Wednesday, 15 August 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 12 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग  12 

                                                डॉ लोक सेतिया 

       15 अगस्त की कहानी काफी हद तक सच भी है। और विडंबना भी है पिछली कुछ कहानियों की तरह जिस को सुखद अंत बताया जाता है क्या वो वास्तव में सुखद है। मुझे बहुत साल पहले इक दोस्त ने इक़बाल का शेर सुनाया था जो मैंने बाद में इक़बाल की शायरी में सही पढ़ा भी समझा भी। शुरुआत उस से ही। 

     जिस खेत से दहक़ां को मय्यसर नहीं रोटी , उस खेत के गोशा ए गंदुम को जला दो।

 शायद इक़बाल ही ऐसा कह सकते थे , कि जिस खेत से किसान को पेट भरने को रोटी भी नसीब नहीं होती , ऐसे खेत की गेहूं की बालियों को जला दो। मगर शायद उनको पता नहीं था ऐसा मुमकिन नहीं है कोई किसान अपनी उगाई फसल को जला नहीं सकता है। अपनी जान जोखिम में डालकर भी फसल को बचाता है ये भी जानते हुए कि उस पर किसान का हक भी नहीं रहा कोई उसकी ज़मीन को बैंक से खरीद चुका है। बंजर ज़मीन को महनत से सींच कर फसल बोता है उगाता है तो बैंक वाला बताता है ये ज़मीन बैंक की है बोर्ड लगा दिया गया है। अब तुम्हारी महनत की फसल भी उसी की है जो इस खेत को खरीदेगा। इस से पहले बैंक वाले ज़मीन गिरवी रखकर लिया क़र्ज़ चुकाने को एक साल की मोहलत देते हैं इस शर्त के साथ कि सात दिन में 15 लाख क़र्ज़ का ब्याज चार लाख जमा करवा दे अगर। इक पहली कहानी में बेटी और बेटा घर से पिता का धन चुरा लेते हैं और जिस कंपनी के मालिक का पैसा था वो उसकी शिकायत पुलिस को करता है। इस कहानी में भी असूल और मूल्यों को दरकिनार कर पत्नी ही बेटे को वो पैसे जो किसान अपना घर भी गिरवी रखकर लाया था दे देती है। ईमानदारी को हर बार यही ईनाम आखिर क्यों मिलता है अपने ही घर से धोखा। किस मिट्टी का बना है जो कुदरत भी कभी साथ नहीं देती और कुदरत से लड़ते हुए खेत की सिंचाई करता है। जब फसल लहलहाती है और लगता है अच्छे दिन आने वाले हैं तभी बैंक वाला बताता है तुम किसान नहीं इक गुनहगार हो अपराधी हो जो कब्ज़ा करना चाहता है अपनी बिकी हुई ज़मीन पर खेती कर के। मगर वो रहम खाने की बात करता है और पुलिस को किसान को जेल नहीं डालने की बात कहता है मगर साफ करता है कि अब खेत ही नहीं उस पर खड़ी लहलहाती फसल भी उसकी हो चुकी है जिस ने ज़मीन खरीद ली है बैंक से। उसी रात सालों बाद बारिश होती है जब फसल पकी खड़ी है और उसे डूब कर बर्बाद करना है। उधर किसान बिमार है और डॉक्टर उसे आराम करने की हिदायत देता है। बेटा पैसे लेकर घर से भागकर अपनी बाकी फीस चुकाकर डिग्री लेकर छोटी सी नौकरी कर रहा है शहर में। अपना अंजाम अपना भविष्य देख लेता है अपने ही गांव के ताऊ जी को गॉर्ड की नौकरी करते और भीख लेते देख कर ईनाम के नाम पर। किसान रात को बिमारी की हालत में फसल बचाने को बारिश में खेत जाता है पत्नी और बेटी के रोकने के बाद भी। अब फसल उसकी नहीं है मगर अपनी उगाई फसल को तबाह होते नहीं देख सकता है। वहीं रात को फसल बचाते बचाते बेहोश हो जाता है और सुबह पत्नी आकर देखती है और शायद लगता है ज़िंदा नहीं है मगर आंखें खुलते ही बच गई खेती को देख जी उठता है। 
          यही वास्तविकता है कठोर धरातल की , कोई सरकार कोई फसल बीमा कोई योजना की कोई बात ही नहीं है। कहानी लिखने वाला जनता है मगर ये सच सामने नहीं लाता और कहानी का सुखद अंत दिखाने को ज़मीन खरीदने वाले साहुकार को दयावान दिखला कर किसान पर दया करता दिखाते हैं जो कहता है जैसे तुम अभी तक किसानी करते आये आगे भी करोगे और जो कर्ज़ा लिया अब बैंक की जगह मुझे चुकता करोगे। खुश हैं सभी दर्शक भी एंकर भी। किसान की ज़मीन मज़बूरी में बिक जाती है और धनवान उस पर खुद तो खेती नहीं कर सकता और किसान को बोने को देता है उपकार करता है। जो आप नहीं जानते मुझे वो भी बताना है , कारोबारी लोग एहसान नहीं करते अपने मुनाफे की बात करते हैं। मिल हो या खेत हो मज़दूर को मज़दूरी देना उनकी ज़रूरत है दया नहीं है। किसान की बदनसीबी अभी भी कोई नहीं समझा है , उसका सब कुछ लुट जाता है ऐसे ही हालात की मज़बूरी में और मिलते हैं झूठे दिलासे झूठी तस्सली और झूठी संवेदना।
       आज मौसम में घुटन थी बहुत और मेरे सीने में उससे भी बढ़कर है घुटन।  लौट आया हूं आते आते इक ग़ज़ल भी याद आई उसे भी शामिल करता हूं ताकि जो अनकहा रह गया कहा जा सके।


 


15 अगस्त पर संबोधन का सफर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया


   15 अगस्त पर संबोधन का सफर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

      आज उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। आज घर दुकान बाज़ार तो क्या सार्वजनिक स्थानों पर भी टीवी पर समाचार दिखाई दे रहे होते हैं। मुसाफिर इंतज़ार करते हैं सामने टीवी चल रहा है , होटल में क्या बड़े बड़े अस्पतालों में रोगी गंभीर रोग का इलाज करवाने आये हुए हैं दर्द में भी टीवी सामने है। हर कोई स्मार्ट फोन पर भी टीवी देखता है। मगर कोई युग था जब हर किसी के पास रेडिओ भी नहीं होता था और कोई ख़ास अवसर होने पर लोग जमा होते थे किसी जगह रेडिओ पर आवाज़ सुनने को। 15 अगस्त को ऐसा ही होता था लालकिले से भाषण देते देश के नेता की हर बात ध्यान से सुनी जाती थी। पहला अंतर तब देश का प्रधानमंत्री देश का लगता भी था होता भी था मगर आज लगता है किसी दल का नेता है जो अपने दल के शासन की बात करता है देश की नहीं। मैं किसी दल का नहीं हूं मगर राजनीति को समझता भी नहीं था तब भी बहुत अच्छा लगता था जवाहर लाल नेहरू जी को सुनकर। कभी नहीं सुनाई दिया मैंने ये किया वो किया है और क्या घोषणा कर रहे हैं उस से कितने लोगों को लाभ होगा। ये साफ लगता है जनता को बहलाने को वोट बैंक की बात की जा रही है , कम से कम आज तो ऐसा मत करो। नेहरू जी की पहली स्पीच आधी रात को दी थी मगर बात मेरी कहीं नहीं सुनाई दी थी , आज की स्पीच सुनकर लगता है मैं मैं मैं। भावना और उद्देश्य दोनों अलग हैं। आज नज़र सत्ता पर है देश की दिशा पर नहीं। विकास न पहले किसी नेता की खुद की जेब की कमाई से हुआ न आज होता है न कभी होगा। जब सब जनता के धन से किया जाता है तो किसी का भी ये दिखलाना कि उसी की महनत से है अनुचित है और छल है।
               कभी बताया जाता था क्या क्या किया जाना चाहिए था मगर नहीं किया जा सका इसका खेद भी जताते थे। आज है कोई जो अपनी पीठ थपथपाना छोड़ सच बोलने का साहस करता कि मैंने कहा तो था बहुत कुछ मगर कर नहीं सका मुझे खेद है। कम से कम इस सरकार से तो कुछ सवाल पूछने ज़रूरी हैं। ये याद करना होगा कि ये वही नेता है जिसने सत्ता पाने से पहले ही इसकी तैयारी की थी और किसी सपने की तरह से लालकिले का इक बहरूप खड़ा कर उस से भाषण भी दिया था। ठीक उसी तरह उनसे भी लालकिले से ही सवालों की झड़ी लगाई जा सकती है। सवाल देश की जनता के हैं।

पहला सवाल :-

  अच्छे दिन क्या हुए , आये या आने वाले हैं या कब आएंगे या कभी नहीं लाओगे। होते क्या हैं अच्छे दिन इतना तो समझाओगे। 

दूसरा सवाल :-

काला धन विदेश में है या देश में आकर सफ़ेद हो गया है। अब तो नोटबंदी का सच बताओ और सभी दलों की असलियत को नहीं छुपाओ। ये कैसा कानून है विदेशी चंदे को खुद छुपाने को कानून लाओ। 

तीसरा सवाल :-

स्वच्छ भारत दिखाओ , मेक इन इंडिया की बात सब बाहर से मंगवाओ , स्किल इंडिया के नाम पर अधिकतर आंकड़े हुआ कुछ नहीं , गंगा और मैली , थोड़ी तो शर्म चेहरे पर लाओ। 

चौथा सवाल :-

महंगाई खुद आपने दाम बढ़ाये पेट्रोल डीज़ल के अनुचित लूट को। रोज़गार की बात पर इतना धोखा। वंशवाद को खत्म करने की जगह इक संगठन की निष्ठा होना बड़े बड़े पदों की योग्यता। हद है। 

पांचवा सवाल ( आखिरी नहीं है ):-

बेटियां सुरक्षित नहीं , सत्ताधारी नेता तक महिलाओं के साथ अनुचित आचरण करते बेख़ौफ़ हैं कोई नहीं कुछ कहने वाला। बलात्कारी बाबा को नतमस्तक सरकार मगर नहीं हुई शर्मसार। कोई पकोड़े तलने की बात करता है तो कोई हरियाणा का सीएम साफ कहता है नौकरी निजि कंपनी की पकड़ लो हमारी तरफ मत देखो। 

  आज ये सब कहकर जनता से वोट मांगना जनता जवाब दे देगी। आप तो केवल सवाल करते हैं जवाब देने की आदत ही नहीं है।

