Tuesday, 28 August 2018

डराता हुआ बेरहम समाज ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     डराता हुआ बेरहम समाज ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

     इक टीस इक दर्द जो सहन नहीं होता अनुभव कर रहा हूं लिखते हुए। सच कहूं समझ नहीं आता बात की शुरुआत कैसे करूं। हम बड़ी बड़ी बातें करते हैं आदर्श नैतिकता और धर्म की। मगर जो दिखाई देता है वो कुछ और ही साबित करता है। शिक्षा के मंदिर अब केवल पैसा बनाने का साधन बन गये हों इतना नहीं है अब तो विद्यालयों में व्यभिचारी अपराध कर रहे हैं। धर्म की आड़ में हर अपराध परवान चढ़ रहा है। सरकार को समाज के पतन की चिंता क्या हो जब खुद नेता सरकार और अधिकारी मनमानी करते हों और हर डरावनी खबर केवल जांच और रपट दर्ज करवाने तक रह जाती है। किसी को फुर्सत ही नहीं जो सोचे ये समाज किस तरफ जा रहा है , कानून का नहीं जंगलराज है। किसी अपराधी को खौफ है ही नहीं कनून का , हो भी कैसे जब नेता अधिकारी खुद उचित अनुचित की बात छोड़ अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हों। और हम तथाकथित सभ्य और आधुनिक शिक्षित लोग हर बात को औपचारिक विरोध जताने या किसी बलात्कार पीड़ित की हत्या होने पर मोमबत्तियां जला जुलूस निकालने और बहरे गूंगे लोगों से इंसाफ की भीख मांगने तक की बात कर घर बैठ अपनी बारी की राह देखते हैं। हर सुबह एक नहीं कितनी डरावनी खबरें सामने आती हैं तो लगता है हमारा समाज इंसानों के जीने के लायक नहीं रहा है। आपने कभी विचार किया है इतिहास लिखने वाले जब किसी युग के इतिहास की खोज करते हैं तो उस वक़्त की हर बात को देखते हैं। तस्वीरों को सामान को उस काल की लिखी हुई कहानियों गीतों नाटकों और अवशेषों को देखते हैं और समझते हैं तब कैसे लोग हुआ करते थे। 
             सोचो आज जो घटता है और जैसे हर दिन अराजकता बढ़ती नज़र आती है , जब इस सब की वास्तविकता को समझ कर इतिहासकार लिखेंगे तो हम मूर्ख कायर और जंगली लोग कहलाएंगे। इस समय के टीवी सीरियल की कहानियां देख कर यही लगेगा कि कैसे हम इस से मनोरंजन किया करते थे। इन में हर कोई छल कपट ही नहीं कत्ल तक यूं करता है जैसे इंसान नहीं गाजर मूली है आदमी। क्या यही सच है हमारे घर की सभी महिलाएं आपराधिक कार्यों में पुरुषों को भी मात देती हैं। अस्पताल पुलिस सब को जब चाहे पैसे देकर अपराध में साथ मिला लेती हैं। जिन फिल्मों की आमदनी पर गर्व करते हैं अभिनेता वो फ़िल्में संदेश क्या देती हैं और समाज को किस दिशा में धकेल रही हैं। हम खुद तमाशाई हैं और हम खुद तमाशा भी हैं। क्या इससे अधिक मूर्खता कोई कर सकता है। 
