Tuesday, 16 October 2018

पुरानी राह से बच कर गुज़रना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 पुरानी राह से बच कर गुज़रना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

पुरानी राह से , बच कर गुज़रना है 
कभी फिसले थे अब वापस निकलना है। 

नशे में रात जिसके साथ हम नाचे 
नहीं अब याद दिन चढ़ते मुकरना है। 

उसे , पहचानते कैसे , भला यारो ,
है कहता साथ लेकर तुमको मरना है। 

किसी को सादगी अच्छी बहुत लगती 
उसी के वास्ते सजना संवरना है।
निभाना है नया किरदार कुछ ऐसे
फरिश्ता बन के सारे जुर्म करना है। 

हुई थी भूल तुम भी भूल जाओ सब 
संभल जाओ नहीं अब फिर फिसलना है। 

ऊंचाई पर रहोगे कब तलक "तनहा"
कभी आखिर ज़मीं पर ही उतरना है।



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