्शकों का काम है उनका काम ठीक समय पर हर बार नये विषय किरदार की बात निदेशक बन कर समझाना है। ये लगता है देश की सरकार और राज्यों की सरकारें सागर मंथन कर अमृत कलश की खोज करना चाहते हैं। पौराणिक कथा में पहाड़ की शिला को मथनी बनाकर देवताओं दानवों ने रस्साकशी की थी अब देश की जनता को मथनी बनाने को जकड़ा गया है और लोग खुश हैं कि उनकी सुरक्षा और भलाई को जो भी संभव है किया जा रहा है। कहने को सबको घर की लक्ष्मण रेखा में रहना है सीता माता की तरह बाहर निकलने की गलती की तो रावण जैसा कोई दैत्य गंभीर रोग का भेस धारण कर प्राण को हर ले जाएगा। जैसे कभी महिलाओं को घर की चौखट नहीं लंगने की बात समझाई जाती थी यहां तुम सुरक्षित हो। ये प्यार की रिश्तों की जंजीर पहन कर महिलाएं अपना शृंगार समझती थी। शायद सबको यकीन है इस बार बच गए तो अमर हो जाएंगे और वो सब पुरानी बातें झूठी साबित हो जाएंगी कि जब जैसे जिसकी मौत आनी है टाली नहीं जा सकती और यमराज आपको हज़ार तालों में बंद होने पर भी खोज ही लेगा।

अभी तक कोई डॉक्टर आदमी में आत्मा को तलाश नहीं कर सका है अन्यथा अगर कोई आधुनिक उपकरण ये दिखलाता कि किस किस की अंतरात्मा मर चुकी है और वो ज़िंदा होकर भी ज़िंदगी से अनजान हैं। अपनी अपनी लाश का बोझ उठाए मौत का इंतज़ार करते हैं। गीता में क्या लिखा हुआ है अब किसी को याद नहीं अर्जुन को उपदेश देते हैं कृष्ण हथियार उठाओ जिनको मारने से तुम डरते हो उनको काल के मुंह में जाना ही है तुम सिर्फ माध्यम बनते हो और शरीर मरता है आत्मा जन्म लेती है जैसी जाने कितनी बातें आखिर कायरता और मोह छोड़ युद्ध करने को तैयार कर लेती हैं। अच्छे वक्ता अपनी वाणी और चतुराई से हर किसी को मोहित कर सकते हैं तभी कौरव पांडव दोनों पक्ष कृष्ण को अपना मानते हैं। कृष्ण वो शासक है जो खुद पांडवों की तरफ है और अपनी सेना कौरवों को देते हैं , इक कवि की कविता में राधा सवाल करती है कान्हा तुम अपनी सेना जो आपकी जनता थी जिसकी सुरक्षा करना आपका फ़र्ज़ था उसको अर्जुन के तीरों से कैसे मरने देते रहे। शासक बनकर लोग कितने भी समझदार हों निष्ठुर बन जाते हैं।

सागर मंथन से अमृत ही निकलेगा या विष भी निकल सकता है। और अगर विष मिलेगा तो कौन है जो शिव बनकर हालाहल पी नीलकंठ बन सकता है। सत्ता का अमृत कलश सभी की चाहत है मगर अब कोई सच झूठ को परखने की चर्चा करता है तो सभी उसको जाने क्या क्या कहने लगते हैं। विदुर जैसा महात्मा इस कलयुग में कोई नहीं है। सच तो ये है कि आजकल जितने भी नायकत्व के किरदार वाले हैं सब नकली हैं असली रामायण गीता के किरदार कहीं नहीं हैं।

यमराज अपने बॉस भगवान के पास आये हैं सूचित किया है भारत सहित कई देश लॉकडाउन की घोषणा कर रहे हैं। भगवान नहीं समझे यमराज को इन बातों से क्या मतलब है। यमराज ने कहा क्यों नहीं आप मुझे भी भारत की सरकार की तरह तीन सप्ताह घर पर बैठने की अनुमति दे दें। मेरा भैंसा भी कभी तो आराम करने का हकदार है। भगवान ने कहा भला जन्म मृत्यु पर भी कोई बंदिश लगती है कभी। दुनिया में जीवन मृत्यु को कभी विराम नहीं मिल सकता है। आप तो जाते रहते हैं भारत की सरकार ने सबको घरों में रहने को आदेश दे तो दिया है मगर क्या हर नागरिक को घर मिला हुआ भी है। लोग बाहर नहीं निकलेंगे तो क्या इतने दिन कोई भी मरेगा नहीं ये नहीं जानते जन्म मरण उनकी मर्ज़ी से नहीं हो सकता है। मौत को जिसे जैसे अपनी आगोश में भरना है घर बैठे भी मुमकिन है ऊंचे महल की दीवारें भी किसी को मरने से बचा नहीं सकती हैं। आपको कोई टारगेट नहीं दिया जाता विधाता को केवल संतुलन कायम रखना होता है , जन्म लेते रहे और मौत नहीं होगी तो दुनिया की मुश्किल और बढ़ जाएगी। यमराज बोले अभी मैं इक सज्जन पुरुष को लाने गया था मुझे देख कर बोलने लगा कि जब तक लॉक डाउन है मुझे रहने दो अन्यथा मेरी अर्थी को उठाने कांधा देने कौन आएगा। किसी ईश्वरभक्त की ये दशा हो ये तो मुझे उचित नहीं लगा और मैंने उसे कुछ दिन की मोहलत अपने विशेषाधिकार उपयोग कर दे दी है।