                   भौतिक उन्नति किसी काम की नहीं अगर मानसिक और सामजिक तौर पर हम पहले से और पिछड़ते जा रहे हैं। सत्ता पर बैठे लोगों को यही पसंद है कि लोग सही गलत की बात पर चर्चा ही नहीं करें और केवल अपने लाभ की बात पर ध्यान दें। अपने स्वार्थ में हम राजनेताओं की चालों के मोहरे बनकर रह गए हैं। नेता हमें बांटना चाहते हैं लड़वाना भिड़वाना चाहते हैं और हमारी लाशों पर खड़े होकर शासन पाना चाहते हैं। क्या ये हमारे दुश्मन नहीं हैं क्या हमारी भलाई कर सकते हैं ऐसे लोग। हमने खुद अपनी आज़ादी अपने अधिकारों को किनके रहमोकरम पर छोड़ दिया है। हम समझ ही नहीं रहे ये दावानल की आग हम सभी को जला कर राख कर देगी किसी दिन। नेता आग को बुझाते नहीं हैं दूर से खड़े देखते हैं और हवा देने का काम करते हैं। हमारे पूर्वजों ने हमें ये तो नहीं दिया था विरासत में। सद्भावना और भाईचारे वाला सभ्य समाज आज हैवानियत को शर्मसार करता लगता है तो इसका ज़िम्मेदार कोई तो है। सीमा की बात करना व्यर्थ है कोई सीमा पतन की बची कहां है। कोई मसीहा नहीं आएगा बचाने हमें , खुद ही संभलना होगा और बचाना होगा अपने समाज को ताकि अपने बच्चों को हम इक अच्छा समाज देने का कर्तव्य निभा सकें।
         हम समझते हैं बड़ा सा घर हर सुख सुविधा और आराम के साधन बहुत बड़ा बैंक बैलेंस अपनी ख्वाहिशों को पूरा करने को होना हमारी सफलता का सबूत है। मगर इसको हासिल करने को जो खोते हैं उसका पता ही नहीं है। हमारे बाज़ार में उसका मोल कुछ भी नहीं है मगर , अनमोल भी कुछ होता है ये हम जानते ही नहीं हैं। जो बिकता नहीं उसे कोई खरीद नहीं सकता उसकी कोई कीमत नहीं होती , आज कीमत लगती है ये खिलाड़ी कितनी कीमत का , ये अभिनेता कितने में काम करता है , जिसे आप महानायक कहते हैं वो पैसे लेकर झूठ ही बोलता नहीं उन वस्तुओं को बेचकर जिसे खुद कभी उपयोग नहीं करता बल्कि गुमराह करता है गलत राह बताता है। नहीं भाई नायक वो नहीं होते जो सही राह नहीं दिखाते हों , ये तो खुद भटके हुए लोग हैं और हमने इन्हीं को अपना आदर्श बना लिया है ये हमारी मूर्खता का सबसे बड़ा प्रमाण है। जो नेता सत्ता पाने को कुछ भी कर सकते हैं और जिनको सत्ता जाना डराता हो उनको आप मसीहा समझते हैं तो अपने नायक मसीहा और महानता को कितना बौना कर दिया है।
                   आज कोई किसी के घर जाता है तो उसकी शख्सियत को ड्राइंग रूम एलसीडी टीवी के साइज़ और रईसी के साज़ोसामान से आंकता है। ये सब नहीं है तो समझता है हमारे बराबर का नहीं है , ये हमने हमने स्टैंडर्ड रखा हुआ है। किन मूल्यों पर कोई चलता है इसको हम स्टैंडर्ड नहीं मानते इतना घटिया हमारा स्टैंडर्ड है। सादगी से जीना विलासितापूर्ण वस्तुओं को अपनी आदत या ज़रूरत नहीं बनाना लगता है बड़ी बात नहीं है छोटी बात है। कभी ऐसे रहना पड़ा तो , जिनकी आज बातें करते हैं वो तमाम आदर्शवादी लोग इसी तरह से रहते थे और इसी तरह रहना भी चाहते थे। हमने दिखावा और आडंबर को बड़े होने का प्रमाण समझ लिया है जबकि ये बड़े नहीं छोटे होने की बात है , आपकी सोच बड़ी होनी चाहिए। खुद इन बातों को महत्व देकर हम चाहते हैं समाज आदर्शवादी मूल्यों पर चलने वाला हो और भौतिकता की दौड़ में अंधा नहीं हो तो हम दोगले हैं। बबूल बोकर आम खाने की अभिलाषा करते हैं। घरों की मंज़िलें ऊंची हैं इंसानों की इंसानियत नीचे गिरती जा रही है , प्रगति नहीं ये अवनति है। और हमने मंज़ूर किया है और और और नीचे जाना ऊपर उठने को।

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