Monday, 22 April 2019

बंद आंखों से नज़र नहीं आएगा ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

    बंद आंखों से नज़र नहीं आएगा ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

    हम लोग सोचते हैं ईश्वर नज़र नहीं आता तो पता कैसे चले कि वास्तव में खुदा है या इंसान की कल्पना है। लोग किस किस की तलाश करते हैं आखिर ढूंढ लेते हैं। दुनिया बनाने वाला कोई तो होगा विचार आता है मगर आगे नहीं समझते या समझने की कोशिश करते। ईश्वर है और हर जगह है हमारे सामने है हम या देख पाते नहीं या पहचानते नहीं क्योंकि जैसा हमने सुना पढ़ा उस जैसा नहीं है जो सामने है। आपके सामने जो भी हो अगर आप अपनी आंखें बंद रखोगे तो दिखाई कैसे देगा। आपको दो आंखों का पता है तीसरी आंख भी होती है नहीं जानते , जानते हैं तो शिवजी की तीसरी आंख की बात। आपने देखा आंख पर पट्टी बांध कोई लिखा हुआ पढ़ दिखलाता है टीवी पर वैज्ञानिक के सामने करतब दिखलाया और गिन्नी वर्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।

  उसकी तरह हम भी तीसरी आंख खोल सकते हैं कोशिश अनुभव और लगन ज़रूरी है। दुनिया देखने को दो आंखें हैं मगर जिनकी नहीं होती उनको नज़र नहीं आने से दुनिया का होना झूठ नहीं हो सकता है। यही हम लोग करते हैं कि मुझे नज़र नहीं आया तो मैं कैसे यकीन करूं भगवान है। देखना चाहते हैं देखने का तरीका नहीं सीखते हैं। भगवान हर समय हर जगह है मगर जब हम चाहें जिस जगह हो उसी जगह दिखाई देना उसकी कोई मज़बूरी नहीं है। आपको देखने की इच्छा है भगवान की मर्ज़ी क्या है वही जानता है उसको नहीं दिखाई देना हर किसी को आसानी से। उसको देखने को तीसरी आंख चाहिए ज्ञान की भीतर की , आंख बंद करने से अपने भीतर नहीं झांकना जैसा कुछ लोग समझाते हैं भटकाते हैं दुनिया को देखने वाली आंखों से भगवान को देखना मुमकिन नहीं है। इधर उधर भागते फिरते हो मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे क्या ऊपर वाला किसी की कैद में रहेगा , नहीं कभी नहीं। उन स्थानों पर उसकी चर्चा हो सकती है आरती पूजा इबादत की जा सकती है उसका होना लाज़मी नहीं है। आप इस समय कहां है क्या कहीं और कोई आपकी चर्चा कर रहा नहीं हो सकता है , लेकिन आप उस जगह मौजूद नहीं हैं।

  समस्या और भी है अगर आपको खबर हो आपके साथ साथ कोई है जो आपकी हर बात सुन रहा है हर अच्छा बुरा काम करते देख रहा है तो आप बेचैन हो जाओगे घबराओगे कुछ भी नहीं कर पाओगे। जबकि सोचो अगर आप कुछ भी अनुचित नहीं कर रहे तो किस बात की चिंता कैसा डर क्यों घबराना। कुछ इसी कारण हम तीसरी आंख खोलना नहीं चाहते और सोचते हैं कोई नहीं देखता जनता समझता हम कुछ भी करते हैं। हमने अपनी मर्ज़ी से सुविधा से अपनी असली आंख बंद की हुई है। जीवन भर कितनी कितनी जगह जाते हैं भगवान देवी देवता अदि के दर्शन करने को , दिखाई नहीं दिया ऊपर वाला फिर भी दिल को झूठी तसल्ली देते हैं दर्शन कर आये हैं। सोचा है कभी भगवान से मिलते बात करते गिला शिकवा करते रूठते मनाते। पिता संतान का नाता तभी तो होता कोई औपचारिकता नहीं। पर घर आते बच्चे गलती की है पिता से नज़र नहीं मिलाना चाहते तो चुपके से दबे पांव अंदर आते हैं। चैन की सांस लेते हैं बच गये पिता को पता नहीं चला। पिता को जाकर बताते भूल हुई है शायद सज़ा मिलती या माफ़ी या कोई सीख मिलती , मगर हम बचने की सोच कर राज़ी हैं। कोई किसी की बंद की हुई आंखों को खोल नहीं सकता है। साधु संत भी आपको कह सकते हैं अपनी मन की आंखें खोल , खोलनी आपको खुद ही हैं। कोई और आपकी तीसरी आंख खोलने में मदद नहीं कर सकता भगवान भी विवश नहीं करता मुझे देखो आंखें खोलकर। जिसे चाहत है खुद खोलता है भीतरी आंख को ईश्वर को देखने को जब मर्ज़ी। 

क्या हमारे नायक छलिया हैं ( कड़वा सच ) डॉ लोक सेतिया

    क्या हमारे नायक छलिया हैं ( कड़वा सच ) डॉ लोक सेतिया

        आपको याद है कलाम साहब ने इक सपना नहीं दिखाया था बल्कि दावा करने की बात की थी 2020 का भारत कैसा होगा। जिनको मालूम नहीं उनकी बेहद कीमती किताब खरीद कर पढ़ सकते हैं। मगर हमारी आदत है कि नेता की हर बात पर तालियां बजाते हैं जय जयकार करते हैं मगर वास्तव में सच नहीं होने पर कुछ नहीं कहते हैं। किसी एक नेता का नाम लिए बिना कह सकते हैं अपनी कही बात सच नहीं होने पर किसी को लाज शर्म का एहसास कदापि नहीं होता है। अभी भी जो सरकार पुराने दावे सच साबित करने में नाकाम रही है भविष्य के सपने बेच कर शायद बार बार सत्ता पाना चाहती है। दावा किया जाता है देश की शान बढ़ने का मगर विश्व में तमाम निष्पक्ष मंचों पर संस्थाओं की रपट में असलियत विपरीत है। गरीबी भूख शिक्षा स्वास्थ्य प्रदूषण जल हवा धरती सभी को लेकर निराशाजनक तस्वीर सामने आती है मगर हम आंखें बंद कर समझते हैं सब ठीक है। ऐसा इसी सरकार ने किया हो ये नहीं है चालीस साल से जनता को छलने को वास्तविकता से उल्ट बताया जाता है और झूठ बेचकर बहलाया जाता है। कहने को अच्छा लगता है आदमी को बड़े बड़े सपने देखने चाहिएं मगर क्या हक़ीक़त से नज़र चुराकर। फ़िल्मी छलिया या किताबी छलिया भा सकता है मगर जनता को छलते रहने वालों को महान समझते रहना हद दर्जे की नासमझी है।

      बहुत देश हमारे साथ आज़ाद हुए मगर आज तस्वीर बदल चुके हैं। जो देश खुद को सारे जहां से अच्छा होने की बात करता है उसको कभी तो अपने आप को देखना चाहिए ताकि अच्छा क्या होना चाहिए समझा जा सके। धरती का दिन मनाने से नहीं उसको बचाने को सार्थक कार्य करने से कुछ संभव है। आज भी हम कुदरत से छेड़ छाड़ करने में कोई कमी नहीं रखते विकास के नाम पर विनाश को बुलावा देते हैं। आज कोई भी नेता देश की और जनता की समस्याओं की बात पर विचार नहीं करता समस्याओं को सुधारना तो क्या उनको बढ़ते देना इनकी चिंता का विषय नहीं है। मगर इनको एक काम बाखूबी आता है छलना हर किसी को। हमने ये किया आपको क्या क्या दिया है ऐसे कहते हैं जैसे बड़े दानी लोग हैं खुद खाली पेट रहते हैं आपको खिलाते हैं जबकि मामला उल्टा है। खुद पर बेतहाशा धन खर्च करना अपने महिमामंडन पर पैसा बर्बाद करना इनको अनावश्यक नहीं लगता है। जिस देश की आधी आबादी भूखी रहती हो गरीबी बदहाली की हालत सुधारने की बात छोड़ राजसी ढंग से रहना लोकतंत्र में बड़ा गुनाह है। कोई भी नेता या दल देश की खातिर या जनता की भलाई की खातिर काम नहीं करता है उनका मकसद अपने लोग अपना दल और अपने पास सब कुछ होना अंबार लगा होना बन चुका है। स्वार्थ में अंधे होकर सत्ता हासिल करने को निम्न स्तर की बातें और आचरण करते हैं। बात कहते हैं मुकर जाते हैं इनका कोई भरोसा कैसे करे जो अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हैं।

       धर्म शायद सबसे बड़ी बाधा बन गया है सही राह दिखाने क्या धर्म खुद धर्म नहीं रहा है। कोई मंदिर मस्जिद मस्जिद गिरिजाघर गुरुद्वारा दीन दुखियों की सहायता नहीं करता अपने खज़ाने भरते हैं और उपदेश संचय नहीं करने का देते हैं। कहीं मुसाफिर को रहने को जगह नहीं मिलती खाना नहीं मिलता ऐसी जगहों पर भी धर्मशाला नहीं बाकायदा रहने का शुल्क लिया जाता है। कुछ एक मंदिर गुरूद्वारे को छोड़ बाकी सब दान से मिली दौलत अपने पास रखने अपनी सुविधाओं पर खर्च करने पर लगाते हैं। बाहर इंसान गर्मी में तड़पते हैं मगर धर्म स्थल के बड़े बड़े भवन कोई भी नहीं बैठा तब भी ए सी चलते रहते हैं ठंडक बनाने को। यही हालत सरकारी दफ्तरों की है सरकारी सुविधाओं का जम कर दुरूपयोग किया जाता है। वीवीआईपी किस संविधान में लिखा है उनका विशेषाधिकार है उनकी खातिर आम जन को परेशानी होना उचित है। इनको जाना है रास्ते बंद बाकी लोगों के लिए और इनके लिए एक दिन में सारी सुविधाएं उपलब्ध होना अपने आप साफ करता है करना चाहें तो सब संभव है मगर करना ही नहीं चाहते। सत्ता पाकर मकसद कुछ भी बदलना नहीं है जो कहते थे कोई नहीं कर रहा आपको भी वही दोहराना है। इतनी भूख सत्ता के विस्तार की बढ़ गई है कि आगे दौड़ पीछे चौड़ की हालत है। सत्ता मिली उस राज्य की बात छोड़ और कहीं सत्ता पाने को कोशिश करने लगते हैं जैसे शासक अपनी जागीर बढ़ाने का कार्य करते थे। आप पांच साल के रखवाले हैं मालिक बन नहीं सकते आपको कर्तव्य पालन की बात याद नहीं रहती है।

     बहुत ऐसे कार्य हैं जिन पर इतना धन खर्च किया जाता है जितने से देश की गरीबी मिटाई जा सकती थी। शिक्षा को बेहतर बनाया जा सकता था , जनता को अच्छी स्वस्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाई जा सकती थी , मगर उस खर्च का कोई फायदा देश को नहीं है। आडंबर करने पर धन बर्बाद करना अपराध है। घोटालों की बात होती है मगर देश में सबसे बड़ा घोटाला सरकारी विज्ञापन हैं जो कुछ लोगों के घर भरने का ही काम करते हैं टीवी अख़बार वालों की बैसाखियां बन गई हैं जिस के बिना ये लूले लंगड़े हो जाएंगे तभी कोई इस घोटाले की बात नहीं करता है। सपने बेचने का घोटाला सरकार ही नहीं बड़े बड़े लोग झूठे विज्ञापन का काम करते हैं अपने नाम का अनुचित फायदा उठाते हैं। किसी को जनता की भलाई से सरोकार नहीं है। दिन भर किसी का चेहरा टीवी पर दिखाने से नकली पहचान मिलती है असली शोहरत वास्तविक कार्य करने से मिलती है और सरकार के विज्ञापन जो नहीं है उसके होने का यकीन दिलाना चाहते हैं। छलते हैं जनता को और जिनको पैसे की भूख कर्तव्य से अधिक महत्वपूर्ण लगती है वो झूठे विज्ञापन दिखलाते हैं सच की बात और जाने किस किस बात का दावा करने के बावजूद भी।

      कई दिन से योग बाबा की खबर नहीं आई , कितनी दौलत जमा कर ली और कहते हैं समाज कल्याण पर खर्च करते हैं , इतना करोड़ों का खज़ाना है कल्याण करने को लोग बहुत हैं जिनको रोटी शिक्षा की ज़रूरत है। कोई बता सकता है इनके योग से , योग किसी का नहीं है पहले से रहा है , कितने रोगी कम हुए हैं।  विश्व स्वास्थ्य संगठन तो भारत में खतरनाक हालत की बात करता है। जाने कितनी सुंदरता बढ़ी है उनके सौंदर्य प्रसाधन उपयोग करने से देश में। छलिया रे। कितने छलिया हैं देश को जनता को छल रहे हैं। छलना इस समय का सबसे बड़ा धंधा बन गया है। गांव की गोरी शहरी बाबू को छलिया कहती थी आया और सब छीन गया चैन करार दिल का , मगर आजकल छलिया बातों से छलते हैं और हम छले जाने की शिकायत भी नहीं करते बार बार छल के शिकार होते है। छलिया नाम बदल आते हैं छलते हैं। दिल्ली मुंबई छलियों की नगरी कहलाती थी अब हर शहर कोई छलिया है। ज़रा सामने तो आ रे छलिये छुप छुप छलने में क्या राज़ है।

    भगवान कभी  छलिया रूप धारण कर आये थे लोग कहते हैं। इधर छलिया हैं जो भगवान बन कर सामने आते हैं भगवान बन नहीं सकते किसी की भलाई नहीं करते रुतबा पाना चाहते हैं।  वाह रे वाह छलिया।

Sunday, 21 April 2019

अच्छे दिन पर मेरा शोध पूर्ण ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  अच्छे दिन पर मेरा शोध पूर्ण ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  ( निवेदन राजनीति करने वाले नहीं पढ़ सकते चुनाव अचार संहिता का पालन करना ज़रूरी है )

    मैं डॉक्टर हूं मगर पी एच डी उपाधि वाला नहीं आयुर्वेदिक स्नातक होने के कारण हूं। लिखता हूं नियमित इसलिए कई लोग मुझे पी एच डी वाला डॉक्टर समझ लेते हैं।  इस बात पर विचार करने के बाद मैंने भी शोध करने का विचार बनाया था और पांच साल से अच्छे दिन को लेकर मेरा शोध चल रहा था और शोध प्रंबध मैंने प्रस्तुत करवा दिया है जो स्वीकृत भी हो चुका है अभी उपाधि मिलने में थोड़ा विलंब है। दस्तावेज़ गोपनीय हैं मगर आपको बता सकता हूं मगर आपको इसकी चर्चा किसी नेता से नहीं करनी है ये वादा करते हैं तभी आगे पढ़ सकते हैं। 

        अच्छे दिन झूठी बात नहीं है और वास्तव में कई लोगों को अच्छे ही नहीं बेहद अच्छे और बेमिसाल दिन भी हासिल होते हैं। अच्छे दिन मिलते नहीं हैं मांगने से खैरात की तरह उनकी कीमत चुकानी पड़ती है। बहुत लोग ज़मीर नाम की चीज़ को बचाकर रखने की मूर्खता नहीं करते और बेच कर बदले में अच्छे दिन खरीद लाते हैं। चोरों के दिन कभी खराब नहीं होते हैं और अच्छे दिन आने की आहट राजनीति की चौखट पार करते ही सुनाई देने लगती है। 

    अच्छे लोगों से अच्छे दिन की राशि नहीं मिलती है ऐसा ज्योतिष समझने वाले जानते हैं कुंडली एक जैसी होने से समस्या होना लाज़मी है। पति-पत्नी दोनों गर्म मिजाज़ होने पर तलाक की ज़रूरत पड़ती है और अगर दोनों का स्वभाव नर्म हो तो झगड़ा नहीं होने पर भी ख़ामोशी छाई रहती है अबनब लगती है। अच्छे दिन हासिल करने को अच्छाई से फासला बनाना ज़रूरी होता है। 

   जिनके दिन अच्छे थे पहले भी एक दल की सरकार में बदली सरकार में भी अच्छे बने रहे दल बदल लेने से। दिल बदलने की कोई ज़रूरत नहीं दल बदल करना समझदारी का निर्णय होता है। बहुत थोड़े ऐसे खुशनसीब होते हैं जो सही समय पर सही दल में शामिल हो जाया करते हैं। दलबदल कानून अड़चन है अन्यथा कितने लोग कितनी बार दलबदल करना चाहते हैं मगर कर नहीं पाते हैं। सरकार को अच्छे दिन का वादा पूरा करना है तो इस अनावश्यक कानून को हटा देना चाहिए। 

    आम जनता को भी अच्छे दिन दिखाई दे सकते हैं मगर दिन को नहीं रात को नींद में ख्वाब में ही। दिन के समय अच्छे दिन ख़ास लोगों को नज़र आया करते हैं। सत्ता जिनकी उनके दिन रात अच्छे होते हैं। चांदनी चार दिन की फिर अंधेरी रात की तरह से चुनाव आने पर जनता की बहार आने की बात होती है। वादों की फसल लहलहाती है ताली बजाते बरसात होती है। जिसकी शादी उसकी सुहागरात होती है बाकी बाराती नाचते गाते हैं खाते पीते हैं इतनी सीधी सी बात होती है। जीत की वरमाला पहनते ही दूल्हा समझता है मैं बादशाह और दुल्हन समझती है वो महारानी बन गई मगर वो सब किराये का महल सजावट अगली सुबह गायब हो जाती है। अच्छे दिन शादी से पहले थे या बाद में मिले हैं यही सबसे बड़ा राज़ है कोई नहीं जान पाया है। कोई कैसे बताये मुझे ठगा नहीं गया मैं खुद अपना सब कुछ लुटवा चुका हूं। कल तक बड़े ऊंची कीमत थी जिसकी आज खोटे सिक्के जैसी औकात है।