भगवान ने अपने चक्षु बंद किये विचारमग्न होकर समस्या को समझा , फिर बोले ये बताओ अगर भारत में किसी वीवीआईपी का अंत आने वाला हो क्या तब भी ये सब नियम लागू रहेंगे। यमराज बोले भला ये भी कोई पूछने वाली बात है इस देश में खास लोगों की खातिर सब बदल जाता है। अभी देखा अमेरिका के सरकार आये तो मीलों लंबी दीवार बनाई गई गरीब बेघर बस्ती वालों को छुपाने को। ऐसे लाखों करोड़ बर्बाद करते हैं आडंबर और तमाशाओं पर उतने से कितने बेघर को घर भूखों को रोटी और रोगिओं को अस्पताल मिल सकते थे। सच तो ये है कि आज तक किसी रोग महामारी क्या दुर्घटना हादिसे से इतने लोग नहीं असमय मरे हैं जितने इन राजनेताओं और बड़े बड़े अतिविशिष्ट लोगों के सही आचरण नहीं करने और लापरवाही और मनमानी तथा अमानवीय कर्मों से मरते हैं जिनका दोष कभी कुदरत कभी भाग्य कभी विधाता को देने की बात की जाती है। भगवान ने चित्रगुप्त से जन्म मृत्यु का आंकड़ा पूछा तो उन्होंने बताया कि जैसा हमेशा से था उसी तरह सब सामान्य है अब मौत के कारण समय समय पर इंसानी फितरत को देख बदलते रहते हैं। समस्या विकट है जिनकी बारी है उनको मरना मंज़ूर नहीं मगर जिनको अभी जीना है वो खुद अपनी जान देने को व्याकुल हैं ऐसे में सरकार को कुछ नहीं सूझता क्या समस्या है और उपाय क्या है। सरकारों को जब जो करना होता है करती नहीं बाद में पछताती हैं मगर यमराज बोले हमको जो करना है किसी सरकारी आदेश से क्या रोक सकते हैं।

   कोई दार्शनिक चिंतित है कि जैसे पंछी जानवर पिंजरे में रहने के आदी हो जाते हैं तो उनको खुली हवा में आज़ाद होना घबराहट पैदा करता है। कहीं घर में बंद रहने की आदत बन गई तो हर शहर गांव गांव इक ख़ामोशी नहीं छाई रहने लग जाए। 

Tuesday, 24 March 2020

मौत से डर के जीना छोड़ दोगे ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

   मौत से डर के जीना छोड़ दोगे ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

शीर्षक से समझ सकते हैं " करो- ना " का उल्टा है ना करो। कुछ भी नहीं करना घर बैठ चिंतन करना है। इसी को कहते हैं जब किसी का वक़्त आता है तो हर तरफ उसकी धूम मची होती है। अब लग रहा है दिल के रोग कैंसर का रोग किडनी का डॉयबिटीज़ का जिगर का शरीर के हज़ारों रोगों का नाम निशान बाकी नहीं है। कोई किसी और रोग से मरने से नहीं घबराता बस इक रोग की दहशत है हर कोई उस से बचना चाहता है। गब्बर सिंह का रुतबा पचास कोस तक था लादेन का कुछ देशों तक मगर इन का भय उन देशों तक को है जिन्होंने दुनिया को अपनी ताकत से डराने और अपने आधीन करने के मनसूबे पाल रखे थे। हर सेर को सवा सेर मिलता है ये शाश्वत सत्य है। 

कहीं बैठा कोई किसी को अपनी वास्तविकता बता रहा है। आज मेरा समय है मगर मुझे भी खबर है मेरा भी अंत इक दिन होना है अहंकार करने वालों का अंजाम यही होता है। लोग गीता रामायण बाईबल कुरान गुरुग्रंथ साहिब को भूलकर जाने किस किस को सुबह शाम रटने लगे थे। भगवान से मंदिर मस्जिद बड़े लगने लगे थे और हर किसी ने कितने लोगों को इन सभी से बढ़कर समझ लिया था। किसी को कोई साधु किसी को कोई अभिनेता किसी को कोई खिलाड़ी किसी को कोई राजनेता किसी को कोई योगी किसी को कोई झूठ का कारोबारी किसी को दुनिया का सबसे अमीर उद्योगपति अपना आदर्श लगता था। अब इन सभी से किसी को कोई उम्मीद नहीं रही कि हमको बचा लेगा क्योंकि ये सभी तथाकथित ऊंचे रुतबे वाले खुद ही बहुत बौने साबित हो गए हैं। हम हैं ना अब इनसे कोई भी आपको ये दिलासा नहीं देने वाला। हर किसी को अपनी जान की पड़ी है भाई जान है तो जहान है। 

कल इक दोस्त ने चार शब्द लिखे थे अपनी फेसबुक पोस्ट पर। " प्यास लगी है , चलो कुंआं खोदें ''। बात नई नहीं है हमने यही ही नहीं किया बल्कि हम तो उल्टा करते रहे हैं। ये मेरा पानी ये मेरी नदी ये धरती मेरी है सब अपने खातिर मानवता को दरकिनार कर अब खामोश हैं सभी आपसी मतभेद भूलकर अपनी अपनी जान को लेकर चिंतित हैं। उधर जितने भी बाकी रोग हैं खिलखिला रहे हैं जैसे राजनेताओं को किसी अदालत ने बेगुनाह करार दे दिया हो। अब सारे इल्ज़ाम उसी एक के सर जाने हैं अभी तक जितने लोग उन रोगों से मरे उनकी मौत स्वाभाविक समझी जानी चाहिए क्योंकि इक इस रोग को छोड़ कोई और रोग कभी था ही नहीं तभी हर देश और सरकारी स्वास्थ्य विभाग से विश्व स्वास्थ्य संगठन तक इक इसी को लेकर चिंतित हैं। कितने झगड़े कितनी नफ़रतें जो नहीं कर सके इक बिमारी ने कर दिखाया है।