Tuesday, 14 August 2018

मैं लालकिला बोल रहा हूं ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया

    मैं लालकिला बोल रहा हूं ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

       मुझे जानते हो क्या , मुझे पहचानते हो क्या। मेरी कहानी सुनोगे क्या मेरा दर्द समझोगे क्या। तुम सब हर साल लालिकले से झंडा फहराते हो , भाषण देने वाले बदलते रहते हैं , भाषण भी बदल गये हैं। कोई वक़्त था मुझसे , मेरी मीनार से बोला हुआ हर शब्द जोश भरता था नई उम्मीद जगाता था। आज वो बात ही नहीं है जानते हो क्यों। तब लोग लालकिले पर खड़े होकर भाषण देने को अपनी शान नहीं समझते थे , तब मेरे पास आने से पहले सोचा करते थे समझा करते थे खुद की नहीं जन गण मन की बात कहनी है करनी है समझनी है। केवल समारोह नहीं था जश्न मनाना नहीं था संकल्प लिया करते थे संविधान की राह पर चलने और सभी को वास्तविक आज़ादी जीने के अधिकार देने का। ये 71 साल की बात है मगर मैं 71 साल का नहीं हूं , 470 साल हो गये हैं मुझे बने और 1638 से बनाना शुरू किया था और 1648 में बना लिया था दस साल में। शाहजहां को तो जानते हो उसी ने मुझे बनवाया था और दिल्ली को राजधानी बनाया था आगरा को छोड़कर। मैं इक गवाह हुन 400 साल के गुज़रे इतिहास का। दो दरवाज़े दिल्ली गेट और लाहौर और दो सभागार दीवाने ए ख़ास और दीवाने ए आम दोनों के नाम और मकसद थे जानते हैं। ये किला कोई केवल शासक के रहने और सुरक्षा करने को नहीं था। 11 मार्च 1783 को सिखों ने लालकिले में प्रवेश कर दीवाने ए आम पर कब्ज़ा कर लिया था और 1857 के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने मुझे अपना बंदी बना लिया था। उनकी सेना के बाद भी 2003 तक मैं सेना के आधीन रहा हूं। मेरा आम लोगों से 200 साल का रिश्ता रहा है मेरी धड़कन आज भी जनता की धड़कन ही है , मैं शासकों का नहीं हूं न था न होना चाहता हूं। 
                किसे फुर्सत है मेरी लंबी दास्तान को सुने समझे , जो बीत गया सो बीत गया , मगर ये जो पिछले 71 साल हैं उनको कोई भुला नहीं सकता न भूल सकता है और भूलना भी नहीं। आज उसी की बात कहना चाहता हूं। शायद आज कोई उस भावना को नहीं समझेगा जब देश के दूर दराज से लोग दिल्ली आते थे 15 अगस्त 26 जनवरी को वास्तविक भावना लेकर। ये लिखने वाला तब घर से बिना बताये ही रात भर रेलगाड़ी का सफर कर आया था 26 जनवरी की झांकियां देखने और लालकिला भी देखने आया था। साथ दो किताबें खरीद कर ले गया था पांच पांच रूपये की , बड़ी कीमत हुआ करती थी पांच रूपये की तब। किसी का वेतन हुआ करता था पांच रूपये महीना उस समय। खिलौना भी खरीद सकता है और पहनने को आधुनिक परिधान भी जो नहीं थे उस के पास पायजामा पहनता था धारीदार , आज देखोगे तो कोई गंवार किसी का नौकर जैसा लगेगा मगर वो बड़े किसान परिवार का बेटा था। समझा था किसी गाइड ने समझाया था इक इक कोने में दर्ज इतिहास की बात को। याद नहीं कितना पैदल चल कर क्या क्या देखा था , कोई मकसद लेकर नहीं आया है मगर ऐसी ही दो चार ऐतिहासिक जगहों पर जाना या उसका गवाह बन जाना उस मन में दिमाग़ में इक विचार बनकर रह गया है जो आज भी है। मगर तब और आज कितना अंतर हो गया है याद करना चाहता है , मेरे साथ दिल की बात बांटना चाहता है। 
               मैं भी उदास हूं और लालकिला भी उदास है। आपको जो सजावट दिखाई दे रही है वो किसी दुल्हन के शादी के सुंदर महंगे लिबास जैसी है मगर ये दुल्हन की शादी नहीं है , जो है उसे कहने को अभी शब्द बना ही नहीं है। आह भर रही है दर्द झेल रही है अभी तक जंजीरों में जकड़ी हुई है। भूखी है प्यासी है और बेबस ही नहीं बेघर बार भी है , बिमार भी इतनी है कि कोई ईलाज असर नहीं कर रहा है। कैंसर का भी ईलाज हो रहा है आजकल मगर उसकी पीड़ा का अंत कोई नहीं करता। करना चाहता ही नहीं कोई , सत्ता को जनता की पीड़ा देखकर अफ़सोस तक नहीं होता दुःख दर्द समझने और मिटाने की बात क्या की जाये। ऐसा नहीं है कि 71 साल में देश की हालत बदली नहीं जा सकती थी सुधारी नहीं जा सकती थी। बहुत कुछ किया जा सकता था करना संभव था और आज भी है मगर शासन करने और सत्ता पर रहने को ही उद्देश्य बनाने वालों को ये सोचने की फुर्सत ही नहीं थी। जिस देश की आधी आबादी भूखी हो शिक्षा स्वस्थ्य और सुख सुविधा से वंचित हो उस देश में ऐसे समारोह और जश्न मनाने पर और रोज़ कितने ही बेकार आयोजनों पर लाखों हज़ार करोड़ रूपये खर्च करना गुनाह है देश और संविधान के साथ। समाधियां स्मारक बनाकर कोई उद्देश्य नहीं पूरा किया जा सकता है , उन लोगों का सपना अपने लिए मकबरे और समाधियां बनाना तो नहीं था , आज़ादी के अर्थ ऐसे छोटे हर्गिज़ नहीं थे। आज़ादी नहीं है आम नागरिक को कोई फर्क नहीं पड़ा है , काले अंग्रेज़ और सफ़ेद अंग्रेज़ इतना ही है। लालकिले से कहा कोई शब्द आज कोई एहसास दिलों में नहीं करवाता है क्योंकि भाषण देने वाले की आवाज़ बेशक जितनी बुलंद हो खुद उसी को अपने शब्दों का कोई महत्व समझ नहीं आता है। ऐसा संदेश जो दो पल बाद ही भुलाया जा सकता हो कितना अर्थहीन है। मुझे दूर से देखने वालो कभी मुझे , लालकिले को छू कर देखना। मेरी दीवार का हर पत्थर तुम्हें बहुत कुछ बता सकता है। मैं नहीं जनता कि कैसे और किसको आज़ादी की शुभकामाएं दूं मैं इस भारी मन से।

Sunday, 12 August 2018

चौकीदारों का एक समान वेतन और रैंक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 चौकीदारों का एक समान वेतन और रैंक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      आपको फिर से याद दिलवाता हूं देश में गधों के भी अधिकार हैं। कवि लोग तो कहते हैं गधों के ही अधिकार हैं , घोड़ों को मिलती नहीं है घास , गधे खा रहे हैं चववनप्राश। मगर नहीं गधों के लिए नियम हैं , गधों को रात अंधेरे में बरसात और उमस के मौसम में काम पर लगाना अपराध है। उनको दिन में भोजन अवकाश और आराम करने देने का भी हक है। जॉनी वॉकर जी तो दिल्ली जाने की भी बात करते थे अपने गधे की जो सब गधों का लीडर था। उस पर दो रचनाएं लिखी जा चुकी हैं मुझे खेद है अभी तक मुझे चौकीदारों की बात पर लिखने की बात कैसे ध्यान में नहीं आई जबकि चार साल से चौकीदार का युग ही जारी है। इस देश में सब से अच्छा काम केवल और केवल चौकीदारी है। अबकी बारी उनकी बारी है।
     देश के चौकीदारों का भी एक संगठन है मुझे पता नहीं था जब तक टीवी चैनल पर हाथ में लाठी और टोर्च लिये चौकीदार की फोटो वाले बैनर उठाये लोगों को अपनी उचित मांगे मनवाने दिल्ली जाने की खबर सुनी और देखी नहीं थी। आप क्या चाहते हैं पूछने पर जवाब देते हैं बराबरी का वेतन और अधिकार। हर चौकीदार को संविधान समानता का हक देता है। अब चौकीदार कोई भी कहीं का भी हो , गांव का हो चाहे शहर का या बेशक आधुनिक आवासीय सोसाइटी का हो , किसी दुकान का हो या कंपनी की मिल का। कुछ भी और नहीं चाहते केवल बराबरी की बात कहते हैं। एंकर नहीं समझा माजरा क्या है। कहने लगा आपको अपने अपने मालिक से बात करनी चाहिए। चौकीदार बोले बड़े नासमझ हो मालिक कौन होते हैं हमारा वेतन सुविधा और क्या करना क्या नहीं करना तय करने वाले। देश का चौकीदार जो है उसने कब जनता से इजाज़त ली किसी बात की। क्या शान से रहता है कितने देशों में घूमता फिरता है संसद या पीएमओ दफ्तर कितनी बार गया कोई पूछता है। क्या वादा किया था जब बना था देश का चौकीदार निभाया कब है। वही चौकिदार बताएगा उसका वेतन क्या हो हमारा भी उतना ही होना चाहिए। हम धन्यवाद करना चाहते हैं कि किसी ने तो हमारे काम को महान कार्य समझा , मगर इक ज़रा सी शिकायत भी है कि हमारे नाम को बदनाम भी किया और सागर की गहराई में डुबोया भी है जो हमें कदापि मंज़ूर नहीं। चौकीदार को झूठ नहीं बताना चाहिए और ये कैसा चौकीदार है जिसका संसद में दिया भाषण भी संसदीय करवाई से निकालने की नौबत आ गई।
         जैसे संगीत कला कारोबार वकील डॉक्टर अध्यापक अभिनेता तक खानदानी लोग होने का दम भरते हैं , उसी तरह से हमारा चौकीदारी का खानदान भी ऊंचा समझा जाता है। चुपके-चुपके फिल्म का नायक खुद शिक्षित है घास फूस का डॉक्टर भी है मगर नायिका को भाता है चौकीदार भेस का धर्मेंदर ही। नकली ही सही उसने चौकीदार बनकर चोरी करने वालों को भगाया तो नहीं। चौकीदार बनना है तो ईमानदारी पहली शर्त है , सच बोलना पड़ता है भले चोर कोई भी हो। अपने ही घर में चोरी करने वाले लोग बदनाम चौकीदार को किया करते हैं। कोई चौकीदार ही चौकीदार की कठिनाई समझ सकता है। ये कैसा चौकीदार है जो रात भर गहरी नींद में सोया रहता है और चार साल बाद जगता है तो घर का सभी सामान चोरी हो चुका है। ऐसे चौकीदार को कौन सज़ा दे जिसका थानेदार अपना हो वकील अपना हो अदालत खुद की और न्यायधीश भी वही हो।
        इस 15 अगस्त पर चौकीदार को युवा वर्ग को रोज़गार हासिल करने को अपना आज़माया नुस्खा बताना चाहिए। सब को पकोड़े बनाने नहीं आते चाय भी सब उन जैसी नहीं बनाते मगर उनकी डिगरियों से बेहतर शिक्षा बहुत युवकों ने पाई है उन्हें चौकीदार बनने से कोई परहेज़ नहीं है। दुनिया देख कर स्तब्ध है जिस देश में चौकीदार की ऐसी निराली शान है उसके मालिक कितने दौलमंद हैं। कोई नहीं यकीन करेगा भारत में गरीबी है भूख है या लोग बेइलाज मरते हैं और शिक्षा भी इतनी महंगी है कि पढ़ने जाना मुमकिन नहीं।

            तू इधर उधर की न बात कर , ये बता कि काफिला क्यों लुटा ,

                हमें रहजनों से गर्ज़ नहीं , तेरी रहबरी का सवाल है।

       दिल का खिलौना हाय टूट गया , कोई लुटेरा आके लूट गया।  चौकीदार जागते रहो कहने की जगह सोते रहो समझाता रहा ताकि चोर चोरी कर सकें। बात मौसेरे भाइयों तक आ ही गई है। ये राफेल विमान की खरीदारी है या चौकीदार की बटमारी है।

क़व्वाली युग की सरकार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    क़व्वाली युग की सरकार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

     मुझे अभी अभी बोध हुआ है कि पिछले चार साल से देश में कव्वाली की धूम है। मुझे गाने का शौक रहा है और कॉलेज में मैंने वार्षिक समारोह में कव्वाली सुनाई है। एक बार कव्वाली में मेरा पहला ईनाम था क्योंकि अकेले मेरे ग्रुप की ही कव्वाली थी। थोड़ी थोड़ी याद है :-


