Tuesday, 25 September 2018

पथ पर सच के चला हूं मैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

   पथ पर सच के चला हूं मैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

पथ पर सच के चला हूं मैं ,
जैसा अच्छा - बुरा हूं मैं। 

ज़ंजीरें , पांव में चाहे ,
फिर भी चलता रहा हूं मैं।

कोई मीठी सुना लोरी ,
रातों रातों जगा हूं मैं। 

दरवाज़ा बंद था जब जब ,
जिसके घर भी गया हूं मैं। 

मैंने ताबीर देखी है ,
इन ख्वाबों से डरा हूं मैं। 

आना वापस नहीं अब तो ,
कह कर सबसे चला हूं मैं। 

खुद मैं हैरान हूं "तनहा"
मर कर कैसे जिया हूं मैं।

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