               आप क्या हैं कोई दानव हैं राक्षस हैं या कोई अवतार देवी देवता क्या हैं। जवाब मिला देखो आपकी यही गलती है हर बात को किसी अंधविश्वास से मिलाने लगते हैं। अब भले कोई मुझे गाली दे या मेरी बढ़ाई करने की बात मूर्खता होगी। कोई अब भी मुझे अपना कारोबार बना सकता है मगर ऐसा कर मुझसे बच नहीं सकता है। मुझे किसी ईश्वर ने नहीं भेजा बनाया ये यहीं के दुनिया वालों की देन है। कितने नासमझ इंसान हैं विनाश के हथियार बनाने पर अपनी ताकत दिखलाने पर धन समय ऊर्जा संसाधन बर्बाद करते रहे और चांद से लेकर मंगल तक की बात की मगर वास्तविक मानवता का मंगल और उजाले की चिंता ही नहीं की अन्यथा कुदरत ने इतना सब दिया था जिस से दुनिया में सभी की सब ज़रूरत पूरी की जा सकती थी। अभी भी जाने कितने देश और लोग विचार कर रहे हैं कि हम बच गए तो मेरा उपयोग धंधा बढ़ाने में करना है। ये आपकी दुनिया खुद ही मौत की सौदागर है मौत को इतना बड़ा कारोबार बना दिया है। आदमी की ज़िंदगी की कीमत समझते कहां हैं , ये जिन्होंने देश दुनिया को इंसान के लिए सुरक्षित बनाने का काम करना था उन्हीं लोगों ने इंसानियत और कुदरत से खिलवाड़ किया है और नतीजा सामने है।

मैं इनको क्या सिखला सकता हूं जब गांधी नानक कबीर और तमाम महान आत्माओं को इन्होने दिखावे और आडंबर का माध्यम बना लिया है उनकी विचारधारा की धज्जियां उड़ाई हैं। गांधी जी की सादगी और नानक कबीर जैसे संतों की क्या गीता रामायण तक को समझने नहीं अपने अपने हित साधने स्वार्थ पूरे करने को दुरूपयोग किया जाता रहा है। पाप अधर्म का फल कड़वा ही होना था मगर लोग भूल गए हैं कि ऊपर वाले की लाठी आवाज़ नहीं करती। अपने बबूल बोये हैं तो कांटें भी मिलने हैं आम कैसे मिलते। अभी भी सही मार्ग पर चलकर अपने इंसानों की स्वास्थ्य शिक्षा और सभी की बुनियादी ज़रूरतों को ध्यान रखते हुए धन संसाधनों का सदुपयोग करें। अस्पताल स्कूल शिक्षा के मंदिर विद्यालय निर्मित करें सच्चा धर्म और ईश्वर की अर्चना दीन दुखियों के दर्द दूर करने को कहते हैं। समाज को अपनी मानसिकता को स्वस्थ बना लेंगे तो किसी भी अनहोनी से घबराने की ज़रूरत नहीं होगी। रोग पाप अन्याय से लड़ने को सत्य और ईमानदारी के मार्ग पर निस्वार्थ कर्म करने की ज़रूरत होती है। खाली बातों से कुछ भी हासिल नहीं होता है। जब तक ज़िंदगी है ज़िंदादिली से जीना सीखो मरना होगा तो मर ही जाना है। कुछ गीत कुछ बोल जीवन के आखिर में दोहराता हूं।

जीने का अगर अंदाज़ आए तो बड़ी हंसी है ये ज़िंदगी , मरने के लिए जीना है अगर तो कुछ भी नहीं है ये ज़िंदगी। अभी तो जीने का हौंसला कर लें जब आएगी मौत तो उसका भी स्वागत करेंगे। घबराने की कोई बात नहीं है इस दुनिया में कोई बचकर नहीं रहा। सब चले गए हमको भी जाना ही है। मौत से डर डर कर जीये तो जीये क्या ख़ाक। अब जीने सीख लें हम सभी मौत से सामना करने से पहले। मौत है इक लफ्ज़ ए बेमानी , जिसको मारा हयात ने मारा।  शायर कहता है गलत तो नहीं है। हमने जीना सीखा ही नहीं। सोचो कितने उपदेश देते रहे हर किसी को अनमोल वचन संदेश भेजते रहे। बस फिर से उनको याद करें और समझें तो बात आसान हो जाएगी।

अपने लिए जिए तो क्या जिए तू जी ऐ दिल ज़माने के लिए।
बुझते दिए जलाने के लिए तू जी ऐ दिल ज़माने के लिए।

अब छोड़ो ये लफड़ा कब कौन कैसे उठेगा। सफर फिल्म का डायलॉग है हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ है कब कौन कैसे उठेगा कोई नहीं जानता। जीना सार्थक है अगर कुछ भी अच्छा कर जाओ। बीती जो बेकार थी जितनी बाक़ी है उसको कुछ अच्छा करने में लगाएं तो ज़िंदगी का मकसद होगा। सौ साल जीना ज़रूरी नहीं है जितना भी है उसको भरपूर जीना है तो अपने नहीं औरों के लिए जिओ।