      स्कूल जाते लगता था क्या खराब दिन हैं खेलना चाहते हैं पढ़ाई करनी पड़ती है। कॉलेज जाकर लगा अच्छे दिन हैं मगर चाहते कुछ मिला कुछ और था इसका मलाल रहा तो अच्छे दिन का लुत्फ़ उठाया ही नहीं। उच्च शिक्षा पाकर सपने साकार करने की खातिर मौज मस्ती करने से बचते रहे मगर बाद में पता चला जो मौज मस्ती किया करते थे उनकी मौज है अभी भी नेता बने फिरते हैं हम पढ़ लिख नौकरी ढूंढ रहे हैं। मुहब्बत करने वाले सोचते हैं विवाहित जीवन खूबसूरत ख्वाब की तरह होगा मगर विवाहित होने पर समझ आता है अच्छे दिन बेकार बर्बाद कर दिए अभी शादी करने की जल्दी क्या थी थोड़े दिन और आशिक़ी का मज़ा लेना था। इस में भी बाज़ी जीतने वाले वो लोग होते हैं जो मुहब्बत किसी से शादी किसी और से करते हैं।  ये खेल भी खतरे का है पकड़े जाने पर अच्छे दिन खराब बनते देर नहीं लगती। वास्तव में अच्छे दिन उन्हीं को हासिल हैं जिन्होंने शादी की ही नहीं या एकाध खुशकिस्मत है जो शादी करने के बाद भी पत्नी से छुटकारा पाने में सफल रहा। पति - पत्नी दोनों एक साथ खुश नहीं रह सकते ये सबसे बड़ा सत्य है एक ही खुश रह सकता है जिसको दूसरे को दुखी करना आता हो।

      लोगों से सुना करते हैं गुलामी के दिन भी कितने अच्छे थे कोई चिंता नहीं थी परेशानी नहीं थी। गुलामी की आदत थी कोई कुछ कहे खराब नहीं लगता था। अभी भी हैं जो गुलामी को बरकत समझते हैं और किसी न किसी की गुलामी करने में जीवन बिता देते हैं। उनको आज़ादी अच्छी नहीं लगती डरते हैं खुली हवा में सांस लेने से भी। किसी शायर ने कहा है , लोग हर मोड़ पे रुक रुक के संभलते क्यों हैं , इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं। कोई धनवान की जीहज़ूरी करता है कोई सत्ताधारी नेता की कोई अधिकारी की। जय जय कार करने से सब मिलता रहता है मगर जिस दिन धनवान का पैसा नेता की सत्ता अधिकारी का पद नहीं रहता सबसे अधिक परेशानी इन्हीं लोगों को होती है। बिना चाटुकारिता इनकी सांस नहीं चलती और चाटुकारिता करने को उनका ऊंचाई पर होना शर्त है। बराबरी पर दुआ सलाम होती है सलाम साहिब नीचे खड़े होकर कहना होता है तलवे चाटने वाले को जो सुख मिलता है वही समझता है। आशिक ऐसे ही नहीं इल्तिजा करते पांव छू लेने दो फूलों पे इनायत होगी।

         अच्छे दिन पर शोध कभी खत्म नहीं हो सकता है। कुछ अन्य बातें हैं जिनको इशारों में संक्षेप में समझना उचित है। पिता की कमाई पत्नी की कमाई पर ऐश करने वाले के दिन सदा अच्छे होते हैं। कई लोग जिनके पिता जीते जी हाथ से कुछ नहीं देते स्वर्गवासी होने पर वसीयत में सब कुछ छोड़ जाते हैं उनके अच्छे दिन पिता जी के जाने के बाद आया करते हैं। नौकरी करते लगता था कोई जीना ही नहीं सेवानिवृत होकर चैन से रहना है खूब पैसा होगा पेंशन मिलेगी और आराम करने को फुर्सत होगी। मगर खाली होते ही घर पर बाबू क्या अधिकारी को लगता है चपरासी बना दिया गया है। चौकीदार बनना कोई मज़ाक नहीं है जैसा सब समझ रहे हैं चौकीदार होने की बात से रुतबा बढ़कर मोदी जी जैसा हो जाएगा। उनकी किस्मत में हमेशा अच्छे दिन रहे हैं सबकी किस्मत में नहीं होते अच्छे दिन। अच्छे दिन पाने को क्या क्या नहीं करना पड़ता है शोले के सूरमा भोपाली की तरह सौ सौ झूठ बोलने पड़ते हैं। मैंने जय वीरू को ऐसे पकड़ा था की कहानी आज भी सच है बात आपसी लेन देन की है अपराधी खुद कहता है मुझे पकड़वाओ , इस तरह अच्छे दिन आपको तलाश करते हैं। आप उस जगह मिलते नहीं जिस जिस जगह अच्छे दिन होते हैं कभी इस देश कभी उस देश कभी इस शहर कभी उस शहर कभी मंदिर कभी मस्जिद कभी गिरिजाघर गुरुद्वारा अच्छे दिन एक जगह टिक कर नहीं रहते है। वक़्त रहता नहीं कभी टिककर , इसकी आदत भी आदमी सी है। शाम से आंख में नमी सी है , आज फिर आपकी कमी सी है। दफ़्न कर दो हमें  कि  सांस मिले , नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है। कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी , एक तस्लीम लाज़मी सी है।  जगजीज सिंह की गई ग़ज़ल अच्छी लगती है। ग़ज़ल के अच्छे दिन हुआ करते थे आजकल क्या हालत है बता नहीं सकते। हास परिहास तक के दिन खराब चल रहे हैं व्यंग्य को देखो तो बेहाल ज़ख़्मी लगता है।


Saturday, 20 April 2019

तमाशा बना दिया ( बदलता समाज ) डॉ लोक सेतिया

       तमाशा बना दिया ( बदलता समाज ) डॉ लोक सेतिया 

   मेरी इक छोटी बहन है आजकल कज़न या फुफेरी बहन कह सकते हैं पर हमारे समय में सभी बहनें होती थी सगी और चहेरी फुफेरी का भेद नहीं समझते थे। सुबह उसके दो संदेश जो यकीनन खुद उस के नहीं हैं फ़ॉरवड किये हुए हैं मिले। अच्छा लगता है मिलकर नहीं बात कर नहीं तो इस तरह से याद कर लेते हैं
रिश्तों को। जानता हूं मेरी भोली बहन ने ये सोचा भी नहीं होगा जो मुझे लगा उन दोनों संदेशों का इक विरोधाभास जैसा। पहले लिखे संदेश में बेटी पिता से घर के आंगन के पेड़ को आगे से उखाड़ कर पिछले बगीचे में लगाने को कहती है और पिता बताते हैं कुदरत किसी को ऐसी ताकत नहीं देती कि ऐसा कर सके मगर बेटियां हैं जो पलती बढ़ती हैं पिता के घर और फलती फूलती हैं ससुराल के घर पर जाकर। किसान जानते हैं धान की फसल ऐसी होती है जिस में पौध उखाड़ कर किसी और खेत में रौपी जाती है बेटियों की तरह शायद।
                   पढ़कर मन की भावना जगती है लेकिन जब साथ मिला वीडियो सुनते हैं तो लगता है कुछ भी कहना क्या हमारी आदत बन गई है। चुटकुले बनाने को बचा है यही , इक महिला भगवान से मांगती है सब कुछ अपने पति के लिए। आखिर में कहती है उसको ये सब दे देना आगे पति से छीनना मुझे आता है। सब जानते हैं और मैंने जवाब लिखा भी कि नारी पति का धन सुख सुविधा का उपयोग भी खुद के लिए नहीं पहले बाकी सदस्यों की खातिर बच्चों पति सास ससुर देवर जेठ हर रिश्ते निभाने को करती है। खुद उस के हिस्से बचता कितना है कोई नहीं समझता। मगर ये बात इतनी सी नहीं है हम आधुनिक बनते गये मगर इस में अपने संवेदनशीलता को खो रहे हैं। जो बात पढ़कर आंखे नम होती थीं आज हंसते हैं तो लगता है पाषाण बनते जा रहे हैं। समाज का बदलता स्वरूप हैरान करता है। बस इसी से बाकी हर समाज के भाग को देखने पर लगता है ये किधर जाते जा रहे हैं सभी लोग।

        चुनाव पहले भी होते रहे हैं मगर हर बार राजनीति का स्तर गिरता जा रहा है। ये किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि सत्ता पाना और चुनाव जीतना देश के संविधान की मर्यादा को ताकपर रखने तक की नौबत ला सकता है। कीचड़ की होली खेलते खेलते नेता लोग अब गंदगी से खेलने लगे हैं और गटर के पानी की बदबू चरों तरफ फैलाई जा रही है। विचारधारा की बात कहीं नहीं है और नियम कानून को भाड़ में झौंक रहे हैं अचार सहिंता का उपहास कर दिया गया है बड़े बड़े पद पर आसीन लोग घटिया बातें स्वार्थ सिद्ध करने को राजनीति को गटर में नहला रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं को बर्बाद करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी गई। देशभक्ति देशसेवा शब्द लगता है कोई हथियार बन गया है मतलब पूरे करने का। जिसे चाहा जो करार दे दिया और जिसको चाहा उसके गुनाहों को दरकिनार कर दिया गया। बुरे को अच्छा और अच्छे को बुरा साबित करने को सोशल मीडिया को टीवी अख़बार को साधन बना लिया है। कोई भी संसद का चुनाव तय सीमा में खर्च कर नहीं लड़ना चाहता और ईमानदारी इक तमाशा बन गई है। इतना धन आया कहां से कोई हिसाब नहीं और जो सबसे बड़ा गुनहगार उसी दल का खर्च सबसे बढ़कर। काला धन सफ़ेद धन कोई भेद नहीं है और अगर धन बाहुबल ताकत जातिवाद धार्मिक उन्माद से चुनाव लड़ना जीतना है तो कोई भी जनता और देश का हितचिंतक नहीं है सभी डाकू लुटेरे हैं।

        इक नंगा नाच है सबके सामने हो रहा है। गाड़ियों के काफिले आम नागरिक को रौंदते हुए सड़क पर दहशत का माहौल बनाते हैं जिसे किसी फिल्म में घोड़ों की आहत गोलियों की गूंज सब को घर में कैद होने को विवश करती थी। जंगलराज का आधुनकीकरण है ये हाथ जोड़ रहे नेता भी भाषण देते हैं तो लगता है धमकी देने की बात है। नहीं ये लोकतंत्र के नाम पर धोखा है छल से रावण साधु बनकर सीता को हरण करने आये हैं। आपकी सीमा रेखा तय है और पार करते ही आपकी सुरक्षा समाप्त और रावण उठाकर ले जायेगा अपनी सोने की लंका में। देश की राजधानी दिल्ली बेरहम है आपकी आवाज़ वहां जाती नहीं है उनके दफ्तर शीशे की दीवारों से बने हैं साउंड प्रूफ हैं बाहर की चीख पुकार सुनाई नहीं देती है। हम कायर बनकर ये ख़ामोशी से देख रहे हैं और सभी दलों ने चुनावी व्यवस्था को तमाशा बना दिया है। गीता रामायण पढ़ते नहीं हैं हम उनकी झूठी शपथ उठाते हैं मगर नहीं जानते कि धर्मयुद्ध नहीं है कोई राम नहीं कृष्ण नहीं रावण कंस राम कृष्ण होने का दावा कर रहे हैं और जीत धर्म की नहीं अधर्म की होगी सब जानते हैं। किताबी बातें किताबों में बंद हैं संविधान की भावना का दम घुटता लगता है। जाते जाते इक मधुर गीत उचित तो नहीं मगर आजकल की वास्तविकता है।

         हम को तुम्हारे इश्क़ ने क्या क्या बना दिया , जब कुछ न बन सके तो तमाशा बना दिया। 

 मनोरंजन कोई मकसद नहीं है और स्मार्ट फोन का उपयोग विचारों का आदान प्रदान करने को किया जा सकता है वक़्त बर्बाद करने को नहीं। समय का उपयोग करना और समय की बर्बादी में बहुत बड़ा अंतर है।

Friday, 19 April 2019

जो नहीं बचा उसका जश्न मनाते लोग ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

  जो नहीं बचा उसका जश्न मनाते लोग ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

       सरकारें भी जश्न मनाती हैं एक दो तीन चार साल होने का। बाकी कितना वक़्त पास है बकाया इसका विचार नहीं करती आजकल सरकारें। पल भर का भरोसा नहीं और सामान सौ बरस का ऐसी बात है। पांच साला जश्न मातम लगता है मानो जान जाती है सत्ता नहीं। जो करना था सो ना किया जो नहीं करना था करते रहे , अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत। बोया था जो वही काटना है इतनी सीधी सी बात है मगर सरकार झूठ का बही खाता बनाती है जनता को दिखाने को अपना हिसाब छुपा कर रखती है। इक नया घोषणा-पत्र जारी करती है अगले पांच की सत्ता की बात है मगर वादे बीस साल बाद तक के। नीयत का खोट है जितना समय संविधान देता है उसी की बात हो और पिछला हिसाब साफ हो कहा जो जो किया या नहीं किया। दुनिया अजीब है सब को पता है ज़िंदगी चार दिन की है मगर कोई मौत की सच्चाई को नहीं समझता। कई पहले आये थे कई बाद में आएंगे रहना कोई नहीं चलाचली का मेला है , भीड़ में हर शख्स अकेला है।

     हम जब भी बात करते हैं आज की बात नहीं करते पीछे की बात करते हैं जो बीत गया वक़्त लौटता नहीं और आगे का कोई भरोसा नहीं आज को जीना है नज़र मिलाकर वही करते नहीं। कभी कोई बताता है मेरे पुरखे अमीर थे राजा थे वज़ीर थे जागीरदार थे। महल थे जाने क्या क्या कहानियां याद रखते हैं। कभी कोई अपने माता पिता दादा परदादा की गरीबी की बात करता है और मैंने कितनी दौलत जमा की है उस पर इतराता है। विचार नहीं करते उनके पास धन दौलत नहीं था फिर भी ख़ुशी ख़ुशी जीवन जिया और कोई मलाल नहीं था कम अधिक होने का। आपके पास कितना है मगर पाने की हवस मिटती नहीं। कोई गरीब होकर भी अमीर था और कोई धनवान रईस बनकर भी मन से गरीब है। कुछ साथ लाया नहीं कोई कुछ साथ जाना नहीं फिर अपना क्या है जो अपने उपयोग किया नेकी की वही अपनी है। संतान परिवार या किसी की खातिर बदी की तो नाम बदनाम आपका होगा , कोई भी पुरखों की बदनामी की विरासत नहीं ढोना चाहता है। अपने चेहरे पर हर सुबह कोई नकाब लगाकर निकलते हैं और शाम को घर आते उसको उतार टांग देते हैं खूंटी पर। ज़मीर मन आत्मा का सामना कोई नहीं करना चाहता , जो नहीं है कहलाना और जो वास्तव में है उसको स्वीकार नहीं करना इसी से आपकी वास्तविकता समझ आती है।

 हम लोग भी हर वर्ष बढ़ती आयु की बात करते हैं अब हम वरिष्ठ नागरिक बन गए क्या इतना काफी है हरकतें अभी बचकानी हैं। ये अच्छी बात है अपने भीतर बचपन को बचाये रखना चाहिए। मेरी जन्म 30 अप्रैल 1951 को हुआ मुझे क्या पता बड़े होने पर देखा बही में दर्ज था तब किस चीज़ का क्या भाव था सोने का गेंहूं का। समझ आया अच्छा वक़्त चला गया आयु बढ़ती गई सब कुछ ज़रूरत का महंगा होता रहा कीमती आदर्श भावनाएं नैतिकता सस्ती होती गई। शराफत दो कोड़ी की समझी जाने लगी और चालाकी का दाम आकाश पर चढ़ता रहा। साल बढ़ते रहे हम गिनती करते रहे बिना विचार किये खोया है या पाया है। 

       आपके पास करोड़ या पचास लाख रूपये थे खर्च होते रहे और आज आपका बैंक बैलेंस पांच लाख या कुछ हज़ार है तो आप क्या जश्न मनाओगे मेरे पर कितना धन दौलत थी जो लुटवा चुका अब थोड़ी बची है। आपकी आयु कितनी है का अर्थ है कितने साल जीना है अभी जो गुज़र गए उनका हासिल क्या है इस पर सोचना क्या पाया क्या खोया है। जन्म दिन नव वर्ष जैसे दिन विचार विमर्श करने को होने चाहिएं जश्न तो ज़िंदगी का हर दिन मनाना चाहिए। ज़िंदगी सालों की लंबाई से नहीं जो किया उसकी सार्थकता से आंकनी चाहिए। 11 दिन बचे हैं इस साल के अभी भी जीना शुरू नहीं किया कोई जीना सिखला दे मुझे यारो। जीने का अंदाज़ सबको नहीं आता लोग मर मर ज़िंदा होने का मातम करते हैं जन्मदिन मनाना औपचारिकता बन गई है केक खाने से ख़ुशी नहीं मिलती जियो हुए जी भर कर जियो। इक गीत याद आया है। सुनना। 



                              ना मुंह छुपा के जिओ और ना सर झुका के जिओ।
                                  ग़मों का दौर भी आए तो मुस्कुरा के जिओ।

                                     घटा में छुपके सितारे फ़नाह नहीं होते
                                 अंधेरी रात के दिल में दिये जला के जिओ।

                                 ना जाने कौन सा पल मौत की अमानत हो
                                हर एक पल की ख़ुशी को गले लगा के जिओ।

प्यार करने का अभिनय ( वयंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

      प्यार करने का अभिनय ( वयंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

       तुमने कसम दी है सच सच लिखने की हिदायत भी की है हमारी कहानी को जिन दो कहानीकार दोस्तों को बतानी है तुम और मैं दोनों नहीं समझ पाये कभी भी इतने साल तक हम उन्हीं के लिखे किरदार का अभिनय ही कर रहे थे। शायद अभी भी मेरी तरह तुम भी हैरान हो सकते हो जानकर कि वास्तविकता क्या है। उन दो लिखने वालों की कल्पना थी तुम मैं दो सच्चे प्यार करने वाले हो सकते हैं। किस मकसद से मुझे नहीं मालूम उन्होंने हम दोनों को किसी कहानी के किरदार की तरह साथ लाने से लेकर तमाम घटनाओं की पटकथा नियमित लिखी और हम उनके इशारों पर अभिनय करते रहे। मुझे एक लिखने वाले ने बताया तुम मुझे प्यार करते हो और तुम्हें भी दूसरे ने यही बताया कि मुझे तुमसे मुहब्बत है। शायद प्यार करने का अभिनय करते करते हम अपनी वास्तविकता को भूल गये जो हम दोनों को कभी मुहब्बत करने की इजाज़त ही नहीं देती।