दिखला के झलक तुम छुप ही गए , जी भर के नज़ारा हो न सका। 

इक बार तुम्हारी  दीद हुई  , दीदार  दोबारा हो न सका।

मुद्द्त से तम्मना थी दिल में , अल्लाह को देखूं बेपर्दा।

जब दिल ने मुझ को मौका दिया , तकदीर को गवारा हो न सका। 

     ये मिलती जुलती कव्वाली है ऊपर जो सुन कर समझ सकते हैं कि क़व्वाली कैसी होती है। कहने को ग्रुप की बात होती है मगर वास्तव में एक गायक ही क़व्वाली सुनाता है बाकी या तो उसको दोहराते हैं या तबला हारमोनियम पर संगीत देते हैं। चार साल से एक ही गायक की धूम है बाकी कोई है नहीं है कोई फर्क नहीं पड़ता है।  क़व्वाली गायक का अंदाज़ ऐसा होता है कि लोग फ़िदा होकर झूमने लगते हैं। क़व्वाली में एक बात को बार बार गाया जाता है कभी ऊंची आवाज़ में कभी मध्यम तो कभी धीमी आवाज़ में। धुन एक ही रहती है और शोर ऐसा कि और कोई आवाज़ नहीं सुनाई देती।  यही तो हो रहा है देश विदेश में एक ही कव्वाली सब सुन रहे सुना रहे हैं। दिन आने वाले थे , दिन आ रहे हैं। गा गा कर बुला रहे हैं , दिन रूठे हुए हैं वो मना रहे हैं। उनकी समस्या है क़व्वाली को कव्वाली कहना मुश्किल है कहीं दूसरे धर्म या देश की बात बीच में न आ जाये। क़व्वाली दरगाहों में गाई जाती है मज़ारों पर सुनाई देती है उनको थोड़ा परहेज़ है ये इनको हज़्म नहीं होती। क़व्वाली का अंदाज़ पसंद है जो एक की आवाज़ वही सबकी आवाज़ , बाकी कोई स्वर सुनाई नहीं देना चाहिए। कव्वाल किसी और की खातिर गाया करते हैं उनका राग खुद अपने लिए है , अपने ही कसीदे पढ़ना , ये ज़रा मुश्किल है। इसी लिए क़व्वाली नहीं ग़ज़ल भी नहीं कविता भी नहीं ये आठवां सुर है। क्या करें गुणगान करने वाले मिलते हैं किराये पर लिख भी देंगे महिमा उनकी पसंद की मगर उनको खुद अपनी आवाज़ अपनी धुन में गाना भाता है और कोई भी गा ही नहीं सकता उन जैसा। सत्तर साल से देश में बेसुरों की आवाज़ गूंजती रही है अब ऐसा नहीं होने देंगे चाहे कुछ भी हो जाये। क़व्वाली मुहब्बत की होती है और उनको मुहब्बत से बैर है , उनकी मुहब्बत सत्ता है कुर्सी है। पत्नी को छोड़ा महबूबा को भी आखिरकार छोड़ ही दिया। अकेले में अपने बॉस खुद हो महबूबा के नखरे और पत्नी की ख्वाहिशें कोई आसान है निभाना। झोला उठाकर चल देने की बात कहते हैं , मेरी क़व्वाली सुनो वरना चला जाऊंगा। 
            क़व्वाली सुनने की भी सीमा होती है , घंटा दो घंटे तक , चौबीस घंटे क़व्वाली सुनते लोग तंग आ ही जाते हैं। मगर उनका आदेश है सब को क़व्वाली सुननी है और ताली भी बजानी है। जो नहीं सुनेगा या ताली नहीं बजाता उसकी देश भक्ति शक के दायरे में आ जाती है। संविधान में कोई निर्देश तो नहीं है कि सत्ता के स्वर में स्वर मिलाना होगा , उनके पीछे पीछे दोहराना होगा। गाना चाहो न चाहो , गाना आये न आये गाना होगा। किसे खबर थी ऐसा भी ज़माना होगा। सरकार आज़ादी के जश्न के अवसर पर हर साल कवि सम्मेलन आयोजित किया करती है। अधिकतर कवि साफ नहीं भी कहते मगर इशारों में सरकार की बखिया उधेड़ते ही हैं कविता में। मेरी सलाह है इस बार इक नई पहल नई शुरआत कर लाल किले पर क़व्वाली का आयोजन किया जाए। कव्वाली का सवभाव राजनेताओं को भा सकता है। कव्वाली हर अवसर पर गाई जा सकती है और इस में कोई रोने रुलाने दर्द तड़पने की बात ऐसे नहीं होती कि किसी की आंख भर आये। ऐ मेरे वतन के लोगो गीत की तरह। सरकार को हमेशा आनंद में रहना पसंद होता है और खासकर इस सरकार को आनंद ही आनंद पसंद है और इन्हें आनंद भी कब किस बात में मिले कोई नहीं जनता। औरों का उपहास उड़ाना इस सरकार के मुखिया की आदत है। मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया , हर फ़िक्र को धुवें में उड़ाता चला गया , चार साल से यही हुआ है। जनता की फ़िक्र में नींद हराम करना उनको नहीं पसंद। इक नशे में रहने का मज़ा लिया है जो पहले कोई नहीं ले पाया था। दुनिया भर की सैर की हर दिन हर नागरिक पर 25 लाख तो केवल किराये वाले जहाज़ के खर्च हुए बाकी का हिसाब फिर कभी। शबे फुरकत का जागा हूं लोगो अब तो सोने दो , कभी फुर्सत से कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता। फ़रिश्तो की जगह लोगो करना पड़ा। फरिश्ता खुद वही है।
                कव्वाली की विशेषता यही है कि जब चाहो जिस जगह फिट कर सकते हैं और हमेशा हिट रहती है। मौज मस्ती भी और संगीत भी दोनों मिलते हैं। ड्रम बजा लिया नाच गा लिया हर तमाशा दिखला चुके तो ये हुनर भी हो जाये , लोग मर मिटेंगे अदाओं पर। इतिहास में अपनी अलग पहचान की चाह भी पूरी हो जाएगी क्योंकि अभी तक किसी भी सरकार ने राग क़व्वाली को आज़माया नहीं था। लाख दुखों की एक दवा है क्यों न आज़मा ले। तेल मालिश चंपी तेल मालिश। आपकी मर्ज़ी है जिस गीत को क़व्वाली बना लो। आप क्या नहीं कर सकते सब कर सकते हैं। झूठा इकरार ही सही , मतलब का यार ही सही। खुद खुद से बस खुदी से प्यार ही सही , अपने खास लोगों का वफादार ही सही। तुकबंदी करते जाओ क़व्वाली बनाते जाओ। सुझाव है आगे मर्ज़ी सरकार की।

Saturday, 11 August 2018

मेरा सुंदर सपना टूट गया ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      मेरा सुंदर सपना टूट गया ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

         कुछ लोग समझते हैं हम जैसे लिखने वाले आलोचना करने के आदी हैं और हमें हर नेता हर सरकार की आलोचना कर कोई सुकून मिलता है। मगर वास्तविकता इस के विपरीत है। दुष्यंत कुमार की पीड़ा आप नहीं समझ सकते अगर आपको उस में केवल शायरी अच्छी लगती है और आप तालियां बजाते हैं भले उनके शेर बोलने वाला खुद कोई नेता अधिकारी या दूसरा कोई ऐसा हो जो देश की दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार हो। हम इक ऐसे समाज का सपना देखते हैं जिस में कोई छोटा बड़ा न हो , अमीर गरीब न हो , किसी तरह का भेदभाव नहीं हो। सब लोग एक समान हों कब ऐसा समाज बनेगा। आज़ादी के बाद से देश की जनता कई नेताओं पर भरोसा करती आई है कि शायद ये कोई सार्थक बदलाव लाएगा। वादे तो बहुत लोगों ने किये मगर वादे निभाए नहीं किसी ने भी। कुछ लोग आये जो बदलना चाहते थे वास्तव में देश और जनता की हालत को मगर वो दुर्भाग्य से कम समय ही रह पाए। लाल बहादुर शास्त्री जी का नाम सबसे पहले आता है , रेल दुर्घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी समझ पद से हट जाना और जब प्रधानमंत्री बने तो देश के खोये स्वाभिमान को जगाना। ऐसे भी जननायक हुए जो किसी पद पर नहीं रहे मगर उनका योगदान कम नहीं था। पिछली बातों की नहीं आज की बात करते हैं। शायद राजनीति अब उस स्तर तक नैतिक रूप से नीचे गिर चुकी है कि लाज शर्म रही ही नहीं है। 
                पिछले चुनाव में देश की जनता को काफी समय बाद किसी की बातों से लगा कि अब कोई हमारा सपना सच कर दिखाना चाहता है और इसी कारण उसे उम्मीद से बढ़कर जनता का समर्थन मिला। ये वास्तव में एक ज़िम्मेदारी समझने और देश की जनता की उम्मीद पर खरे उतरने का इम्तिहान भी था। मगर बेहद खेद से कहना पड़ता है कि मोदी जी ने चार साल में कोई कोशिश ही नहीं की देश और जनता की भलाई पर ध्यान देने की। ये कहना अनुचित नहीं होगा कि अपार बहुमत मिलने से कर्तव्यबोध होने की जगह उनको अहंकार हो गया और समझने लगे कि उनसे अच्छा कोई पहले न था न आगे कोई हो सकता है। उनका सारा ध्यान अपनी छवि किसी मसीहा की बनाने और पहले जितने भी नेता सत्ता पर रहे उनको बुरा और खलनायक साबित करने पर रहा। ये नकारात्मकता कोई सार्थक कार्य कर सकती भी नहीं थी। जिस हद तक मोदी जी ने अपना रहन सहन पहनावा और तौर तरीके बनाये और राजा महाराजा की तरह से शानो शौकत दर्शाने का कार्य किया उसे भारत जैसे गरीब देश की जनता के साथ मज़ाक ही समझ सकते हैं। जिस भारतीय संस्कृति का दम भरते है आज के ये सत्ताधारी उस में सादगी से जीना और खुद पर नहीं देश के धन सुविधाओं को उन पर खर्च करना जो आज़ादी के बाद भी नर्क सा जीवन जीने को विवश हैं।
                       देश की जनता गरीबों की समस्याओं की अनदेखी कर अपने अघोषित अजेंडे पर चल कर राजनीति को और भी घटिया स्तर पर ले आये हैं। धार्मिक उन्माद फैला कर सत्ता की रोटियां सेकना लोगों को गुमराह करना विकास की बात छोड़ टकराव और विनाश की निति पर चलना और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा की परवाह नहीं करना। सब से बढ़कर खुद को सर्वस्व समझना और टीवी चैनलों को लाखों करोड़ का फायदा बेकार के झूठे विज्ञापनों की आड़ में पहुंचाकर उनको अपने गुणगान को चाटुकार बनाना जैसे कार्य संविधान और लोकतंत्र के विपरीत हैं। अपने विरोध की आवाज़ को बंद करवाने को हर सीमा को लांघना किस बात को दर्शाता है। अगर सत्ता हासिल करना ही एक मात्र मकसद होता है तो देश सेवा की बात मत कहो और इसे देशभक्ति तो कदापि नहीं। सत्ता की खातिर क्या क्या नहीं किया अपने , क्या देश में किसी एक दल की ही सरकार होना महान कार्य है। सत्ता के मोह में इस कदर अंधा होना कोई अच्छी निशानी नहीं है। हर तरफ दंगे फसाद और भीड़ बनकर अराजकता पर सर्वोच्च न्यायालय भी चिंतित है। धर्मं की आड़ में जो फसाद करते हैं आपकी सरकार उनका अभिनंदन करती है फूल बरसाती है घर बुलाकर सम्मानित करते हैं। नहीं ये देश की बात नहीं है जनता को बांटने की बात है और लाशों पर राजनीत्ती करना है।
          कोई भी वादा नहीं पूरा किया आपने और आप को मिले जनमत की रत्ती भर भी लाज नहीं रखी है। फिर भी आपको एहसास ही नहीं है कि कैसे झूठी उम्मीदें जगाकर आपने भोली भाली जनता की भावनाओं से खिलवाड़ किया है। झूठ बोलने की कोई सीमा बची नहीं है। आपको पता ही नहीं है आपने जनता को किस हद तक निराश किया है , इतना कि अब लोग दूध के जले छाछ को भी फूंककर पिया करेंगे। अपने एक ही बात साबित की है कि दल कोई भी हो नेता कोई भी हो विश्वास किसी की बात का नहीं है। जनता को आपने दिया कुछ भी नहीं है उनकी उम्मीदों को भी छीन लिया है। क्या किया है आपने आप नहीं समझ सकते। हम भी चाहते थे कोई नेता वास्तविक रूप से ऐसा हो जो खुद अपनी शानो शौकत से बढ़कर देश की जनता की भलाई की बात सोचता हो।  शायद हमारी सबसे बड़ी समस्या हमारी गुलामी की मानसिकता है जो किसी न किसी को अपना खुदा या मसीहा समझने लगती है। जब कोई खुद को खुदा समझने लगता है तो उसे लगता है वो जो चाहे कर सकता है और उस पर सही गलत का सवाल कोई नहीं उठा सकता है। हमारे देश का मीडिया हमेशा किसी न किसी को भगवान बनाकर अपना उल्लू सीधा करता आया है और खुद को खुद ही सच का झंडाबरदार घोषित कर सच को बेचता आया है। उनका सच सच बाकी सब झूठ और उनके विशेषाधिकार की बात , क्यों कैसे विशेषाधिकार आपको या किसी को। खबर क्या है कोई कसौटी नहीं कोई निष्पक्षता की बात नहीं और सच कहने का साहस तो है ही नहीं। अपने आप पर फ़िदा होना अच्छी बात नहीं है।
      ऐसे ही लोगों ने अपने स्वार्थ की खातिर या खुद को बेचकर लोगों की महानता की छवि घड़ने का काम किया है जो अपने आप में किसी अपराध की तरह है। धर्म और आस्था के नाम पर मनमर्ज़ी की छूट देने का अंजाम सामने है तथाकथित साधु सन्यासी जेल में बंद हैं। उनको भी लोग भगवान मानते थे और नहीं चाहते थे उन पर कोई शक या सवाल करे। इस सरकार ने भी अपने को किसी के प्रति जवाबदेह नहीं माना है। ये कैसी देश की सेवा है कि आप चयन नहीं मनोनयन से अपने ख़ास लोगों को पदों पर बिठाते चलें। जिस देश में लोग बदहाल हों उसकी सरकार जश्न मनाती रहे बात बात पर। आज विश्व भर की संस्थाओं की सूचि में हमारा देश भ्र्ष्टाचार भूख स्वास्थ्य शिक्षा और मानवाधिकार में निचले पायदानों पर है पहले से और खराब हालत है। सौ से अधिक योजनाएं घोषित की गई और सफल कोई भी नहीं , जिस गांव को गोद लिया जिस जिस नेता ने उस गांव की ही खबर नहीं ली तो देश की क्या लेंगे आप। लाखों करोड़ बर्बाद किये और स्वच्छ भारत अभियान की हक़ीक़त बताती है कोई बदलाव नहीं हुआ केवल सरकारी ऐप्स और झूठे विज्ञापनों से कुछ नहीं किया जा सकता है। स्किल इंडिया मेक इन इंडिया को इक धोखा बना दिया है जब हर चीज़ विदेश से बनवाते हैं। अपने हमेशा घोषणा की कि आपसे पहले किसी ने कुछ नहीं किया मगर आज आपके चार साल के काम को देखा जाये और 63 साल में देश में जितना काम हुआ उस से तुलना की जाये तो उस रफ्तार से उसका सोलहवां भाग काम तो दिखाई देता मगर उसका एक प्रतिशत भी नहीं हुआ देश और जनता का विकास का काम। जो हुआ या किया वो भी सामने है छुपा नहीं है सत्ताधारी दल के आलीशान भवन दफ्तर हर राज्य हर शहर में और सत्ताधारी नेताओं पर महिलाओं से बदसलूकी से गंदे आपराधिक कार्य तक सामने आये हैं। हरियाणा में तो सरकार ने बलात्कार के आरोपी को वोटों की खातिर बचाने का भरसक प्रयास किया और अदालत के आदेशों की धज्जियां उड़ाने का काम किया , यहां तक कि इसी सरकार ने उसके कितने साल से अवैध घोषित निर्माण को वैध करने को ही कानून बनाकर उसे इक शहर से गांव घोषित कर दिया। क्या यही स्मार्ट शहर बनाने का ढंग है , हर चुनाव में आपराधिक छवि के नेताओं को शामिल किया अपने दल में। आपने कहा कुछ किया कुछ और , आज अपने चार साल का हिसाब बताने की जगह देश को धर्म आदि के नाम पर उलझाने को लगे हैं। नहीं कोई भी इसे देश सेवा या देशभक्ति नहीं मान सकता है।
        
