Monday, 12 November 2018

इक्कीसवीं सदी का संविधान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   इक्कीसवीं सदी का संविधान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

      आखिर देश की सरकार को भी समझ आ ही गया है कि भगवान का ही भरोसा है। हम तो पहले से सोचते रहे हैं कि ये देश चल कैसे रहा है। जिस देश के नेता अधिकारी अपना कर्तव्य नहीं निभाते हर विभाग अपना काम छोड़ बाकी सब काम करता है पुलिस अस्पताल विद्यालय सभी अन्याय बढ़ाने अपराध करवाने रोगी को उपचार देने से पहले खुद अपनी कमाई की चिंता करने शिक्षा का कारोबार करने लगे हों उस देश का मालिक भगवान ही है। इसलिए सरकार ने नई नीतिगत योजना बनाई है मंदिर और मूर्तियां बनाने की। शिक्षा स्वास्थ्य न्याय और समानता से कहीं अधिक महत्व धर्म पूजा पाठ और मंदिर मूर्तियां का है। मंदिर में भगवान से ज्ञान शिक्षा स्वास्थ्य और इंसाफ जो मर्ज़ी मांग सकते हैं , सब को सभी कुछ भगवान ही दे सकता है। भगवान सब से धनवान है इस में किसी को संदेह नहीं है। सभी भगवान सब देवी देवता अकूत धन संम्पति हीरे जवाहारात सोना चांदी जमा करे हुए हैं। रब माना जाता है उनको भी देता है जो उसे नहीं मानते हैं शायद उन्हीं को ज़्यादा देता है। जो भगवान को मानते हैं वो मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाते हैं रोज़ सुबह शाम और घंटों राम नाम या गुरुबाणी या कुरान अथवा बाइबल पढ़ने पर खर्च करते हैं मगर जो इसकी चिंता नहीं करते वो जब मनोकामना पूरी हो जाती है तब चढ़ावा भेंट करते हैं। इनका भरोसा पहले काम फिर दाम की बात का है। नेता जी भी चुनाव जीतने के बाद करोड़ों का चढ़ावा सरकारी धन से चढ़ाते रहे हैं। समझदारी इसे कहते हैं हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चौखा हो , कमाल है। भगवान कैसे खुश नहीं होंगे इस से पहले ऐसा भक्त कोई सत्ताधारी नज़र आया ही नहीं होगा। देश का विकास भविष्य में संविधान के सिद्धांत के अनुसार नहीं साधु संतों और बाबाओं से निर्देश लेकर किया जाएगा। विभागों के नाम बदल कर देवी देवताओं के नाम से बुलाया जाएगा। वित मंत्रालय को देवी लक्ष्मी , ग्रह मंत्रालय को संकट मोचन , स्वास्थ्य मंत्रालय को धन्वन्तरी देव नाम की तरह करने से सब अपने आप ठीक हो जाएगा। और नहीं भी हुआ तो लोग सरकार की आलोचना नहीं करेंगे भगवान की मर्ज़ी मान खामोश रहेंगे। आज तक किसी ने भगवान को लेकर कोई बात कहने का साहस नहीं किया और जो करे उसको नास्तिक कहकर लताड़ा जाता है कि भगवान के लिए ऐसी बात कहते हो तभी तो बदहाल हो। अब जब चुनाव होंगे तब हर दल वाले वादे करेंगे आपके शहर में किस किस देवी देवता का कितना भव्य मंदिर बनाया जाएगा। कितनी मूर्तियां किस किस की धातु की पत्थर की या आधुनिक ढंग से रंग बिरंगी रौशनियों से बनाई जाएंगी। विज्ञान की साहित्य की अर्थशास्त्र की किसी भी विषय की पढ़ाई ज़रूरी नहीं होगी , बस भगवान को लेकर चर्चा खोज पर ध्यान देना होगा।

Saturday, 10 November 2018

तीसरा कौन है ( ज्योतिष की बात ) डॉ लोक सेतिया

       तीसरा कौन है ( ज्योतिष की बात ) डॉ लोक सेतिया 

     इसे मानो चाहे नहीं मानो की सूचि में रख सकते हैं। अभी उस नाम की चर्चा नहीं की जा सकती है। अभी सब इसी चिंतन में हैं कि अगला मोदी कौन अर्थात अगला शासक मोदी या राहुल। भाई ये कोई कुश्ती है दो पहलवानों की जो उन से एक की जीत और एक की हार होगी। धर्म कर्म मानने वाले लोग भूल गये कल क्या होगा कोई नहीं जनता पल भर का भरोसा नहीं और आप अगले चुनाव की अगले वर्ष की बात कर रहे हैं। लो आज इक ज्योतिष की जानकारी से अनजान आदमी घोषणा करता है अगला सत्ताधारी कोई तीसरा होगा। चाहो तो शर्त लगा सकते हो सट्टा गैरकानूनी है। है किसी टीवी वाले जाने माने अथवा हर फ़ोन कंपनी के संदेश वाले ज्योतिषी को मालूम उस तीसरे का नाम , चलो नाम नहीं तो इतना ही बता दो किस राशि का होगा , ये भी नहीं तो बताओ मेरी कुंभ राशि का होगा या मेष राशि का। मेरी इक राशि नाम से है दूसरी जन्म समय से। आपने गलत समझा मुझे राजनीति से कोई मतलब नहीं है और मैं अपनी बात नहीं कर रहा वैसे मेरी धर्म पत्नी को शायद लगता हो कि वो अच्छी नेता बन सकती है। मुझ में नेतागिरी के कीटाणु नहीं हैं। विषय पर आते हैं। विचार करो कि अगर अगले चुनाव में मोदी जी और राहुल जी घोषित कर दें कि उनकी ख्वाहिश नहीं है सत्ता पाने की और अब उनको सच में देश और समाज की सेवा करनी है बिना किसी पद की सत्ता की चाहत के तब क्या भूचाल आ जाएगा जो सवा सौ करोड़ लोगों के पास कोई नहीं होगा काबिल नेता प्रधानमंत्री बनने के लायक। नहीं उनका मोहभंग राजनीति से नहीं होगा और चुनाव भी लड़ेंगे मगर फिर भी होगा कुछ ऐसा जैसे दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर की मौज की कहावत है। मेरा मतलब किसी को बंदर कहने का नहीं है क्योंकि मानहानि की बात संभव है। समझा जाए तो हम बंदर से इंसान बने हैं और बंदर कहलाने में कोई अपमान की बात नहीं है वानरसेना से भगवान राम जंग जीत सकते हैं। 
       आपको आदत है पूछोगे ही कोई हिंट तो देना चाहिए। ठीक है वो पूरब से होगा न पश्चिम से उत्तर से नहीं होगा दक्षिण से भी नहीं , मगर उसका संबंध चारों दिशाओं से होगा। किसी भी एक दल से उसका नाता नहीं होगा और कोई भी दल उससे अछूता नहीं होगा। महिला पुरुष दोनों हो सकते हैं आयु की सीमा कोई नहीं होगी चाहे जितनी आयु हो बूढ़ा नहीं कहलाएगा न ही बचपना बाकी होगा। विवाहित कुंवारे से भी कोई मतलब नहीं है इतना समझ सकते है इसे लेकर दुविधा रहती है अक्सर। कुंडली बन चुकी है मगर अभी काफी उपाय करने को हैं थोड़ा इंतज़ार करें। इक अनुरोध इसे पढ़कर मेरे पास अपना भविष्य पूछने मत चले आना , मुझे किसी को ठगना झूठ बोलना या धोखे में रखकर फायदा उठाना नहीं आता न ही करना है। मगर मेरी बात शत प्रतिशत सही साबित होगी देखना अवश्य।