हम दोनों ज़िंदगी से निराश होकर अपनी बातें जिनको बताते थे हमराज़ समझ कर उनको प्यार मुहब्बत इक खेल जैसा लगता है अपनी कविता ग़ज़ल कहानी में लिखने को नाम बदलकर पुराने किरदार वापस लाने की। मगर इस बार उनकी कहानी घट रही थी उनकी मर्ज़ी से हम दोनों को उलझाने का काम करते हुए। शायद उनको आज़माना था या तजुर्बा करना था कि कोई किसी के कहने से किसी को प्यार कर सकता है। जब जब हम दोनों को लगता हम प्यार नहीं करते तब तब उन्होंने हमें किसी भी तरह अलग नहीं होने दिया। ये उनका लिखा नाटक था जिस पर जीवन के मंच पर कोई और कठपुतली बन नाच रहे थे। हम दोनों को यही समझने को विवश किया गया कि हम चाहते हैं इक दूजे को। तुम ये समझते रहे कि मुझे तुमसे बेइन्तिहा मुहब्बत है और मैं ये कि तुम मुझसे बेहद मुहब्बत करते हो। इनकार करने पर या ये बताने पर कि कोई एहसास दिल में नहीं है सोचते कहीं कोई अनहोनी नहीं घट जाये। सहानुभूति थी या परवाह करना मगर साथ रहते रहते कुछ अपनत्व होता गया मगर वास्तविक बंधन मुहब्बत का आधे सच आधे झूठ की बुनियाद पर नहीं कायम हो सकता है।

सब को कोई पसंद आये और उस से मुहब्बत हो ये मुमकिन नहीं है। शायद पहली बार तुमने भी जो कहा किसी और के कहने में आकर नहीं कहा और असलियत को समझना चाहा और मैंने भी किसी से बिना बात किये अपनी बात अपने शब्दों में व्यक्त की है। हम प्यार मुहब्बत करते हैं या नहीं भी करते हैं मगर इतना तो है कि हम आपस में कोई झूठा दिखावा छल कपट नहीं करना चाहते और सोचने लगे हैं कि और अभिनय नहीं करना है। जो भी हम दोनों को महसूस होता है स्वीकार करना है , हम ज़िंदा इंसान हैं किसी किताबी कहानी का फिल्म का नाटक का किरदार बनना मंज़ूर नहीं है। अपनी कहानी की शुरुआत चाहे किसी भी नाटकीय ढंग से हुई हो अंत हमारी मर्ज़ी से होना चाहिए और कोई काल्पनिक मोड़ अब नहीं आना संभव है।

Tuesday, 16 April 2019

हमको उनसे बचाओ ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     हमको उनसे बचाओ ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   चुनाव हो रहे हैं ऐसे में पहली बार साहस कर पुरुषों ने भी अपना अधिकार मांगना याद रखा वो भी समझदारी से अपने तरीके से। महिलाओं के संगठन अपनी बात मनवाना जानते हैं मगर पुरुषों को भी समझाने नारदमुनि जी धरती पर खुद चले आये और पुरुषों की समस्या को समझ ऊपर जाकर भगवान से मुलाकात भी फिक्स करवा दी ज़िंदा रहते आमने सामने। नारदमुनि ने जैसा समझाया था पुरुषों ने बहुत शालीनता से मगर चालाकी से बात शुरू ही चुनावी ढंग से करते हुए कहा कि आपके सामने कोई और भी दावेदार खुद को भगवान साबित करता है जिस के भक्तों की संख्या बढ़ती जा रही है और इस बार जीत जाने पर आपसे बढ़कर उसी की महिमा का गुणगान होने लगा तो तैयार रहना। हम पुरुष भी महिलाओं की तरह आधी दुनिया का तमगा बिना लगाये भी संख्या में कम नहीं है। हम आपकी शरण आये हैं और आप ही को भगवान मानते हैं मगर आपको भी उनकी तरह अपने भक्तों का ख्याल रखना चाहिए। भगवान उनकी मांग सुन कर चकित रह गये समझ गये खेल नारद जी का रचाया हुआ है। नारद जी बात संभालते हुए कहने लगे भगवान मुझ पर समझना शंका मत करना मैंने खुद धरती पर वास्तविकता को देखा और समझा है। आपकी चिंता भी मुझे मालूम है मगर आपकी अनुमति के बिना महिलाओं की वास्तविकता की कथा पढ़कर सुनाना उचित नहीं था तभी यहीं आपकी आज्ञा से कथा सुना कर उपाय की बात कर सकते हैं। भगवान की इजाज़त से कथा सुना रहे हैं। 

       दुनिया बनाने के बाद हवा पानी नदी समंदर पशु पक्षी कुदरत के सभी रंग बनाने के बाद इन सभी को इस्तेमाल करने को इंसान बनाये गये तो केवल पुरुष ही बनाने का विचार था मगर जैसे ही पुरुष को सोचने को दिमाग मिला उसने सबसे पहला सवाल ही भगवान से आप कौन हैं क्यों हैं सवालों की झड़ी लगा दी। तरह तरह से बच्चों को खिलौनों से बहलाने की तरह कोशिश की गई मगर पुरुष जितना बड़े होते गए समझदारी से भगवान को चुनौती देने का काम करने लगे। पुरष को उसकी समझदारी को टक्कर देने को महिला बनाई गई जो वास्तव में नासमझ थी जैसा कहा जाता है उनका दिमाग एड़ी में होता है मगर भगवान ने हर नारी को बनाते समय सब से समझदार काबिल सुंदर होने का तमगा थमा दिया। इतना ही नहीं उनको इक अतिरिक्त गुण भी दिया गया पुरष को मूर्ख समझने और बनाने का , अपने आधीन करने का और अपने बीच भी हर महिला को खुद से कमतर समझने की सोच साथ देकर दुनिया में भेजा गया। जिस जिस व्यक्ति को ये राज़ समझ आया कि महिला नासमझ होने के बावजूद भी उनको उल्लू बनाती हैं और दासी कहलाती है पर राज़ वही करती है उस पुरुष ने महिला के जाल में फंसना स्वीकार नहीं किया अविवाहित रहने का निर्णय किया या शादी कर बैठे तो मौका देखते ही पिंजरा छोड़ उड़ गये। जिनकी हार जीत की बात चुनाव में दांव पर है वो ऐसे ही पुरुष हैं। भगवान को भी अपनी धर्मपत्नी से हर बात की आज्ञा लेनी होती है जबकि उन जनाब को रोकने टोकने वाला कोई नहीं है। 
   
       महिला मां बनकर पत्नी बनकर बहन बनकर या फिर दोस्त बनकर भी पुरुष को सुधारने को हाथ धोकर लग जाती है और पहला काम ही पुरुष को कुछ नहीं जानते नासमझ और किसी काबिल नहीं हो खुद मानना और उसको मनवाना होता है। कुछ पुरुष भी इसी तरह के होते हैं जो सभी पर अपनी राय थोपते हैं ये कह कर कि जो आपको लगता है करना चाहिए नहीं ठीक है जो हम कहते हैं आपको वही बिना चाहे भी करना चाहिए आपकी ही भलाई की बात है। भलाई करने का ठेका लेकर औरों की ज़िंदगी उनके ढंग से जीने नहीं देना अपने आप में समस्या है समाधान नहीं। महिलाओं को आपकी दुखती रग पता चल जाए तो बार बार उसी को दबाती हैं और आपके ज़ख्म सीने की बात करती आपके ज़ख्मों को कुरेदती रहती हैं कभी ज़ख्म भरने नहीं देती। शल्य चिकिस्या की शुरुआत किसी वैद्य ने नहीं नारी ने की होगी , महिलाओं के पास अचूक हथियार होते हैं जिसका कोई लाइसेंस नहीं लिया जाता बाकी कोई हथियार असफल हो सकता है आंसुओं का वार खाली नहीं जाता है। भगवान महिलाओं के साथ रहे हैं पुरुषों को खामोश करवाने को अन्यथा अपने भगवान को निशब्द करने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। समझदार होना ठीक था अपनी समझदारी का दिखावा करना ठीक नहीं था। आपको महिलाओं से बचना है तो उनकी नासमझी का उपयोग करना सीखना होगा , महिला को समझदार नहीं समझते हुए भी समझदार होने की बात झूठ ही सही कहकर काम चलाना होगा। ये जो नेता भगवान बना फिरता है इसी कला का माहिर उस्ताद है और आप सबसे बहुत पहले भगवान से आकर ये पाठ पढ़ चुका है। शेर और बिल्ली की कहानी याद है बिल्ली ने शेर को सब ढंग सिखला दिए तो शेर उसी को खाने को झपटा तब बिल्ली ऊपर पेड़ पर चढ़ गई। शेर ने कहा मौसी जी अपने मुझे ये गुर नहीं सिखाया है। बिल्ली बोली क्योंकि अगर सिखलाती तो आज कैसे बचती। इंसान की फितरत है अपने बनाने वाले को ही मिटाना चाहता है सरकार भी इसी ढंग से शासन करती है। मुंबई में येड़ा बनकर पेड़ा खाने की कहावत मशहूर है आपको समझनी होगी।

      चालाक लोमड़ी से चालाकी से पेश आना होगा और भोले बनकर नासमझ और अभिमानी की महिला या नेता को मज़ा चखाना होगा। अपने जीतना है इसलिए हार जाना होगा क्योंकि हार कर बाज़ी जीतने वाले बाज़ीगर कहलाते हैं। बाज़ीगरी क्या है भगवान खुद समझाते हैं , अपनी पत्नी को बिना बात रूठने पर मनाते हैं और इस तरह सब जानते हुए अनजान बन कर मौज मनाते हैं। बाकी खुद सोचोगे तभी बात बनेगी अब आप भी घर जाओ भगवान को भी नींद आई है खुद सोना है पत्नी को जाकर कहना है सो गई क्या इस तरह सोई हुई नारी को जगाते हैं। राज़ की बात जानते हैं सोई हुई महिला सोती हुई भी सचेत रहती है इस मुलाकात की बात पता चलने मत देना वर्ना पछताने से हासिल कुछ नहीं होगा। अपनी सुरक्षा खुद करनी होगी भगवान भरोसे मत रहना भगवान भी बेबस हो सकते हैं शादीशुदा हैं और साथ साथ रहते हैं। 
    

Sunday, 14 April 2019

खुद को कितना तबाह किया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    खुद को कितना तबाह किया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

         ये हम पर है क्या सबक किस से सीखा है। उपदेशक लोग जो हम लोगों को कहते हैं खुद अमल नहीं करते हैं। इक बात तय है भगवान खुदा जो भी कोई जहां भी है उसने दुनिया बनाई होगी अच्छी बनाई होगी इसको खराब किसी अल्लाह ईश्वर ने किया हो संभव नहीं है। हम इंसानों ने बर्बाद किया है नर्क किसी और जगह नहीं है यही हमारा बनाया हुआ नर्क ही बहुत है। हम मतलब की बात समझते हैं बिना मतलब की नहीं समझना चाहते हैं। चालाक लोग धर्मगुरु बनकर उपदेशक बनकर राजनेता बनकर हमसे जिन राहों पर चलने की बात कहते हैं खुद उन पर कभी नहीं चलते। हम देख कर नहीं देखते समझ कर नहीं समझते और बेकार जिन बातों को करना अच्छा लगता है नहीं करते किसी डर से कि मौत के बाद कोई सज़ा मिलेगी। हम जिस तरह ज़िंदगी जीते हैं उसको क्या समझते हैं किसी सज़ा से कम तो नहीं है। और जो लोग मनमानी करते हैं जैसे चाहते हैं जीते हैं उनको मरने की चिंता नहीं होती मौत के बाद क्या होगा इसी चिंता में जीना छोड़ना भला समझदारी की बात है। भगवान किसी को कोई रोक टोक लगाना चाहता तो खुद वो नहीं संभव होने देता जब उसी ने सभी कुछ बनाया है तो उपयोग करने को बनाया है। समझाने वाले कह भी गये सकल पदार्थ हैं जग माहीं कर्महीन नर पावत नाहीं। मरने की चिंता छोड़ जीना शुरू करते हैं। मेरी बात मानों साधु संतों की बातों का कोई भरोसा नहीं भरोसा किया जा सकता है तो उन पर जिनको जीना आया और जिन्होंने ज़िंदगी को जिया भरपूर जिया हम तो जीते जी भी मरते रहे हैं। ज्ञान व्यान की बातें किताबी हैं लिखी रहने दो क्या करना क्या नहीं अपने आप से पूछो। ये नहीं खाना उधर नहीं जाना जाने कितनी बंदिशें बंदों पर बंदों की लगाई हुई हैं ऊपर वाले की कोई बंदिश नहीं उसने अपनी मर्ज़ी से सोच समझ से अच्छाई बुराई को परखना और सही राह चलने को दुनिया में भेजा था। सरकारी कनून अपनी तिजौरी भरने को बनाये हुए हैं जैसे उसी तरह से कुछ लोग भगवान की दुकानदारी करने लगे खुद भगवान से नहीं मिले आपको हमको मिलवाते हैं इसकी कमाई खाते हैं। ये बिचौलिये का दलाली का धंधा किसका बनाया हुआ है ,उनकी दुकानों पर वो सामान है ही नहीं जिसको बेचते हैं। सच बताओ किसी जगह आपको ईश्वर खुदा अल्लाह वाहेगुरु मिला कभी न मिलेगा कभी। 

           इंसानियत से अच्छा धर्म कोई नहीं मगर उसकी शिक्षा कोई नहीं देता क्योंकि उस में मुनाफा कुछ भी नहीं है। कमाई और खुद सब हासिल करने को हमको धर्म के नाम पर लड़वाते हैं बांटते हैं क्या ऊपर से कोई लेबल लगा आया है कौन किस धर्म का है। आदमी आदमी बनकर नहीं रहता खुदा बनने की चाहत रखता है , आपको भय दिखला अपने को ऊंचा बनाने वाले कोई साधु संत सन्यासी नहीं होते हैं। जिनको दुनिया की चाह नहीं जाकर पहाड़ों पर जंगल में धूनी रमायें देवी देवताओं की कथाओं की तरह , मगर खुद विलासिता की चाहत आपको सादगी की नसीहत ये हेराफेरी है। हम सब जान सकते हैं अच्छा क्या है बुरा क्या है किसी के समझाने की ज़रूरत नहीं है ऊपर वाले ने विवेक देकर भेजा है मगर अपनी समझ से नहीं चलना किसी और की समझ से आंख बंद कर चलना क्या अनुचित नहीं। भगवान ने आपको दिमाग दिया है उसका उपयोग करने को न कि अपनी सोच समझ ताले में बंद कर किसी के झांसे में आकर अनचाही राहों पर चलते जाने से। किस मंज़िल की चाहत है जिसका कोई अता पता ही नहीं इक सपना बेचते हैं सपनों के सौदागर। मगर हम देखते हैं हमारे बीच कुछ लोग अपनी राह चलते हैं जीते हैं ज़िंदगी गुज़र मर भी जाते हैं पर हम क्या करते हैं जीते ही नहीं मरने की आहट से घबराते हैं जबकि मौत आनी है आती है। सोचना कोई मौत का फरिश्ता खुदा ईश्वर का अल्लाह का भेजा लेने आएगा तो ऊपर वाला मिलते क्या सवाल करेगा जी लिया जी भर के। नहीं हम तो स्वर्ग जन्नत की चाहत में जी सके ही नहीं ये कहोगे तो हंसेगा वो भी। बेकार आयु गुज़र दी खाया पीया कुछ नहीं गलास तोड़ा बारह आना वही बात है। गाइड फिल्म देखी थी कांटों से खींच कर ये अंचल तोड़ के बंधन बांधी पायल कोई ना रोको दिल की उड़ान को , दिल वो चला ओ ओ आज फिर जीने की तमन्ना है आज फिर मरने का इरादा है। मरने की घड़ी आएगी मर लेंगे अभी तो जीना चाहिए खुद को मार मार जीना ज़िंदगी नहीं है। जियो खुद सबको जीने भी दो यही मानवता कहलाती है लेकिन हर कोई न खुद जीता है न औरों को जीने देते हैं सब लोग। खुद को कितना तबाह किया है और कितना करना है आपकी मर्ज़ी है।

Saturday, 13 April 2019

कलयुग की आत्मकथा ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया

      कलयुग की आत्मकथा ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

   शानदार वातानुकूलित मॉल के हॉल में स्वयं कलयुग सफ़ेद रंग का चोला धारण कर बाकायदा भीतर आने की महंगी टिकट खरीदने वालों को अपनी आत्मकथा सुना और दिखला रहे हैं। मान लिया गया है कि ये इस युग के भगवान हैं और इनकी अराधना आरती पूजा पाठ सब कुछ दे सकता है। पहले अध्याय में बात सत्ययुग की बताई थी फिर कैसे युग बदलता गया विस्तार से समझाया था। यहां सभी देवी देवता रहा करते थे धर्म भी इक गरीब की झौंपड़ी में रहा करता था उसका कोई अपना महल नहीं था मगर उसका ठिकाना हर दिल में हुआ करता था। माता पिता थोड़ा पढ़े लिखे होते थे मगर उनकी समझ ऊंची हुआ करती थी बच्चे माता पिता को गुरु भगवान से बढ़कर मानते थे और घर कितना छोटा भी होता दिल सभी के बड़े हुआ करते थे। तब घर में बच्चे भाई ताऊ चाची सब मिलकर रहते थे। घर में रौनक चहल पहल रहती थी मधुर वाणी सुनाई देती थी कोई शोर नहीं होता है धीमी आवाज़ भी सब को सुनाई देती थी। मन साफ थे और रूखी सूखी खा कर भी कोई कमी नहीं महसूस होती थी। अहंकार स्वार्थ जाने किधर से आकर सब के भीतर रहने लगे और भाई भाई अलग होने लगे बच्चे माता पिता से दूर जाने लगे सभी अपनी अपनी दुनिया बसाने लगे। घर बड़े और ऊंचे आसमान को छूने वाले बनते गए सामान बढ़ता गया घर में इंसान को रहने को दो गज़ जगह भी अपनी नहीं मिलती है। कभी जिन माता पिता के घर आंगन में सब बच्चे भाई बहन उनके साथी दोस्त सखी सहेली खेला करते थे उन्हीं माता पिता को बच्चों के घर में आकर समझौता कर वक़्त बिताना पड़ता है। पिता के घर अधिकार से सब रहते थे बच्चों के महल में रहना है तो बड़े बूढ़ों को सलीका सीखना होता था और जीने को सब सहना पड़ता है। आधुनिकता और तथाकथित सभ्यता के विकास ने बाग़ बगीचे छीन गमले की सीमा बना दी थी पेड़ पौधे सब का अपना सभी कुछ बदल गया है छांव तलाश करते हैं तो दरख्तों से आग बरसती लगती है। पत्थर के लोग क्या हुए जो देवी देवता हुआ करते थे सभी बेजान पत्थर के बन गए हैं। लोग इंसान को प्यार नहीं करते पत्थरों की पूजा का आडंबर करते हैं धर्म जिस गरीब की झौंपड़ी में रहा करता था उसे शासन ने हटवा दिया है और जगह जगह अधर्म को स्थपित कर उनको धर्मस्थल घोषित कर दिया है। अब किसी भी ऐसी जगह कोई खुदा कोई भगवान कोई देवी देवता रहता नहीं है उनका भेस धारण कर मुझ कलयुग के अनुयायी मालामाल हो रहे हैं। सब मेरी इबादत पूजा करते हैं और पाप पुण्य का भेद बचा नहीं है। 

