Thursday, 11 October 2018

कानून उनके लिए फुटबॉल है ( अंधेर नगरी चौपट राजा ) डॉ लोक सेतिया

         कानून उनके लिए फुटबॉल है ( अंधेर नगरी चौपट राजा ) 

                                  डॉ लोक सेतिया 

    कल की कई घटनाओं की बात आज। कल लोककनायक का जन्म दिन था।  कल गंगा सफाई के लिए अनशन करने वाले जी डी अग्रवाल का निधन हुआ। कल मुझे पुलिस वालों का परवाना मिला आज जाकर उपस्थित होने को। कल रात ही उत्तर प्रदेश के लखनऊ में आजतक टीवी चैनल वालों ने खबर में पुलिस वालों को सोते हुए दिखाया। इनका एक साथ बताना समझने को ज़रूरी है कि देश में नेताओं अधिकारीयों ने कानून को कैसे फुटबॉल बना रखा है। शुरआत 27 नवंबर 2015 से करता हूं। मैं तब 64 साल का था और बीमार भी था मगर उस दिन मैंने सी एम विंडो पर शिकायत दर्ज करवाई थी गैरकानूनी कार्यों और गंदगी को लेकर। कभी इधर कभी उधर भेजी जाती रही शिकायत करवाई को मगर सब विभाग और अधिकारी किसी और को करने की बात लिखते रहे , ये किसी ने नहीं कहा कि शिकायत झूठी है। मगर करीब साल भर बाद शिकायत दो बार बंद कर खुलने के बाद खुद सी एम के ऑफिस के पास चली गई। और मुख्यमंत्री दफ्तर द्वारा निपटान किया गया टिप्पणी लिखकर कि ये कोई शिकायत ही नहीं इक सुझाव मात्र है। मैंने इक खुला खत भेजा विभाग को मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री जी को कि आपको साल लगता है ये साबित करने में कि ये शिकायत है या सुझाव और इसी तरह हर ऐप्प पर दफ्तर में बैठे निपटारा किया जाता है तो ऐसी एप्प्स की उपयोगिता ही कुछ नहीं है। मगर हैरानी हुई जब विभाग से सूचना मिली कि उस खुले खत को ही शिकायत बना लिया गया है जिस पर लिखा हुआ था मुझे कोई शिकायत नहीं है। अर्थात आपकी मर्ज़ी है सुझाव को शिकायत बना सकते है और शिकायत को सुझाव। मगर करना कुछ भी नहीं केवल कागज़ी खानापूर्ति कर दिखानी है। अब कल की बात को लेकर वास्तविकता। 
            इक ऐसा ही जनहित का पत्र ईमेल से भेजा सभी अख़बारों और अधिकारीयों को करीब दस दिन पहले जब किसी नागरिक को उत्तर प्रदेश पुलिस ने एनकउंटर कर मार दिया और उसी दिन हरियाणा में एक नेता का ब्यान आया कि हरियाणा का साल में एकाध ही शहीद होता है इसलिए मुख्यमंत्री से कहकर सहायता राशि बढ़वा देंगे। लिखा था नशे में हैं जनाब , सत्ता का नशा है समझने नहीं देता क्या बोल रहे हैं। ये कनून व्यवस्था पर ध्यान दिलवाने को जनहित का खत था जिसको हरियाणा पुलिस ने न केवल शिकायत माना बल्कि खत लिखने वाले को ही दफ्तर आकर सफाई देने को फरमान भेज दिया। उनको लगता ही नहीं सरकार या विभाग को किसी सुधार की ज़रूरत है , जब जिस भी पुलिस वाले से बात हुई है उसी से सुना है जनता को सुधारना है। फिर ये सेवा सुरक्षा सहयोग का स्लोगन क्या है। 
               कभी अख़बार भी पाठकों के पत्र छापते थे और सरकारी विभाग भी चिट्ठी मिलने पर कुछ करवाई किया करते थे। उसके बाद जब लाज का घूंघट उतरा तो मिले खत रद्दी की टोकरी में डालने लगे। अब लोग ईमेल और सोशल मीडिया पर शिकायत करने लगे तो समस्या हुई है कि बिन में आप डाल सकते हैं भेजना वाला जाने कब तक नहीं डिलीट करता है। बड़े बड़े पढ़ लिख कर उच्च पदों पर आसीन लोग भी पढ़कर समस्या का समाधान नहीं करने पर विचार करते , ईमेल भेजने वाले को अपने दफ्तर बुलाकर जो मर्ज़ी बयान लिख कर हस्ताक्षर करवा मामला निपटाते हैं। समस्या की तरफ कोई ध्यान नहीं देता है , बात व्यवस्था के ढंग को बदलने की है। कल ही इक पोस्ट लिखी थी जो इस तरह है :-

