Saturday, 30 June 2018

झूठ के देवता का घर ( मेरा नया व्यंग्य - 572 संख्या ) डॉ लोक सेतिया

      झूठ के देवता का घर ( मेरा नया व्यंग्य - 572 संख्या ) 

                                डॉ लोक सेतिया 

मुझे पता तक नहीं चला जाने कब किधर से दबे पांव मेरे कमरे में आ गया और सामने बैठ गया वो। राम राम कलमकार जी , चौंक गया आवाज़ सुनकर। नज़र उठाकर देखा , क्या शानदार पहनावा , सज धज और इतर की खुशबू जो मुझे भाती नहीं है। किसी को भी प्रभावित-आकर्षित कर सकता है व्यक्तित्व उसका। मैंने कहा अपना परिचय बताएं , माफ़ करें पहचानता नहीं मैं आप कौन हैं। ऐसे कैसे आ गये यहां समझ नहीं पा रहा। कहने लगे मुझे पहचान लो , मैं आजकल सबसे अधिक लोकप्रिय हूं। नाम है मेरा झूठ। आप सच लिखते रहो , बोलते रहो , मुझे कोई परेशानी नहीं है। फिर भी मुझसे दोस्ती दोस्ती नहीं करना चाहते तो जान पहचान ही सही। मुझे तो आपकी दुश्मनी भी स्वीकार है , बस मेरी इक काम में सहायता करो , यही विनती लेकर आया हूं। सच कहूं , उसकी बातें सुनकर मेरा तो सर चकराने लगा। मैंने कहा लगता है आप गलत जगह चले आये हैं , मैं आपके काम का आदमी नहीं हूं। नहीं जनाब , मैं सोच समझ कर आया हूं सही जगह पर और मेरी सहायता केवल आप ही कर सकते हैं। बस आप एक बार मेरी बात ध्यानपूर्वक सुन तो लीजिए। 
          सब से पहले आप इस बात को मान लो कि अब हर जगह मेरा ही शासन है। मेरा ही बोलबाला है , मेरे बगैर एक पल भी लोग रह नहीं सकते हैं। राजनेताओं की बात छोड़ दो , उनकी बात पर कभी लोगों ने विश्वास किया ही नहीं। धर्म वालों की हालत और भी खराब हो गई है। खुद सब करते हैं , लोभ मोह काम क्रोध अहंकार भरा हुआ है और उपदेश देते हैं अनुयाईयों को ये सब छोड़ने के। आपको सब लोग सोशल मीडिया व्हाट्सएप्प आदि पर कितने सुंदर संदेश , आदर्शवादी बातों वाले भेजते हैं और शुभकामनाएं देते हैं सुबह शाम। कितनी वास्तविक हैं ये आप को भी पता है वो भी जानते हैं। कहते हैं झूठ बोलने से कोई खुश होता है तो झूठ बोलना अच्छा है।
                        चार साल पहले जब देश में सरकार बदली थी , आपने दो आशिकों की कहानी लिखी थी। आपको नहीं पता आजकल उनका क्या हाल है। आपसे मिले नहीं आमने सामने , केवल फोन पर बताई थी आधी अधूरी अपनी दास्तां। थोड़ा सच ज़्यादा झूठ था और आप भावुक लेखक समझे ही नहीं नाम तक बदले हुए थे। कुछ दिन जिस फोन नंबर से बात की थी मतलब को वो मतलब नहीं पूरा हुआ तो नंबर बदल लिया था। जैसे देश की सरकार के हालात हैं उनका हाल भी आपको अब पता चला है , घर से प्रेमी के साथ भागने वाली लड़की दो साल से अधिक समय तक लिविंग रिलेशनशिप के नाम पर पति पत्नी बनकर रही और आखिर घर वापस लौट आई है। महीना भर हुआ उसने शादी कर ली है किसी और के साथ , फोटो देखना चाहोगे। ये देखो उसकी वास्तविक नाम की फेसबुक से डाउनलोड की है , लंगूर के हाथ अंगूर मत कहना , ये अंगूर खट्टे हैं न मीठे हैं नकली हैं प्लास्टिक से बने हुए। जिस तस्वीर को आप सच समझते रहे वो कौन जाने किस खूबसूरत लड़की की थी। आपका बचपन का दोस्त कितना भोला है , इतनी सी बात पर हैरान हो गया था कि जिस दोस्त महिला की फोटो महिला दोस्त ने लाइक की तीसरी महिला दोस्त को कह रही थी कितनी बकवास फोटो लगाई है।