                युगों की दास्तान सुनाने में जितना समय लगेगा उतना जीवन बाकी नहीं है किसी के पास भी , सब सांसों की गिनती को जीना समझते हैं सांस सांस की कीमत चुकानी पड़ती है। बीती बातों को जानकर क्या होगा गुज़रा हुआ ज़माना वापस लौटता नहीं कभी। अपने जो खोया है बहुत मूलयवान था जो संजोया है कौड़ी का भी मोल नहीं है अभी आज की बात आज पर ही चर्चा करते हैं। कलयुग आया तो चोरी लूट डकैती अन्याय अत्याचार होने लगा ऐसे में इक चालाक आदमी ने कलयुग को सत्ययुग बनाने की बात की और सत्ता के शिखर पर चढ़ गया। उसने सभी को चोर अपराधी गुनहगार घोषित कर दिया और हर किसी पर पहरा लगाने का उपाय करने लगा। चोरी से बचने को सब को आदेश दिया अपना धन पैसा सोना चांदी हीरे मोती सभी कीमती सामान बैंक  में जमा करवाना है और सभी बैंकों की चाबी खुद अपने पास रख ली हैं। उसने घोषित किया है वही अकेला चौकीदार बनकर देश की रखवाली करेगा। और अपने काम में वह इधर उधर भागता फिरता है इस भरोसे पर कि जब हर खज़ाने की चाबी उसी के घर सुरक्षित हैं तो कोई चोर चोरी कैसे कर सकता है। मगर उसको इस बात का पता नहीं है कि घर घर में कोई महिला पत्नी बनकर घर की रखवाली किया करती है जबकि उसकी पत्नी घर में रह नहीं सकती है। अब ऐसे लोगों के घर यार दोस्त जब मर्ज़ी बिना रोक टोक घुसते रहते हैं घर की कोई मालकिन देखने को दरवाज़ा बंद करने को नहीं है। अब चौकीदार के घर से राज़ के दस्तावेज़ चोरी हो जाते हैं लोग बैंकों का खज़ाना लूट भाग जाते है मगर चाबियां सुरक्षित हैं इसलिए चौकीदार चोरी लूट को मानने से इनकार करता है। चौकीदार अब अपनी बिरादरी कुनबा बढ़ाना चाहता है और दावत देने लगा है आप भी चौकीदार बनने की घोषणा कर दो। हर कोई उनका रुतबा देख मैं भी चौकीदार घोषित कर रहा है। 

              आज की कथा का अंत इसी बात पर करते हैं कि जो देश करोड़ों देवी देवताओं का हुआ करता था क्या उसका भविष्य चौकीदारों का देश शहर बस्ती होना विकास की बात हो सकता है। क्या इस बात पर ताली बजाई जानी चाहिए आप सभी से वही इक दिन सवाल करेगा। चौकीदार होना क्या बुरी बात है क्या चौकीदार इंसान नहीं होते हैं उनको शासक नहीं बनाया जा सकता है। ऐसे में इक छोटे से शहर की अदालत ने जाने क्या समझ कर निर्णय सुनाया है चौकीदार से आठ घंटे से अधिक काम नहीं लिया जा सकता है और उसको छुट्टी भी मिलनी चाहिए। चौकीदार की छुट्टी की बात से कितनों को पसीने आने लगे हैं कोई छुट्टी नहीं चाहता है क्योंकि चौकीदारी ऐसा कर्म है जिस में जागते रहो की आवाज़ लगाने को छोड़ कोई काम नहीं करना होता है और आजकल गली गली चौकीदार की रिकार्डेड आवाज़ गूंजती रहती है और चौकीदार मज़े लूटता रहता है। त्याग की बात हो तो हर कोई ऐसा त्याग करने को व्याकुल है। हींग लगे न फटकरी और रंग भी चौखा इसी को कहते हैं। 

   ( अभी कथा या आत्मकथा शुरू होनी है इसे आप किताब की शुरुआत की लिखी व्याख्या समझना )


Friday, 12 April 2019

कॉमेडी चाहिए भाइयो बहनों ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  कॉमेडी चाहिए भाइयो बहनों ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

      पांच साल में हमने क्या किया सब जानते हैं। अभी तक सभी नेताओं ने आपको निराश किया उदास किया मैंने पहली बार इतिहास का नया अध्याय लिखा है कॉमेडी करने का कीर्तिमान स्थापित रचा है। किसी भी नेता ने शायद इस बात को समझा ही नहीं कि हंसना हंसाना कितना महत्वपूर्ण कार्य है। हास्य कलाकार आपको दुःख दर्द परेशानी भूलकर खुश होना सिखलाता है। साहस का काम है ऊल जुलूल बातें हरकतें करना खुद अपने आप का उपहास बनवाना और सबको मज़ाक उड़ाने का अवसर उपलब्ध करवाना। सच बोलना कोई कठिन काम नहीं है सफ़ेद झूठ बोलना वो भी इस वास्तविकता को जानते हुए कि लोग झूठ को समझते हैं और हंसेंगे हर झूठ पर। शुरुआत ही जिन अच्छे दिनों के ख्वाब से की थी जुमला नहीं था मज़ाक था देश की जनता के साथ। दिन अच्छे बुरे नहीं होते हैं दिन सभी दिन और रातें सभी रातें होती हैं , कभी दिन में अंधेरा छाता है कभी रातों को चकाचौंध रौशनी की जगमगाहट भी होती है। हालात जिनके अच्छे उन्हीं के दिन रात अच्छे होते हैं। विश्व भर के लोग हैरान हैं जिस देश के सेवक या चौकीदार की इतनी शान आन बान हो उसकी गरीबी रईसी से बढ़कर होगी। देश सेवा देश में रहकर नहीं दुनिया भर की सैर करने से ही संभव है ये किसी को कभी मालूम नहीं था। अब इस से अच्छी बात क्या हो सकती है कि कोई नेता अपने किये वादे निभाने में सफल नहीं हो तब भी उसके नाम का शोर और गुणगान करने वाले वास्तविकता से आंखें मूंदे हुए हों। 

       मुझे समझ आई है ये बात कि देश को शिक्षा रोज़गार स्वास्थ्य सेवाओं पीने का पानी बुनियादी सुविधाओं से अधिक मनोरंजन और कॉमेडी की ज़रूरत है। ज़िंदगी के दुःख दर्द परेशानियों को फ़िल्मी नायक की तरह सिगरेट के धुएं में उड़ा देना वही जानता है जो विवाह करता है मगर घर बार की मुसीबत से जान बचाता पत्नी को बीच मझधार छोड़ देता है। देश को भी उसी तरह से ही भंवर में ला खड़ा किया है अब उनको बचाने वाला दिखाई देता है वही जिसने डुबोया या डुबोने के कगार पर लेकर खड़ा किया है। लता दीदी गाती थी ऐ मेरे दिल ए नादां तू ग़म से न घबराना , इक दिन तो समझ लेगी दुनिया तेरा अफसाना। मेरा अफसाना भी दुनिया याद रखेगी , अफसाना लिख रही हूं दिल ए बेकरार का आंखों में रंग भरके तेरे इंतज़ार का। हम दर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे , हर दिल में मुहब्बत की इक आग लगा देंगे। देश की जनता को दर्द की आदत है सहना जानती है दर्द का रिश्ता सबसे करीब का नाता होता है। आशिक़ हो या माशूका जो भी दर्द देता है तड़पाता है उसी ज़ालिम पर और भी प्यार आता है। मैंने भी जनता को ही नहीं विपक्षी दल वालों को ही नहीं खुद अपने दल के लोगों को भी इतना सताया है कि उनको रात भर सपने भी मेरे आते हैं और नींद चैन सब छीन लिया है। शोले फिल्म का असली नायक गब्बर सिंह ही सबको याद है ठाकुर जय वीरू पीछे रह जाते हैं। बसंती की बात अलग है और अब बसंती मेरे कहने पर नाचती ही नहीं खेत मज़दूर बनकर गेहूं की कटाई तक करती है। देश कितना बदल गया है कि मेरे शासन में हेमा मालिनी फसल काटने को भी हैलीकॉप्टर से उड़कर जाती है। आपको हंसी आने लगी है यही मेरी सफलता है हंसते हंसते कट जाएं रस्ते दुनिया चाहे बदलती रहे। 

                इक पंजाबी कहानी है रात को गांव में कई महमान अचानक चले आये तो घरवाली ने पति को बताया घर में पकाने को कुछ नहीं है खाना खिलाना होगा तो क्या करेंगे। पति ने कहा शराब की बोतलें रखी हैं बस उनको जी भर कर इतनी पिलानी है कि उनको होश ही नहीं रहेगा कि भूख भी लगी है और सुबह होते ही सब लेकर खूब खिला देंगे। और यही किया जिस से अगली सुबह महमान बेहद खुश थे और बड़ी अच्छी सेवा हुई कह रहे थे। मेरी कॉमेडी का नशा घर की बनी देसी दारू से कम नहीं है लोग खुश होकर मुझी को फिर से वोट देकर अपने मनोरंजन का शो जारी रखेंगे कपिल शर्मा के शो की तरह दोबारा हिट रहेगा मेरा भी खेल तमाशा। बताओ भाइयो और बहनों आपको कॉमेडी पसंद है या नहीं है कॉमेडी चाहिए कॉमेडी चाहिए बोलो एक सौ पचास करोड़ देशवासिओ आपको कॉमेडी पसंद है। जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे।

Thursday, 11 April 2019

अच्छे लोग हैं अच्छाई के बिना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   अच्छे लोग हैं अच्छाई के बिना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

     कितना बदल गया है ज़माना कभी लोग खुद अपने आप में बुराईयां देखते थे अपने आप को छोटा समझते थे आजकल सब मानते हैं दावा करते हैं हम से अच्छा कोई नहीं है। चलो कुछ पुरानी यादों को दोहराते हैं। बुरा जो खोजन मैं चला बुरा न मिलिया कोय , जो मन खोजै आपना मुझ से बुरा न कोई। नानक नीच करे विचार वारिया न जावां एको वार जो तुध भावे साई भली कार। अब अपने भीतर कोई नहीं झांकता है सब अंदर से जो हैं उसको छुपाते हैं उस पर पर्दा डालते हैं उसको ढक देते हैं सफ़ेद चादर से या कोई खूबसूरत कालीन बिछाकर। लिबास सुंदर हैं बातें भी भली भली करते हैं बस आचरण और कर्म ही उस जैसे कोई नहीं करता है। बदल गई है परिभाषा , पहले मानते थे धन गया कुछ नहीं गया स्वास्थ्य गया कुछ खो गया और चरित्र नहीं बचा तो कुछ भी नहीं रहा सब खो बैठे हैं। अब उल्टी धारणा है चरित्र खोने को समझते हैं कुछ भी नहीं गया बेकार की चीज़ थी किसी काम की नहीं थी गई तो अच्छा हुआ और स्वस्थ्य जाने पर लगता है सभी तो रोगी हैं मैं अकेला तो नहीं फिर धन है तो डॉक्टर बड़े बड़े अस्पताल महंगी दवाएं हैं ही बस
धन पास रहना ज़रूरी है। जब नैतिकता के मापदंड बदल चुके हैं तो सत्यमेव जयते भी मिटा देना चाहिए और सत्य को इक मूर्ति की तरह किसी जगह सजाकर टांग देना चाहिए सूली पर चढ़ा हुआ ताकि लोग देख कर सबक सीखें कि सच बोलना मुसीबत को घर बुलाना है। चलो हर तरफ निगाह डालते हैं कौन क्या है क्या होना चाहता है और क्या होना चाहिए था।
    
         शुरुआत राजनीति से इसलिए करते हैं कि आजकल यही सब के सरों पर सवार है।  नीति की बात है नहीं बाकी अनीति राजनीति बन गई है देशसेवा की कोई बात नहीं बस हर कोई अपने बारे सोचता है सत्ता जाना लगता है जान जाती है। इतना मोह है सत्ता का कि अच्छा बुरा कुछ नहीं सूझता बस सत्ता पानी है किसी भी तरह से। ऊपर जाने को कितना नीचे गिरना पड़े सब तैयार हैं। माला फेरने से भगवान नहीं मिलते राम राम रटते रटते उल्टा मरा मरा कहने लगते हैं। आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास की बात है देश समाज को बदलना था बदल खुद ही गये हैं। आदर मान पाने की वास्तविकता है कि नेता शब्द सबसे गंदी गाली बन गया है फिर भी लोग खुश हैं गाली बनकर भी। अपमान जब आदर समझा जाने लगता है तब अच्छाई की राह चलता कौन है।

       आधुनिकता की दौड़ ने पागलपन को समझदारी नाम दे दिया है और हर कोई रेगिस्तान में भागता चला जा रहा है पानी कहीं नहीं है इक चमकती हुई रेत है जिसको पानी समझते हैं और प्यास है कि बुझती नहीं है। कितनी दौलत कितना सामान जुटा लिया व्यर्थ में ज़रूरत कितनी है नहीं समझते हैं। शिक्षा पाई थी डॉक्टर बनकर रोग का रोग उपचार करने से कमाई करने को मगर कमाई करने को रोगियों का उपचार करना ही मकसद नहीं बनाया बल्कि रोग और रोगी बढ़ाने और बनाने लगे हैं। दवा उपचार रोगमुक्त करने को नहीं पैसा बनाने को होने लगा है। किसी को नहीं खबर जाना किधर था जा रहे किधर हैं। शिक्षक विद्या का कारोबार करने लगे हैं और पढ़ा रहे हैं उल्टी पढ़ाई जिस में अच्छे इंसान और सेवा करने की बात नहीं है पढ़ाई को साधन बनाकर स्वार्थ सिद्ध करने का पाठ पढ़ाते हैं। अधिकारी देश समाज का कल्याण निर्माण नहीं पद का उपयोग क्या दुरूपयोग कर जो करना उसको छोड़ जो करना नहीं उसी को करने लगे हैं। कोई कारोबार करता है या कोई भी सेवा करता है मकसद ईमानदारी की कमाई नहीं अधिक से अधिक की लूट होने लगा है। उचित अनुचित की चिंता नहीं सही गलत मार्ग की चिंता नहीं सब राह से भटके हैं मगर चाहते हैं मंज़िल पाना। मंज़िल क्या है कोई नहीं समझता न जानना चाहता। लोग सभी कहते हैं किसी का बुरा नहीं करते हम पर जब सभी लोग अच्छे हैं शिक्षित हैं जानकर हैं ज्ञानी हैं विवेकशील होने का दावा करते हैं धर्म को मानते हैं तब अच्छाई कहीं आस पास नज़र आती क्यों नहीं है।

Wednesday, 10 April 2019

सही-गलत सच-झूठ की परख ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       सही-गलत सच-झूठ की परख ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      शायद इस से अधिक अचरज की बात कुछ नहीं हो सकती है कि हम बातें अच्छे लोगों की बढ़ाई की करते हैं मगर वास्तव में जब कभी चयन करना होता है तब हम अच्छे भले व्यक्ति को अकेला छोड़ बुरे और चालाक व्यक्ति का पक्ष लेते हैं। दबंग लोगों से दहशत महसूस करने के कारण हम बुराई का विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं। जब अच्छे बुरे की परख ही नहीं करते जीवन में तो अपना विधायक सांसद चुनते समय विवेक की बात का कोई सवाल ही नहीं उठता है।  हम कैसे कैसे लोगों को चुनकर विधानसभाओं में और संसद में भेजते हैं ये कोई राज़ की बात नहीं है। बबूल बोकर आम खाने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। बात इतनी सी नहीं है हम मतलबी लोग हर गलती का दोष औरों को देते हैं। पंडित जी रिश्ता करवाते हैं कुंडली मिलाते हैं तब कहते हैं क्या जोड़ी है इन से अधिक तालमेल किसी का बैठ नहीं सकता है। साल दो साल बाद निभती नहीं दोनों में मतभेद होते हैं तो उसी पंडित जी का कथन बदलते देर नहीं लगती। इनके गृह ऐसे हैं इसी बात से इक दूजे के दुश्मन बने हैं पहले तमाम उपाय करवाते हैं और उनमें समझ बन जाती है तो पंडित जी की बात बन जाती है अन्यथा उनकी कुंडली में संबंध टूटने का योग बताया जाता है। शुरुआत में बताना था मगर हंसते हैं भाग्य की बात है बदली नहीं जाती शादी नहीं करते तो तलाक की नौबत नहीं आती। मुझे इक दोस्त ने शादी नहीं करने की सलाह दी थी मगर मैंने नहीं मानी वो वकील थे मगर वकालत करते नहीं थे फिर भी मुझे तलाक दिलवाने का वादा शादी से पहले ही करते थे। मगर उनकी घोषणा सच साबित नहीं हुई और हम पति पत्नी लड़ते झगड़ते साथ साथ हैं और परेशान होकर भी खुश हैं। अलग होने की बात नहीं सोचते और हैरानी की बात ये है दोनों मानते हैं मेरा क्या है पर बिना मेरे जीवनसाथी का जीना मुश्किल हो जायेगा। एहसान करते हैं साथ साथ रहने का , अगर खुदा न करे नौबत अलग होने की आती तो उस दोस्त को अवसर मिल जाता कहने का मेरी सलाह नहीं मानी उसी का नतीजा है। सच तो ये है दुनिया की कोई जोड़ी अच्छी और बढ़िया नहीं होती है और तमाम लोग विवाह करने के बाद समझौता कर तालमेल बिठा लेते हैं जिनको ये कला नहीं आती उनकी ज़िंदगी नर्क बन जाती है मगर पंडित जी किनारे खड़े तमाशा देखते हैं।