    कौन होते हैं हम लोग ( जनहित की बात वाले ) डॉ लोक सेतिया 

हम बहुत सारे लोग हैं कोई नाम नहीं कौन कौन कहां कहां है। न कोई संगठन न कोई एन जी ओ न किसी भी जाति धर्म से कोई वास्ता। मानवता है जो हर दिन याद रहती है। कहीं कुछ भी गलत होता है हम बेचैन होने लगते हैं। हम आवाज़ उठाते हैं अन्याय अत्याचार भेदभाव किसी के भी साथ होता देखकर। कोई डूब रहा है तो हम तमाशाई बनकर विडिओ नहीं बनाते। तैरना नहीं आता फिर भी दरिया के लहरों से टकराते हैं और चिंता नहीं करते मरने से नहीं डरते कोशिश करना छोड़ते नहीं है। हमने हार नहीं मानी है कि कुछ भी सुधर नहीं सकता है। हमने कोई सीमा नहीं बनाई हुई कि अपने गांव की गली की शहर की बात करनी है , राज्य की बात करनी है , हमने समाज की बात करनी है देश के हर भाग की बात करनी है। न किसी ने हमें आदेश दिया है न किसी का कोई निर्देश है , पुराने लोग पुरानी परंपरा बिभाते हैं। समाज को समाज का सच दिखलाते हैं। कोई वेतन कोई रुतबा कोई शोहरत नहीं मांगते हैं कहीं भी किसी का शोषण नहीं हो अराजकता नहीं हो कोई लाचार नहीं हो इतना चाहते हैं। जब भी जिस जगह कोई बात ठीक नहीं नज़र आती संबंधित लोगों विभाग को जाकर बताते हैं , उनको वास्तविकता बताने को कई ढंग अपनाते हैं। कभी खुद जाना होता था , कभी खत लिखकर सूचना देते थे कभी फोन पर समस्या बताते थे आजकल ईमेल और सोशल मीडिया से कर्तव्य निभाते हैं। कहीं कोई घायल है कहीं कोई दबा कुचला किसी का बंधक बना हुआ है कहीं शिक्षा स्वास्थ्य की कोई खामी है कहीं सरकारी विभाग की नाकामी है जब जो भी सामने आता है अपना कर्तव्य हमें बुलाता है। 
     देश समाज की समस्याओं को हमने अपना समझा है , कुछ कोशिश करने का बीड़ा उठाया है। निराश होकर नहीं बैठे थककर हार नहीं मानी कटु अनुभवों से मन नहीं घबराया है , हर दिन किसी न किसी तरह कोई सबक समझ आया है। आज ऐसे इक जी डी अग्रवाल की खबर आई है 85 साल की आयु है गंगा सफाई को 109 दिन से अनशन पर बैठे हैं। कोई किसी गांव में अकेला रास्ता बनाता है , कोई और सड़क किनारे बच्चों को खुद बुलाकर पढ़ाता है। कोई किसी मुसाफिर को मंज़िल बतलाता है बिना वर्दी यातायात को सुचारु ढंग से चलवाता है। ऐसे तमाम लोग अपने घर परिवार से बाहर सब को अपनाते हैं निस्वार्थ काम आते हैं। मगर जिस किसी की गलती पर उंगली उठाते हैं उसकी आंख का कांटा बन जाते हैं। सरकार सवाल करती है अधिकारी लताड़ लगाते हैं आप कौन हैं।  क्या बताएं कोई जवाब भी नहीं बस मौन हैं। समाजसेवक देशभक्त कई लोग हैं जो तमगा लगाए फिरते हैं हम अनाम गुमनाम कोई स्वार्थ नहीं अच्छा लगता है यही काम करते हैं। जिस किसी को दाग़ दिखलाते हैं उसी के कोप का भोजन बन जाते हैं। हम कोमल बदन कोमल दिल वाले लोग तूफानों से पत्थरों से टकराते हैं घायल होकर भी नहीं रुकना जानते चलते जाते हैं। जब भी कोई हमारे होने पर ऐतराज़ जताता है हमारी आवाज़ को खामोश करना चाहता है अपने शुभचिंतक को विरोधी समझता है , अफ़सोस बस जताते हैं। हम उजालों की बात करते हैं खुद को जलाकर रौशनी करते हैं मगर अब तो ये भी होता है अंधेरे हमीं पर इल्ज़ाम धरते हैं। सच की मशाल लेकर चलते रहे हैं झूठ की बस्ती से नहीं गुज़रते हैं। हम राहों से कांटे चुनने वाले लोग हैं जिधर से भी हम गुज़रते हैं फूल खिलते हैं। जाने ये कैसा निज़ाम आया है चलना गुनाह रेंगने तक की मनाही है। बार बार यही होता है , मुजरिम समझा जाता है जो फूल बोता है। आम खाने की बात करते हैं बबूल बोकर भी कुछ लोग , जिनको गुलों से लगाव नहीं है वो कहते हैं हम दरख्त हैं मगर मिलती लोगों को छांव नहीं। आज इतना ब्यान है मेरा कल फिर कोई इम्तिहान है मेरा। 
मुझे सरकार से कोई शिकायत नहीं है न ही उम्मीद है , केवल जनहित को बताया है। सफाई दे रहा हूं।

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