Monday, 23 March 2020

अब तो जागो भारतवासियो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   अब तो जागो भारतवासियो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 


ये आलोचना की बात नहीं है आत्मावलोकन की घड़ी है। जब अन्य देश भयानक स्वास्थ्य समस्या से मुकाबला करने को नये अस्पताल बनाने  और उपचार के ढंग और खोज जांच की बात करते हैं हमारे देश का सबसे बड़ा अस्पताल अपनी ओ पी डी बंद करने का निर्णय करता है। बड़े बड़े दावे खोखले साबित हुए हैं तमाम सरकारों के आम नागरिक को उचित स्वास्थ्य सेवाओं के उपलब्ध करवाने के। पिछले कई सालों से हर सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी ज़रूरी बुनियादी साहूलियत को निजि नर्सिंग होम या बड़े बड़े अस्पतालों के भरोसे छोड़ दिया है जो कम से कम देश की आधी आबादी के लिए असंभव है बेतहाशा खर्च कर हासिल करना।

हमने भी पुरानी चली आ रही धार्मिक निशुल्क चिकित्सालय या स्कूल बनाने को छोड़ अन्य तरह से धार्मिक आयोजनों पर पैसा खर्च करने का काम किया है। बड़े बड़े उद्योगपति भी अब अस्पताल या स्कूल कॉलेज गरीब नागरिकों के लिए नहीं बनाते अगर बनाते हैं तो किसी कारोबार की तरह। सबसे आपत्तिजनक बात है देश की जनता का धन और संसाधन हर देश की सरकार और राज्यों की सरकारों ने व्यर्थ के आयोजनों और अपनी महत्वांक्षाओं की पूर्ति और आडंबर अपनी शोहरत गुणगान करने पर बर्बाद कर मानवता के विरुद्ध इक अपराध किया है। जैसे हर दिन इक इक राजनेता और आलाधिकारी से तमाम पदों पर बैठे लोगों ने अपने सुख सुविधा और ऐशो आराम पर लाखों करोड़ों बर्बाद करने को अपना अधिकार समझ लिया है इस गरीबी भूख से पीड़ित देश में देशसेवा के नाम पर लूट ही है।

इनके देश विदेश के अनावश्यक सैर सपाटे और सांसदों विधायकों को मिलने वाली लाखों की राशि देख लगता है जैसे सरकार और अधिकारी वर्ग सफेद हाथी की तरह हैं। टीवी मीडिया जो कहने को बड़ी बड़ी बातें करते हैं वास्तव में देश में चलते आये सबसे बड़े घोटाले के भागीदार हैं। सरकारी विज्ञापन के नाम पर हर दिन करोड़ों रूपये ऐसे विज्ञापनों पर सरकार के तमाम विभाग खर्च नहीं फज़ूल उड़ाने का काम करते हैं।
काश ये सारा धन स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने पर खर्च किया जाता तो आज हम इस कदर बेबस नहीं होते। आज हम सभी को घर पर रहने को कहने वाले खुद किसी राज्य में अपनी सरकार बनाने को जमा होने वाले हैं। ऐसे में उनसे संवेदशीलता की उम्मीद क्या की जाए।

हम सभी को मिलकर भविष्य में अन्य धार्मिक कर्मकांड या आयोजन की जगह सार्वजनिक स्वस्थ्य सेवाओं और शिक्षा की तरफ ध्यान देना चाहिए। किसी धार्मिक स्थल पर चढ़ावे की जगह अपना वही धन अच्छे उदेश्य की खातिर देने का चलन फिर से शुरू करना चाहिए।

Sunday, 22 March 2020

हादिसों की अब आदत हो गई है ( हाल-ए-गुलिसतां ) डॉ लोक सेतिया

   हादिसों की अब आदत हो गई है ( हाल-ए-गुलिसतां ) 

                                     डॉ लोक सेतिया  

 सच से भागना संभव नहीं है भले आपको सच सुनना अच्छा नहीं लगता है। जब कोई मुसीबत सामने खड़ी हुई तब समझ नहीं आया सामना कैसे करें। अब लोग या तो उपदेश देते हैं ये करना ज़रूरी है या फिर अपनी मूर्खता का सबूत देते हुए चुटकले बनाते हैं। गंभीर समस्या पर गंभीरता से चिंतन नहीं करते हम लोग। चलो जो हुआ अब कोई सबक तो समझ सकते हैं क्योंकि हर घटना आपको सबक सिखाती है। सरकार ने कहा लोग घर से बाहर नहीं जाएं अपना बचाव सबका बचाव करना है , चलो माना ये करने से कुछ तो बचाव शायद मुमकिन हो मगर कितना और कब तक कोई नहीं जानता। आधुनिक उपचार निदान के समय हम ये कहां खड़े हैं। मगर सवाल करना लगता है आलोचना है जबकि कमियां निकालना और वास्तविकता से नज़र मिलाने की बात करना दो अलग बातें हैं। 