          राजनीति में अच्छे लोग संभव ही नहीं है लोग मानते है इसलिए जैसे भी मिलते हैं नेता उनको निर्वाचित करने की गलती किया करते हैं। पसंद की दुल्हन या दूल्हा ढूंढने वाले अकेले रह जाते हैं मगर देश की सत्ता सदा सुहागन है कभी बिन ब्याही नहीं रहती कभी कोई संबंध विच्छेद की बात नहीं होती और विधवा होना उसका भाग्य नहीं है। राजा राजशाही के समय भी शासक की मौत होने पर नये शासक की ताजपोशी उसी समय की जाती थी। विवाह में भी कभी ऐसा हो जाता है कहते हैं किसी की घरवाली मरी और किसी के भाग्य खुले जिसकी शादी नहीं होती थी। शादी का लड्डू खाकर पछताना ठीक है बिना खाये पछताते हैं तो मलाल रहता है। दलों का गठबंधन इसी तरह का होता है स्थाई नहीं होता है दिल नहीं मिलते हैं। आखिर वही बात समझ आती है चाहने से सभी कुछ नहीं मिलता और किसी को भी सब कुछ मिलता नहीं है। खुश कोई नहीं नेता को और बड़ा ओहदा नाम शोहरत चाहिए जनता की बदनसीबी है कहने को क्या नहीं घर में मगर अपना कुछ भी नहीं की हालत है। पति की कमाई पर जीना चाहती है मगर उसकी कीमत नहीं समझती पति को भगवान समझना होता है। जब से महिलाओं ने कमाना शुरू किया है मामला और उलझ गया है पति पत्नी की कमाई को भी अपनी कमाई मानता है जैसे घरेलू महिला अपने पति की कमाई को अपना मानती है। पति बेशक अपना वेतन लेकर पत्नी को दे सकता है पत्नी कभी ऐसा नहीं करती है। ताना देती है मेरी कमाई पर नज़र रखते हो क्या यही देखकर शादी की थी। दो लोग इक जैसे कभी नहीं होते हैं पति पत्नी तो मतलब ही इसका उद्दाहरण जैसा है इक पूरब इक पश्चिम। ये अच्छा है शादी जीवन भर की होती है कोई समय सीमा अवधि निर्धारित नहीं कोई दवा की तरह तारीख नहीं कोई पांच साल बाद पंजीकरण का नवीनीकरण का नियम नहीं अन्यथा सब उलझन सुलझाने में उलझे रहते। कई रोग लाईलाज होते हैं जीना उपचार नहीं होता है और डॉक्टर समझाते हैं इसकी चिंता मत करो इसको भूल जाओ कोई परेशानी की बात नहीं है।

                हम हर बार सरकार बनाते हैं पछताते हैं मगर पांच साल बाद वोट की ताकत पर इतराते हैं। क्या समझा है मिंट भर की बादशाहत है उंगली पर वोट देने की स्याही लगते ही सामान पर बिक चुका है का लेबल लगने की हालत बन जाती है। समझदार लोग कहते रहे हैं कोई भी शासक हो हमें क्या हमने तो शासित होना है हम चुनते हैं और जिसको बनाया वही खुद दाता और हम सबको भिखारी समझता है। वास्तव में राजनैतिक दल सभी सत्ता के भूखे हैं जनता से देश से उनको कोई मुहब्बत प्यार जैसा कुछ भी नहीं है। सत्ता मिलते ही पति वाला रुतबा हासिल हो जाता है और हर पल अपनी हवस मिटाते हैं अधिकार की तरह। कर्तव्य की बात किसी समझौते पर लिखवाई नहीं है चुनावी वायदे कहते हैं उनको झूठ समझना ज़रूरी है। आशिक़ आसमान से चांद तारे तोड़ने की बात महबूबा को करता है मगर चांद तारे कोई छूने की बात कभी हुई है देखी है। लोकतंत्र चांद तारे तोड़ने का सुनहरा ख्वाब है। राजनीति का कोई धर्म ईमान नहीं होता है सत्ता ही सभी कुछ है आपको कितनी भी समझ हो सही-गलत सच-झूठ की परख आना मुमकिन नहीं है। राजनेताओं का कहना है सब मुमकिन है देश की समस्याओं के समाधान को छोड़कर और उनको जो चाहिए मिल जाता है। जो चाहते कर लेते हैं वायदे निभाने को छोड़कर।

              लाल रंग पूंजीवाद के खिआफ़ नहीं है भगवा कोई किसी का विशेषाधिकार नहीं है। हरा पीला नीला केसरिया गुलाबी दो रंगा सब इक बाहरी लिबास बन गये हैं।  किसी को किसी विचार किसी धर्म से जोड़ना उचित नहीं है। राजनीति रंग बदलने में गिरगिट को पीछे छोड़ चुकी है। किसी नेता का किसी भी विचारधारा से कुछ भी नाता नहीं है। मतलब को धर्म रंग क्या भगवान बदलने को राज़ी हैं। समाजवादी कहलाने से सब की समानता की बात उद्देश्य नहीं बन जाता है। राजनेता लिबास बदलने में पहले कभी इतने माहिर नहीं थे और महिलाओं पर तोहमत लगती थी इतनी जल्दी पोषक बदलने और फ़ैशन पुराना हो जाने को लेकर। अब नेताजी की शानदार पोशाक इतिहास में दर्ज होने के काबिल है। दलबदल विरोधी कानून क्या बनाया है कि अब दल बदलना दिल बदलना दोनों खेल लगते हैं। दिल दिल की बात समझता नहीं दिल दिल हाय मेरा दिल की आवाज़ गूंजती रहती है , दिल के डॉक्टर दिल बचाने को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाए हैं क्यंकि दिल की बीमारी से कमाई बहुत है। दिल ने क्या कहा है दिल से जैसे गीत बेकार लगते हैं एंजिओग्राफ़ी से पता चलता है रुकावट दिल की धमनी में खून बहने नहीं देती ठीक से। डॉक्टर हर बाधा को हटाना जानते हैं अगर कोई आपके दिल का रास्ता रोके है तो मामला लाख दो चार लाख का समझना चाहिए। दिल के खेल में पैसा हमेशा महत्व रखता आया है।  दिल लेना देना भी राजनेताओं के झूठे वायदे की तरह है कोई किसी को दिल देता नहीं लेता नहीं न किसी के दिल में कोई बसता है दिल तो पागल है दिल चाहता है दिल ने क्या कहा है दिल से। मन की बात आजकल की बात नहीं है सदियों से मन भटकता रहा है कोई किसी को मन की बात बतलाता नहीं है। मन ही जनता है मन की बात मन चंचल है और पल भर टिकता नहीं है। मन की बात मन ही में रह जाती है और किसी दिन मन का पंछी उड़ जाता है। इस तरह चर्चा शुरू होती है कहीं से चलते चलते आखिर में उसी मोड़ पर पहुंच जाती है जहां दुनिया की बात झूठी और अध्यात्म की नासमझ आने वाली बात सही लगने लगती है। 

Tuesday, 9 April 2019

समस्या सरकार है जनता समस्या नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

 समस्या सरकार है जनता समस्या नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

     जब तक आपको समस्या ही समझ नहीं आएगी कोई समाधान मुमकिन ही नहीं है। वास्तविकता कुछ और है और माना जाता है कि देश की जनता ही असली समस्या है जबकि समस्या जिनको है वही लोग जनता ही वास्तव में देश हैं। अब इस बात को समझने के बाद विचार करेंगे तभी हैरानी होगी कि कितनी अनुचित बात कही जाती है कि जनता की आबादी उनकी अनपढ़ता उनका नियम कानून पालन नहीं करना समस्या है। वास्तव में समस्या सरकार उसके अधिकारी और अधिकारी कर्मचारी का तौर तरीका है जो अनावश्यक रूप से जनता पर ऐसे नियम कानून लादने की बात करते हैं जो धरातल पर संभव ही नहीं हैं क्योंकि जब आप सार्वजनिक जगह शौच नहीं करने की बात करते हैं सार्वजनिक शौचालय हर जगह बने होने चाहिएं क्योंकि ये इक कुदरती ज़रूरत है। ऐसा तो नहीं उचित कह सकते कि नगरपरिषद सड़क पर ही कूड़ा जमा करने की मनमानी करती रहे और आम लोगों को स्वछता का उपदेश देती रहे। अंधे नहीं हैं और बार बार बताया गया है मगर उनको लगता है हम अधिकारी हैं परिषद के अध्यक्ष हैं जो फरमान जारी करें मानना होगा। जब आपको लगा लोगों को शहर भर में कार पार्किंग पर निराधार रोक लगा दी। कोई सीमा नहीं और कहीं भी पार्किंग की व्यवस्था की नहीं लंबे चौड़े फैले बाज़ार में। संभव ही नहीं कि किसी एक ही जगह पार्किंग में कार खड़ी की जाये और मीलों दूर तक समय और बाकी परेशानी की चिंता को लेकर उनको विचार करने की क्या ज़रूरत जिनके लिए हर नियम कानून बदला जा सकता है। अर्थात जितने भी नियम हैं जनता पर लागू होने हैं नेताओं अफसरशाही को कोई रोक टोक नहीं।

                   नेताओं का काफिला चलता नहीं रौंदता हुआ दौड़ता है और कोई गतिसीमा नहीं होती है। उनके लिए बाकी का रास्ता बंद करना इक आदत है कोई मज़बूरी नहीं है। कहने को वीवीआईपी रुतबा लाल बत्ती कल्चर नहीं मगर दहशत है जैसे जनता के सांसद विधायक नहीं कोई डाकू गिरोह के लोग आने जाने वाले हैं। हर जगह सत्ता की मनमानी है उनको किसी को वोट हासिल करने को ज़मीन देनी है कौड़ियों के भाव तो शहर का नक्शा प्लान बदलते कोई वक़्त नहीं लगता है। हर शहर में धर्मशाला धार्मिक स्थल संस्थाओं के भवन क्या क्या नहीं बनने दिया प्लान नक्शा कोई नहीं पूछता है। इतना भी नहीं नियम अनुसार ऐसे जगह को व्यौपार दुकानें बनाने की इजाज़त नहीं मगर वास्तव में पहली शुरुआत ही कमाई करने को यही सब बनाने से होती है। इक धोखा है छल फरेब है ऐसा करने को जनहित की बात कही जाती है। हर सरकार नियम बदलकर कभी कुछ अपनों को सरकारी ज़मीन का मालिकाना अधिकार देती है तो कोई किरायेदार दुकानों की नाम की कीमत लेकर जायदाद का मालिक बनवा देती है। ऐसा लगता है देश की तिजोरी कोई मुफ्त का मिला खज़ाना है हर सत्ताधारी के पास लूटने लुटवाने को। किसी संस्था या ख़ास आदमी का नाजायज़ घोषित निर्माण वैध करने को कानून बनाया जाता है। ऐसे तमाम कार्य करने वाले आम नागरिक पर तलवार लटकाये रहते हैं कोई निर्माण सालों बाद भी कोई कमी बताकर जुर्माना लगाने को। और ये जुर्माना तीस चालीस साल पहले किसी विभाग की बेची संपत्ति पर कोई नया विभाग लगाना चाहता है जो उस समय बना भी नहीं था न ही तब उनका कोई नियम कानून लागू था। ज़मीनों के अधिग्रहण की कहानी सब जानते हैं मिलीभगत से कई गुणा कीमत देकर जिनको घर बनाने को प्लॉट्स बेचे उनसे कितने साल बाद वसूली की जाती है। सरकारी है विभाग का घोषित मकसद जो होता है उसके विपरीत कार्य किये जाते हैं। सस्ता घर देने नहीं महंगे प्लॉट्स घर का कार्य किया जाता है।

         शिक्षा स्वास्थ्य और पीने का पानी शहर की गली सड़क बनवाना सभी हद दर्जे की मनमानी लापरवाही और अराजकता का आलम है। इस देश में इंसान की जान की कोई कीमत नहीं है। इक अजीब चलन है हर अधिकारी कुछ लोगों को जाने किस नियम कानून के हिसाब से अपनी कोई समिति बनाने में शामिल करते हैं जो बिना कोई अधिकार नियमानुसार मिले सत्ता का अधिकार उपयोग करते हैं और समाज में हैसियत बनाते हैं। ये लोग कोई जनता के पक्ष के नहीं होते न ही नागरिक की बात करने को होते हैं। इनका काम दफ्तरों में बैठ शान दिखाना और अधिकारी के निर्देश पर लोगों को बरगलाना होता है। जब कोई अधिकारी तबादला होने पर जाता है तो इनको चेक देकर जाता है जाने किस अधिकार का उपयोग करते हुए और ये अमीर लोग खैरात लेने को शान समझते हैं। और भी बहुत बातें हैं कोई अंत नहीं इनकी बातों का आचरण का।

      सरकार विभाग अधिकारी सरकारी कर्मचारी नियुक्त किये जाते हैं जनता की समस्याओं का समाधान करने और उसको बुनियादी साहूलतें उपलब्ध करवाने को जबकि ये इसी कार्य में बाधा बनते हैं अड़चन पैदा करते हैं। कानून इनके लिए फुटबॉल की तरह है जिसको जिधर मर्ज़ी ठोकर लगाते हैं। देश सेवा जनता की भलाई क्या ईमानदारी क्या इनको मानवता का भी पास नहीं होता है और अधिकार पाकर कल्याण करना नहीं मकसद शासकीय ताकत का बेजा इस्तेमाल करना हो गया है। कभी इनको धार्मिक जगहों पर देख सोचते हैं क्या इनको वास्तव में किसी धर्म में आस्था है कोई भगवान खुदा अल्लाह वाहेगुरु इनको सच्चाई अच्छाई की राह दिखला सकता है। सबसे बड़ी विडंबना इस बात की है कि इनको अपने अमानवीय कार्यों और निर्दोष नागरिकों को परेशान करने का कोई खेद नहीं होता है बल्कि ऐसा करना इनको अच्छा लगता है। भगवान शायद इनसे डरता है अन्यथा इनको कभी तो कोई एहसास करवाता ही।

Monday, 8 April 2019

अंधा कुआं कैद लोग ( समझदारी पागलपन ) डॉ लोक सेतिया

   अंधा कुआं कैद लोग ( समझदारी पागलपन ) डॉ लोक सेतिया 

       चुनाव भी हैं धर्म भी साथ साथ है। पार्क से लेकर बाज़ार क्या दफ्तर क्या संजीदा गुफ्तगू राजनीति पर होती है। किसको किसने खड़ा किया किसका क्या आधार है कौन किस वर्ग जाति धर्म का कौन पैसे वाला कौन कितना ताकतवर। शाम को धर्म की सभा में झूमते गाते हैं देने वाली एक मां मागत लाख करोड़। मुझे भीख मिल रही है मेरा काम चल रहा है , मां बच्चों को भीख नहीं देती है कोई मां कभी नहीं चाहती बच्चे को भिखारी बनाना। लगता है राजनीति हो धर्म हो हमने कुछ भी नहीं सीखा न इबादत करना आया न सियासत करना आया है। स्वाभिमान क्या होता है सोचते ही नहीं और तुलसी की रामायण पढ़ते हैं कि जिस जगह आपकी कदर नहीं आपकी चाहत नहीं उस जगह बदल सोने की बरसात भी करते हों तब भी नहीं जाना चाहिए। हम पढ़ लिख कर आधुनिक बन गये हैं मगर आत्मसम्मान भी होता है और आदर देना अनादर नहीं करने का क्या अभिप्राय है सोचता कोई नहीं। अवसरवादिता ने सब छीन लिया है। ज़रा विचार करते हैं हो क्या रहा है जबकि होना कुछ और चाहिए था। 

               शिक्षा की दशा की कोई बात नहीं करते किसी भी दल वाले। स्वस्थ्य सेवाओं की रोटी की गरीबी की बदहाली की बात नहीं बात है तो झूठे सच्चे वादे जनता को भीख देने की। सबको जीने को बुनियादी सुविधा अधिकार की तरह मिलने की कोई बात नहीं करता है सभी दाता बनकर खैरात देने का दावा करते हैं। देता कौन है क्या किसी नेता ने अपने घर से एक पाई भी दी है इनकी सभी की चाहत जनता की दौलत पर खुद ठाठ बाठ से जीने की है सेवा करने का नाम है नज़र मेवा लूटने पर है। अगर इसको देश की समाज की भलाई समझते हैं तो देशभक्ति देश सेवा का अर्थ बदलना होगा। 

                   पहले राजा जंग लड़ते थे अपनी सत्ता का विस्तार करने को मगर जीत हार किसी की भी हो जंग में मरा आम लोग करते थे। आज भी देश के सैनिक शहीद होते हैं और सत्ताधारी उनकी शाहदत की राजनीति का बेहूदा काम करते हैं। कोई दुर्घटना होती है हादिसा होता है किसी बेगुनाह को क़त्ल कर दिया जाता है तो हम उसकी जान की कीमत मांगते हैं मुआवज़ा लेकर खामोश हो जाते हैं। खुद अपने प्रियजन की मौत की कीमत लगवाते हैं ये जाने कैसे नाते संबंध हैं , क्या हर रिश्ता कुछ लाभ उठाने तक का है।