इतिहास का काला अध्याय ( मौजूदा हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया

  इतिहास का काला अध्याय ( मौजूदा हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया 

 जो काम आज करने जा रहा हूं बेहद कठिन ही नहीं खुद अपनी रुसवाई की भी बात है फिर भी लिखने लगा हूं आजकल का वास्तविक इतिहास अपनी कलम से जिस पर कोई नाज़ तो नहीं किया जाना चाहिए। सोचा तो समझ आया कि हुआ क्या है जो हम सभी सदमें में हैं समझ नहीं पाये अभी तक हुआ क्या है। किसी व्यक्ति या दल से विरोध नहीं किसी विचारधारा से टकराव नहीं कोई चाहत नहीं शोहरत की नाम की न ही कोई गलतफहमी है इतिहास लेखन या साहित्य लेखन में मेरी अहमियत क्या कोई जानता तक भी नहीं। इक दर्द है इक टीस सी है सीने में चुभती हुई जो बेचैन किये है और हर दिन कुछ न कुछ घटता रहता है जो ज़ख्मों को कुरेदता रहता है। क्या ये तकलीफ़ मेरी है या पूरे देश की समाज की है और क्या ये एहसास मुझी को है या फिर बाक़ी लोगों को भी होता है। अगर होता है तो जो अनगिनत लिखने वाले हर दिन किताबें लिख लिख छपवा रहे हैं उन में किसी ने इस वक़्त की व्यथा को समझा है साहस किया है। लिखना क्या यही है जो अब पढ़ने को मिलता है और सभाओं में मंचों पर संस्थाओं के आयोजनों में सुनाया जा रहा है। केवल यही याद दिलवाना कि हम उनके वंशज हैं जो तोप के सामने कलम लेकर लड़ा करते थे। उन बहादुर लोगों के वंशज क्या ऐसे कायर हो सकते हैं। सच की बात का दावा करने वाले अख़बार टीवी चैनल से कविता कहानी लिखने वाले सब के सब क्या अपना फ़र्ज़ राह दिखलाने का कर रहे हैं या अपने सवर्थ सिद्ध करने वालों की भीड़ में शामिल होकर हुआं हुआं का शोर मचाने लगे हैं। पढ़ लिख कर समझदार कहलाने वाले लोग मुझे क्या सोच खुद को किनारे खड़े कर दूर से नज़ारा देख रहे हैं बर्बादी का और अपने समझदारी साबित करने को सोशल मीडिया पर व्यस्त हैं चौबीस घंटे। ऐसे में मैं इक नासमझ और पागल आपको आज के इतिहास का वो काला अध्याय पढ़कर सुना रहा हूं जिसपर कोई नाज़ नहीं करेगा चाहे बेशर्मी से नज़र बचाकर निकल जाने का कार्य करे या सुनकर अनसुना कर दे। 
               आपने सोचा क्या हुआ था जिस को देश की जनता ने चुना था उसने एक दिन बिना सोचे समझे घोषित कर दिया कि देश के हर नागरिक की तलाशी ली जाएगी। कभी किसी थानेदार ने शहर भर की तलाशी की बात की है किसी इतिहास में लिखा है। अपराधी को पकड़ने का ये तरीका क्या मंज़ूर किया जा सकता है। फ़िल्मी पार्टी में किसी का कीमती हार चोरी हो गया तो सभी बुलाये महमानों की तलाशी की बात की जाती देखी है कोई नहीं खुद को अपमानित महसूस करता। वास्तव में कोई किसी से ऐसा कहे तो जीवन भर उससे बात ही नहीं करना चाहोगे। मगर यहां ये घोषणा करने वाला तो घर का मालिक भी नहीं है चौकीदार है जनता का रखा हुआ। रखवाली करना छोड़ सब को चोर समझने लगा है। उसने कहा था तलाशी के बाद चोर नहीं पकड़ा गया तो सज़ा खुद उसे लोग दे सकते हैं चौराहे पर खड़ा कर मगर दो साल बाद तक चोरी का माल बरामद हुआ नहीं फिर भी उसको अपना अपराध स्वीकार नहीं है। उसकी गलती है कि नहीं क्या ये भी खुद वही तय करेगा। मामला इतना ही नहीं है उसकी गलतियों की कोई गिनती ही नहीं की जा सकती। अमेरिका में ट्रम्प के झूठ कितने हैं बता रहा है मीडिया मगर यहां हर झूठ को सच घोषित किया जा रहा है। 
           आज जब सत्ता संवैधानिक संस्थाओं को ध्वस्त करने लगी हुई है और जो उसकी नहीं मानता उसी को गुनहगार साबित कर सज़ा देने लगे हैं सीबीईआई आईबी अदालत के बाद आरबीआई की बारी है और आगे किस किस को बर्बाद करना है उनके इरादे नहीं मालूम। क्योंकि उनको अभी सत्ता चाहिए और किसी भी तरह से हर कीमत पर चाहिए। पहले उनसे कोई पूछेगा आपको चुना किस किस वादे पर गया था उनका क्या हुआ। अपने जो किया सब सामने है मगर चुनाव से पहले अपने ये तो नहीं कहा था कि आप सत्ता मिलते ही देश विदेश घूमने का कीर्तिमान स्थापित करना चाहते हैं और उस पर इतना धन देश का खर्च करेंगे जो पहले कभी किसी ने नहीं किया और उन सारी विदेशी यात्राओं से देश को मिलना कुछ नहीं केवल आपकी छवि चमकानी है। ये बहुत महंगी देशभक्ति है जो देश को देती कुछ नहीं लेना सभी कुछ चाहती है। अपने तो लोगों को बताया था कि अपने गरीबी देखी है और गरीबों की हालत सही करोगे मगर अपने तो रईसों की तरह शान से जीवन व्यतीत करने में राजाओं महाराजाओं को पीछे छोड़ दिया। अपने रहन सहन वेश भूषा और हर गली चौराहे पर अपनी तस्वीर के विज्ञापन से क्या देश की दशा बदल जायगी या आप की हंसती मुस्कुराती तस्वीर जनता को चिढ़ाती लगती है। काला धन मिला नहीं काले धन वाले जेल नहीं गये और आपके ख़ास लोग देश के बैंकों का धन लेकर रफू चक्क्र हो गए। अपने बार बार कहा था परिवारवाद को खत्म करना है मगर अपने संघवाद को बढ़ावा दिया और हर राज्य में सत्ता विस्तार कर संघ के लोगों को सत्ता पर थोपने का काम ही नहीं किया बल्कि ऐसे लोगों के सरकार चला पाने में असफल होने पर भी ख़ामोशी से साथ दिया और ऐसे नाकाबिल लोग मनमानी कर अपराध और दहशत को बढ़ाने का काम करते रहे। 