विचार करो क्या सबक मिल रहा है। सच ये है कि चांद पर जाने एटम बंब बनाने सबसे ऊंची मूर्ति बनाने की बातें करने वाली सरकार ने देश की वास्तविक समस्याओं की अनदेखी की है उपचार क्या जांच की भी सुविधा उपलब्ध नहीं है। जब समस्या खड़ी तब उपाय सूझता नहीं तब शोर मचाने जैसे काम किये जाते हैं। अभी खबर दिन भर सुनते रहे किसी फ़िल्मी गायिका की लापारवाही के आचरण की और हर कोई उसको दोष देता रहा मगर क्या हम सब भी अपना फ़र्ज़ निभाते हैं जब भी कोई बात हो अपने बारे सच जाकर बताते हैं और अपने कारोबार को छोड़कर सबकी भलाई की बात करते हैं। वास्तव में अधिकतर लोग यही किया करते हैं सच बताने से घबराते हैं। कितने लोग जब पता चला जांच करवाने की जगह शहर छोड़ भाग गए। 

इक और बात समझना ज़रूरी है। भगवान को लेकर कोई गलतफ़हमी मत रखना सब कुछ उसकी इच्छा से नहीं होता है हमने अपनी दुनिया को कितना बर्बाद किया है और जो जो भी अनुचित करते हैं उसका दोष किसी और पर नहीं दिया जा सकता है। अपने मतलब स्वार्थ को अंधे होकर हम कितना खिलवाड़ कुदरत से करते हैं। अब जब मंदिर मस्जिद धार्मिक स्थल वाले उनको बंद कर रहे हैं तब भी आपको समझ नहीं आया कि इन जगह वास्तव में कोई भगवान आपको क्या खुद को भी नहीं बचाने वाला। विश्वास के नाम पर आपकी भावनाओं का दोहन किया जाता है , कितना अंबार धन आदि जमा करना धर्म उचित ठहराता है , कदापि नहीं। यही जन कल्याण पर खर्च करते तो सच्चा धर्म हो सकता था। 

टीवी चैनल वाले खुद अपने पर कोई नियम नहीं मानते हैं। विज्ञापन के जाल में आपको फंसाते हैं अपनी पीठ थपथपाते हैं जबकि अपना कर्तव्य नहीं बिभाते निष्पक्षता से और टीआरपी और कमाई की खातिर अंधे हुए हुए हैं। राजनेताओं को अपने आप पर रोज़ लाखों करोड़ ऐशो आराम पर खर्च करते लज्जा नहीं आती है। हर दिन बेशर्मी से कोई कहता है देश जनता की सेवा नहीं कर सकता बिना संसद या कोई पद मिले इसलिए इस दल से उस दल में जा रहा हूं , क्या ऐसे स्वार्थी मतलबी लोग किसी की भलाई कर सकते हैं। और राजनीति के इस हम्माम में सभी नंगे हैं। टीवी चैनल वाले आज भी उसी से करोना पर चर्चा कर रहे हैं जिसका अनुभव केवल सब कुछ बेचकर मुनाफा कमाकर भी महानता का दावा करना है। उसकी शिक्षा जानकारी से नहीं इन को मतलब है उसके विज्ञापन से मिलने वाली राशि से। मामला चोर चोर मौसेरे भाई वाला है। हद है कि ये भी उसको अवसर लगता है अपने धंधे को लेकर। 

ध्यान से देखें तो पिछले सालों में धर्म राजनीती और खबर वालों टीवी अख़बार वालों का नैतिक पतन सबसे बढ़कर हुआ है। राजनेताओं की कठपुतलियां बनकर अधिकारी और अन्य संस्थानों में नियुक्त लोग देश से धोखा करते हुए शर्मसार नहीं हैं। ये सब अपना कर्तव्य नहीं समझते निभाने की तो बात क्या करें मगर आपको आम नागरिक को आदेश उपदेश देते हैं और फिर भी उनकी नहीं मानो तो कानून की लाठी न्याय नहीं अत्याचार करने को तैयार है व्याकुल है। 

कल ये भी बीत जाएगा और सब सामान्य हो जाएगा मगर क्या हम इन से कोई सबक भविष्य को बेहतर बनाने को लेते हैं या नहीं ये हम पर निर्भर है।

पिंजरा कैद बंधन और हम ( समाज और सुरक्षा ) डॉ लोक सेतिया

  पिंजरा कैद बंधन और हम ( समाज और सुरक्षा ) डॉ लोक सेतिया 

पहले कुछ गीत याद करते हैं। पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय। चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना। पंछी से छुड़ा कर उसका घर तुम अपने घर में ले आये , ये प्यार का पिंजरा मन भाया हम जी भर के मुस्काए , जब प्यार हुए इस पिंजरे से तुम कहने लगे आज़ाद रहो। हम कैसे भुलाएं प्यार तेरा तुम अपनी ज़ुबां से ये तो कहो। तोड़ के पिंजरा इक दिन पंछी तो उड़ जाना है। कोई गिनती नहीं है और ये भी सच है हम सभी खुद अपने बनाए पिंजरे में बंद हैं निकलते ही नहीं अपनी कैद से। मेरी इक कविता है। 

कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कब से जाने बंद हूं
एक कैद में मैं
छटपटा रहा हूँ
रिहाई के लिये।

रोक लेता है हर बार मुझे 
एक अनजाना सा डर
लगता है कि जैसे 
इक  सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये।

मगर जीने के लिए
निकलना ही होगा
कभी न कभी किसी तरह
अपनी कैद से मुझको।

कर पाता नहीं
लाख चाह कर भी
बाहर निकलने का
कोई भी मैं जतन ।

देखता रहता हूं 
मैं केवल सपने
कि आएगा कभी मसीहा
कोई मुझे मुक्त कराने  ,
खुद अपनी ही कैद से।


