Wednesday, 29 May 2019

मुझे अपना किरदार निभाना है ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

   मुझे अपना किरदार निभाना है ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

    मुझे अभिनय करना नहीं आता है सीखा नहीं सीखना चाहा भी नहीं। फिर किसी ने बहुत प्यार से आदर से अपनत्व से कहा अगले महीने कोई शाहकार बनाने लगा है उस में मेरी बड़ी भुमिका रखी है। दोस्त लोग बिना पूछे हक से विश्वास से निर्णय कर लेते हैं। उनको कैसे बताऊं आपकी अनुकंपा की ज़रूरत नहीं है। मैं 68 साल से अपना किरदार निभाता रहा हूं वही हूं वही रहना है कुछ और जो नहीं हूं उस किरदार को निभाना ही नहीं है। मैं अच्छा नहीं हूं जानता हूं सब लोग भी मानते हैं फिर झूठ मूठ नकली अच्छाई का अभिनय कर क्या होगा। जैसा हूं रहने दो मुझे बनना नहीं अच्छा उनकी तरह। उनको देखो कितना कमाल का अभिनय किया है सच्चे देशभक्त होने का और सब ने उनको सरपंच बना दिया है देश का। किसी ने सोचा ही नहीं ये अभिनय है या वास्तिवकता भी है इस किरदार में। कितने महान नायक फ़िल्मी नाटक में अभिनय करने वाले कमाल का अभिनय करते आये हैं मीनाकुमारी के आंसू असली निकलते थे ग्लिसरीन की ज़रूरत नहीं पड़ती थी मगर ये तो पल में तोला पल में माशा हैं भाई वाह क्या बात है। 

     आज उनकी नहीं किसी की भी नहीं बस अपनी खुद की बात कहनी है। कल कोई समझा रहा था उस से सबक सीखना चाहिए दस मिंट हंसना बीस मिंट मस्ती का संगीत सुनना सब थोड़ा थोड़ा तय वक़्त पर करना अच्छा होता है। कुछ मीठा थोड़ा नमकीन कुछ ठंडा कुछ गर्म बारी बारी मज़ा लेते हैं , हम ठहरे गांव के पले बड़े मिला तो जी भर खाया नहीं मिला तो राम नाम लेकर चादर ओढ़ ली सो गए। राशनिंग का हिसाब नहीं आता है। इक जूते की दुकान वाले ने समझाया ऊंची एड़ी का जूता खरीद कर पहन लो छोटा कद लंबा नज़र आता है। मुझे ऐसे ऊंचाई पाने से परहेज़ रहा है , कभी बचपन में सफ़ेद कमीज़ पायजामा डालता था दोस्त कहते क्या एक ही जोड़ा है बताता चार हैं मगर चरों सफ़ेद रंग के हैं। कॉलेज जाकर परेशानी हुई दो पैंट दो कमीज़ थी रोज़ धोनी पड़ती थी हॉस्टल में रहते खुद ही , उस पर ऊपर वाला हर दिन बारिश करवा देता था। हॉस्टल से कॉलेज की कच्ची सड़क पर छींटे पड़ ही जाते थे। तंग आकर सफ़ेद रंग को ही छोड़ दिया और रंगदार कपड़े सिलवाने लगा। किसी ने कहा चमकते काले रंग का सूट पहनोगे तो पतले लगा करोगे मगर बात जची नहीं खा पी कर मोटे बनकर अब पतले दिखाई देने का मतलब क्या है। कोई भूखे नंगे खानदान से हैं खाते पीते घर के हैं रंजो-ग़म से दूर हैं। नहीं ये फ़िल्मी बात है हम बिल्कुल नहीं मगरूर हैं। 

    लोग समझते नहीं हैरान होते हैं पढ़ाई डॉक्टर की की और काम लेखक का करते हो ये तो नामुमकिन को मुमकिन करना है। अब कोई नेता जी दावा करते हैं वो हैं तो सब मुमकिन है तो लोग तारीफ करते हैं मगर ज़रा भी नहीं विचार करते जो मुमकिन नहीं था उसका वादा किया अच्छे दिन का फिर उसको जुमला बता दिया और कहने लगे अच्छे वच्छे दिन कोई नहीं होते हैं भूत जैसी कल्पना की बात है। होनी को अनहोनी कर दे की बात है सब मुमकिन है मगर मुमकिन हुआ क्या कुछ भी नहीं। भटक गया अपनी बात करते करते सभी उसी की करने लगते हैं। मैंने अपना किरदार मर्ज़ी से नहीं चुना है तकदीर से मिला है अपना लिया है अब लोग कहते हैं आप ऐसे क्यों हैं। अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफर के हम हैं , रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं। इतनी बीत गई कितनी बाकी है ज़िंदगी अब बदलने को वक़्त बचा कहां है। या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो , मैं ग़म को ख़ुशी कैसे कह दूं जो कहते हैं उनको कहने दो। 

     याद आया जवानी की बात थी इतनी समझ कहां थी कहा था प्यार में , जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे , तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे। कब तक यही रस्म निभाई जा सकती है मुहब्बत में माना झूठ बोलना ज़रूरी है मगर दिन को रात कहने से रात होती तो नहीं। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है। माफ़ करना ज़माने वालो मुझे अपने बताए किरदार को निभाने की ज़िद न करो मुझे रहने दो मैं जैसा भी हूं। लोक सेतिया बहुत महनत से बना हूं अब बदलने की बात संभव नहीं है। क्षमा चाहता हूं अभिनय करना आता नहीं है जो हूं साफ सामने हूं रहने भी दो।

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