      

Friday, 10 August 2018

रूह भटक रही है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        रूह भटक रही है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

       सब उसकी तस्वीर के सामने हाथ जोड़ फूल चढ़ा रहे हैं।  अफ़सोस जता रहे हैं। भगवान इसकी आत्मा को शांति दे कह रहे हैं। आत्मा तड़प रही है ये क्या माजरा है ये कैसा तमाशा है। जीते जी कोई साथ नहीं था अकेले ज़िंदगी का सफर तय किया और आज इतनी भीड़ लगी है। कितनों के तो नाम तक याद नहीं हैं शायद पहचान नहीं रही , कभी बात ही नहीं की जो आज रिश्ते नाते निभाने को फल फूल भी लेकर आये हैं। मांगने पर कांटें भी उधार नहीं देते यही। शोक सभा हो रही है मगर शोक नदारद है , ये आंसू ये रोना धोना आज किस काम का। मुझे रुलाते भी थे रोने भी नहीं देते थे , खुश रहो कहते भले थे खुश रहने देते नहीं थे। ख़ुशी देख कर जलते रहे और आज खुश हैं मगर दुखी बने हुए हैं। मंच पर जो लोग भली भली बातें कर रहे उनकी निगाह भी सामने जमाराशि पर है , और कह रहे हैं माया साथ नहीं जाती मोह माया को छोड़ दो। मरना सच है जीना झूठ बात तो ठीक है बस जो समझा रहा खुद उसी को समझ नहीं आती। ये सब नहीं जानते रूह सब देख रही है और समझ रही है , बेचैन हो रही है और चाहती है ये सब बंद हो। भगवान से यही तो कहा था जो मेरे अपने हैं उनका हाल बता दो तो भगवान इस जगह लेकर आये , मगर खुद नहीं रुके इक पल को भी बाहर दरवाज़े पर छोड़ कर चले गये। भगवान नहीं देख पाते ये सब , झूठी और दिखावे की विनती खुदा इस आत्मा को शांति देना स्वर्ग देना। मन में तो कुछ और है , कोई सोचता है ज़रूर नर्क गयी होगी इसकी आत्मा। कोई सोचता है यकीन ही नहीं होता ज़िंदा नहीं है कहां आसानी से मरते हैं ऐसे लोग। भगवान के साथ भी छल कपट होता है भरी सभा में। भगवान नहीं समझ सके ये सब किस मकसद से किया जाता है , मरने के बाद बहुत कुछ जीते जी कुछ भी नहीं। 
                                               क्या क्या बातें नहीं कर रहे लोग। इधर उधर की बेकार की भी और अपने अपने काम की भी। समय सब को लग रहा ठहर गया है घड़ी चलती नहीं जैसे धीमी चल रही है थककर रुकना चाहती है। जितनी चाबी भरी उतनी चलती है अब सैल खत्म होने को , सांस चलने की तरह। बस यही इक घड़ी ही वास्तव में शोक जता रही है। कोई मरने वाले को याद नहीं कर रहा सभी और ही बात कर रहे हैं। सब को बोरियत हो रही है रूह तक को लगता है कब जाऊं इस जगह से , भगवान आओ मुझे यहां से कहीं दूर ले जाओ। एक घंटा इतना लंबा तो कभी नहीं लगता था हर सेकंड लगता है इक सदी के समान है। इतनी लंबी आयु थी अब समझ आया आत्मा को शरीर से निकल कर। लोग सोच रहे हैं जो तय समय था दस मिंट ऊपर हो गये है , इनको आज वक़्त की पाबंदी की बात समझ आई है जो कभी किसी के वक़्त की कदर नहीं करते हैं। गप्पबाज़ी में क्या स्मार्ट फोन पर सोशल मीडिया पर व्यर्थ समय बिताने वाले ऐसे दिखा रहे हैं जैसे उनका इक इक लम्हा किसी विशेष कार्य को होता है। सभा का अंत हुआ तो सबको चैन आया मगर रूह को अभी भी नहीं मिला चैन। लोग कतार लगाकर अफ़सोस जताने नहीं अपना चेहरा दिखाने आये हैं किसे जिसे देख भी नहीं सकते उसको छोड़ बाकी सबको। अब जाने की जल्दी नहीं है आपस में मिलना जुलना बातें करना खूब शोर है और पूरा माहौल बदल गया है। हंस रहे हैं सब कुछ है बस शोक ही नहीं है मगर है शोकसभा ही की जगह। इतना अधिक शोर है कि रूह घबरा रही है भगवान मुझे यहां से ले जाओ गुहार लगा रही है। हलवा मिल रहा खुशबू लुभा रही है रूह सकपका रही है। गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है ,  चलना ही ज़िंदगी है चलती ही जा रही है। देखो वो आ रही है देखो वो जा रही है। आते हैं लोग जाते हैं लोग पानी के जैसे रेले , जाने के बाद आते हैं याद गुज़रे हुए वो मेले। यादें मिटा रही है यादें बना रही है। 
 

Thursday, 9 August 2018

भीख भिखारी और भिक्षा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       भीख भिखारी और भिक्षा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      भीख की महिमा , भिखारी सारी दुनिया , मोबाइल वाले भिखारी , भिक्षा सरचार्ज , ये सभी मेरी 2003 में लिखी और छप चुकी रचनाएं हैं। आज की रचना उसी विषय पर है मगर नई लिख रहा हूं पुरानी याद आ रही हैं। सरकार अगर पुरानी योजनाओं को नाम बदल चला सकती है तो थोड़ा अधिकार मुझे भी मिल सकता है पिछली बातों को दोहराने का। शुरुआत जनाब जाँनिसार अख़्तर जी की इक ग़ज़ल से की जाये तो कैसा हो। पहले उनकी ग़ज़ल का आखिरी शेर लिखता रहा हूं आज मुक़्क़मल ग़ज़ल पेश है :-

ज़िन्दगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो , कुछ न कुछ हमने तेरा क़र्ज़ उतारा ही न हो। 

कूए-क़ातिल की बड़ी धूम है चल कर देखें , क्या खबर कूच-ए-दिलबर से प्यारा ही न हो। 

                                   ( कूए-क़ातिल = क़ातिल की गली )

दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी , चौंक उठता हूँ कहीं तूने पुकारा ही न हो। 

कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर , सोचता हूँ तेरे आँचल का किनारा ही न हो। 

शर्म आती है कि उस शहर में हैं हम कि जहाँ , न मिले भीख तो लाखों का गुज़ारा ही न हो। 