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आज हमने किसी के कहने पर खुद को घर में कैद रखना चुना है। सुरक्षा की खातिर। सच तो ये भी है कि शायद भगवान भी चाहता होगा इंसान की बनाई ऊंची ऊंची इमारतों की कैद से मुक्त होना। ये जाने कैसे आस्तिक उसको मानने वाले हैं जिन्होंने उसे भी अपने तालों में कैदी बना रखा है। कितना बड़ा मज़ाक है जिसके लिए भरोसा है सबको दुनिया को बनाया है मिटाता है उसको आपके सहारे की ज़रूरत है घर बनवाने को रहने को। भगवान को दाता नहीं बेबस भिखारी बना दिया है। कब किसी भी धर्म के ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु यीशु मसीह ने कहा मुझे आलीशान महल चाहिए चढ़ावे में पैसा हीरे मोती जवाहरात चाहिए , शानदार पोशाक चाहिए।

अभी भी आपको धर्म भगवान के नाम पर कुछ करना है तो समझो वास्तविक सच्चा धर्म क्या चाहेगा। किसी भूखे को खाना किसी गरीब को आसरा किसी बेघर को घर रोगियों के लिए अस्पताल बच्चों के लिए स्कूल कॉलेज और उनको वास्तविक जीवन का ज्ञान देना। अंधविश्वास और भेदभाव का अंत करने का संकल्प। अब ये भी समझ लेना चाहिए कि क्या करना अधर्म है। अपना काम ईमानदारी से नहीं करना अधर्म है। शिक्षा स्वास्थ्य जनसेवा राजनीति निजी कारोबार को बेतहाशा धन कमाने का साधन बनाना भी अधर्म है। व्यौपार और लूट में यही अंतर है सही कारोबार उतना मुनाफा लेना जिस से आपका गुज़र बसर हो सके को कहते हैं मगर अपने लिए तमाम साधन और सुख सुविधाओं को हासिल करने को व्यवसाय में मनमाने ढंग से और उचित अनुचित की परवाह नहीं करते हुए धन कमाना अधर्म है। धर्म सबको सब कुछ मिलने का मार्ग है जब लोग अपने पास बहुत अधिक जमा करते हैं तब धर्म की बात कहना आडंबर भी है और छल कपट अधर्म भी।

इक तरफ मानते हैं जीना झूठ है मरना शाश्वत सत्य है दूसरी तरफ जीने को इतना सामान जमा करते हैं जैसे सब सुख साथ लेकर जाना है। विचार करें तो लगता है हम भगवान को धोखा देते हैं ये समझते हैं कि चाहे कुछ भी करते हैं पूजा अर्चना ईबादत और स्तुति चढ़ावे से उसको बहला लेंगे। ये समझदारी है या अज्ञानता है शायद इस से अच्छा होता हम ईश्वर को नहीं मानते नास्तिक ही होते मगर इंसान और इंसानियत को समझते। वास्तविकता में हम जिस पिंजरे में बंद हैं और खुद ही कैदी बने हैं वो पिंजरा है हमारे स्वार्थों और खुदगर्ज़ी के जाल का बुना हुआ पिंजरा। उसे तोडना है और फैंकना है किसी गहरी खाई में इस कथा के अनुसार।

साधु और पिंजरे में बंद पक्षी ( बोध कथा )

 पहाड़ों पर सैर करते इक साधु को घाटी में कहीं दूर से आवाज़ सुनाई दी मुझे आज़ाद करो। ढूंढते हुए उसको इक पक्षी पिंजरे में बैठा ऐसा कहता मिला। मगर पिंजरा तो खुला था बंद नहीं फिर भी साधु ने भीतर हाथ डालकर उसको बाहर निकाला और आसमान में उड़ने को छोड़ दिया। अगली सुबह फिर साधु को वही आवाज़ सुनाई दी और जाकर देखा तो पाया कि पक्षी वापस उसी पिंजरे में चला आया है। उसकी आदत बन गई थी आज़ाद होने को कहना मगर खुद ही कैद होकर रहना। अब साधु ने उस पक्षी को निकाला उड़ाया और फिर उस पिंजरे को उठाकर बहते पानी में गहराई में फेंक दिया। इस तरह उसके लिए पिंजरा ही नहीं रहा वापस आने को। लेकिन आजकल जो संत साधु मिलते हैं उनके पास हमारे लिए पिंजरे हैं वो कभी हमें सही दिशा नहीं समझाने वाले। अपने विवेक से हमने ही अपने आप को स्वार्थ और खुदगर्ज़ी के पिंजरे से मुक्त करना है। घर बैठे चिंतन कर सकते हैं क्योंकि जब आपको बाहर नहीं जाना तभी अपने भीतर जाने का समय होता है।

Wednesday, 4 March 2020

महिला दिवस पर इक नारी की बात ( विचारणीय ) डॉ लोक सेतिया

महिला दिवस पर इक नारी की बात ( विचारणीय ) डॉ लोक सेतिया 

मुझे पिता से पति से बराबरी करने की ज़रूरत नहीं है। जैसे कोई नदी अपने दो तटबंधों के बीच बहती है और अपने आस पास की दुनिया को बनाती संवारती रहती है। तटबंध उसको रोकते नहीं आगे बढ़ने से बांधे रखते हैं पानी को किनारे तोड़ कर बाढ़ होने नहीं देते। आधुनिक महिला को अपना बदन ढकना उचित नहीं लगता है क्योंकि उसको नहीं मालूम उसकी नग्नता जिनको पसंद है उनकी नज़र में महिला कोई इंसान नहीं इक सामान है नुमाईश का औरों के दिल बहलाने को सजना और अपने खुद के लिए संवरना दो अलग बातें हैं। महिला कम नहीं किसी से नासमझ भी नहीं है फिर भी जो किसी को चाहता है उस पुरुष भाई पिता पति या कोई दोस्त भी सखी भी हो सकती है अगर देश समाज की कड़वी वास्तविकता को जानकर किसी को उसी की सुरक्षा की खातिर संभलने को कहता है तो ये समझना किसी को क्या अधिकार है आदेश उपदेश देने का तो विचार करना होगा अपना अहम बड़ा है कि सुरक्षा और आदर की खातिर सलाह पर ध्यान देना। 

