Sunday, 22 July 2018

मेरी आत्मकथा की लघुकथा ( दास्तां ) डॉ लोक सेतिया

      मेरी आत्मकथा की लघुकथा ( दास्तां ) डॉ लोक सेतिया 

     कोई चीज़ नहीं मांगता , जो भी मिल जाये उसी में खुश हो जाता। किसी खिलौने की मिठाई की ज़िद नहीं करता। जैसे कहता हूं वैसा ही मानता भी है। मगर पिता जी को अच्छा नहीं लगता क्योंकि जैसा वो चाहते बेटा वैसा है नहीं। धन दौलत ज़मीन का हिस्सा नहीं मांगता , अपनी परेशानी बताता भी नहीं और चुप चाप हालात से समझौता कर लेता है। थोड़ा भावुक है और ज़रा सी बात पर उदास हो जाता है। बहुत समझाया तुम किसी काबिल नहीं हो बाकी सब के बच्चे समझदार हैं दुनियादारी समझते हैं पर समझे तब ना। जाओ अपना घर अलग बना लो कहा तो उदास हुआ मगर मान गया। क्या दिया क्या नहीं कोई सवाल भी नहीं। कहते हैं मां भी खिलाती पिलाती है जब बच्चा रोता है। इसको कुछ नहीं चाहिए पिता जी को भी लगता रहा। मैं जो चाहता था किसी के पास था ही नहीं कोई देता भी कैसे मुझे थोड़ा सा भी प्यार। यही तलाश करता रहा जो किसी और दुनिया में मिलता होगा इस जहां में तो कहीं नहीं मिला। जिसको मिला उलझन में पड़ गया वही , छोड़ने की कोई वजह नहीं समझ आई और रखने की कोई ज़रूरत भी नहीं। दोस्तों को जब ज़रूरत हुई इस्तेमाल किया खिलौना जान कर बाद में भूल गये किस जगह रखा था खिलौना। सब के लिए अनचाहे बंधन की तरह साथ रहा मैं। सब को गिला है सभी को शिकायत भी है कि जो उनको चाहिए नहीं दिया मैंने। मुझे कुछ नहीं चाहिए था कोई शिकायत नहीं है , पर सोचता हूं कभी कोई तो होता जिस के दिल में मुझे थोड़ी सी जगह मिल जाती इक कोने में। इतनी सी दास्तां है मेरी जिसे किस को सुनाऊं यही सोचता हूं। कौन समझेगा।

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