        नाम बदलना और पुराने लोगों को बदनाम कर खराब साबित करना क्या यही किसी चुनी हुई सरकार का ध्येय होना चाहिए। सत्ता की हवस में आपने उस पुरानी कहानी को दोहराया है जिस में और अधिक ज़मीन पाने की चाहत में कोई शाम ढलने तक अपनी मंज़िल तक नहीं पहुंच पाता है। हाउ मच लैंड ए मैन नीड्स। अब आपको पता चलने लगा है जब साये लंबे होते जा रहे हैं मगर अपने जिस मंज़िल पर पहुंचना था वो कहीं दिखाई नहीं दे रही है। अच्छे दिन नहीं हैं। भ्र्ष्टाचार बढ़ा है। गरीबी बढ़ी है।  महंगाई और बढ़ती गई है। लोग असुक्षित हैं। महिलाओं को और भी चिंता बढ़ी है सुरक्षा को लेकर। रोज़गार खत्म हुए हैं।  कारोबार बर्बाद हुए हैं।  किसान ख़ुदकुशी करने को विवश हैं। सीमा पर सैनिक शहीद हो रहे हैं। पहले सत्ताधारी लोगों ने जो भी बनाया सामने है अपने क्या बनाया है नहीं मालूम। भूखे भजन न होय गोपाला। देश को मंदिर मस्जिद और धर्म के नाम पर नफरत और बांटने का काम नहीं करना था और किसी ऊंची मूर्ति से एकता होती है ऐसा शायद ही कोई समझता है। सार्थक क्या है जिसे सुनहरे हर्फों में लिखा जाये आज का इतिहास ऐसा हर्गिज़ नहीं जिस पर भावी पीढ़ियां गर्व करेंगी।
       इक पुरानी कहानी फिर से लिखनी पड़ी है। इक नगर का शासक बनाने की बात आई तो इक जादूगर आया कहीं से और उसने दावा किया जादू की छड़ी से सब कुछ कर दिखाने का। लोग भोले और नासमझ सपने बेचने वाले सौदागर की चिकनी चुपड़ी बातों में फंस गये। और उस के सर पर ताज रख दिया। वो हर दिन खेल तमाशे दिखलाता और हाथ की सफाई और आंखों के सामने झूठ का सुनहरा पर्दा डालकर शानदार दृश्य दिखलाता और कहता कि जल्दी ही इस ख्वाबों की दुनिया को वो हक़ीक़त में बदल देगा। मगर वास्तव में उसे जादू से धोखा देने को छोड़ कुछ भी नहीं आता था। उसको जितना समय दिया गया था धीरे धीरे व्यतीत होता गया और आखिर में उसने नगर वालों को बर्बाद ही कर दिया। संक्षेप में आज भी हम वास्तविकता और छल का अंतर नहीं समझते हैं और ठग आते रहते हैं। हम खुश हैं ठगस ऑफ़ हिंदुस्तान फिल्म के बड़े बड़े अभिनेता हमें जादूगर की तरह झूठी दुनिया में रखना चाहते हैं और हम ख़ुशी से उनको धनवान बनाने को तैयार हैं जबकि ठग तो हमारे पर नेता अधिकारी क्या साधु संत बनकर भी आते रहते हैं जो खुद अपनी इच्छाओं को पूरा करते हैं मगर हमें भगवान सब करेगा का सबक पढ़ाकर उल्लू बनाते हैं।

Friday, 9 November 2018

कारोबारी बाबाओं के भरोसे देश ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   कारोबारी बाबाओं के भरोसे देश ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  सवाल गंदुम जवाब अदरक हमारे बज़ुर्ग मिसाल दिया करते थे। ये होना ही था जाने क्यों किसी को पहले विचार नहीं आया। सीबीआई की समस्याओं को आर्ट ऑफ़ लिविंग वाले रविशंकर जी तीन दिवस के शिवर में हल करेंगे। शायद इसके बाद आरबीआई में आयोजन करवाना पड़ सकता है आईबी की बारी आ जाए तो भी हैरान मत होना। आपको क्यों याद होगा ये वही रविशंकर जी हैं जिन पर यमुना तट पर तमाम नियम कानून तोड़ने पर जुर्माना लगाया गया था जिस आयोजन में देश का चौकीदार भी शामिल हुआ था। तब से यमुना में कितना पानी बह गया और गंदगी भी बढ़ गई होगी स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद। विज्ञान के युग में हम अभी भी सदियों पुराने तौर तरीकों से देश को जाने किधर को धकेल रहे हैं। इक कहानी याद आ रही है मगर अभी ठीक से याद करने के बाद आगे विस्तार से लिखूंगा। उस में शासक राजा और अधिकारी इक मदहोशी का शिकार होकर बहुत अजीब बातें निर्णय और कार्य करते हैं मगर कोई होता है जो इस सब के बाद भी कोई अनहोनी नहीं होने देता है। अफ़सोस इस बात का है कि उस जैसा कोई किरदार अब संभव नहीं है और अगर हो भी तो हाशिये पर धकेला जा चुका होगा। सच्चाई ईमानदारी और देश के लिए निष्ठा ऐसे गुण हैं जो कोई माने चाहे नहीं माने विलुप्त हो चुके हैं या इनको अवगुण मान लिया गया है। 