        शर्म उनको मगर नहीं आती। दिल्ली की बात है कल ही उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है अब दिल्ली में भीख मांगना अपराध नहीं होगा। शायर ने ये बात लगता है बॉम्बे को जो अब मुंबई है सोच कर कही होगी। मगर शायरी की खासियत यही है सभी जगह हाल वही मिलता है। एक लाख लोग बताये जा रहे हैं जो बेबसी में देश की राजधानी में भीख मांगकर गुज़ारा करते हैं। सरकार को चिंता है मुमकिन है जो बात 15 साल पहले इक मज़ाक लगती थी आज सच हो जाये। हुआ यूं कि इक अख़बार में एक भिखारी को मोबाइल फोन पर बात करते दिखाती तस्वीर छपी थी और तब भी शाइनिंग इंडिया की धूम थी। तब भी कोई आईएएस अधिकारी सत्येंद्र दुबे कत्ल किया गया था सच बोलने की खातिर , भ्र्ष्टाचार की बात पीएएमओ को लिखने के बाद। परसों फिर कुछ लोग राफेल की बात पर सच समझना चाहते थे। आपको लगेगा ये किधर की बात किधर जा रही है , मगर नहीं ये भी भीख की ही बात है। सरकार जनता को अधिकार भी खैरात की तरह देती है मगर अपने खास लोगों को भागीदार बनाकर करोड़ों रक्षा सौदे में उपहार की तरह देती है। ये जो बिक चुके हैं टीवी चैनल वाले अख़बार मीडिया वाले विज्ञापन की भीख पर जीते हैं। तेज़ चलने की बात कहने को है अपाहिज हैं बिना सरकारी बैसाखियों के दो कदम भी नहीं चलते हैं। बिक गये हैं बेचते हैं खबरें भी और झूठ को सच का लेबल लगाकर भी , खबर के साथ साथ किसी की फोटो देख समझना खरीदार वही है और उसी का सब बिकता है ये तो बिचौलिए दुकानदार हैं। टीवी अख़बार वालों को राजनीति को छोड़ देश की कोई खबर खबर नहीं लगती , मोबाइल हाथ में देकर फोटो लिया और खबर बन गई। आजकल भी देश की वास्तविकता को दरकिनार कर वायरल विडिओ की बातें करते हैं। सरकार भी आजकल सब स्मार्ट फोन या ऐप्स पर करती है तो मुमकिन है भिखारियों को भी आधार कार्ड और ऐप्स से जोड़ा जाये। भीख भिक्षा और भिखारी शोध का विषय हैं। आओ भीख की महिमा सुनते हैं।
           ये बात सभी धर्म के ग्रंथ एक समान कहते हैं कि जिसके पास धन दौलत , सुख सुविधा सब कुछ है मगर उसको तब भी और अधिक पाने की लालसा रहती है वो सब से दरिद्र है। आप जिनको बहुत महान समझते हैं वे भी क्या ऐसे ही नहीं हैं। उनको अपने काम से सब मिलता है , नाम-पैसा-शोहरत , फिर भी उनकी दौलत की हवस है कि मिटती ही नहीं। विज्ञापन देने का काम करते हैं , पीतल को सोना बताते हैं , अपनी पैसे की हवस पूरी करने को। हम तब भी उनको भगवान बता रहे हैं। ईश्वर तो सब को सब कुछ देता है , कभी मांगता नहीं , उसको कुछ भी नहीं चाहिये।  इन कलयुगी भगवानों को जितना भी मिल जाये इनको थोड़ा लगता है। ये जब समाज सेवा भी किया करते हैं तो खुद अपनी जेब से कौड़ी ख़र्च नहीं किया करते , यहां भी इनके चाहने वाले उल्लू बनते हैं। उल्लू मत बनाना कह कर खुद उल्लू सीधा कर लेते हैं अपना। देश के नेता हों या प्रशासन के अधिकारी ये सारे भी इसी कतार में शामिल हैं। देश की गरीब जनता इनकी दाता है और ये लाखों करोड़ों की संपत्ति पास होने के बाद भी उसके भिखारी। ये लोग भीख भी मांग कर नहीं मिले तो छीन कर ले लिया करते हैं , इनको भीख पाकर भी देने वाले को दुआ देना नहीं आता। हर भिखारी मानता है कि भीख लेना उसके हक है , भीख लेकर ख़ाने में उनको कोई शर्म नहीं आती। वेतन जितना भी हो रिश्वत की भीख बिना उनका पेट भरता ही नहीं। ये भीख मज़बूरी में पेट की आग बुझाने को नहीं लेते , कोठी कार , फार्महाउस बनाने को लेते हैं। ये जो भीख लेते हैं उसको भीख न कह कर कुछ और नाम दे देते हैं।
                                            भीख भी हर किसी को नहीं मिला करती , उसी को मिलती है जिसे भीख मांगने का हुनर आता हो। ये गुर जिसने भी सीख लिया वो कहीं भी चला जाये अपना जुगाड़ कर ही लेता है। भीख और भ्र्ष्टाचार दोनों की समान राशि है , बताते हैं कि रिश्वत की शुरुआत ऐसे ही हुई थी। पहले पहले अफ्सर -बाबू किसी का कोई काम करने के बाद ईनाम मांगा करते थे , धीरे धीरे ये उनकी आदत बन गई और वह काम करने से पहले दाम तय करने लगे जो बाद में छीन कर लिया जाने पर भ्र्ष्टाचार कहलाने लगा। आज देश में सब से बड़ा कारोबार यही है , तमाम बड़े लोग किसी न किसी रूप में भीख पा रहे हैं।  जिनको हम समझते हैं देश के सब से अमीर लोग हैं उनको भी सरकारी सबसिडी की भीख चहिये नहीं तो वो रहीस रह नहीं सकते। आजकल भीख मांगने वाले भी सम्मान के पात्र समझे जाते हैं , जिसे देखो वही इस धंधे में शामिल होना चाहता है। भीख नोटों की ही नहीं होती , वोटों की भी मांगी जाती है , वोट जनता का एकमात्र अधिकार है वो भी नेता खैरात में देने को कहते हैं , वोट पाने के हकदार बन कर नहीं। कई साल से देश की सरकार तक समर्थन की भीख से ही चल रही है। देश की मलिक जनता को जीने की बुनियादी सुविधाओं की भी भीख मांगनी पड़ रही है , मगर नेता-अफ्सर सभी को नहीं देते , अपनों अपनों को देना पसंद करते हैं। अफ्सर मंत्री से मलाईदार पोस्टिंग की भीख मांगता है तो मंत्री जी मुख्य मंत्री जी से विभाग की। हर राज्य का मुख्य मंत्री केंद्र की सरकार के सामने कटोरा लिये खड़ा रहता है। राजनीति और प्रशासन जिंदा ही भीख के लेन देन पर है। विश्व बैंक और आई एम एफ के सामने कितनी सरकारें भिखारी बन ख़ड़ी रहती हैं। इनको भीख किसी दूसरे नाम से मिलती है जो देखने में भीख नहीं लगती। मगर जिस तरह गिड़गिड़ा कर ये भीख मांगते हैं उस से सड़क के भिखारी तक शर्मसार हो जाएं। सच तो ये है कि सड़क वाले भिखारी भीख अधिकार से और शान से मांगते हैं , उनको पता है लोग भीख अपने स्वार्थ के लिये देते हैं , बदले में पुण्य मिलेगा ये सोच कर। बड़े बड़े शहरों में रोक लगा दी गई थी , सड़क पर भीख मांगने पर , जो पुलिस वाले खुद सड़क पर खड़े होकर भीख लिया करते वो  जुर्माना करते थे  उन पर जो भीख दे रहा होता है।  भिखारी पर नहीं होता जुर्माना। मतलब यही है कि भीख मांगना नहीं देना अपराध है। देश की तमाम जनता इस कानून के कटघरे में खड़ी नज़र आती है , इस युग में किसी पर दया करना कोई छोटा अपराध नहीं है।
        दाता एक राम है भिखारी सारी दुनिया। धर्म की दुकानों पर भीख को दान कहते हैं गरीब लोग उपदेश सुनते हैं जितना है उसी में खुश रहो अपने गुरु जी से जो खुद कतनी आमदनी कितने डेरे कितने हर शहर में सतसंग घर बनवाता जाता है बदले में दो रूपये का बिस्कुट का पैकेट एक रूपये में खरीद कर खुश हो जाता है। ये सस्ता माल जो कंपनी बेचती है कभी घाटे में नहीं रहती। दान की और भीख की महिमा का सार यही है कि कई गुणा वापस मिलता है , भीख देने वाले को दुआओं की ज़रूरत होती है। आखिर में इक राज़ की बात बताता हूं। हम लोग स्वर्ग नर्क की चिंता करते मर जाएंगे मगर जब कभी ऊपर पहुंचेंगे तो समझेंगे सच क्या है। भगवान ने सब को जी हां सभी को एक ही जगह एक साथ एक समान रखा हुआ है। वहां न कोई जन्नत है न कोई दोखज है , न कोई अपना अपना धर्म ही है। ये सब इसी धरती पर खुद इंसानों ने बनाया हुआ है। अब आपकी मर्ज़ी है चाहो नर्क में रहो या स्वर्ग का आनंद लो।  लूटने वाले मज़े लूट रहे हैं और हम मूर्ख लोग मंदिर मस्जिद के झगड़े में नर्क भोग रहे हैं। भगवान को हमारी सहायता की ज़रूरत नहीं है , भगवान को नहीं खतरा किसी और को है।  भगवान को पहचान लोगे तो शैतान का खेल खत्म हो जायेगा , शैतान कोई और नहीं है खुद हमारे भीतर छुपा बैठा है।  आपको याद है बनवास में भी माता सीता जी के पास रावण भिक्षा मांगने आया था , जंगल में खुद कंद मूल खाते थे मगर दर पर आये को भीख देनी ज़रूरी थी। राम जी पत्नी की बात मानते थे इसलिए सोने का हिरण लाने चले गये थे। अनादिकाल से भिक्षा भिक्षुक की कथाएं चली आ रही हैं। भीख देने को अब आयकर विभाग नियम बना सकता है। नकद कितनी और कितनी भीख आयकर मुक्त और भीख देने पर कितनी छूट। इक घटना याद आई।
              इक दुकानदार का हिसाब किताब सही मिला आयकर अधिकारी हैरान हुए। उनसे कहा सेठ जी सुबह से छापे डालने में लगे मिला नहीं कुछ भी। भूख लगी है आप खाना ही मंगवा कर खिला देते।  सेठ जी बोले क्यों नहीं ऐसा तो पुण्य का काम है। पांच सौ रूपये तब बड़ी रकम थी , नौकर को देकर सभी अधिकारीयों के लिए होटल से अच्छा खाना लाने को कहा। नौकर के जाने के बाद मुनीम जी ने पूछा सेठ जी ये पांच सौ किस खाते में लिखने हैं। सेठ जी ने बताया खर्च खाते में डाल दो और लिख देना भिखारियों को खाना खिलाया। आयकर विभाग वालों को ठीक से समझ आ गया कि हिसाब बिल्कुल ठीक कैसे है।

 


Wednesday, 8 August 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग 11 - डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात )भाग-11   