    कैफ़ी आज़मी की इक कविता है , कुछ लोग इक अंधे कुंवें में बंद थे। ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें लगाते थे , हमें आज़ादी चाहिए हमें रौशनी चाहिए। जब उनको कुंवें से बाहर निकाला गया तो बाहर की खुली हवा रौशनी को देख कर वो लोग घबरा गये आज़ाद होने की बात उनको भूल गई और उन्होंने वापस फिर उस अंधे कुंवें में छलांग लगा दी। नीचे जाने पर फिर वही नारे दोहराने लगे। हमें आज़ादी चाहिए हमें रौशनी चाहिए। यही हम हर बार करते हैं चुनाव आते हैं हम बाहर निकल सकते हैं अंधेरे से मगर हम वपस उसी अंधी गली में चले जाते हैं। जीवन को भी हमने इक कैद बनाया हुआ है और अपनी बनाई बंद कोठरी से निकलते हुए घबराते हैं। कायरता अभिशाप है हमने उसको तकदीर बना लिया है और वरदान समझते हैं। कोई मसीहा कभी किसी को बाहर निकालता नहीं है लोग सदियों से मसीहा की राह देखते जीते हैं मर जाते हैं।

    जो भी खैरात चाहते हैं उनको हर घर के दरवाज़े पर जाकर भीख देने की अपील करनी होती है। कोई भिक्षा दे देता है कोई फटकार लगाता है हट्टे कट्टे होकर हाथ फैलाते शर्म नहीं आती है। मगर हम किस से भीख मांगते हैं जिनको हमने बनाया है , सेवक बनकर हमीं को सीख देते हैं ये सब नेता अधिकारी। पलते हैं हमारे से लेकर कर या किसी बहाने से खज़ाना भर। यही बात धर्म की है भला किस जगह किसी धर्म के भगवान खुदा यीशु मसीह या अल्लाह या वाहेगुरु ने कोई धर्म स्थल बनाया हो अपने लिए। हम बनवाते हैं जेब से दान चंदा देकर और हर दिन चढ़ावा चढ़ाते हैं फिर उसी से हाथ फैलाकर भीख मांगते हैं , बताओ कब किस भगवान ने ऐसा समझाया है। कर्म करो फल मिलने की बात है अपने हाथ जगननाथ की सलाह है। किसी भगवान को कोई भवन नहीं चाहिए अगर उसी का बनाया सब कुछ है तो अपने बनाये इंसानों से आसरा नहीं मांगता है। पहले तय करो कौन दाता कौन भिखारी है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है जिनकी बात हम करते हैं आज़ादी की लड़ाई की कुर्बानियों की कब उन्होंने जनता नागरिक को भिखारी बनने की बात कही थी। ये आज़ादी का अपमान है जो हम अधिकार नहीं खैरात की चाह रखते है।


Sunday, 7 April 2019

बंधनमुक्त ( आत्मचिंतन ) डॉ लोक सेतिया

              बंधनमुक्त ( आत्मचिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

        कुछ कहना नहीं कुछ सुनना नहीं , कोई भी गवाही नहीं देना चाहता कुछ भी सफ़ाई किसी के आरोप पर नहीं देनी है। मंज़ूर है जिसको जैसा भी लगता हूं मैं। जन्म से लेकर बंधता गया रिश्तों के कितने बंधनों में मगर सब जानते हैं दुनिया का हर नाता छोड़ना होता है जिस दिन आपको अपने संग रहना जीना होता है। कौन समझता है किस की ज़िंदगी किस किस मोड़ से कैसे गुज़री है। हम सभी जानते हैं हमने कैसे जीवन का सफर तय किया है। किसी को भी सभी मिलता नहीं जो भी चाहते हैं और जो मिलता उसकी कीमत कोई भी नहीं समझता है। नहीं आज अब मुझे कोई गिला कोई शिकायत कोई नाराज़गी या कोई ख़ुशी संबंधों को लेकर नहीं है। अच्छा नहीं मगर शायद इतना भी बुरा नहीं कि मतलबी और अवसरवादी बन जाऊं। ऐसा बन कर बड़े चैन से सुखमय जीवन जी सकता हूं मगर इक ज़मीर है जो इजाज़त नहीं देता। कभी किसी रिश्ते का अनुचित लाभ उठाना नहीं चाहा है मगर मुमकिन है किसी को लगता हो मैंने किसी भी नाते को ठीक से निभाया नहीं है। वास्तव में इसी में उलझा हुआ खुद क्या हूं सोचने की फुर्सत इजाज़त दोनों नहीं थीं। अब मेरे पास कुछ भी नहीं है खाली दामन है और काटों से उलझा हुआ है कोई फूल कोई उपहार कुछ भी नहीं है मेरे आंचल में छुपाया हुआ। अब आंचल फैलाना भी नहीं है स्वाभिमान आत्मसम्मान को छोड़ कर। बस चाहता हूं सभी से बिना किसी आरोप किसी व्यर्थ की बहस क्या उचित क्या अनुचित किस का क्या फ़र्ज़ निभाना बाकी है की सारी बातों को छोड़ ख़ुशी ख़ुशी जीना केवल खुद बनकर। बगैर किसी संबंध का आवरण ओढ़े केवल इक आम इंसान बन कर बचा हुआ जीवन जीना। क्या ऐसा करना कोई गुनाह होगा क्या हर दिन खुद नहीं कुछ होकर जीना ही नियति है। 

                 किसी को छोड़ने की बात नहीं है कहीं भी जाने की भी बात नहीं है कोई साधु संत का चोला नहीं पहनना क्यंकि मैं नहीं हूं जो डाकू रहा और फिर योगी बन गया। मैं तो हमेशा यही था और कुछ बनना नहीं चाहा जबकि सभी चाहते थे मुझे केवल जो हूं नहीं रहना कुछ और बनना चाहिए जो मैं था नहीं। जैसे कोई किसी नाटक का किरदार निभाता है। नाटकीयता जीवन का अंग होती होगी मगर मुझसे अपना किरदार उस तरह से नहीं निभाया गया जैसे दुनिया चाहती थी। इस के सिवा किसी से कोई मतभेद नहीं था और न कोई हो सकता है , सब को अपनी ख़ुशी से जीना और सबको जीने देना इस साधारण सी बात में परेशानी क्या है। कोई भी खराब नहीं लगता मुझे सभी अच्छे लगते हैं और खुद अपनी कमियां बुराईयां जानता हूं। नहीं बन सकता कोई देवता कोई मसीहा कोई इंसान जिस में कोई खामी नहीं हो। जैसा भी अच्छा बुरा मैं हूं बदलना संभव नहीं जीवन की ढलती बेला के आखिरी पड़ाव पर। भागना नहीं है जीवन की कठिनाइयों से डरकर घबराकर मगर उनको स्वीकार कर उनके साथ तालमेल बनाकर रहना है। साहस की कमी होगी जो ज़िंदगी की बातों से जंग लड़ना नहीं आता है पर कायरता नहीं है उनसे बचने को भाग नहीं सकता हूं। दुनिया मेरी नहीं है जाने किसकी दुनिया है मगर मुझे इसी पराई दुनिया में सभी के बीच खुद अपने साथ रहना है। ये चाहना भी अगर अपराध है तो अपराधी होकर सज़ा भी मंज़ूर होगी जो भी मिलेगी सुनाई जाएगी। अलविदा कहने का समय नहीं आया अभी जब आया तब औपचारिकता निभाऊंगा क्षमा मांगने धन्यवाद करने की। अभी रुक कर थोड़ा समझना है निर्णय करना है आराम भी करना है थकान मिटानी है तब बाकी सफर को आगे बढ़ना है।

Saturday, 6 April 2019

बुरा होता है भला होना ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     बुरा होता है भला होना ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

        अच्छे होने में बुरा क्या है ये समझना समझाना चाहता हूं।  अच्छी सूरत भी क्या बुरी शय है , जिसने डाली बुरी नज़र डाली। जिनकी पत्नी बेहद खूबसूरत होती है उनके चेहरे पर हमेशा इक ख़ौफ़ छाया रहता है। इक उपन्यासकार दत्त भारती लिखते थे जिसकी पत्नी की सुर्खी का रंग जितना लाल होगा उसके पति के चेहरे का रंग उतना पीला होगा। अमीरी भी इक अभिशाप होती है हर किसी की नज़र लगने का डर होता है। बात इतनी नहीं है इक धर्म की कथा बताती है जिसकी लोग बुराई करते हैं उसके पाप कम होते जाते हैं इसलिए किसी दुश्मन की नहीं बुराई अपनों की करनी चाहिए। नेताजी को समझाओ कितनी बुराई औरों की करते हैं अपनों को देखते तो शर्मिंदा हो जाते। मुझे अपने बुरा होने या बुरा समझे जाने से कोई परेशानी नहीं है।  

  मैं हमेशा से जनता था मुझ जैसे लोग किसी को भी पसंद नहीं आ सकते हैं। आज ऐसा कमेंट पहली बार किसी दोस्त का पढ़ने को मिला , अच्छी पोस्ट कम पसंद की जाती हैं। उनको नहीं पता उनका ये एक कमेंट कितना महत्व रखता है दिल से धन्यवाद आपका दोस्त। ये पोस्ट आपकी दोस्ती के नाम लिखना उचित लगा। 
यूं इक लिखने वाले दोस्त ने पहले भी बताया था आपकी पोस्ट पर कमेंट लिखते लोग कतराते हैं कि कहीं उनको सरकार विरोधी नहीं समझा जाने लगे। सच किसी का पक्ष लेता है न ही विरोध करता है सच केवल वास्तविकता बताता है बिना भेदभाव किये कौन अपना है कौन बेगाना है। जिस दिन सोच समझ कर गणित लगाकर फायदा नुकसान देख लिखने की ज़रूरत हुई लिखना छोड़ देना होगा। इक बात से कितने फ़साने याद आये हैं नये दोस्त कुछ दुश्मन पुराने याद आये हैं। हमने हर रंग के फूल अपने आंगन में सजाये हैं कागज़ के फूल कभी नहीं हमको भाये हैं। 

          किसी एक की बात नहीं है बहुत बार बहुत लोग पहले खुद किसी की बात बताया करते फिर कहते भाई ये लिखना मत आपस की बात है। उनको पता होता है मेरी आदत किसी की व्यक्तिगत आलोचना नहीं है और किसी का विरोध करना मेरा सवभाव नहीं है झूठ को सच कहना नहीं आता है। मेरी रचनाओं में सभी किरदार जीवन से जुड़े हुए हैं मगर कोई नहीं समझ सकता क्या किस को लेकर अनुभव किया है। कई साल पहले की बात है इक अख़बार की कोई बात उचित नहीं लगी तो उसी पर इक ग़ज़ल लिखी और सबसे पहले उसी अख़बार को भेज भी दी जो बड़े अच्छे सलीके से छपी भी। ग़ज़ल है :-

               इक आईना उनको भी हम दे आये , हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं। 

     मुझे लगता था कोई चाहता है जिस बात की चर्चा हो उसको लेकर कहता है राज़ की बात है किसी को नहीं बतानी। भाई राज़ अपने पास रखते क्यों फाश किया है इरादा राज़ को सरेआम करने का है। मगर इक बात नहीं समझते लोग कि मुझ जैसे नासमझ लोग भी इतना तो समझते ही हैं और जब कोई मेरे लिखने की झूठी तारीफ करते हैं पता चलता है। आजकल भी कई लोग कहते हैं मिलने पर आपकी कलम कमाल लिखती है मगर नहीं सवाल करता क्या पढ़ा जो अच्छा लगा क्यंकि मालूम है उनका साहित्य से कोई नाता नहीं है और वास्तव में उन्हें खबर नहीं कि मैं लिखता क्या हूं। क्लिनिक पर कोई अलमारी में साहित्य की किताबों को देख कहता है क्या पढ़ने को हैं अब क्या समझाया जाये लोग किताबों को घर की सजावट को भी उपयोग करते हैं दिखाने को मगर मेरे पास थोड़ी गिनती की किताबें हैं पढ़ता हूं जब भी मन चाहता है बार बार। कोई मांगता है तो देना संभव नहीं क्योंकि फिर वापस मिलने की बात कठिन लगती है। 

        जीवन भर यही समझा है हर कोई जब किसी को अच्छा आदमी बताता है तो इक लहज़ा तंज का छुपा रहता है। जो बात कही नहीं जाती वो होती है दुनियादारी नहीं समझता इस से फासला रखना ठीक है। जिन को लोग भला इंसान कहते हैं वो हमेशा अकेला नज़र आता है कोई उसके साथ चलना नहीं चाहता कुछ कदम भी। शोहरत नाम की और लोग पसंद करें इसकी चिंता कभी नहीं की है फिर भी लोग समझते हैं हर किसी को नाम की चाहत होती है। सच कहा जाये तो अपना नाम बदनाम अधिक है जिसने कभी मुझे पढ़ा नहीं वह भी मेरे लेखन पर अधिकार पूर्वक राय दिया करते हैं। किसी को समझना क्या इतना सहज हो सकता है मैं खुद अपने आप को नहीं समझ पाता ठीक से और जो लोग खुद से अजनबी हैं मुझे समझने की बात तो क्या मुझी को आकर समझाते हैं कि आप क्या हैं कौन हैं। मुझसे अधिक मुझे कौन जान सकता है , ऐसा फ़िल्मी डायलॉग है सफर फिल्म का नायक कहता है मैं तुम्हें तुम से बेहतर जानता हूं और नायिका जवाब देती है मेरी खुशनसीबी है। बेशक इतना प्यार कोई किसी से करेगा तो उसको उससे बढ़कर समझेगा भी। मगर कब ऐसा वास्तविक जीवन में होता है। यहां हर कोई सोशल मीडिया पर इसी बात का आलाप लगाए है कि कोई मुझे समझता ही नहीं। नेताजी को भी लगता है लोग जानते हैं पर समझते नहीं उनकी असलियत कुछ और है। समझदार को इशारा बहुत है हम झूठ को झूठ कहने पर बुरा मानते हैं क्योंकि हमने सीखा है काने को काना नहीं एक आंख से देखने वाला कहना चाहिए। अंधों में काना राजा होता है अंधे को अंधेरे में कहा जाता है बहुत दूर की सूझती है। 

        अभी तक मुझे खुद नहीं समझ आया जो लिखा कितना सार्थक विषय है। बात निकली है तो किधर को पहुंचती है नहीं पता होता। ये कलम भी अब मनमानी करती है लिखना नहीं जो लिखवाती है , कहते हैं आजकल कलम लिखती नहीं कोई सरकार है जो लिखवाती है। उनकी कलम सभी को भाती है जो झूठ को सच का मसीहा बतलाती है राग दरबारी की कला नहीं सबको आती है। अपनी कलम अभी भी ऐसा नहीं करती शर्माती है लाज खाती है। दिया है बुझी हुई बाती है तेल महंगा है दिल जलाती है।

सरे-राह चलते चलते ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

      सरे-राह चलते चलते ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया 

     ज़माना बदल चुका है , मीना कुमारी की पाकीज़गी की कहानी पुरानी है। खुले आम आरोप लगाती थी इन्हीं लोगों ने ले लेना दुप्पटा मेरा , सिपहिया से गवाही लेने को कहती थी जिसने बीच बाज़ार  छीना था दुप्पटा उसका। अर्थात तब का दरोगा छेड़खानी भी करता था तब भी पूछने पर झूठ नहीं बोलता था। मान लिया करता था कि हां मैंने छीना था दुप्पटा।  तभी मीना कुमारी जंगल के बनाये आशियाने में भी खुद को असुरक्षित नहीं समझती थी। कोई डर नहीं लगा और अकेली इक वीरान जगह में मौसम है आशिकाना गुनगुनाती थी कोई लुटेरा  नहीं था लूटने वाला। अब मीना कुमारी हो या राजकुमार हो भरे बाज़ार में रोक कर सड़क पर पार्क में गली में खेत खलियान में सिनेमा हाल से लेकर किसी सभा में शामिल होने पर अपने होने का सबूत देना लाज़मी है। कुछ इस तरह से समझ सकते है सवाल जवाब हाज़िर हैं। 

      आप कौन हैं पूछा जाता है। नाम बताते हैं तो फिर सवाल नाम नहीं हैं कौन हिंदु मुस्लिम देशभक्त या कोई मुजरिम हैं भागे हुए। करते क्या हैं कुछ तो करते होंगे और क्या सोचते जा रहे थे सच सच बताओ कोई योजना सरकार का विरोध करने की बनाई है क्या। ये किस रंग की कमीज़ किस रंग की पतलून और भीतर क्या पहना हुआ है बनियान किस कंपनी की क्यों पहनते हैं। किस अभिनेता की समझाई बात को समझा है। पहले ये बताओ आप ज़िंदा हैं या मर चुके हैं आपकी संख्या बताती है सरकारी फाइल में आपकी मौत कभी की हो चुकी है। अपने घर से निकलते सूचित किया था किधर क्यों जाना है घर वालों को नहीं सरकारी विभाग को चौबीस घंटे पहले बताना होगा। आपकी आज़ादी ठीक है मगर आपकी सुरक्षा की बात है बिना बताये इधर उधर आना जाना उचित नहीं है। 

       रहते कहां हैं घर कब बनाया अपना है किराये का है या सरकारी ज़मीन पर अवैध बना हुआ है। मकान ईंट सीमेंट से बना है अपने खरीदा या बनाया कोई सबूत होगा विरासत में मिला तो बाप दादा कब से रहते थे। कितने कमरे कितने सामान और क्या क्या निर्माण किया हुआ है। बाज़ार को जा रहे हैं तो खरीदना क्या है क्यों खरीदना ज़रूरी है और नकद लेना है उधार या फिर बैंकिंग द्वारा। चार किलो सब्ज़ी चीनी चाय पत्ती क्या कोई दावत है और दावत है तो सरकार को बुलावा भेजना था बेशक सरकार नहीं आती मगर सरकार को अपमानित नहीं कर सकता कोई भी। आपको पता है मौसम का हाल क्या है अगर बरसात हुई तो छाता साथ रखना चाहिए आपको। अकेले चलने समय इधर उधर ध्यान रखना है कोई खबर नहीं किस तरफ से कोई आपको नुकसान पहुंचा सकता है। सरकारी नियम कायदे आपकी खातिर ही बनाये हुए हैं अपने कितनी मिठाई कब कब खरीदी और खुद खाई या किसी को खिलाई का हिसाब साथ होना चाहिए तब और खरीद सकते हैं। 

