Saturday, 16 March 2019

फिर चली बात जूतों की ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    फिर चली बात जूतों की ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

निकल पड़ी है बारात जूतों की , फिर होने लगी है बात जूतों की। कल सुनी हुई बरसात जूतों की , देखना चाहते हो करामात जूतों की। खेल कोई भी हो जूतों की अपनी बात होती है देखना शह मात जूतों की। जूतों का खेल कोई आजकल का नहीं है सदियों से जूता चलता रहा है। गली के शोहदे मनचले और छोटे चोर जूते की सज़ा से बरी हो जाते हैं खरबूजा या गन्ना खेत से चुराने वाले की जूतों की सज़ा देना नाइंसाफी समझा जाता है डांट डपट ही बहुत होती है। कुछ माता पिता बिगड़े बच्चों को जूतों से सुधारने की नाकाम कोशिश करते हैं मगर बच्चे और बिगड़ जाते हैं। जूता चलता रहा है और चलता रहेगा मगर उसकी सफलता का कोई मापदंड नहीं है। लोग किसी की पिटाई होते देख भीड़ में घुस जूते चलाने का लुत्फ़ लेते हैं बिना जाने कि जिसको जूते पड़े उसका दोष क्या था। सभाओं में सस्ते घटिया जूते विरोधी दल के लोग उपलब्ध करवाते हैं मगर चालाक लोग जूट लेकर भी फेंकते नहीं पहन कर निकल लेते हैं। जूते बनाने वाली किसी कंपनी ने राजनीति के काम आने वाले अच्छे सस्ते और टिकाऊ जूट बनाने पर गौर नहीं किया अन्यथा चुनाव में खूब बिकते। वास्तव में जूतों का खेल बेहद मनोरंजक खेल है , पुलिस थाने में जूता इक छड़ी से बांधा टंगा रहता है पहले उसकी मार मुंह खुलवाती थी आजकल उसको दिखला कर ही काम चल जाता है। नेताओं पर जूता फेंकना खुद मुसीबत को घर बुलाना है अब कोई ऐसा नहीं करता मगर खुद नेता नेता को जूतों से सम्मानित करते हैं कभी कभी। घोषणा कर के जूतों की बारिश करने वाले संसद की चर्चा है कि बात का पक्का है इरादे पर खरा होगा ही। 

                   माना जूता विरोध जतलाने को इक साधन हो सकता है लेकिन जिस देश में करोड़ों लोग नंगे पांव रहते हैं फैंकने को जूता खरीदना मुश्किल है। किसी सरकार ने इस के लिए सबसिडी पर जूते मिलने की योजना नहीं बनाई है। विरोध का ये बेहद महंगा तरीका सांसद और विधायक उपयोग करते हैं संसद में या विधानसभा में। भारत ही नहीं अमेरिका वाले भी अपने शासक को इतनी सुरक्षा के बाद भी जूता चलने से सुरक्षित रख नहीं सके। उनके इतिहास में इस घटना का महत्व 9 / 11 की घटना से कम नहीं है। उस जूते का नंबर तक जानते हैं दस नंबरी था और उसका निशान तक मिटा दिया गया फिर भी बुरा सपना बनकर दिखाई देता है। बहुत मुमकिन है किसी दिन चुनावी उम्मीदवार की जूतों की क्षमता पर भी ध्यान देने लगे पार्टी का आलाकमान। कितने खा सकता है कितने से बचाव करना जानता है और कितनी दूर तक जूता फैंकने की क़ुअत है। कोई कंपनी दावा कर सकती है कि उसके बनाये जूते भारी नहीं बेहद हल्के हैं लगने पर दर्द भी नहीं होता बस धीरे से लगते हैं मगर उनकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देती है। हाथों हाथ बिक जायेगा सब माल। आप देखना इक दिन आपके हर शहर में इक जूता चौक नाम का स्थान होगा जहां कोई ख़ास दिन जूतों को फूलमाला चढ़ाकर जूतों का महत्व समझने की बात होगी। कभी जूतों की माला पहनाई जाती रही है आशिक़ों को या समाज विरोधी कार्य करने पर। 

   
         जूतों की कहानी इतनी भर नहीं है। विवाह के समय दूल्हे के चुराये हुए जूते मुंह मांगे दाम देकर वापस लेते हैं। शादी का अर्थ समझाने को ये बहुत काम की रस्म है। पांच सौ का जूता दो हज़ार का हो जाता है। मंदिर जाने पर मांगने वाले की मुराद पूरी नहीं हो बेशक लेकिन जो मंदिर जूते चुराने को जाते हैं नंगे पांव जाते हैं और मनपसंद जूता डालकर घर आते हैं। जूतों की महिमा इसी से पता चलती है कि पुराने लोग जूता देखकर इंसान की पहचान किया करते थे।

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