                                           डॉ लोक सेतिया 

    आज रात की कहानी पहले ही सुना देते हैं। आपको अकारण उलझन में क्यों रखना। उसके बाद चर्चा होगी कि किस मोड़ पर कहानी पर चर्चा करने वाले क्या क्या अभिमत ज़ाहिर कर रहे थे। अधिकतर सवाल गैर ज़रूरी होते हैं और दर्शाते हैं कि हम हर किसी की ज़िंदगी में दखल देने को उतावले बैठे हैं। पति पत्नी और छोटा सा बच्चा है परिवार में पति नौकरी करता है मगर अपना घर और अन्य ज़रूरतों को समझ पत्नी से भी नौकरी करने को कहता है। बच्चा छोटा है मगर उसके लिए देखभाल को रखा जा सकता है किसी को वेतन देकर और यही किया जाता है और कोई समस्या नहीं आती सब डर बेकार साबित होते हैं। मगर पत्नी को पति के दफ्तर में ही नौकरी मिलती है और जिस का डर होता है , उन पति पत्नी को नहीं बाकी लोगों को , वही होता है। पत्नी को तरक्की मिलती है और वो पति की बॉस बन जाती है। लोग फिर डर जताते हैं अब शादी का टिकना मुश्किल है मगर सब सामान्य रहता है। आखिर में जब पत्नी को ऊपर से निर्देश मिलता है अपने आधीन कर्मचारी पति को नौकरी से हटाने को तब लगता है जैसे अभी आसमान टूटने को है। मगर ऐसा कुछ भी नहीं होता है और जब घर आकर पत्नी खुद भी नौकरी छोड़ने की बात करती है तो पति उसको मना ही नहीं करता है बल्कि जो कोई भी अपेक्षा नहीं कर रहा था वो कहता है। शायद ऐसा होता नहीं होगा अक्सर मगर होना ऐसा ही चाहिए। हर कहानी की सार्थक इसी में है कि वो मार्गदर्शन करे राह दिखलाये। पति कहता है मुझे भी शुरू में तुम प्रतिद्विंदी लगी मगर फिर समझ गया कि तुम मुझसे काबिल और मेहनती हो और तरक्की की हकदार भी। तुमने मुझे नौकरी से निकला क्योंकि तुम्हें करना पड़ा अपने पद और अपने ऊपर के अधिकारी के आदेश का पालन करने को। घर में हम पति पत्नी हैं अब बॉस और कर्मचारी नहीं रहे ये अच्छा है तुम इक दुविधा से बच सकोगी। रही मेरी बात तो मैं चार पांच साल घर पर बच्चे की देख रेख करूंगा और तुम काम करोगी। जब बच्चा बड़ा हो जायेगा मैं कहीं भी नौकरी कर लूंगा शायद तुम ही मुझे फिर से रख लो क्योंकि तब तक तुम सीईओ बन जाओ शायद।  कितनी सरल सी बात है अगर समझ आ जाये तो। कोई टकराव कोई मतभेद नहीं हुआ जिसका अंदेशा बाहरी लोगों को था। वास्तविक जीवन में ऐसा अगर नहीं होता तो उसका कारण लोगों का औरों की ज़िंदगी में अनावश्यक दखल देना है। 

                                  चर्चा समाज की मानसिकता की

   स्टुडिओ में बैठे और टीवी पर देखने वाले क्या विचार रख रहे थे। पत्नी पति के घर के लिए ही तो कमा रही है , क्यों उसका अपना घर नहीं है अपनी ज़रूरत नहीं है। जो पति भी कभी आपसी मतभेद में बातों में ये कहते हैं कि मैं आप सभी के लिए ही तो कमाता हूं उनको भी मालूम होना चाहिए घर पर पत्नी भी सभी के लिए काम करती है क्या कभी कहती है उपकार करती हूं , अगर कहती है तो अनुचित है। हैरानी की बात है इक्कीसवीं सदी में पढ़ लिखकर भी हम महिला पुरुष में समानता की बात नहीं करते और ये औरत का काम है ये आदमी का ये समझते हैं। जबकि कोई काम नहीं जो आज महिला नहीं करती है और कोई काम नहीं जो पुरुष भी महिलाओं की तरह नहीं कर सकते। अभी भी हमारी सोच को विकसित होना है और बदलना है।

जिएं तो जिएं कैसे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

         जिएं तो जिएं कैसे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

      जीने को कुछ बातें ज़रूरी हैं। महात्मा विदुर बताते हैं , स्वास्थ्य तन मन , अपनी आमदनी से गुज़र बसर करना , निडर होकर रहना , अपने देश में रहना। सुखी जीवन को यही चार बातें ज़रूरी हैं। दो और बातें भी साथ हों तो सोने पर सुहागा , अच्छा परिवार विशेषकर जीवन साथी और आज्ञाकारी संतान , सबसे आखिर में सबसे महत्वपूर्ण अच्छे और सच्चे लोगों से मेल जोल रखना। थोड़ा ध्यान से पढ़ना क्या इस से बढ़कर कुछ होता है। मगर अधिकतर आजकल केवल तन के स्वास्थ्य और धन की बहुलता पर सब केंद्रित हैं। मगर सच तो ये है कि धन ही सब से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है और हैरानी की बात है कि जितना अधिक धन उतनी अधिक समस्याएं भी बढ़ती जाती हैं। तन मन को रोगी बनाकर धन हासिल करते हैं फिर उस धन से तन मन को निरोग करने को जतन करते हैं। बाहरी ख़ुशी है सब के पास दिखाने को भीतर से सब चिंता डर परेशानी में अपने ही जाल में फंसे हैं। वो कहानी आज भी सच है हाऊ मच लैंड ए मैन नीड्स , आदमी को कितनी ज़मीन चाहिए , जी नहीं दो गज़ भी नहीं मिली कुए यार में बादशाह बहादुर शाह ज़फर तक को। सबक सीखने को बहुत हैं सीखता कौन है। दार्शनिकता की नहीं केवल स्वस्थ्य की ही बात करते हैं आज अन्यथा विषय से भटक सकते हैं जिस तरह उपदेशक बात को कहीं से कहीं ले जाते हैं मगर बात अर्थहीन हो जाती है लोग सुनते हैं तो सुनने को ही। चलो स्वस्थ्य जीवन की बात करते हैं।
           मन स्वस्थ्य होना आवश्यक है और उसे विचार से चिंतन मनन से और अध्यन से ही किया जा सकता है। मंदिर मस्जिद जाने से भी नहीं , बल्कि मंदिर मस्जिद जाते हैं मन की स्वछता के बगैर तो जाकर कुछ भी नहीं मिलता है। तन की चिंता रहती है , स्वस्थ्य रहने को केवल व्यायाम योग काफी नहीं हैं , योग तो सभी आयु में और अधकचरे ज्ञान से और भी गलत है जो आजकल होने लगा है। सैर की अहमियत सब जानते हैं मगर सैर करने का भी तरीका होता है। अच्छे वातावरण में चुप चाप और मौसम के अनुसार सुविधजनक कपड़े पहन कर सैर की जानी चाहिए। अधिकतर लोग सही ढंग से ये भी नहीं करते हैं। आपको दिल की बिमारी मधुमेह या मोटापा और जोड़ों के दर्द ही रोग लगते हैं जिनसे बचना चाहते हैं। खान पान और जीवन शैली से गुर्दा जिगर और कैंसर तक दबे पांव किसे कब जकड़ लेते हैं कोई नहीं जनता। सब से बड़ी मूर्खता हम नियमित स्वास्थ्य की जांच नहीं करवाते और यथासंभव अच्छे क्वालिफाइड डॉक्टर से बचते हैं क्योंकि वो भी अब आपके स्वास्थ्य से अधिक अपने आर्थिक हित को ध्यान रखते हैं और अनावश्यक जांच आदि और दवाएं लिखते हैं जिनसे ज़रूरत नहीं होने पर नुकसान भी होते हैं। ईमानदारी का अभाव हर जगह है , नेता अधिकारी शिक्षक व्यौपारी सब अपने कमाई किसी भी तरह अधिक करने को अनुचित धन अपनाते हैं। क्या ये काम खतरनाक रोग नहीं है जो देश समाज को बर्बाद कर रहा है। अपने स्वार्थ में अंधे होकर हम कितने अमानवीय कार्य करते हैं। कहने को बड़े बड़े अस्पताल हैं मगर वास्तविक सुविधा और प्रशिक्षित लोग कम होते हैं। कभी नीम हकीम खतरा ऐ जान कहते थे आजकल नीम हकीम भी फल फूल रहे हैं और हम खुद जाते हैं उनके पास कितनी बार सरकारी विभाग छापे मारता है और झोला छाप कुछ दिन बाद लोगों की ज़िंदगी से खिलवाड़ करता दिखता है। बड़े बड़े अस्पतालों में भी नर्सिंग होम में यही और ढंग से होता है। आपके पास बचने को कोई तरीका नहीं है क्योंकि सरकार को अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं और अच्छी शिक्षा की कोई चिंता नहीं है।
                       हवा में ज़हर , हर चीज़ में मिलावट और आयुर्वेद या देसी चिकित्स्या के नाम पर केवल साबुन शैम्पू गोरे रंग की क्रीम और वज़न बढ़ाने कम करने के धंधे आपको और गुमराह कर रहे हैं। कम लोग जानते हैं कोई समस्या हो तो क्या करें किस के पास जाएं। दो चीज़ें ज़रूरी है , पहली हमारी शिक्षा में जीवन की वास्तविक कठिनाइयों की जानकारी शामिल करना और दूसरी आपके पास कोई एक सही चिकित्स्क सलाहकार होना फॅमिली डॉक्टर की तरह जो आपको कुछ फीस लेकर सही मार्गदर्शन दे सकता हो। मगर इक कटु सत्य ये है कि हम ऐसी बेहद मूल्यवान राय की कदर नहीं करते और मुफ्त में मिली सलाह से भटकते रहते हैं बिना ये जाने कि जिसने आपको बिना फीस लिए किसी के पास भेजा है उसका इस में अपना स्वार्थ भी होता है। सब से ज़रूरी है अपनी तंदरुस्ती की कीमत समझना जो बेहद कीमती है।

Monday, 6 August 2018

जिन्हें लेना ही आता है जिन्हें देना नहीं आता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      जिन्हें लेना ही आता है जिन्हें देना नहीं आता ( तरकश ) 

                                            डॉ लोक सेतिया 

             माफ़ करें आज का विषय महिला पुरुष की समानता की बात पर नहीं है इसलिए उस नज़रिये से मत पढ़िये। पत्नी को भी सरकार भी कहते हैं तो बिना कारण तो नहीं ऐसा हुआ कि घर की सरकार वही है। उन्हीं का शासन चलता भी है , आपकी पत्नी की भी राय यही होगी कि भाभी जी जो इशारा करती हैं भाई साहब वही कहते हैं करते भी हैं और सोचते समझते भी हैं। मगर इस सब के बाद भी भाई साहब समझदार तो हैं बस बीवी को ही नहीं समझते हैं। लेकिन आपके लिए पत्नी की राय ये नहीं है , आप नासमझ भी हैं और बुद्धू भी आपको कितना समझाती है पत्नी समझते ही नहीं। बाबू समझो इशारे। थोड़ा दूसरे किरदार की बात भी हो जाये , सरकार गवर्नमेंट की , जनता को लेकर उसकी राय भी पत्नी जैसी ही है। मूर्ख लोग समझते ही नहीं कितना विकास किया है कितनी भाग दौड़ दिन रात करते हैं , गरीबी भूख कब की मिट चुकी है और हम खूब मज़े में हैं। आंकड़े जारी करते हैं इश्तिहार बंटवाते हैं विज्ञापनों पर करोड़ों रूपये खर्च करते है हर दिन फिर भी लोग हमारे भाषणों को झूठा बताते हैं। जिनको पता होता है वो एक के चार नहीं आजकल पचास हज़ार गुणा बढ़ जाते हैं , नहीं समझते जो हाथ मलते जाते हैं। आओ अब विषय पर आते हैं , नासमझ तो हैं हम खुद भी मगर आपको समझाते हैं। 
                              सरकार की तिजोरी खाली होती है जब भी सरकार सत्ता में आती है। पहली चिंता हर नेता को यही सताती है। मगर सत्ता की देवी क्या क्या करामात दिखाती है , सरकार घाटे में भी खुद अपने खज़ाने को लुटवाती है। सरकार है क्या दरवाज़े पर बंधा खड़ा शान दिखलाने वाला सफेद हाथी है। सफ़ेद हाथी की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू , चुटकी भर सिंदूर की बात कब किसको समझ आती है। सरकार कैसे कैसे जनता से कर वसूल करती जाती है , किसी भूखे के पेट पर लात मरते बिल्कुल नहीं घबराती है। आप ही से लेकर सौ रूपये आपको दस रूपये देकर एहसान जतलाती है। खुद कितना हज़्म करती है तभी तो सरकार सरकार कहलाती है। सरकार आपका नहीं हर साल अपना बजट बनाती है , आपके लिए आफत लाती है फिर थोड़ी आफत कम कर देती है जो राहत बतलाती है। आपकी आमदनी पर आयकर विभाग की नज़र जाती है , जब आमदमी नहीं घाटा हो तब उसकी नज़र नज़र नहीं आती है। आय नहीं है तो भी क्यों नहीं है कई सवाल उठाती है। एक नहीं दो नहीं पचास रास्ते अपनाती है , चोर आपको साबित करती है खुद साहुकार बन जाती है। मुसीबत आने पर कोई भी नहीं काम आती है। 
                             पत्नी भी यही सोचती है समझती है और समझाती है। आपकी कमाई उसी की ही बन जाती है। आपकी आमदनी पर अपना अधिकार जतलाती है मगर उसके पर्स की राशि उसी की बन जाती है। बदकिस्मती जब आपकी आती है आपकी पत्नी साहुकार भी बन जाती है , उधार देकर सरकार की तरह इतराती है। कितना दिया हिसाब लिखती जाती है , लिया भी था नहीं याद आती है। आपने जो दिया वो घर खर्च था वो जो दे रही है जमाखर्च है पाई पाई गिनवाती है। पत्नी से लिया क़र्ज़ कोई चुकता नहीं कर पाया है , सब उनकी माया है। पुरुष कितने भी समझदार हों पत्नी से अपना हिसाब कभी नहीं छुपा सकते हैं , राज़ की बात भी खुद ही बता कर फंसते हैं। आपकी कमाई कब सफेद से काली बन जाती है , महिलाओं की कमाई पर आयकर विभाग की भी नहीं नज़र जाती है। सरकार किसी की भी हो महिला जगत से घबराती है , उनकी बचत बचत ही समझी जाती है। नोटबंदी में उन पर कोई मुसीबत नहीं आती है , बहनों से सरकार डरती है , जानती है बिंदिया चमकती है चूड़ी खनकती है तो कितने सितम बरपाती है। संसद में मंत्री बनी बैठी खामोश हो जाती है जो महंगाई पर पहली सरकार को चूड़ियां भिजवाती है। आप उसको क्या भेज लोगे यही गुनगुनाती है , नाचती झूमती जाती है। अब समझो कोई भी सरकार महिला आरक्षण बिल क्यों नहीं पारित करवाती है , जितनी भी थोड़ी हों महिलाएं संसद में महिलाओं की गूंज साफ सुनी जाती है। जिस दिन एक तिहाई संख्या महिलाओं की हो गई सब पुरुष सांसदों की बोलती बंद कराती है। किसे पता किस किस की पत्नी कैसे पर्दे के पीछे से सत्ता चलाती है। अंत नहीं है इस कथा का मगर बात कही नहीं समझी जाती है। सरकार से डर लगता है पत्नी भी डराती है ये दोनों नहीं किसी पर रहम खाती हैं।

