Thursday, 20 September 2018

इन लबों पर हसी नहीं तो क्या ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इन लबों पर हसी नहीं तो क्या ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इन लबों पर हसी नहीं तो क्या ,
मिल सकी हर ख़ुशी नहीं तो क्या।

बात दुनिया समझ गई सारी ,
खुद जुबां से कही नहीं तो क्या।

हम खुदा इक तराश लेते हैं ,
मिल रहा आदमी नहीं तो क्या।

दोस्त कोई तलाश करते हैं ,
मिल रही दोस्ती नहीं तो क्या।

ज़ख्म कितने दिए मुझे सबने ,
आंख में बस नमी नहीं तो क्या।

और आये सभी जनाज़े पर ,
चल के आया वही नहीं तो क्या।

यूं ही मशहूर हो गए "तनहा"
दास्तानें कही नहीं तो क्या।

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