     ( बाकी बात कल आगे लिखी जाएगी उस कहानी को याद करने के बाद )


मुझे दे दो अपने गहने ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     मुझे दे दो अपने गहने  ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

 सरकार और रिज़र्व बैंक का आपसी मामला है। सरकार समझा रही है जो धन तिजोरी में रखा हुआ है उसकी चाबी तुम मुझे सौंप दो मेरा धंधा मंदा चल रहा है। रिज़र्व बैंक नियम बताता है कि जो सुरक्षित रखना है उस पर आपकी नज़र नहीं होनी चाहिए उस से ज़्यादा जितना अपने मांगा दिया है मगर आपकी हालत और बिगड़ी है अब बचा हुआ देना अनुचित होगा। स्वायतता की बात सरकार को खलती है। कहानी को कहानी से समझ सकते हैं। पति पत्नी सात जन्मों का बंधन होता है और पत्नी मायके से लाई हो या विवाह में उपहार मिले हों ससुराल वालों से दोनों सोने के गहनों पर अधिकार उसी का होता है। हर महिला उसको जान से बढ़कर प्यार करती है और कोई भी मुसीबत आने पर यही उसका सहारा होता है। पति से झगड़ा हो या नाते रिश्ते निभाने हों पत्नी घर खर्च से थोड़ा बचा कर रखती है। दो साल पहले सरकार ने सभी महिलाओं की बचत को पल भर में बर्बाद कर दिया साथ में हर पत्नी को बदनाम भी किया अपने पति से झूठ बोलती हैं ऐसा साबित कर। क्या गुनाह किया था उन्होंने न ही रिज़र्व बैंक की गलती है जो नियमानुसार सुरक्षित धन सरकार को देने में घबरा रही है पत्नी की तरह और पति धौंस दिखा रहा है कानून बदलने की। 
         चार साल से मनमानी की है और देश के धन को फज़ूल के कार्यों पर उड़ाया है मगर अभी भी स्वीकार नहीं  करना चाहते कि नातजुर्बाकारी के कारण मूलधन ही बचा नहीं मुनाफा ख़ाक होता मगर बही खाते में कमाई दिखानी है। नाम गरीबों का बदनाम है जो बीवी को मार पीट कर उसकी कमाई से शराब पीकर ऐश किया करते हैं। नेताओं के देश का धन अपने घूमने फिरने देश विदेश में सरकारी साधनों से निजि कार्य दान धर्म अपने लिए शोहरत हासिल करने पर खर्च करने को अय्याशी से भी खराब अमानत में खयानत समझना होगा। कोई कारोबार के लिए गहने बेचना चाहता है कोई घर बनाने को कोई मज़बूरी में बेटी की शादी पर घर गहने सब बेचने पर विवश हो जाता है मगर सरकार को चुनाव से पहले अपने चेहरे को चमकदार बनाकर दिखाना है। अब अगर नहीं जीते चुनाव हर गये तो आने वाली सरकार सोचेगी क्या करना है। जी हां ऐसे लोग होते हैं जो अपने स्वार्थ को देखते हैं और अपने मतलब को भविष्य तक दांव पर लगा देते हैं। रिज़र्व बैंक या द्रोपती खुद को जुए में दांव पर लगने से इनकार नहीं कर सकती। सवाल आपके पद और संस्था का नहीं है सरकार के पति की तरह मालिक होने का है। पति कहता है मेरा है चाहे जैसे खर्च करूं बर्बाद होगा तो भी मेरा है तुम कौन होती हो रोकने वाली। कोई उसको याद दिलाए कि आप भी किराएदार हो मालिक नहीं और आपका भी अनुबंध खत्म होने को है।

Thursday, 8 November 2018

खज़ाना मिल गया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        खज़ाना मिल गया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     आज ही का दिन था जब खुदाई शुरू की थी कुबेर का खज़ाना दबा हुआ है काले बक्से में इसका शोर बहुत था। सबको कहा था उसने पचास दिन लगेंगे खुदाई में बस उसके बाद इतना बड़ा खज़ाना हाथ आएगा कि सब को सभी कुछ मिल जाएगा और बुरे दिन इक सपना बनकर रह जाएंगे , अच्छे दिन जब आएंगे। मौज उड़ाएंगे झूमेंगे गाएंगे जाम से जाम टकराएंगे। खाज़ना किस जगह है कोई नहीं जनता था शक था विदेश में अधिकांश धन गढ़ा हुआ है पर खुदाई देश से करनी थी और घर घर से करनी थी। किसी न किसी घर से कोई न कोई सुरंग जाती होगी स्विस बैंक तक और वापस उधर से देश के किस बैंक तक आती है पता लगाना ज़रूरी था। खुदाई हुई खज़ाना कितना मिला अभी तक हिसाब ही नहीं लगाया जा सका है मगर है ज़रूर खज़ाना। खुदाई करने वालों को पता है मगर खज़ाना मिलते ही खुदाई करने वालों की नीयत खराब हो जाती है। सब आपस में हिस्सा बांट लेते हैं और खज़ाना मिलने की बात खुदाई की जगह ही दफ़्न कर दी जाती है। लोग समझते हैं किसी की सनक थी कोई खज़ाना नहीं मिला बेकार खुदाई से बर्बादी की गई। मगर उनकी मर्ज़ी है सच्चाई बताएं या छुपाएं। खज़ाना उनका चौकीदार खुद सरकार है। आज भी रात आठ बजते सबकी धड़कन बढ़ जाएगी सोच कर। अली बाबा चालीस चोर बनानी थी मगर बना दी ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान और आज ही रिलीज़ कर दी है। सीने में ऐसी बात मैं दबा के चली आई , खुल जाए वही राज़ तो दुहाई है दुहाई। राज़ की बात पता चली है सरकार की तिजोरी खाली हो चुकी है और अब इरादा रिज़र्व बैंक में सेंध लगाने का है। 
     कुबेर जी ऊपर बैठे भगवान से विचार विमर्श कर रहे हैं। देवी लक्ष्मी जी इस बार भारत की धरती पर दीपावली की रात गईं तो साथ धन नहीं लेकर गईं इस डर से कि कहीं चौकीदार का आयकर विभाग हिसाब पूछने लगा तो बांटने से पहले ही ज़ब्त कर अपना खज़ाना भर लेगा। ऊपर से ज़हरीली हवा और शोर के साथ नकली रौशनी की चकाचौंध में भटकने का भी खतरा था। ऐसे में अमीरों के महलों की रौशनियों में गरीबों की अंधेरी बस्तियां अपनी तरफ देखने को विवश करती हैं। भगवान हैरान है उसके नाम पर इतनी बर्बादी धन की कैसे की जा रही है जब देश की आधी आबादी बदहाली में रहती है। अधर्म है आडंबरों पर देश का धन लुटाना या भगवान के नाम की आड़ में राजनीति की रोटियां सेंकना। देखो ऐ दीवानों तुम ये काम न करो , राम का नाम बदनाम न करो। ऐसे में नारद जी भी चिंता बढ़ा गये हैं ये जानकारी देकर कि किसी ने सोशल मीडिया फेसबुक व्हाट्सएप्प पर करोड़ों को पैसे देकर गुणगान को रख रखा है और हर महीना नकद राशि लेकर भक्ति हो रही है। भगवान का अपना एक भी अकाउंट किसी साईट पर नहीं है। नकली भगवान भरे पड़े हैं जिनकी गिनती ही नहीं। 
                           टीवी चैनल वालों के भी अपने अपने भगवान हैं जो झूठे विज्ञापन करते हैं कमाई करने को मगर अख़बार टीवी वालों की आमदनी विज्ञापनों से ही होती है इसलिए उनके भगवान वही हैं। महात्मा जूदेव की बात भूली नहीं है उन्होंने सालों पहले घोषित किया था स्टिंग ऑपरेशन में कि पैसा खुदा तो नहीं मगर खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं। खज़ाने की बात उनसे बेहतर भला कौन जनता होगा मगर अब सरकार उनके दल की है पर उनका कोई अता पता ही नहीं है। भगवान को अभी कोई ये नहीं बता सकता कि इधर भारत देश में लोग भगवान से कई गुणा अधिक नाम किसी नेता का लेते हैं। भगवान को भी लोग लालच की खातिर रटते हैं या डर से और उस नेता को भी इसी तरह लालच या डर से लोग नाम लेते हैं। खुश है वो भी दहशत ही सही डंका बजना चाहिए। खज़ाने का क्या हुआ इस पर सभी चुप हैं सरकार खुदाई को बेकार नहीं मानती और लोगों को अभी भी बुरे दिनों से कोई राहत मिली नहीं है। घोटालों की पुरानी बात है हुए मगर साबित नहीं हुए और चोर चोर का शोर आज भी जारी है मगर पकड़ा नहीं जाता कोई भी चोर। चोर दिन दहाड़े लूट लेते हैं साधु बनकर। राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट , ये लो फिर नारद जी चले आये हैं गाते हुए। नारद जी को कौन समझाए सभी अपनी खैर मनाते हैं।

Wednesday, 7 November 2018

आवारा भीड़ का महान देश ( कड़वा सच ) डॉ लोक सेतिया

   आवारा भीड़ का महान देश ( कड़वा सच ) डॉ लोक सेतिया 

            अदालत आपके घर तलवार लेकर नहीं आ सकती , अदालत देश समाज का संतुलन बनाए रखने को नियम लागू करने का निर्देश ही देती है। अपने देश की अदालत की बात की अवहेलना करना देश के साथ छल करना है। मगर हम लोग निसंकोच करते हैं मिलकर करते हैं , कोई किसी को रोकता टोकता नहीं है बढ़ावा देते हैं। मैं किसी कानून को नहीं मानता तुम भी मत मानो , सब मनमर्ज़ी करते हैं और इसे अराजकता नहीं आज़ादी कहते हैं। खुलेआम अदालतों के निर्देश की धज्जियां उड़ाते हैं तमाम लोग। सरकार प्रशासन खुद यही करता है जिसे वास्तव में बनाया ही संविधान का शासन और कानून का राज कायम रखने को है। मगर ऐसा करने के बाद भी खुद को देशभक्त कहते झिकझकते नहीं हैं न नेता न अधिकारी न ही जनता। जिस देश की हर डाल की हर शाख पर उल्लू बैठा हो उसका भला भगवान भी नहीं कर सकता। जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा को बदल दिया जाना चाहिए। सोचिये हम क्या क्या करते हैं। भीड़ बनकर इक दहशत बन जाते हैं इंसान नहीं शैतान बन जाते हैं। कोई भी झंडा उठाकर किसी भी संगठन के नाम पर गुंडागर्दी करते हुए शान से अपराधी बन जाते हैं। भीड़ बनते ही रास्ता रोकना अत्यधिक शोर करना औरों का जीना दुश्वार करना तोड़ फोड़ करना इक आदत बन गई है और ऐसा करते हुए हम अपराधी होकर भी खुद को सभ्य नागरिक मानते हैं। 
                              हम सब धर्म की बात करते हैं भगवान को मानते हैं ऐसा दावा भी है मगर क्या हम सच में धार्मिक हैं। दिखाई देता तो नहीं है धर्म इंसानियत हमसे कोसों दूर है। जिन की हम पूजा करते हैं उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया था न ऐसा करने को कहा ही था। धर्म के नाम पर जो मर्ज़ी करना किस धर्म की किस किताब में समझाया गया है , कहीं नहीं लिखा हुआ ये सबक। ये पाठ पढ़ाने वाले नेता सरकारी लोग सामाजिक संस्थाओं की आड़ लिए अधर्मी लोग , नफरत की आग लगाने वाले स्वार्थी लोग किसी धर्म को नहीं जानते समझते। जिनको आदर्श मानते हैं उन्होंने जीवन काल में देश समाज के नियमों को कभी तोड़ा नहीं न ही अपनी सत्ता का दुरूपयोग किया। नेकी की राह पर चले हर कठिनाई को झेला मगर डगमगाए नहीं। हम उनकी तस्वीरों को पूजते हैं उनके आदर्शों को त्यागकर तो हम उनकी भक्ति नहीं उपहास करते हैं। जो लोग समझते हैं हम पैसे वाले हैं अपने पैसे से जो चाहे करें किसी को क्या वो अभिमानी और पापी लोग होते हैं। पैसा धन दौलत अथवा ताकत अनुचित करने को उचित नहीं करती है बल्कि ऐसा करने वाले उसके अधिकारी नहीं हैं इस बात का सबूत देते हैं। देश केवल धनवान लोगों का नहीं है सभी का है और सब एक समान हैं। मगर हम कोई और नियम तोड़ता है तो आलोचना करते हैं पर खुद तोड़ते सोचते तक नहीं हैं कि हम सभ्य नागरिक ही नहीं बन पाते तो देश भक्त कैसे बन सकते हैं। 
         कोई भी देश समाज वास्तविक रूप से ऊपर नहीं उठ सकता जब तक उस के लोग नियम पालन और नैतिकता की ईमानदारी की राह पर चलना ज़रूरी नहीं मानते। खेद है आज देश बदहाल है और हर दिन और भी रसातल को जाता जा रहा है मगर हम अपने अपने स्वार्थ में हठ पूर्वक अपने देश समाज को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। आज आपको इक बात याद दिलवानी ज़रूरी है कि 26 जनवरी 1950 जब देश का संविधान लागू हुआ तो उसके शुरूआती शब्द हैं वी दि पीपल ऑफ़ इंडिया , हम भारत के लोग , इस संविधान को अपना रहे हैं। हमने स्वीकार किया और हर देशवासी का कर्तव्य बन गया उसका पालन करना। मगर जिसे हमने तमाम धर्मों को दिखाने को अपनाया मगर समझा नहीं अपनाया नहीं केवल आडंबर करते हैं उस पर चलने का उसी तरह हम संविधान को अधिकार पाने तक याद रखते हैं फ़र्ज़ निभाने की बात को भूलकर। आदमी भी न रहे सब खुदा हो गये हैं , किसी को क्या खबर क्या थे क्या हो गये हैं। हक़ीक़क नहीं रहे फ़लसफ़ा हो गये हैं , हया की बात है बेहया हो गये हैं। झूठ की इब्तिदा नहीं इन्तिहा हो गये हैं , सच की बात है सब फ़ना हो गये है। जो कहीं भी नहीं हैं हर जगह हो गये हैं , बेगुनाही यही खुद गुनाह हो गये हैं। किस की बात है कैसे कहें सभी की बात है। शुरुआत किस से करें मुश्किल यही है। 

Monday, 5 November 2018

आप अपने में सिमटे सभी लोग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   आप अपने में सिमटे सभी लोग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

     सभी जान पहचान वाले हैं अजनबी कोई नहीं फिर भी अनजान हैं इक दूजे से। जैसे कोई इक गली में रहे मगर घर के भीतर नहीं आता जाता बस बंद खिड़की से बाहर सुनाई देती आवाज़ या खुलते बंद होते दरवाज़े की चौखट पर खड़े होकर गुज़रने वालों से औपचारिक नमस्कार तक का संबंध रखे। मिलना होता भी है तो किसी आयोजन पर और बात होती है तो केवल बात करने को। कभी कोई ऐसा सवाल करता है जिसका अर्थ ही ख़ामोशी रखना अच्छा है या सवाल करने वाले की पसंद का ही जवाब। चुप रहता हूं जब से दुनिया की रिवायत को समझने लगा हूं। व्यर्थ है उनको समझाना कि साहित्य और समाज की बात लिखने का मकसद क्या है। लिखते नहीं आजकल कई पूछते हैं उनको मालूम ही नहीं मैं तो हर दिन लिखता हूं मगर जो उनको लगता है मैं लिखता नहीं कभी वो सब। समय बिताने को वही राजनीति की फालतू बातें अपनी अपनी समझ से समझते हुए। कोई कहता है आजकल तो बहुत पैसा लेते हैं कई कवि और सरकार से भी इनामात पाते हैं। सामाजिक सरोकार की बात कोई नहीं करता है लेखन को भी बाज़ारी चश्मे से देखते हैं जो उनको कैसे कहूं मैं क्या हूं कौन हूं क्या चाहता हूं क्या करता हूं। ऊब जाएंगे सुनकर वास्तविकता को समझना नहीं चाहेंगे। भीड़ में खोये लोग खुद ही को भुला बैठे लोग मिलते हैं मगर मुलाकात नहीं होती है। सामने होकर भी दीदार नहीं होता है शक्ल होती है किरदार नहीं होता है। इधर लोग बात भी मतलब की करते हैं मगर बातों का कोई मतलब नहीं होता है। शिक्षित होने से ज्ञान नहीं हासिल हो जाता है , जीवन का अनुभव किसी सिमित दायरे में रहकर हासिल होता नहीं है पर लोग कुवें को समझते हैं समंदर यही है जिसके मालिक हम हैं। अंतर क्या है पढ़ लिख कर भी विचारशील नहीं बनने और काला अक्षर भैंस बराबर वालों में। नफरत की आग की बात भी करते हैं तो ऐसे जैसे समाज की नहीं उपन्यास की बात हो। आंच अपने तलक पहुंचने तक सब दूर से खड़े तमाशा देखते हैं। कहने को आधुनिक साधनों ने कितना पास ला दिया है मगर भौतिक रूप से , दिल से दिमाग से सोच से पहले से अधिक बढ़ गई हैं दूरियां। समस्याएं अपनी हैं सुलझाएगा कोई और ऐसा समझते हैं। औरों को देखते हैं मगर कमियां तलाश करने को ही किसी की काबलियत को नहीं देखते और खुद अपने आप को आईने में कोई नहीं देखता है। सभी बाहर से शांत लगते हैं मगर हर कोई भीतर किसी तूफान को लिए फिरता हैं। रहते हैं जैसे अभिनय कर रहे हों जीने का जीते नहीं हैं। जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है मनोरंजन को बड़ा महत्वपूर्ण समझते हैं समय बिताने को झूठी खुशियां दिखावे की हंसी लिए रहते हैं मगर चेहरा बुझा बुझा लगता है। बीमार समाज स्वास्थ्य पर बहस करता है।

Sunday, 4 November 2018

मरना भी नहीं सीखा जीना भी नहीं आता ( मनन ) डॉ लोक सेतिया

 मरना भी नहीं सीखा जीना भी नहीं आता ( मनन ) डॉ लोक सेतिया 

   आज अपने ही कुछ शेर और कुछ विचार ज़िंदगी से मौत तक के सफर को समझने के लिए। बचपन था तो ज़िंदगी गले लगाती थी शायद हमसे ही भूल हुई जो उसकी अहमियत जानी ही नहीं। धीरे धीरे दूरियां बढ़ती गईं हमारी ज़िंदगी से दूर हम खुद हुए और इल्ज़ाम देते रहे ज़िंदगी को। आज स्मार्ट फ़ोन पर ज़िंदगी से विडिओ कॉल करते हैं।  सोशल मीडिया पर संदेश भेजते हैं मगर आमने सामने मिलती नहीं ज़िंदगी। इक मतला और इक शेर यूं है।
                  बस मुहब्बत से उसको शिकायत रही , इस ज़माने की ऐसी रिवायत रही।
                  उड़ गई बस धुंआ बन के सिगरेट का , राख सी ज़िंदगी की हिकायत रही।
ज़िंदगी को समझ सके नहीं हम भी और दुनिया ने भी समझाया नहीं इक सबक जो प्यार वाला ज़रूरी था। देर बहुत हो गई तब समझ आया कि जो प्यार करते थे सभी कुछ देकर हमें कहीं जाते रहे। 
और हम बेगानों को अपना बनाने में उम्र गंवाते रहे। इक मतला और इक शेर और ऐसे कहा है। 

                     उसको यूं हैरत से मत देखा करो , ज़िंदगी तो हादिसों का नाम है। 
                 काफ़िले में चल रहे हैं साथ साथ , अपनी अपनी फिर भी तन्हा शाम है।
ये भी कैसी अजीब बात है मौत मांगते हैं सभी मरना चाहते नहीं लोग। मौत को पास जाकर देखते तो पता चलता कितनी प्यारी है। मौत से लोग डरते रहे और मौत का डर दिखाते रहे जबकि।

                 मौत तो दरअसल एक सौगात थी , हर किसी ने उसे हादिसा कह दिया। 
                           शिकवा तक़दीर का करें कैसे , हो खफ़ा मौत तो मरें कैसे।
नहीं सीख पाये जीना हम फिर भी जीते रहे जैसे कोई गुनाह करते रहे। कोई तलाश थी जो अधूरी रही। कुछ शेर कहना चाहता हूं। 

                  मिलने को दुनिया में क्या न मिला , मझधार में नाखुदा न मिला।
                  ढूंढा किताबों में हमने मगर , जीने मरने का फ़लसफ़ा न मिला।
                  मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी , दर्द का इक जाम है ये ज़िंदगी। 
                  मुस्कुराती सुबह आती है मगर , फीकी फीकी शाम है ये ज़िंदगी। 
                  है कभी फूलों सी कांटों सी कभी , नित नया अंजाम है ये ज़िंदगी। 

शायद तीस साल पहले अपनी वसीयत इक ग़ज़ल की शक्ल में लिखी थी जो मुझे मालूम है नहीं संभव हो सकता। भला दुनिया होने देगी ऐसा कोई किसी की मौत का जश्न मनाये इसे मंज़ूर करे। फिर भी हाज़िर है। 

( जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ) मेरी वसीयत

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये ,
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात ,
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं ,
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे ,
मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई ,
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी ,
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये।  

अलविदा ज़िंदगी 

और कब तलक मुझे 
रोके रहोगी प्यार से 
जाने भी दो अब तो 
शाम ढलने लगी है। 

न शिकवा न गिला है 
बहुत है जितना मिला है 
थक गया हूं चलते हुए 
खत्म अपना सिलसिला है।
 

Thursday, 1 November 2018

नीम हकीम खतरा ए जान बनाम सोशल मीडिया ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     नीम हकीम खतरा ए जान बनाम सोशल मीडिया ( आलेख )

                                    डॉ लोक सेतिया  

       मैं जो कहूंगा सच कहूंगा सच के इलावा कुछ नहीं कहूंगा। ये कहना ज़रूरी है आज जब खुद अपनी ही नासमझी नहीं मूर्खता की बात बतानी है। अपनी मूर्खता कोई किसी को बताता है भला , सब छुपाते हैं। हर गलती होने पर सबसे पहले यही सोचते हैं धन्यवाद भगवान का कोई देख नहीं रहा किसी को पता ही नहीं चलेगा कि मुझसे ये भूल हुई। बात सोशल मीडिया की है और शायद इससे अधिक मूर्खता क्या हो सकती है कि खुद एक डॉक्टर होने और बाकी दुनिया को समझाते रहने कि अपने ईलाज खुद नहीं करें न हर किसी की सलाह से विशेषकर टीवी अख़बार के विज्ञापन से कभी अपना उपचार करें। मैंने खुद इतनी बड़ी गलती की। एक बात सबसे पहले कहना मेरा कर्तव्य है कि बेशक हर समाज के भाग की तरह चिकिस्या व्यवसाय में भी कुछ कमियां आई हैं बदलते समय में फिर भी ये बात हम सभी को माननी चाहिए कि हर डॉक्टर चाहता है और पूरी कोशिश करता है अपने रोगी को ठीक करने को। कोई नहीं कह सकता कि कोई डॉक्टर अपने रोगी को ठीक करना नहीं चाहता। वास्तव में अधिकतर जैसा माना जाता है कि डॉक्टर अधिक पैसे लेते हैं या लेना चाहते हैं उस में भी तथ्य नहीं है और सामान्यता ऐसा नहीं होता है। बल्कि शायद हम ही अपनी जान की कीमत कम समझते हैं और पैसों की अधिक। आज शायद मेरे साथ आपको भी अपने उन सभी डॉक्टर लोगों का आभार व्यक्त करना चाहिए जिन्होंने कितनी बार आपको स्वस्थ किया निरोग किया रोग होने पर। 
          ये अच्छा है तब सोशल मीडिया नहीं था और मुझे पता था कि बेशक खुद डॉक्टर हूं मैं फिर भी अपने ईलाज अपने आप नहीं करना चाहिए और 1990 में मैं इक विशेषज्ञ से मिला और जांच करवाई जिस से मालूम हुआ कि मेरा कोलेस्ट्रॉल बहुत बढ़ा हुआ है और मुझे बहुत एतिहात बरतने की ज़रूरत है। 27 साल तक मैंने उनकी अथवा किसी और विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह ली और समस्या होने पर फिर से तंदुस्त हो गया। केवल हृदय की नहीं अन्य भी जीवन की स्वस्थ्य संबंधी समस्याओं में मुझे चिकित्स्कों की सलाह से स्वास्थ्य लाभ हुआ है। अक्सर हम दवा के साइड इफेक्ट्स की बात करते हैं जबकि उनसे डरने या घबराने की नहीं सचेत रहने की ज़रूरत होती है। सही डोज़ में डॉक्टर की सलाह से दवा लेना कभी अहितकर नहीं होता है। मगर साल पहले इक वीडियो से प्रभावित होकर मैंने बहुत बड़ी गलती की , जो दवा सालों से लेकर तंदुरस्त रहा उसको बंद कर दिया था क्योंकि उस वीडियो में जानकारी दी गई थी कि अधिक कोलेस्ट्रॉल होने से कोई समस्या नहीं होती है और ऐसा कुछ दवा बनाने वाली कंपनियों ने अपनी दवा बेचने को किया है। मैंने नासमझी में मूर्खता की और सोचा कि जब मेरा कोलेस्ट्रॉल बिल्कुल ठीक है तो दवा बंद कर देता हूं। मगर साल बाद ही मैं उसी मोड़ पर पहुंच गया जहां 1990 में 28 साल पहले था। अब जांच करवाई तो पता चला कि अपना ईलाज बिना अपने डॉक्टर की राय करने का नतीजा क्या होता है। धन्यवाद मेरे सभी डॉक्टर्स का मुझे हर बार उचित उपचार और सलाह देने के लिए। आज अपना ही लिखा पुराना लेख फिर याद आया है जो नीचे लिख रहा हूं।     
*******************************************************************************

  आप अपने डॉक्टर नहीं बनें ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

       शायद सब कुछ उतना आसान होना मुमकिन नहीं जितना हम चाहते हैं। मेरे पास कई बार लोग आएं हैं इंटरनेट से किसी रोग बारे जानकारी हासिल कर अधकचरी जानकारी से कोई गलत नतीजा निकाल कर। मैंने हर बार उनको भी और कई बार कहीं भी या फोन पर ही अपने रोग का उपचार पूछने वालों की आगाह किया है कि अपनी जान की कीमत को समझें और इस तरह उपचार नहीं कराएं। पिछले साल मुझे जब लगा लोग आयुर्वेद के लेकर ठगी का शिकार हो रहे हैं तब मैंने सभी को निस्वार्थ सलाह लेने को अपना नंबर भी दिया और इक पेज पर आयुर्वेद की जानकारी और बहुत ऐसी समस्याओं का निदान भी बताना शुरू किया। मगर तब भी अधिकतर लोग चाहते थे उनको बिना किसी डॉक्टर से मिले घर बैठे दवाएं मिल सकें। अर्थात जो उचित नहीं मैं समझाना चाहता था लोग मुझ से भी वही चाहते थे। शायद कोई ऐसे में अपनी दुकानदारी कर कमाई भी कर सकता था , मगर मुझे लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर पैसे बनाना कभी मंज़ूर नहीं रहा। आजकल देखता हूं हर कोई हर समस्या का समाधान गूगल से खोजने लगे हैं। मगर रोग और चिकिस्या बेहद संवेदनशील विषय हैं। सवाल ये नहीं कि इस से डॉक्टर्स हॉस्पिटल या नर्सिंग होम को कोई नुकसान हो सकता है , सवाल ये है कि खुद जो इस तरह उपचार करेंगे उनका भला इस में है भी या नहीं। आप अगर कभी किसी भी दवा को लेकर सर्च करें तब आपको कठिन ढंग से इतना कुछ मिलेगा कि आप घबरा जाओगे और कोई भी अलोपथी की दवा नहीं लेना चाहोगे। मगर असल में कितने लोग इस सब को पढ़ कर समझ सकते हैं , मेरा विचार है अधिकतर बस रोग और दवा का नाम और किस मात्रा में खानी पढ़कर उसे अपने पर इस्तेमाल करते होंगे। जब कोई आस पास क्या राह चलता भी बताता है किसी रोग की दवा तब भी लोग बिना विचारे अपने पर आज़मा लेते हैं तब गूगल का नाम ही उनको प्रभावित करने को काफी है। कल ही मैंने इसी तरह इक नई दवा की जानकारी ढूंढी जो दिल्ली के इक बड़े संस्थान के डॉक्टर मेरे परिवार के इक सदस्य को लिख रहे थे , तब मैं हैरान हो गया ये पढ़कर कि तमाम रोगों पर काम करती है की बातों के आखिर में लिखा मिला अभी तक ये किसी ने विधिवत रूप से प्रमाणित किया नहीं है। ये शब्द आने तक मुझे लग रहा था जैसे ये कोई संजीवनी बूटी है राम बाण दवा है। लेकिन आखिरी शब्द मुझे डराते हैं क्योंकि वहीं उस दवा के तमाम ऐसे दुष प्रभाव भी थे कि इस से अमुक अमुक गंभीर रोग हो सकते हैं। इसलिए मुझे लगा लोगों को इस बारे सावधान किया जाना चाहिए। बेशक लोग विवश हैं क्योंकि देश में न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की खराब दशा है बल्कि जब मिलती भी है तो अनावश्यक रूप से महंगी और केवल पैसे बनाने के मकसद से न कि ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने को लोगों को रोगमुक्त स्वास्थ्य जीवन जीने के लिए। फिर भी ये तरीका कदापि सही नहीं है।