जैसे महिलाओं की भावनाओं को महिला समझती है जिस तरह पुरुष शायद नहीं ठीक उसी तरह पुरुष भी अपने पुरुषवादी समाज को हमसे बेहतर जानते समझते हैं। ये हम स्वीकार करें चाहे नहीं करें नारी कोमल मन और भावनाओं से कुदरत की रची रचना है जबकि पुरुष सवभाव से कठोर और मन से काम वासना के अधीन भीतर से किसी शिकारी की तरह है और अधिकांश पुरुष अपनी घर की महिलाओं को छोड़ बाकी को बस इक औरत ही समझते हैं और हर कोई खूबसूरत महिला को हासिल करना चाहता है। महिलाओं को अपने सजने संवरने और पुरुष से महंगे उपहार की चाहत रखने ने खुद उसी को छोटा बनाया है क्योंकि हर उपहार देने वाला खुद को बड़ा और अधिकारी होने का भाव रखता है। महिला कमज़ोर नहीं होती है उसकी इच्छाएं ही उसको कमज़ोर बनाती हैं। जब महिला उम्मीद रखती है पिता भाई पुरुष उसको आगे बढ़ने को सहायक हों तब उसे स्वीकार करना होगा खुद अपने लिए समाज से समानता हासिल करना कठिन है असंभव नहीं। और वास्तव में उन्हीं महिलाओं ने अपने समाज को दिशा दिखाई है जो बिना कोई समझौता किये अपने मकसद पाने की राह पर चलती रही हैं। जो बंधन सामाजिक ताने बाने को मधुरता बनाये रखने को हैं उनको निभाना कोई खराब बात नहीं है। 

बेशक समाज की कुत्सित सोच को बदलना चाहिए मगर नारी को ये अपनी अस्मिता खोकर नहीं कायम रखते हुए करना है। अपने बेटे-बेटी को उचित समझ और शिक्षा देकर खुद अपनी न सही अपनी आगे की आने वाली पीढ़ियों को इक अच्छा और सुरक्षित समाज देने में योगदान दे सकती हैं। सिर्फ अपने लिए अधिकार और समानता हासिल करना कोई महान उद्देश्य नहीं हो सकता है। आप शिक्षित हैं स्वालंबी हैं तो उन महिलाओं को आगे बढ़ाने को साथ दे सकती हैं जिनको अपनी शक्ति और स्वाभिमान को समझना अभी बाकी है। मगर जब महिला दिवस मनाने वाली महिलाएं अपने घर या पार्टी में कामकाजी महिलाओं को अपने से कम समझती हैं और उनको भी महिला दिवस में शामिल नहीं करती उनकी बातें भाषण व्यर्थ हैं केवल आडंबर हैं। क्या इस 8 मार्च को अपनी महिला कर्मचारी को छुट्टी देकर महिला दिवस की शुरुआत कर सकती हैं।

Tuesday, 3 March 2020

जाने वाले हो सके तो लौट कर आना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  जाने वाले हो सके तो लौट कर आना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

जनाब आली हज़ूर आपको कोई रोक नहीं सकता है। अपने ठान लिया जो भी कर के रहते हैं। सबको समझ आ गया है। आपको आपकी पत्नी नहीं रोक सकी थी और किसी का शासन आप पर क्या चलेगा। जाना है ख़ुशी से जाओ और भी ग़म हैं ज़माने में सोशल मीडिया ट्विटर फेसबुक इंस्टाग्राम व्हाट्सएप्प के सिवा। आपको जितना फायदा मिलना था मिल गया अब लगता है शायद नुकसान होता दिखाई दिया होगा। फिर भी बड़ी चहल पहल रौनक थी जाने कितने लोग तो आपने ही रख छोड़े थे गुणगान को उनको ये कमी खलनी लाज़मी है जब आप नहीं रहोगे सोशल मीडिया पर देखने को तब उनको कुछ भी पोस्ट करना किसी काम का नहीं लगेगा। अब अपने अपने दल या पद छोड़ने की बात कही होती तो चाटुकार लोगों को अवसर मिलता आपके समर्थन में भीड़ लेकर नारे लगाकर अपने नंबर बढ़ाने को। आपके दल के शासन वाले राज्यों से लोग आते आपको मनाने मगर जिनका ऐसा ख्वाब है कभी नहीं सच होने वाला। भला कुर्सी से कोई नेता कभी तंग आता है वास्तव में तो आपका ही करिश्मा है जो बड़े पद पर रहते इतना सोशल मीडिया पर रह सकते हैं। 

