Sunday, 24 March 2019

नहीं का नहीं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

             नहीं का नहीं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

चुप रहने की आज़ादी है 
लब खोलने की भी मिली है 
हर बात पर हर बार मगर 
हां कहने की है नहीं की नहीं। 

रिश्तों के बंधन जाने कैसे हैं 
दुःख दर्द सहने की आज़ादी है 
चुपके चुपके छुपके रोने की भी 
खुश रहने की कभी मिली नहीं। 

घुट घुट कर जीने की आज़ादी 
मर मर ज़िंदा रहने की भी है 
हर सांस पर पहरा लगा हुआ 
मौत की मरने की मर्ज़ी पर नहीं। 

जिस राह पर जाना ज़रूरी है 
उसी डगर चलने की मनाही है 
काटों की राह चलना पड़ता है 
रुकने ठहरने की अनुमति नहीं। 

उलझन कोई भी नहीं सुलझती 
सुलझाने से बढ़ती जाती है और 
समझाते हैं सभी हर किसी को 
समझता उलझन नहीं कोई नहीं। 

हां वही है जो नहीं है नहीं है 
वही नहीं जो होकर भी है नहीं 
इकरार इनकार दोनों इक जैसे 
हां कहा नहीं , नहीं सुना नहीं।

2 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

वाह

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 24/03/2019 की बुलेटिन, " नेगेटिव और पॉज़िटिव राजनीति - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !