Saturday, 27 October 2018

सीबीआई मार्का पटाखों की गूंज ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  सीबीआई मार्का पटाखों की गूंज ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      आधी रात को गूंज दूर तक जाती है तभी सरकार ने आधी रात को सीबीआई मार्का पटाखों को आज़मा कर देखा। अदालती आदेश है दीपावली पर ऐसे पटाखे चलाए जाने चाहिएं जो कम प्रदूषण करें अब इन से कोई प्रदूषण हुआ ही नहीं और धमाका देश भर में अभी भी गूंज सुनाई दे रही है। आप बेकार चिंता मत करो कितनी संस्थाओं का क्या हाल है जब देश बदहाल है तो ये सभी देश से अलग भला कैसे रह सकते हैं। क्या ये सरकारी दीवाली थी या दिवालिया घोषित करना ये बहस करते रहेंगे जिनको आदत है चिंता करने की। चिंताराम की चिंता करने से कोई समस्या हल हुई कभी। सकारात्मकता तलाश करना आना चाहिए दशहरा से अनहोनी की चिंता होने लगी थी। आपको वास्तविकता अभी तक भी शायद समझ नहीं आई है। जिस इमारत को समझा गया था ऐसे पत्थर की बनी हुई है कि कभी दरार तक नहीं आएगी , ज़रा से तपिश में पिघल रही है मोम की तरह। सरकारी संस्थाओं की मज़बूती ऐसी ही होती है रावण के ऊंचे बुत को दो पल नहीं लगते ख़ाक होते समय। जिसका दावा था सबसे भरोसे की नींव पर बनाया गया है उसी में हर कोई भरोसा तोड़ता मिला। मेरे दोस्त जवाहर लाल ज़मीर जी का शेर है शायद दिल्ली की बात लगती है। 

       इक फूल को छुआ तो सब कागज़ बिखर गए , तुम कह रहे थे मेरा बहारों का शहर है।

यहां तो फूल तक पत्थर के होते हैं राजधानी में दिखावे को लगते हैं असली जैसे मगर खुशबू नहीं होती न ही कोमलता का एहसास होता है। दूर से दर्शन करो यही अच्छा है हाथ लगाओ तो घायल भी हो सकते हैं। अब हर राज्य अपने अपने विभाग को निर्देश जारी करने वाला है कि आप भी ऐसे धमाके करके दीवाली मनाओ। सीबीआई के पटाखे ही नहीं मिठाईयां भी मंगवाओ। त्यौहार है सब मिलकर मनाओ नाचो गाओ। अभी तो अपने सैंपल देखे हैं अभी तो फिल्म बाकी है ये केवल ट्रेलर था। अगले महीने रिलीज़ होगी सारी फिल्म और सुपर डुपर हिट होनी तय है। ठगज़ ऑफ हिंदुस्तान के बाद इसकी बारी है आमिर खान की चिंता बढ़ गई होगी। अभी तक मामला चोर पुलिस वाला था जो वास्तव में चोर चोरी और चौकीदार था मगर किसी को खबर नहीं थी। बात निकलती है तो कितनी दूर तलक जाएगी ये शायद खुद बोलने वालों को खबर नहीं होती। काहे को लफड़ा किया अंदर बैठ चुपचाप सुलटा लेते तो ऐसी छीछालेदारी तो नहीं होती। नाम कमाने में सालों लगते हैं नाम मिटाने को इक लम्हा भी नहीं। आज जो लिखी है लघुकथा लगती है , कल यही कहानी बनेगी और बाद में इसी का उपन्यास बनाया जाएगा। अभी थोड़ा रुकना चाहिए तमाशा शुरू हुआ है खत्म नहीं होने वाला जल्दी से। मध्यांतर।

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