     जो अभी तक होता रहा हमेशा नहीं होगा। आपको हर दिन बदलते नियम कानून को जानकर समझकर चलना चाहिए। कोई भी तकलीफ हो रोग चोट या एमरजेंसी आपको पहले तैयार रहना चाहिए आपकी जान की कोई कीमत नहीं है सरकारी हर बात की कीमत होती है। आजकल आम नागरिक को हर दिन साबित करना होता है सच्चा देशभक्त है। सत्ताधारी दल का सदस्य बनते खुद ब खुद सबूत मिल जाता है ऐसा समझा जाता है। पांच साल जिस नेता की बुराई करते रहे अगर वास्तव में उनके आचरण की अच्छी बातों को थोड़ा भी अपनाते तो जो आज दावा करते हैं मुमकिन है मगर विश्वास नहीं कि मुमकिन हो भी सकता है मुमकिन हो भी सकता था। आजकल उनकी बुराई करनी लगता है छूट गई है चुनाव निपटने के बाद फिर शायद शुरू करेंगे क्योंकि बुराई करने की बुरी आदत जाती नहीं है। अपनी रेखा बड़ी बनाना कठिन था तो उनकी छोटी करने को मिटाने की कोशिश करते रहे। अभी भी हुई लगती नहीं। जनता की इंतज़ार की रात अभी भी बीती नहीं है और याद आती है वही ग़ज़ल। शब-ए -इंतज़ार आखिर कभी होगी मुख़्तसर भी , ये चिराग़ बुझ रहे हैं मेरे साथ जलते जलते। 

Thursday, 4 April 2019

शादी का इंश्योरेंस का अधिकार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     शादी का इंश्योरेंस का अधिकार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

                हमारी सरकार महिलाओं पर मेहरबान रही है मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक पर ही नहीं जिन महिलाओं ने धर्म बदलकर मुस्लिम बने विवाहित पुरुष से शादी की उनकी भी काबलियत को समझा और उनको अपना बनाया है। संस्कार और संस्कृति की इक आधुनिक परंपरा की शुरुआत की है। बिना तलाक अपनी पत्नी को छोड़ने वाले को आदर्श स्थापित करने वाला महनायक घोषित किया गया  है क्योंकि  ऐसी महिला  को सीता जी की तरह त्याग किये जाने पर बनवास नहीं भेजा गया। फिर भी शादी पर संशय बना रहने की बात को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। महिला को बीच भंवर बेसहारा देखना अच्छी बात नहीं है , शायद दोबारा विचार कर उनकी दशा और सुरक्षा पर ध्यान देना ज़रूरी है। सरकारी दल की तरफ से फ़िल्मी सुंदरी महिला जगत से चर्चा कर वोट देने की बात समझा रही है। सुझाव देने की बात कही गई तो महिला मंडल की अध्यक्ष मांग सामने रखने लगी है।   

                       नेता जी आपकी कोई समस्या नहीं है। खुद अभिनय करती हैं और आपके नेता जी भी बहुत अच्छा अभिनय अच्छे होने का सफलता से करते हैं। कोई आपसे सवाल नहीं करता किसी और महिला का पति छीन लेने पर , कोई नेता जी से सवाल क्यों करेगा अपनी पत्नी को अधिकार नहीं देने और दुनिया की महिलाओं की चिंता जताने में विरोधाभास पर। मगर आज  नारी जगत जाग गया है अब बाकी कुछ भी नहीं चाहिए केवल एक अधिकार की मांग रखनी है सभी दल वालों के सामने। आरक्षण नहीं बराबरी नहीं कोई खैरात नहीं महिला होने पर किसी भी साहूलियत की। मगर इक नया कानून संविधान संशोधन द्वारा पारित करवाना लाज़मी है। शादी का पंजीकरण नहीं उसका इंश्योरेंस किया जाना चाहिए और उस में साफ़ किया जाना चाहिए कि जिस से विवाह कर रही है कोई महिला उस को जो है वही रहना और उसी के अनुसार महिला को सभी कुछ उपलब्ध करवाना हमेशा को तय किया गया हो। बहुत धोखे हैं गठबंधन में लड़की सोचती है कारोबारी है रईस है डॉक्टर है आईएएस है उद्योगपति है और सदा को ऐशो आराम का साधन है। मगर बाद में हालात बदल जाते हैं रईसी नहीं रहती धंधा मंदा हो जाता है या किसी कारण आर्थिक परेशानी होती है तो महिला को लगता है ठग लिया गया है। हीरा समझा था जिस पति को पत्थर निकला और कितना नुकसान हुआ कोई हिसाब नहीं जीवन भर का रोना घाटा ही घाटा। मुस्लिम महिलाओं को लिखित मिलता है भरपाई की राशि का भुगतान बाकी को अदालत कचहरी मगर ये भी तलाक के बाद ही। नहीं ये बड़ी नाइंसाफी है गब्बर सिंह मानते हैं तीन आदमी तीन गोलियां हिसाब बराबर।

                 विवाह गठबंधन होता है सात जन्म की नहीं एक जन्म की बात तो हो निभाने की , सुख दुःख की साथी मगर जब पति शासक बन जाता पत्नी जनता बनी रही राजा की रानी नहीं। सब जानते हैं भगवान ने हर पुरुष का नसीब किसी नारी से जोड़ा हुआ है और पति ऊंचाई छूता है पत्नी के भाग्य के कारण ही। हमने पूछा है पंडित जी से उन्होंने बताया है अगर अपनी पत्नी को तलाक दे देते तो नेता जी के भाग्य में नेता बनना ही नहीं मुमकिन था। जिसकी तकदीर ने उनको नाम शोहरत दी उसको क्या मिला , जाने को कितने धर्म स्थानों की सैर पूजा आरती करें मगर व्यर्थ है भगवान राम को भी यज्ञ करने को पत्नी सीता की सोने की मूर्ति बनवानी पड़ी थी। किसी दूसरे दल के नेता की ऊंची मूर्ति बनवाने से पहले पत्नी की बनवाते तो अच्छा था।  चलो जो बीत गई सो बात गई मगर इस बार महिला जगत को उनका शादी का इंश्योरेंस का अधिकार मिलना चाहिए और इस बार अच्छे दिन की तरह से बात से मुकरना नहीं है। इंश्योरेंस का सबूत मिलना ज़रूरी है आपके नेता जी को अपनी पत्नी को साथ लेकर वोट की भीख मांगनी चाहिए। जिसकी पत्नी संग नहीं कोई महिला उसको समर्थन देकर नारी जगत की एकता को ठेस कैसे पहुंचा सकती है। आपका पति से अलग रहना आपकी और आपके पति की मर्ज़ी या सुविधा हो सकता है लेकिन नेता जी की पत्नी की मर्ज़ी कब उनसे जानी गई है। देश की सभी महिलाओं को अपनी बहन की उलझन को सुलझाना चाहिए। आपको घर बनाना नहीं आता किसी का तोड़ कर अपना बनाना जानती हैं हम सभी घर बसाने की बात करती हैं। आपका क्या है आप किसी और की गेंहूं की तैयार फसल काटने को दराती लेकर चली जाती हैं जबकि आपको दराती क्या है ये भी पता शायद ही हो। नकली मज़दूर महिला बनना आसान है वास्तव में कभी नंगे पांव चलना पड़ा तो होश ठिकाने लग जाएंगे। मगर चुनावी खेल में सब मुमकिन है नेता जी पत्नी को मनाने जा भी सकते हैं सत्ता क्या नहीं करवा सकती। क्यंकि महिला जगत को आश्वासन नेता जी से नहीं उनकी धर्मपत्नी की ज़ुबान से चाहिए इंश्योरेंस मिलने को लेकर। बात भरोसे की है।

Wednesday, 3 April 2019

कुछ भी नज़र आता नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        कुछ भी नज़र आता नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   आंखें भी हैं , नज़ारे भी हैं। फिर भी दिखाई क्यों नहीं देते। इस देश की हालत कुछ इस तरह की है। ईलाज करवाते रहे सभी लोग डॉक्टर बदल बदलकर। कभी इस कभी उस पर ऐतबार किया कभी एक से बात नहीं बनी तो कुछ डाक्टरों की टीम के गठबंधन को भी आज़माया गया। नतीजा वही ढाक के तीन पात। जब जब जिस के पास गये उसने कहा मेरा चश्मा लगाओ फिर देखो हर तरफ खुशहाली है , बहार है चांदनी है ठंडी ठंडी हवाएं चल रहीं हैं। गरीबी भूख अन्याय अत्याचार जीवन की बुनियादी ज़रूरतों की कमी कहीं नहीं है। जनता का वहम है , जब देश का लाखों करोड़ का बजट है राजधानी की चकाचौंध है तो यह सब देखने की ज़रूरत क्या है। आंखों के डॉक्टर जानते हैं किस की दूर की नज़र कमज़ोर है किस की नज़दीक की। किसी को सफेद मोतियाबिंद है किसी को काला मोतियाबिंद की शिकायत है। काला धन की तरह काला मोतिया का ईलाज पहले करना होता है , फिर चाहे कोई अंधा हो जाये पर काला मोतिया नहीं रहने देना है। अब अगर बदकिस्मती से आंखों के किसी डॉक्टर को नज़र की समस्या हो तो उसका क्या कसूर है। फिर उसकी आपकी किस्मत ऊपर वाले के हाथ है। 
             किसी शायर ने कहा है , खुदा ऐसे एहसास का नाम है , रहे सामने और दिखाई न दे। और दुष्यंत कुमार कहते हैं , खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही , कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए। परेशानी यह है कि सबको सपनों में जीना नहीं आता अन्यथा धर्म वाले कब से स्वर्ग का जन्नत का सपना बेच रहे हैं। 

     तकनीक बदल गई है। अब आपको चश्मा लगाना नहीं पड़ता। आपकी आंख में मंहगा सस्ता हर दाम का देसी विलायती लैंस डाल देते हैं और आपको सब दिखाई देता है। अपने किस डॉक्टर से आंख बनवाई है इस पर निर्भर करता है। पिछली बार डॉक्टर ने कहा था मुझे आता है अच्छे दिन दिखाना। इस के बावजूद लोगों को कुछ भी फर्क नहीं दिखाई तो कमी ईलाज की नहीं है। आप खुद देखना नहीं चाहते खुशहाली , विकास के सपने।  आप आंख बंद कर ध्यान लगाएं और अच्छे अच्छे ख़्वाब बुनकर मस्त हो जाएं। आंख खोलते सामने कुछ भी नज़र नहीं आए तब भी खुद पर नहीं डॉक्टर पर भरोसा रखें , कहें जी हां वही नज़र आ रहा है जो अपने दिखाने को वादा किया था। हम भगवान के होने का विश्वास करते हैं , वो सामने नज़र आए इस बात की ज़िद नहीं करते हैं। भगवान और सरकार है , इसका भरोसा करना ज़रूरी है। लोग जब कहते हैं भगवान कहां है या सवाल उठाते हैं सरकार नाम की कोई चीज़ नहीं है यहां तो लूट भ्र्ष्टाचार और कुशासन दिखाई देता है तो समस्या खड़ी हो जाती है।

      ईलाज दोनों तरह से होते हैं। सर्जीकल का ज़माना है। ईलाज वादों की दवाओं से भी किया जाता है , लातों की ज़रूरत भी हो सकती है। स्कूल मास्टर और पुलिस का थानेदार तब तक पिटाई करता है जब तक छात्र और गुनाहगार तौबा नहीं कर लेते। आप भी तौबा कर लो उस आशिक़ की तरह , जिस प्यार में ये हाल हो उस प्यार से तौबा। जिस लोकतंत्र में बहुमत के वोट पाने वाले विपक्ष में बैठते हैं तौबा उस से। तौबा से याद आया हर सुबह तौबा करते हैं हर शाम जाम छलकाते हैं , नशा कोई भी हो छूटता नहीं है। सत्ता का नशा और बेईमानी का सुरूर सर पर चढ़ा रहता है। लाख कसमें खाते हैं नेता और अधिकारी छूटता नहीं है नशा। होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है। राजनेताओं पर सत्ता का खुमार चढ़ा रहता है सत्ता जाने तक। हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये। सागर में ज़िंदगी को उतारे चले गये। फिर चुनाव आये हैं मुद्दों की बात कहीं नहीं है , नाचने गाने झूमने ठुमके लगाने वाले बुलाए जा रहे हैं। देश की समस्याओं का यही समाधान हमारे सभी दल वालों को नज़र आता है। झूठ के ऐसे आइनों को तोड़ दो , इन में अब कुछ भी नज़र आता नहीं। जब सभी अंधे हों तब जो काना होता है उसी को राजा बना देते हैं। आंखे हैं मगर अंधे हैं और अंधेर नगरी चौपट राजा की कहानी है।
 

Tuesday, 2 April 2019

खुद दिल से दिल की बात ( आत्म मंथन ) डॉ लोक सेतिया

    खुद दिल से दिल की बात ( आत्म मंथन ) डॉ लोक सेतिया 


       शुरुआत कहां से करूं नहीं समझ पा रहा। बहुत तार उलझे हुए हैं ज़िंदगी के जितने सुलझाता हूं और भी उलझते जाते हैं। कोई भी दोषी नहीं है खुद मैं ही मुजरिम हूं अपना। अपने आप से प्यार नहीं किया हर किसी से चाहत की व्यर्थ की उम्मीद रखी। दोस्ती को धर्म ईमान समझा दोस्त बनाये भी मिले भी मगर कोई भी नहीं मिला जिसकी तलाश थी है और रहेगी जो दिल की बात जान जाये बिना कहे सुने ही। रिश्तों की दास्तान अजीब सी है हर किसी को शिकवा है शिकायत है अविश्वास है और जाने किस किस बात की मन में छुपी हुई कड़वाहट सभी को है लगता है। ज़िंदगी नहीं जैसे इक गुनाह किया है और कटघरे में खड़ा रहा आरोप सुनता सभी से। उम्मीद करना कोई बुरी बात नहीं लेकिन जब भी किसी रिश्ते से जो चाहते नहीं हासिल होता तो किसी से नफरत करना किसी को अपमानित करना अच्छा नहीं है। शायद मुझे भी रही है शिकातय कुछ लोगों से बस इतनी कि काश मुझे समझते थोड़ा साथ चलते तो मेरा अकेलापन तनहाई दर्द आंसू कम हो जाते और कभी कोई ख़ुशी मेरे दामन में भी होती थोड़ी सही। दस्तक फिल्म की ग़ज़ल बहुत पसंद रही है मुझे लगता है मेरी बात मेरी कहानी बयां करने को इक वही बहुत है।

          हम हैं मताये कूचा ओ बाजार की तरह , उठती है हर निगाह खरीदार की तरह। 

लिखना इक ज़रूरत बन गया खुद अपने आप से अपनी बात कहना अपने दर्द अपनी आहें अपने अश्क अपने हाथ से पौंछना। कोई दामन नहीं मिला जिस पर गिरते आंसू और मोती बन जाते कोई गोद नहीं मिली सर रखकर सोने को चैन से , कोई हमदर्द नहीं मिला कोई हमसफ़र नहीं मिला जीवन के अकेले सफर में जो चार कदम साथ साथ चलता बिना किसी बंधन के निस्वार्थ भाव से। किसी को समझा नहीं पाया और किसी को भी फुर्सत भी नहीं थी मुझे समझने की। काश मुझे अपने खुद के साथ रहने की ही इजाज़त मिल जाती मगर वो भी नसीब नहीं हुई। साथ देते नहीं निभती नहीं और अकेला होने की भी अनुमति नहीं ये जीना इक कैद की तरह है। इस पिंजरे से आज़ादी मौत ही शायद दे सकेगी मगर मौत भी चाहने से मिलती कहां किसी को। ज़िंदगी मिलती तो जी लेते मौत मिलती तो मर भी जाते इस तरह अधर में लटके रहने से अच्छा था। 

    अच्छा नहीं हूं मगर क्या इतना बुरा हूं कि हर किसी का तिरिस्कार मिलना भाग्य बन गया है। कोशिश बहुत की अच्छा बनने की मगर शायद हर किसी की कसौटी पर खरा उतरना संभव नहीं है। पल पल मरता रहा इसी कोशिश में फिर भी नाकाम रहा कोई भी नहीं जिसको वो सब दे पाता जो उसकी चाहत रही। आज देखता हूं कौन किस को क्यों अच्छा समझता है , जो किसी की ज़रूरत को पूरा कर सकता है हर कोई उसको अपना समझता है और जो लाख कोशिश करने के बाद भी किसी की चाहत ज़रूरत स्वार्थ को पूरा नहीं कर पाता है उस से किसी को प्यार नहीं है। रिश्तों का ये गणित मुझे नहीं पसंद आया बस कहने को नाम के नाते हैं निभाने को दिल से कोई अपना नहीं किसी का। इक कविता लिखी थी दोहराता हूं। 

               वो जहां ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

देखी है हमने तो
बस एक ही दुनिया
हर कोई है स्वार्थी जहां 
नहीं है कोई भी
अपना किसी का।

माँ-बाप भाई-बहन
दोस्त-रिश्तेदार
करते हैं प्रतिदिन
रिश्तों का बस व्यौपार।

कुछ दे कर कुछ पाना भी है
है यही अब रिश्तों का आधार।

तुम जाने किस जहां की
करते हो बातें
लगता है मुझे जैसे 
देखा है शायद 
तुमने कोई स्वप्न 
और खो गये हो तुम।

    लिखना मेरे लिये सांस लेना है बिना सांस लिये जीना संभव नहीं। अपनी इक ग़ज़ल भी फिर से दोहराता हूं इक बार यहां।

 खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ,
हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई।

इंसान की कीमत नहीं सिक्कों के इस बाज़ार में ,
सामान दुनिया का सभी की अब ज़रूरत बन गई।

बेनाम खत लिक्खे हुए कितने छुपा कर रख दिये ,
वो शख्स जाने कब मिले जिसकी अमानत बन गई।

मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां ,
कैसे बताएं अब तुम्हें ऐसी सियासत बन गई।
( मतलूब=मनोनित। तालिब=निर्वाचित )

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।

सब दर्द बन जाते ग़ज़ल , खुशियां बनीं कविता नई ,
मैंने कहानी जब लिखी पैग़ामे-उल्फ़त बन गई।

लिखता रहा बेबाक सच " तनहा " ज़माना कह रहा ,
ऐसे  किसी की ज़िंदगी कैसी इबादत बन गई।