Saturday, 4 August 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 10 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग -10 

                                     डॉ लोक सेतिया 

    3 अगस्त की कहानी सदियों पुरानी है , आधुनिक परिवेश में बदले रूप में। जुआ या सट्टा या फिर खेल की जीत हार पर शर्त से लेकर आदत कुछ भी हो सकती है। जब शुरुआत ही कोई दोस्त के साथ शर्त लगाकर लड़की को परपोज़ करने से होती है तो आगे अंजाम क्या होना था। किसी धर्म वालों को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता मगर सवाल तो आते हैं मन में चिंतन तो किया जाना उचित है। द्रोपती को दांव पर किसने लगाया धर्मराज से पहले उसका विवाह मछली की आंख में तीर लगाने वाले से करने की शर्त खुद पिता ही ने रखी थी। बेटी कोई गाय बकरी है जो किसी के हाथ दे सकते हैं। जनक जी को भी धनुष तोड़ने की शर्त रखने की क्या ज़रूरत थी। जो पंडित बतलाते हैं राम और सीता की कुंडली के 36 के 36 गुण मिलते थे उन्होंने कभी सोचना ही नहीं चाहा कि विवाह की शर्त से पहले क्या सभी स्वयंबर में आये युवकों की कुंडलियां मिलाई गई थी। खुद को जुए में दांव पर लगाने वाले पतियों को द्रोपती ने छोड़ नहीं दिया था तो प्यार में अंधी लड़की जो खुद ही पिता के समझाने के बावजूद जुआरी सट्टेबाज़ से शादी करती है भला खुद को दांव पर लगाने वाले पति को कैसे छोड़ देती। फिर जो उसको शादीशुदा होने के बावजूद भी पति से अलग करवाने को वही करता है जुए में दांव ही लगाता है दूसरे को खलनायक साबित करने को।  नायक कैसे हो सकता है। जब एक जैसे हैं तो पहले जिस से प्यार किया विवाह किया उसी को चुनना उचित ही था। कहानी में अंत में समझा जाता है अब उसको समझ आ गई है और वो आगे से जुआ सट्टा खेलना छोड़ देगा। वास्तविकता में ऐसा होता शायद ही देखते हैं। मैंने अपने आस पास कितने ही घर तबाह होते देखे हैं इसी कारण। मगर आप इस को सिर्फ जुए सट्टे और शेयर मार्किट की बात मत समझना। 
                     हम हर चुनाव में अपने वोट को इसी तरह दांव पर लगाते हैं। विचार करते हैं कैसा है क्या चाहता है। इतना धन क्यों खर्च करता है। हर बार सत्ता भले जिस किसी दल को मिलती है और जो भी दल सत्ता से वंचित रहता है उनकी जीत हार खेल की तरह है मगर जनता द्रोपती की तरह दांव पर लगाई जाती ही नहीं बल्कि हर बार हारती वही है जनता ही। वास्तव में जिसकी जीत होनी चाहिए वो खुद ही बिना सोचे समझे वरमाला डालती है जो जुए की तरह ही लड़ते हैं चुनाव। जीतने पर लाख गुणा और हारने पर जो लगाया गया पानी में , मगर उनकी कोई मेहनत की खून पसीने की कमाई नहीं होती है हम जानते हैं। जिस संसद में शायद सौ से अधिक आपराधिक कार्यों से संबंधित चुने हुए बैठे हों उस संसद से कानून व्यवस्था की समझने की उम्मीद रखना खुद को ठगना है। 
                                 लॉटरी पर रोक है मगर टीवी शो पर यही धंधा बड़े बड़े नाम वाले खेलते नहीं खिलाते हैं और खुद करोड़पति नहीं अरबपति बनते जाते हैं। आपको कितनी अच्छी अच्छी बातें समझाते हैं खुद पैसे की खातिर जो मर्ज़ी करते जाते हैं। आजकल ऐसे लोग आदर्श कहलाते हैं। मैं आज बेहद हैरान हुआ देख कर अख़बार के ऊपरी स्थान पर महान लोगों की जहां नैतिकता की मूल्यों की बातें छापते हैं इक आधुनिक सफल कारोबारी की कही बात लिखी थी " सब को अवसर समान मिलते हैं मगर जो अवसर का उपयोग करते हैं वो सफल होते हैं। " कौन सवाल करेगा क्या क्या हथकंडे नहीं अपनाते हैं। हर सत्ताधारी से मधुर संबंध बनाते हैं , बिना लाइसेंस लिए मोबाइल के बाज़ार में आते हैं और देश को चूना लगा सरकार से माफ़ करवाते हैं।  जनाब ईमानदारी की भाषा में ये अवसरवादी असल में चोर कहलाते हैं। चलो छोडो आदर्श की बातें आओ हम सब मिलकर गुनगुनाते हैं। गलती से मिस्टेक करने वाला गीत गाते हैं। क्या खूब है गुमराह करते हैं मार्गदर्शक कहलाते हैं।

Friday, 3 August 2018

तेरी सुबह कह रही है तेरी रात का फ़साना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

तेरी सुबह कह रही है तेरी रात का फ़साना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 


     मैं गरीबों की बात करता हूं अमीरों के साथ करता हूं। तुम रात को दिन समझ लेना मैं दिन में रात करता हूं। मैं आफ़ताब हूं तुम प्यासी धरती हो धूप की मैं बरसात करता हूं। मुझसे सवाल कौन करे मैं सब से सवालात करता हूं। मेरी हर बात झूठी है मैं सच्ची बात करता हूं। हालात मुझसे डरते हैं खुद मैं ऐसे हालात करता हूं। सब मेरी बात करते हैं मैं खुद मन की बात करता हूं। मैं अपने को जनता ही नहीं इस तरह मुलाकात करता हूं। मैंने पाले हुए हैं मगरमच्छ कितने मछलियों को प्यार करता हूं। मैं मैं हूं मैं ही मैं हूं इस की ही बात करता हूं। किताबों से बैर रखता हूं शिक्षा की बात करता हूं। सपना मेरा जब से हुआ सच सपनों के महल में रहता हूं। महल वो किसी और का है हर किसी से कहता फिरता हूं। इस आलीशान महल को अपनी झौपड़ी है सबको कहता हूं। ताज बदलता नहीं कभी बस राज बदलता रहता हूं। अब रोज़ ख्वाब आता है कच्ची दीवार जैसा ढहता हूं। मुझे नींद अब नहीं आती सोते में ऐसा कहता हूं। मुझे हारना नहीं आता हारना भी है यही सच है सच है मैं हारने से डरता हूं। मेरे ख्वाब बहुत ऊंचे हैं मुझको खुदा कहलाता है खुदाई न छीन ले कोई जान जाती है बात से मुकरता हूं। मेरे पास ऐसा जादू है सम्मोहित सभी को करता हूं। फूटेगा या नहीं फूटेगा मेरा घड़ा भरता ही नहीं भरता हूं और भरता हूं। कितना सफर अभी बाकी है दिन रात सफर ही करता हूं।
       तेरी सुबह कह रही है तेरी रात का फ़साना। हर मोड़ पर लिखा था कोई न इधर जाना , लेकिन अच्छी कोई हिदायत कोई भी नहीं माना। अब कौन किससे पूछे तुम आगे कितना पहुंचे , वो लोग सब पीछे रहे जिनको था साथ लाना। सब दर्द से कराह रहे हैं आह भरना भी मना है , देखना ज़रूरी है तेरा नाच गाना। खो गए हैं जनता के कहीं सवेरे , तेरी रौशनी ने बढ़ा दिए हैं कुछ और भी अंधेरे। साये भी हैं डराते हर शाम कांपती है हर राह डर है घेरे।   मौसम है सुहाना जो लड़की गा रही है , बादलों को बुला रही है , बिजली भी गिरनी है दिल में सोचती है घबरा रही है। बंद दरवाज़ों को खोलता नहीं कोई कोई अजनबी अकेला और भीड़ आ रही है। भीड़ जुटी हुई तफरीह के लिए जो सामने आया उसी पर कहर ढा रही है। यहां किसी कवि की कविता याद आई है। हर कोई अपने झोले में अपना अपना सच लिए हुए है। भगत सिंह पाश सफदर हाशमी कितनी बार जन्म लेते कोई साथ नहीं चलता है , कलम तो कलम है अपने खून से लिखती है अपनी ही मौत का फरमान।
                           आज़ादी किसी बेबस महिला की तरह बंद है उनकी कैद में जो दावा करते हैं सुरक्षा देने का। झुकना नहीं जानते जो जो भी कट गए हैं , ये लोग कितने अजीब हैं ख़ामोशी से हर ज़ुल्म सह गए हैं। अब कोई नहीं गुनगुनाता उनके गीतों को जो खून बनकर रगों में बह रहे हैं। सरफ़रोशी की तमन्ना किसी के दिल में नहीं बाकी , बाज़ुए कातिल के हौसले बढ़ गए हैं। सब ने समझ लिया है आएगी नहीं सुबह कभी हर किसी के आंगन में , मीनार महलों के रौशनी को रोके हुए बढ़ते जा रहे हैं। दिन भी है रात जैसे और रातों को दिन हैं कहते , हवा चलाने दिया जलाने का दम भर रहे हैं। ये हद है आप को 1975 से 1977 का आपत्काल याद है और उस समय जो कैद रहे उनको पेंशन भी मिलने लगी चालीस साल बाद। जो उसी समय जेल में रहने से ही नेता ही नहीं राज्यों के मुख्यमंत्री तक बने उन्होंने क्या नहीं किया। मगर आज जो बिना आपात्काल घोषित किये डर दहशत ही नहीं बदले की भावना से विरोध की आवाज़ को दबाने को लगे हैं वो क्या है। अगर उसे काला अध्याय समझा जाता है तो ये भी कोई सुनहरी काल कदापि नहीं कहलायेगा।
         
