Monday, 18 March 2019

क्योंकि मैं सच नहीं बोलता ( होली है ) डॉ लोक सेतिया

     क्योंकि मैं सच नहीं बोलता ( होली है ) डॉ लोक सेतिया 

                                  कुछ चुटकियां होली पर 

    आप शोर बहुत करते हैं मुझे कहा किसी ने। लोग चैन से सो रहे हैं आपकी आवाज़ से नींद में खलल पड़ता है। कोई ज़माना था उठ जाग मुसाफिर भौर भई गाते थे। इधर खामोश रहकर स्मार्ट फोन पर बिना आवाज़ का शोर करते सुनते हैं। गोविंदा की इक फिल्म आई थी क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता जिस में उनका किरदार वकालत करने वाले अधिवक्ता का था। सच बोलकर नहीं झूठ को सच बनाकर मुकदमा जीतने का हुनर आता है उनका इक वकील दोस्त शराफत की ज़िंदगी जीता सेंटीमेंटल फूल कहलाता है। बहुत लोग अभी भी नेताजी के झूठ बोलने को झूठ नहीं मानते। किसी ने समझाया कि अगर बोलने वाला और सुनने वाला दोनों को मालूम हो तो ऐसा झूठ बोलना पाप नहीं होता है। आजकल किसी को झूठी कसम खाने से मौत तो क्या बुखार भी नहीं आता है। आशिक़ से महबूबा ने प्यार करते हो कसम खाओ की बात की तो जवाब मिला ये नहीं पता कितना कम या अधिक करता या नहीं करता मगर तेरे बिना समय नहीं गुज़रता। वास्तव में आजकल रिश्ते वक़्त बिताने और मतलब निकलने को साहूलियत से बनते निभाते हैं। सच का झंडा बरदार होने का दावा करने वाले झूठे नंबर दो हैं पहला नंबर आरक्षित है उनसे बड़ा झूठा इस देश में कोई हुआ नहीं आगे भी संभावना कम ही है। सत्यवादी इधर इक गाली की तरह लगता है कोई कड़वा सच लिखता है तो उपहास करने को उपयोग किया जाता है ये इस शब्द को। तभी मैंने बचाव को शीर्षक ही लिख दिया क्योंकि मैं सच नहीं बोलता। 

                         कल कई साल बाद इक पुराने दोस्त का फोन आया नये बदले नंबर से। अब ये इक समस्या भी है और समाधान भी लोग नंबर बदलते रहते हैं। किसी को बात करनी तो नंबर पता नहीं क्या बदला हुआ और कोई बात नहीं करना चाहता तो नंबर बदल लेता है। अच्छा लगा दोस्त से बात कर और फिर से मेल मुलाकात की राह खुल गई। बोले भाई ये मेरे शहर में अमुक दल के पदाधिकारी हैं होली पर कविता का पाठ करने को बुलाने को बात करना चाहते हैं। दुआ सलाम के बाद आने को कहा तो बताना ज़रूरी समझा कि मुझे सब आता है राग दरबारी नहीं आता और किसी भी दल के नेता की जय जयकार करना सीखा नहीं है। जी कोई बात नहीं मगर आपको बाद में बताते हैं कब आना है , ये शिष्ट ढंग है हम दोनों जानते हैं उन्होंने बुलाना नहीं और हमको भी जाना नहीं। दूध का जला छाछ को भी फूंककर पीता है। 

                      पढ़ने लिखने की बात समझनी ज़रूरी है। कभी लोग थोड़ा पढ़ लिख लेते थे तो अख़बार रिसाला मांगकर भी पढ़ते थे। कॉलेज की पढ़ाई करने के बाद पुस्तकालय से किताब लेकर या फिर बाज़ार से खरीदकर पढ़ते थे। आजकल फेसबुक पर किताबों को फुटपाथ पर वज़न के हिसाब से 150 रूपये किलो भाव का फोटो नज़र आता है। फेसबुक शुरू हुआ तो लेखक पोस्ट लिखते पाठक पढ़ते थे मगर आजकल कोई पढ़ता ही नहीं टाइमलाइन  पर और मेसेंजर या व्हाट्सएप्प पर संदेश तक देखते हैं और तस्वीर देखना या फिर शीर्षक पढ़कर समझना पढ़ लिया की आदत है। लंबा लेख पढ़ना बोरियत भरा काम है क्योंकि अब ज्ञान की जानकारी की ज़रूरत नहीं है मनोरंजन सबसे महत्वपूर्ण है। जानकारी को गूगल सर्च है ही। अनपढ़ लोग भी स्मार्ट फोन खरीद समझदार बन सकते हैं। हमने इतने साल व्यर्थ महनत की इक स्मार्ट फोन होता तो ढाई आखर पढ़ लिए होते लेकिन कितनी किताबें पढ़ीं मगर वही ढाई अक्षर नहीं समझ पाये हम लोग।


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