जाने क्या सोचकर बहुत पहले इक छोटी सी कहानी लिखी थी। इक पत्रिका से निर्देश मिला उसको थोड़ा विस्तार से लिखने को दोबारा भेजने की उम्मीद के साथ मगर दोबारा अपने ज़ख्मों को छेड़ना कठिन लगा और नहीं लिख पाया। नहीं मंज़ूर था खुद अपनों से शिकायत खुले आम करना। ये लिखी थी कहानी।

                   चाहत अपनो की ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

              मन में तो ये बात से रही है। मगर कहूं किस से , कौन समझेगा। कितने साल हो गये हैं मुझे घर से दूर रहते , मगर किसी ने कभी मुझे घर आने को नहीं कहा। अपने ही घर जाने को भला बुलाता है कोई बेटे को बेटी को विवाह के बाद मायके आने को बुलाया जाता है। मगर जब भी हुई बात किसी ने पूछा ही नहीं घर आना है कब बस औपचारिकता निभाई सबने आप तो गांव छोड़ शहर में खुश रहते हो गांव आने की बात की नहीं किसी ने। यूं इसकी ज़रूरत भी नहीं है , मेरे घर जाने पर कोई रोक तो लगी नहीं है। बस इक एहसास रहता है कि जिस तरह मुझे घर अपनों की कमी लगती है उदास हो जाता याद करते कोई होता जिसको मेरे घर से दूर होने की कमी खलती नहीं मिलने पर उदास होता मेरी तरह कोई। माता पिता को बहनों से कितना लगाव है अपनापन है तीज त्यौहार पर हर अवसर पर याद किया जाता है कोई उपहार भेजते हैं कभी लिवाने को जाते हैं कभी आने को खत लिखते हैं। सभी बहनें आती हैं मिलती हैं सभी से गली की गांव की सखियों से और पुरानी यादें ताज़ा करने के साथ नई कुछ मधुर यादें साथ ले जाती हैं। 
        
      मेरा मन क्यों तरसता है ऐसे मोह को जैसे बेटी को लेकर चिंता रहती है कैसी होगी खुश तो है और सोचते हैं कितने दिन से मिलने नहीं आई न हम मिलने जा पाये। मेरे लिए भी होता नहीं पास होने का थोड़ा एहसास किसी को तो कभी। केवल इसी लिए कि मैं लड़का हूं और अपने घर गांव से दूर होना पड़ा है काम करने के लिए मुझे बेगाना बना दिया गया लगता है। घर जाकर भी परायापन लगता है जब पूछते हैं कैसे आना हुआ कब तक रहना है जैसे घर का सदस्य नहीं कोई बिन बुलाया महमान हो। नहीं जानता कोई नहीं महसूस करता कोई भी घर गांव के याद कर कितना उदास हो जाता हूं मैं। अपना सब कुछ रिश्तों का अपनापन खो कर पाया क्या है उदासी अजनबीपन का दर्द का अनुभव। अपने घर से मुझे पराया कर दिया गया है क्या पढ़ लिख शिक्षित होने की ये कीमत है चुकाने को ज़रूरी है। कितने दोस्त हैं जो बाहर रहते हैं वापस घर गांव आते हैं तो उल्लास का अनुभव होता है। मुमकिन है मेरा सफल नहीं होना मेरी कोई कमी हो मगर कोई अगर ऐसे में साथ देने का भरोसा देता और हौंसला बढ़ाता तो शायद सफलता पाना आसान होता मगर जब सभी नाकाबिल और जाने क्या क्या कहकर हीनभावना के भंवर में अकेला छोड़ देते हैं तो सफल होना असंभव हो जाता है। हर किसी ने मान लिया है कि मुझे इसी शहर में रहना है और उस अपने घर से मेरा कोई नाता नहीं है। मुझे जाने किस जुर्म की ये सज़ा मिली है कितने जन्मों के लिए। काश मैं लड़का नहीं लड़की बनकर जन्म लेता और बहनों की तरह अपनी उदासी की बात कह सकता भीगी आंखों से। मगर मेरे आंसू आना जैसे कोई कायरता ही नहीं अपराध भी है जिस पर ताने कसे जा सकते हैं। पुरुष की भावनाओं को क्या कोई नहीं समझता है। मेरी बहनों को लगता है पीहर पर उनका हक है अच्छा है मगर मुझे भी अधिकार अपनापन मिलता तो कितना अच्छा होता। 
     मुझे उच्च शिक्षा के लिए बचपन से ही बाहर रहना पड़ा , बाकी भाई बहन पढ़ने लिखने की रुचि नहीं रखने के कारण गांव और घर में रहे। ये बात कभी कभी खलती है कि मुझे याद दिलवाया जाता था मेरी पढ़ाई पर दो सौ रूपये महीना खर्च होता है और पांच साल का हिसाब पंद्रह हज़ार बना हुआ था कोई उधार था क़र्ज़ था जाने क्या था। शायद अच्छे अमीर परिवार में हर सदस्य को इतना नहीं इस से अधिक खर्च करने को मिलता था। जुआ शराब जाने क्या क्या सब मज़े से करते थे किसी का कोई हिसाब नहीं लिखा गया था। ये सब सोच कर लगता जैसे मैं उनकी दुनिया में अनचाही संतान की तरह हूं। जितना पढ़ता गया सब मुझसे दूर होते गये और आना जाना कम होता गया किसी अवसर पर जाना होता। शिक्षा का असर हुआ और सही गलत अच्छे बुरे की समझ आने लगी और सच कहने की आदत ने अनुचित को मंज़ूर नहीं करने दिया तो सब को बुरा लगने लगा मैं। 
         अभी तलक रिश्तों में कुछ बचा हुआ था लेकिन मुझसे इक गुनाह हो गया। मैंने परिवार वालों की मर्ज़ी से इक ऐसी लड़की से बिना कोई कारण शादी करने से इनकार कर दिया जो अपने साथ कई लाखों की जायदाद साथ लाती और मुझे और अमीर बना देती। डॉक्टर बेटे की इतनी कीमत की चाहत कोई हैरानी की बात नहीं थी जबकि हमारा परिवार कोई दहेज का लालची नहीं था बाकी भाइयों की शादी सामान्य ढंग से करते कोई मांग नहीं की थी। मगर घर आती लक्ष्मी को ठोकर लगाने वाले को नासमझ नहीं बेअक्ल माना जाता है। तुझे दुनियादारी नहीं आने वाली घोषणा के साथ बिना बताये घर निकाला हो गया। किसी और कम पढ़े लिखे भाई के लिए ऐसा रिश्ता नहीं आया था तो जिस बेटे की पढ़ाई पर निवेश किया था उस को मुनाफे सहित वसूल किया जा सकता था। मुझे अपनी कीमत लगना स्वीकार नहीं था और बिकने से मना करना ज़रूरी था। परिवार वाले समझ गये थे ये खोटा सिक्का दुनिया के बाज़ार में नहीं चलने वाला। सब ने बहुत समझाया मगर मुझे कोई समझ नहीं सका न समझा पाया ही। मैंने अपने काम में भी मूर्ख बनाकर धन कमाना और कमाई के सभी ढंग अपनाना मंज़ूर नहीं किया। ईमानदारी से जितनी आमदनी हुई उसी से खुश रहा और हमेशा आर्थिक तंगी को झेलता रहा मगर अपने असूल नहीं छोड़े। 
       संयुक्त परिवार में बड़े होने पर विवाहित बेटों को जायदाद और आमदनी का हिस्सा मिलने लगता है। सब को अपना अपना हिस्सा मिला मुझे नाम को मेरे नाम किया जायदाद पर मगर मुझे मिला नहीं कुछ भी कोई आमदनी का उचित बराबरी से भाग कभी भी। जाने क्यों मुझे महसूस ही नहीं हुआ घर की किसी चीज़ पर कोई अधिकार मेरा भी है। शादी के दस साल बाद शायद पिता जी को कुछ कारणों से समझ आया कि ठीक नहीं हुआ मेरे साथ तब खुद उन्होंने मुझे जायदाद बेचने को खुद ही कहा ताकि अपना घर करोबार की जगह बना सकूं। अपने मरने से तीन चार साल पहले मुझे जितना और जैसा हिस्सा उनको उचित लगा दे गये , नहीं उनकी अपनी विवशता रही मुझे समझ थी कोई गिला नहीं है। मिलने को सब कुछ मिला है मगर नहीं मिली कोई भी चाहत अपनो की कभी इसका अफ़सोस रहता है।

     मुझे नहीं मालूम मुझे ये सब लिखना चाहिए था या नहीं। मैं जनता हूं मेरी तरह बाकी सभी का भी अपना अपना पक्ष अपना नज़रिया होगा। और मैं किसी को दोष नहीं देता बल्कि चाहता हूं जिनको मुझसे जो भी गिला है मेरा कोई भी गुनाह मानते हैं मुझे उसकी सज़ा दे सकते हैं। बस हर दिल आरोप लगाना बंद करें इतनी विनती है। आखिर में अपनी इक ग़ज़ल कहना चाहता हूं।

खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता - लोक सेतिया "तनहा"

खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता
हो जीना मौत से बदतर ,न इतनी बेबसी देता।

मुहब्बत दे नहीं सकते अगर ,नफरत नहीं करना
यही मांगा सभी से था ,नहीं कोई यही देता।

नहीं कोई भी मज़हब था ,मगर करता इबादत था
बनाकर कश्तियां बच्चों को हर दिन कागज़ी देता।

कहीं दिन तक अंधेरे और रातें तक कहीं रौशन
शिकायत बस यही करनी, सभी को रौशनी देता।

हसीनों पर नहीं मरते ,मुहब्बत वतन से करते
लुटा जां देश पर आते ,वो ऐसी आशिकी देता।

हमें इक बूंद मिल जाती ,हमारी प्यास बुझ जाती
थी शीशे में बची जितनी ,पिला हमको वही देता।

कभी कांटा चुभे ऐसा ,छलकने अश्क लग जाएं
चले आना यहां "तनहा" है फूलों सी नमी देता।  
 
    आज दिल से दिल की बात करनी चाही है कोई और मकसद नहीं है। मेरे अपने फिल्म के गीत , कोई होता जिसको अपना हम अपना कह लेते यारो। और अनुभव फिल्म का गीत , फिर कहीं कोई फूल खिला चाहत न कहो इसको। फिर कहीं कोई दीप जला मंदिर न कहो इसको याद आये हैं। अलविदा।
 


चाहत अपनो की ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

            चाहत अपनो की ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

             मन में तो ये बात से रही है। मगर कहूं किस से , कौन समझेगा। कितने साल हो गये हैं मुझे घर से दूर रहते , मगर किसी ने कभी मुझे घर आने को नहीं कहा। अपने ही घर जाने को भला बुलाता है कोई बेटे को बेटी को विवाह के बाद मायके आने को बुलाया जाता है। मगर जब भी हुई बात किसी ने पूछा ही नहीं घर आना है कब बस औपचारिकता निभाई सबने आप तो गांव छोड़ शहर में खुश रहते हो गांव आने की बात की नहीं किसी ने। यूं इसकी ज़रूरत भी नहीं है , मेरे घर जाने पर कोई रोक तो लगी नहीं है। बस इक एहसास रहता है कि जिस तरह मुझे घर अपनों की कमी लगती है उदास हो जाता याद करते कोई होता जिसको मेरे घर से दूर होने की कमी खलती नहीं मिलने पर उदास होता मेरी तरह कोई। माता पिता को बहनों से कितना लगाव है अपनापन है तीज त्यौहार पर हर अवसर पर याद किया जाता है कोई उपहार भेजते हैं कभी लिवाने को जाते हैं कभी आने को खत लिखते हैं। सभी बहनें आती हैं मिलती हैं सभी से गली की गांव की सखियों से और पुरानी यादें ताज़ा करने के साथ नई कुछ मधुर यादें साथ ले जाती हैं। 
        
      मेरा मन क्यों तरसता है ऐसे मोह को जैसे बेटी को लेकर चिंता रहती है कैसी होगी खुश तो है और सोचते हैं कितने दिन से मिलने नहीं आई न हम मिलने जा पाये। मेरे लिए भी होता नहीं पास होने का थोड़ा एहसास किसी को तो कभी। केवल इसी लिए कि मैं लड़का हूं और अपने घर गांव से दूर होना पड़ा है काम करने के लिए मुझे बेगाना बना दिया गया लगता है। घर जाकर भी परायापन लगता है जब पूछते हैं कैसे आना हुआ कब तक रहना है जैसे घर का सदस्य नहीं कोई बिन बुलाया महमान हो। नहीं जानता कोई नहीं महसूस करता कोई भी घर गांव के याद कर कितना उदास हो जाता हूं मैं। अपना सब कुछ रिश्तों का अपनापन खो कर पाया क्या है उदासी अजनबीपन का दर्द का अनुभव। अपने घर से मुझे पराया कर दिया गया है क्या पढ़ लिख शिक्षित होने की ये कीमत है चुकाने को ज़रूरी है। कितने दोस्त हैं जो बाहर रहते हैं वापस घर गांव आते हैं तो उल्लास का अनुभव होता है। मुमकिन है मेरा सफल नहीं होना मेरी कोई कमी हो मगर कोई अगर ऐसे में साथ देने का भरोसा देता और हौंसला बढ़ाता तो शायद सफलता पाना आसान होता मगर जब सभी नाकाबिल और जाने क्या क्या कहकर हीनभावना के भंवर में अकेला छोड़ देते हैं तो सफल होना असंभव हो जाता है। हर किसी ने मान लिया है कि मुझे इसी शहर में रहना है और उस अपने घर से मेरा कोई नाता नहीं है। मुझे जाने किस जुर्म की ये सज़ा मिली है कितने जन्मों के लिए। काश मैं लड़का नहीं लड़की बनकर जन्म लेता और बहनों की तरह अपनी उदासी की बात कह सकता भीगी आंखों से। मगर मेरे आंसू आना जैसे कोई कायरता ही नहीं अपराध भी है जिस पर ताने कसे जा सकते हैं। पुरुष की भावनाओं को क्या कोई नहीं समझता है। मेरी बहनों को लगता है पीहर पर उनका हक है अच्छा है मगर मुझे भी अधिकार अपनापन मिलता तो कितना अच्छा होता। 

     मुझे उच्च शिक्षा के लिए बचपन से ही बाहर रहना पड़ा , बाकी भाई बहन पढ़ने लिखने की रुचि नहीं रखने के कारण गांव और घर में रहे। ये बात कभी कभी खलती है कि मुझे याद दिलवाया जाता था मेरी पढ़ाई पर दो सौ रूपये महीना खर्च होता है और पांच साल का हिसाब पंद्रह हज़ार बना हुआ था कोई उधार था क़र्ज़ था जाने क्या था। शायद अच्छे अमीर परिवार में हर सदस्य को इतना नहीं इस से अधिक खर्च करने को मिलता था। जुआ शराब जाने क्या क्या सब मज़े से करते थे किसी का कोई हिसाब नहीं लिखा गया था। ये सब सोच कर लगता जैसे मैं उनकी दुनिया में अनचाही संतान की तरह हूं। जितना पढ़ता गया सब मुझसे दूर होते गये और आना जाना कम होता गया किसी अवसर पर जाना होता। शिक्षा का असर हुआ और सही गलत अच्छे बुरे की समझ आने लगी और सच कहने की आदत ने अनुचित को मंज़ूर नहीं करने दिया तो सब को बुरा लगने लगा मैं। 

         अभी तलक रिश्तों में कुछ बचा हुआ था लेकिन मुझसे इक गुनाह हो गया। मैंने परिवार वालों की मर्ज़ी से इक ऐसी लड़की से बिना कोई कारण शादी करने से इनकार कर दिया जो अपने साथ कई लाखों की जायदाद साथ लाती और मुझे और अमीर बना देती। डॉक्टर बेटे की इतनी कीमत की चाहत कोई हैरानी की बात नहीं थी जबकि हमारा परिवार कोई दहेज का लालची नहीं था बाकी भाइयों की शादी सामान्य ढंग से करते कोई मांग नहीं की थी। मगर घर आती लक्ष्मी को ठोकर लगाने वाले को नासमझ नहीं बेअक्ल माना जाता है। तुझे दुनियादारी नहीं आने वाली घोषणा के साथ बिना बताये घर निकाला हो गया। किसी और कम पढ़े लिखे भाई के लिए ऐसा रिश्ता नहीं आया था तो जिस बेटे की पढ़ाई पर निवेश किया था उस को मुनाफे सहित वसूल किया जा सकता था। मुझे अपनी कीमत लगना स्वीकार नहीं था और बिकने से मना करना ज़रूरी था। परिवार वाले समझ गये थे ये खोटा सिक्का दुनिया के बाज़ार में नहीं चलने वाला। सब ने बहुत समझाया मगर मुझे कोई समझ नहीं सका न समझा पाया ही। मैंने अपने काम में भी मूर्ख बनाकर धन कमाना और कमाई के सभी ढंग अपनाना मंज़ूर नहीं किया। ईमानदारी से जितनी आमदनी हुई उसी से खुश रहा और हमेशा आर्थिक तंगी को झेलता रहा मगर अपने असूल नहीं छोड़े। 

       संयुक्त परिवार में बड़े होने पर विवाहित बेटों को जायदाद और आमदनी का हिस्सा मिलने लगता है। सब को अपना अपना हिस्सा मिला मुझे नाम को मेरे नाम किया जायदाद पर मगर मुझे मिला नहीं कुछ भी कोई आमदनी का उचित बराबरी से भाग कभी भी। जाने क्यों मुझे महसूस ही नहीं हुआ घर की किसी चीज़ पर कोई अधिकार मेरा भी है। शादी के दस साल बाद शायद पिता जी को कुछ कारणों से समझ आया कि ठीक नहीं हुआ मेरे साथ तब खुद उन्होंने मुझे जायदाद बेचने को खुद ही कहा ताकि अपना घर करोबार की जगह बना सकूं। अपने मरने से तीन चार साल पहले मुझे जितना और जैसा हिस्सा उनको उचित लगा दे गये , नहीं उनकी अपनी विवशता रही मुझे समझ थी कोई गिला नहीं है। मिलने को सब कुछ मिला है मगर नहीं मिली कोई भी चाहत अपनो की कभी इसका अफ़सोस रहता है।