     

Thursday, 2 August 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 9 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 9 

                                      डॉ लोक सेतिया 

     आज की कहानी पर चर्चा करना बेहद कठिन कार्य है। इस को समझने के लिए कुछ पुरानी कहानियों की बात की जाये तो शायद आसानी होगी। इक फिल्म में अशोक कुमार जो नायक से लेकर हास्य कलाकार और चरित्र अभिनेता तक तमाम तरह के किरदार निभा चुके हैं , एक डॉयलॉग बोलकर वो बात समझा देते हैं जो कहानी के सभी अभिनय करने वाले नहीं समझा पाते। " औरत की पवित्रता को शरीर के दो इंच हिस्से से नहीं आंका जा सकता है , उसके मन आत्मा की पावनता अधिक महत्व रखती है। " ये खेद की बात है हम आज भी अपनी मानसिकता को बदल पाये नहीं न ही बदलना चाहते हैं। धूल का फूल जैसी फिल्म भी और साधना जैसे फिल्म के रौंगटे खड़े करने वाले गीत का भी कोई असर हुआ नहीं। चलो ये दो गीत सुनते हैं। 

जिस समाज की दुहाई देते हैं उसी समाज के मुंह पर तमाचा है। और जो संतान नाजायज़ कहलाती है उसका क्या दोष होता है। मुजरिम वो पिता है जो बिन बियाही मां बनाता है किसी को। 


नहीं इतना काफी नहीं है। इक पंजाबी कहानी इस से भी अलग है। इक महिला को बच्चा पैदा होता है जो केवल उसी को  जानकारी होती है कि न लड़का है न ही लड़की। मगर वो इस राज़ को छुपाये रखती है कितनी मुश्किल से कोई नहीं समझ सकता। सब से छुपाकर नहलाने से कपड़े बदलने और दोस्तों के साथ खेलने तक इसका ध्यान रखना कि कोई नहीं जान सके। सामाजिक विवशता से उसकी शादी भी करनी पड़ती है , बेटा पति धर्म निभाने में सक्षम नहीं है इसलिए जिसको बहु बनाकर लायी उसके साथ किसी और से संबंध स्थापित करवा संतान भी पैदा करवा लेती है। बच्चा नहीं समझता क्यों कोई दूसरा आदमी उसकी मां से मिलने आता है। जब जिसको पिता समझता रहा उसकी मौत होती है तब उसकी लाश को नहलाते समय समझता है कि वो पिता बन ही नहीं सकता था। 
      बहुत घटनाएं जीवन में होती हैं जिनका पता किसी को नहीं होता सिवा उस के जिसके साथ घटा कुछ भी। इक पति पत्नी बच्चा गोद लेते हैं बिना किसी को बताये मगर बड़े होने पर पढ़ लिख जाने के बाद भी जब उन्हें मालूम होता है कि हम इनकी नहीं किसी और की संतान हैं जो पालन पोषण नहीं कर सकते थे और उन की भलाई और भविष्य के लिए किसी और को सौंप दिया था। किसी को पूरी जानकारी और हालात की वास्तविकता को समझे बिना अपराधी मान लेना गुनाह है मगर हम सभी ऐसा करते हैं। हर किसी को लेकर कोई धारणा बनाते ही नहीं उन पर थोपते भी हैं। विडंबना की बात ये भी है कि हम अपनी गलती मानते भी नहीं और किसी तरह जान भी लें कि हमने गलत समझा तो कोई खेद व्यक्त नहीं करते हैं। 
        आज की कहानी यही थी। डीएनए टेस्ट से पता चलता है कि मेरा पिता वास्तविक पिता नहीं है और मां को दोषी समझ कुछ दिन बाद घर छोड़ जाने लगता है। जो वास्तविकता सामने आती है खुद उसी को शर्मसार करने वाली होती है। किसी नाबालिग लड़की से सामूहिक बलात्कार के बाद जो उस लड़की को निर्दोष समझ विवाह ही नहीं करता बल्कि उस हादिसे के कारण जन्म लेने वाले बच्चे को भी बेटा ही मनाकर प्यार लाड दुलार से बड़ा करता है उसी को बीमारी की हालत में छोड़ कर जाने लगता है तब असलियत पता चलती है और उसका मन साफ हो जाता है। मगर तब तक जो दर्शक स्टुडिओ में बड़ी बड़ी बातें कर रहे थे अब किसी को खेद भी नहीं है कि हम कौन हैं किसी महिला पर लांछन लगाने वाले। दुःख इस बात का है चाहे कितनी कहानियां कविताएं नज़्में ग़ज़लें लिखी जाएं और लोगों को अच्छी भी लगें तब भी उनकी हमारी सोच बदलती नहीं है कभी। सवाल वहीं का वहीं खड़ा है सदियों से।

Wednesday, 1 August 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 8 डॉ लोक सेतिया

 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 8 

                                            डॉ लोक सेतिया 

        आज पहली अगस्त की कहानी। शायद हर कोई जीवन की गुज़री वास्तविकता को फिर से दोहराने से बचता है। लिखने वाले भी अपनी आत्मकथा लिखते मुमकिन हैं कुछ बातें छुपा लेते हों अथवा उनको अपनी सुविधा से दिखा सकते हैं। आज जब कहानी की शुरुआत भी नहीं हुई थी केवल इतना एंकर ने बताया कि ये कहानी दोस्ती पर है तो मुझे जाने क्यों लगा शायद इस में किसी तरह से मेरी बात हो सकती है। और कुछ कुछ मेरे जीवन से मिलती जुलती कहानी ही थी आज की। हालांकि बिल्कुल अलग ढंग से और शायद दूसरे दृष्टिकोण से भी। आज शायद मुझमें साहस है अपनी बात सभी पढ़ने वालों को बताने का। मगर पहले आज की टीवी शो की कहानी की बात। 
               शुरुआत होती ही दो दोस्तों की दोस्ती से है। भरोसे प्यार विश्वास और इक अटूट बंधन। मुझे ओशो की दोस्ती की परिभाषा हमेशा पसंद रही है। 
     आपसी बात में इक दोस्त दूसरे को पूछने पर बताता है कि उसे कोई लड़की पसंद थी और दो साल तक उसका पीछा किया मगर उसने इनकार कर दिया था। और वो दोस्त राय देता है कि उस लड़की के घर के सदस्यों से मिलकर बात करनी चाहिए। इनकार तो पहले ही मिल चुका है इस से बुरा क्या हो सकता है। मगर तभी दोस्त किसी पुराने दोस्त की दोस्ती की बात बेहद नफरत से बताता है कि कभी ये मेरा सब से अच्छा दोस्त रहा है मगर उसने दोस्ती के साथ विश्वासघात किया है और मेरी बहन को लेकर भाग कर उससे शादी कर ली थी। ये जानने के बाद दोस्त के घर जाने पर उसी लड़की से सामना होता है जिसकी बात दोस्त को बता चुका होता है और समझता है फिर से उसी तरह मैं भी अपने दोस्त की बहन से प्यार की बात करूंगा तो वो शायद सह नहीं सकेगा और सोच लेता है दोस्ती को खोना नहीं है। कोई दूसरा सोच सकता है कि उसने तो पहले ही बता दिया था किसी लड़की से प्यार की बात तो अब ये क्यों नहीं बता देता कि वो लड़की तुम्हारी बहन ही है। लड़की खुद भी कहती है मैं भी आपको पसंद करती हूं मगर फिर इस तरह मिलने की उम्मीद नहीं थी। और दोस्त की बहन की सगाई हो जाती है खुद शामिल रहता है उस में। लेकिन शादी से दो दिन पहले लड़की उस के साथ भागने की बात करती है और इतना ही नहीं उसकी मां को भी पता चलता है तो वो भी उनके विवाह की बात से सहमत हो जाती है। मगर वो उनकी बात नहीं मानता है और दोस्ती की लाज रखता है। मुझे यही उम्मीद थी क्योंकि या तो जैसे ही लड़की को पता चला था कि जिसको चाहती है भाई का दोस्त है तो तभी भाई और मां को अपनी बात बता देती और उसके बाद जो होता मंज़ूर करती। मगर तब खामोश रहकर बाद में ऐसे समय बताना तो और बड़ा आघात होता भाई पर भी दोस्ती पर भी। मैं मानता हूं कि किसी से प्यार होना कोई शर्त नहीं है विवाह भी उसी से हो सके। बहुत कारण होते हैं और तब निर्णय सोच समझ कर लेने उचित होते हैं , कितने आधुनिक समाज में रहते हों कुछ सामाजिक बंधन निभाने अच्छी बात है। ज़रा इक फ़िल्मी उदाहरण से इक गीत से समझते हैं।

 

छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए , ये ज़रूरी नहीं आदमी के लिए। 

प्यार से भी ज़रूरी कई काम हैं , प्यार सब कुछ नहीं ज़िंदगी के लिए। 

तन से तन का मिलन हो न पाया तो क्या , मन से मन का मिलन कोई कम तो नहीं। 

खुशबू आती रहे दूर ही से सही , सामने हो चमन कोई कम तो नहीं। 

चांद मिलता नहीं सब को संसार में , है दिया ही बाहर रौशनी के लिए। 

अब अपने जीवन की वास्तविकता , दो बातें हुई। पहली बात मेरे पिता जी के इक दोस्त के घर आना जाना था और उनकी बेटी से मिला करता था। मन में भावना रहती थी बहन की तरह की है। मुझे नहीं खबर थी पिता जी ने अपने दोस्त से रिश्ते की बात कब की थी। मुझे जब बताया गया तो मैं इस रिश्ते को मंज़ूर नहीं कर सका और इस बात पर हम बाप बेटे में मतभेद सामने आये। मुझे मनाने की हर कोशिश नाकाम रही। अब इक और इत्तेफ़ाक़ होना था , मेरे बचपन के इक दोस्त ने अपनी बहन से मेरे रिश्ते की बात की तो पिता जी ने मुझे या किसी भी और सदस्य को बताना उचित नहीं समझा , शायद मेरे पहले संबंध से इनकार की बात से उनको लगा ये भी वही बात है। मगर वास्तव में मैं कभी अपने दोस्त की बहन से मिला ही नहीं था उनको देखा भी नहीं था। शायद इत्तेफाक की बात है कि उस दोस्त से मेरा पत्राचार होता रहता था और मुझे उसका पत्र मिला जिस में इशारे से रिश्ते की बात मेरे पिता से की और निर्णय मुझ पर है ऐसा उसे बताया गया लिखा हुआ था। गांव आने पर बात की तो मेरे पिता जी के बड़े भाई ताया जी मुझे साथ लेकर दोस्त के घर मिलने चले आये और बिना लड़की को देखे ही रिश्ता पक्का कर दिया। हम पति पत्नी हैं और सब ठीक है , मगर यहां हमारा कोई पहले जान पहचान और दोस्त की बहन का नाता नहीं था। इसलिए वो सवाल खड़ा ही नहीं हो सकता था , जबकि पिता जी के दोस्त की बेटी से मिलता रहा था परिवारिक संबंध समझ कर। आज की कहानी को अंत लेखक ने सभी दर्शकों की पसंद का भले नहीं किया हो , मुझे बेहद अच्छा लगा। दोस्ती मेरी नज़र में बाकी हर रिश्ते से बढ़कर अहमियत रखती है।