साफ बात तो ये है कि मुझे भी और तमाम लोगों को ये व्यर्थ की ऊर्जा और वक़्त की बर्बादी के इलावा कुछ भी नहीं है। मगर ये ऐसा नामुराद रोग है जिसका कोई उपचार नहीं आशिक़ी की तरह दर्द बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की। आपको इस से छुटकारा मिले तो लोग दोबारा कहेंगे आप हैं तो सब मुमकिन है। फिर भी मुझ जैसे जो आपके अथवा किसी के भी समर्थक या चाहने वाले नहीं हैं चाहेंगे आपके दर्शन सोशल मीडिया पर होते रहें तो खूब चर्चा को विषय उपलब्ध होते रहें। सत्ता का विरोध करने वाले लोगों को ऐसे आपका छोड़ कर जाना जैसे कुछ खालीपन दे जाएगा। ये मत समझना वास्तव में ऐसा करने से किसी को कोई फर्क पड़ेगा कुछ भी नहीं अंतर होता कोई रहता है या छोड़ जाता है बेचैनी उसी को होती है जो छोड़ता है मगर चैन नहीं आता जिस की आदत थी उसके बगैर।


Sunday, 1 March 2020

इस युग के शिक्षक फेसबुक व्हाट्सएप्प ( होली है ) डॉ लोक सेतिया

 इस युग के शिक्षक फेसबुक व्हाट्सएप्प ( होली है ) डॉ लोक सेतिया 

कथा का सार इतना है बिना देखे मिले अपनापन और दोस्ती संदेश से अचानक संबंध तोड़ने दरवाज़ा बंद करने अर्थात व्हाट्सएप्प फेसबुक मैसेंजर पर ब्लॉक करने तक का सफर। इन सब में छिपी हुई है अहंकार की भावना जो विचार विर्मश और आपस में शिष्ट वार्तालाप को जंग के अखाड़े में बदल देती है। अब कुछ घटनाओं की अनुभव की बात बिना किसी को दोष देते हुए कहना चाहता हूं। 

व्हाट्सएप्प ग्रुप में पहचान हुई संदेश आदान प्रदान के बाद व्हाट्सएप्प कॉल पर कहने लगे मिलना चाहिए। अगले दिन संदेश भेजा अगर समय है तो पास पार्क में मिलते हैं मगर जवाब नहीं मिला पता नहीं संदेश को बिना पढ़े ही डिलीट किया हो खैर। इक वीडियो भेजा जिस में साफ नहीं था कौन हैं और कब की बात है संदेश भेजा आपको पता है तो जानकारी देने का कार्य करें अच्छा होगा। कोई जवाब नहीं दिया ये भी नहीं बताया पता है या नहीं है। कल इक वीडियो आया तो लिखा जब तक सब जानकारी नहीं होती यकीन नहीं होता आपके भेजे वीडियो को फॉरवर्ड नहीं कर सकूंगा। नोटेड। संदेश इक शब्द का और ब्लॉक्ड। अब कौन उनको किस तरह समझाए कि जीवन भर लिखने से पहले सच को समझना पहचाना है अब कोई बात शेयर करने से पहले विचार करना होता है कि हज़ारों चाहने वाले पढ़ने वालों को भरोसा है ये ध्यान रखना महत्वपूर्ण होता है। हम लोग सोशल मीडिया पर रिश्ते बनाते हैं और उनको आपसी विश्वास के धागे से नहीं पिरोते हैं बड़ी कच्ची डोरी है ये आधुनिक इंटनेट और सॉफ्टवेयर ऐप्प्स वाली छूट जाती है बिखर जाती है। हम जानते हैं समझते नहीं पहचानना तो दूर की बात है। 

इक और सज्जन हैं सब जानते हैं समझाते हैं सबक सिखलाते हैं। बस अपनी बात से असहमत नहीं होने देते अन्यथा अंदाज़ बदल जाता है। कई संदेश कई वीडियो भेजते रहे अपने किसी गुरु के संबोधन वाले। मगर जब कोई गुरु अपने अनुयाइयों को अपने धर्म की अच्छी बातें समझाने उन पर अमल करने की सही दिशा दिखलाने की बात छोड़ इस पर उपदेश देने लगता है कि किसी और धर्म की क्या क्या बुराई है क्या खराब बात है कैसी शिक्षा देते हैं तब सोचना पड़ता है क्या आपके पास खुद अपने धर्म की अच्छाई बताने को कुछ नहीं जो उनकी बुराई बताकर अपने को अच्छा साबित करना पड़ रहा है। ऐसे बहुत लोग हैं जो व्यर्थ की सोशल मीडिया की बहस में आपसी नाते रिश्ते बर्बाद करने लगते हैं। 

मुझे हैरानी नहीं खेद हुआ जब देखा अपने करीबी किसी के बच्चे बड़े छोटे से वार्तालाप करने की मर्यादा की सीमा लांघ जाते हैं केवल किसी नेता के समर्थन या राजनीति की विचारधारा के मतभेद के कारण। उनका जन्म नहीं हुआ था जब से मैंने तमाम सरकारों नेताओं की आलोचना की है जनहित की खातिर मगर अपने देश की ऐतहासिक घटनाओं से अनजान ये चार किताबें पढ़ खुद को सब समझने जानने वाला कहते हैं। उनको बस वही मालूम है जो जोड़ तोड़ कर कुछ मतलबी लोगों ने अपने स्वार्थ की खातिर समझाया है। अब जब ऐसे लोगों की नफरतों का अंजाम सामने है तब भी क्या हम उनकी चालों को बांटने की राजनीति को समझ नहीं सकते। अब तो इन सब का अंत होना ही चाहिए।