                                 जो आज तक आपके लिखने का मकमसद नहीं समझ पाया , आपको लेकर राय देता है कि आपको मंज़िल नहीं मिली। खुद अपने को समझते नहीं औरों को बताते वो कौन हैं। आप भगवान की बात लिखते घबराते नहीं हैं सवालात करते हैं मगर जो नास्तिक होने का दम भरते हैं धर्म की बातों को रटते रहते हैं बिना समझे ही। सच बोलने का साहस नहीं और निडर होकर लिख सकते नहीं उनको कैसे समझाओगे समाज को सच का आईना दिखलाना ही लिखने का मकसद है आपका। मैंने कहा समझ गया और आपको पहचान भी लिया। अब साफ साफ शब्दों में संक्षेप से बताओ मुझसे क्या चाहते हो। बताता हूं , झूठ महोदय कहने लगे , इस समय सभी नहीं तो अधिकांश लोग मेरी जयजयकार करते हैं। मेरी ही पूजा करते हैं मेरे ही भक्त हैं , फिर भी मेरा अर्थात झूठ के देवता का कहीं कोई भी मंदिर नहीं है। अगर अभी नहीं बना तो फिर कब बनेगा मेरा कोई घर या मंदिर मेरी महिमा के गुणगान को। आप ये काम करने में मेरी सहायता कर सकते हैं। मुझे आप पर पूरा भरोसा है। मैंने हंसकर कहा जनाबेआली मेरे पास दौलत नहीं ज़मीन नहीं , किसी से दान मांगना भीख मांगना आता नहीं मुझे। मंदिर बनाते ही दान जमा कर ही हैं। उसने कहा आपको मांगना नहीं आता मांगोगे भी नहीं जनता हूं , आपको केवल इस बात की घोषणा करनी है कि झूठ के देवता का घर बनाना है। मेरे भक्त खुद आकर आपको धन ज़मीन सोना चांदी दे जाएंगे। मैंने कहा शायद आपको भी मालूम है कि आपके चाहने वाले भक्त अनुयाई जो भी हों , दान आदि तभी देते हैं जब उनका नाम लिखवाया जाये दानी लोगों की सूचि में। आपको लगता है कोई अपना नाम झूठ के देवता का पुजारी होने की बात लिखवा शोहरत पाना चाहेगा। झूठ खिलखिला कर हंस दिया , कहने लगा कोई भी अपना नाम लिखने को नहीं कहेगा मगर चुपके से दानपेटी में खूब पैसा डाल जाएंगे सभी भक्त।
                             मैंने कहा मुझसे कोई बैर निकालना है दुश्मनी करने का इरादा है जो मुझे अपने जाल में फंसा रहे हो। मैं कैसे दिखाऊंगा कहां से आया धन झूठ के देवता का मंदिर बनवाने को। फिर ठहाका लगाया झूठ महोदय ने , मुझे हैरान देख कर कहने लगा अभी भी नहीं समझे आप। मेरा सब से बड़ा भक्त वही तो है जिस के हाथ शासन की बागडोर है। झूठ बोलने का इतिहास रचा है उसी ने और अभी कितने ऊंचे शिखर पर ले जाएगा मुझे ये मैं भी नहीं जनता। यूं भी देवी देवताओं का हिसाब कोई नहीं पूछता यहां और ये नेता जो कितने ही मंदिरों में कितना धन कहां से दे आये खुद नहीं जानते काला सफेद की बात केवल वोटों के समय करते हैं। कल ही साक्षात्कार में सत्ताधारी नेता ने कहा है स्विस बैंकों में पिछले साल डेढ़ गुना अधिक पैसा जमा होने पर कि वो सारा काला धन नहीं है। इससे बढ़कर इशारा क्या होगा। एक नंबर का आयकर चुकाया पैसा कौन देता है मंदिर को दान के लिए या धार्मिक आयोजन में खर्च करता है कोई। बहुत बार तो आयकर बचाने को ऐसा किया जाता है। भगवान देवी देवता काला सफेद धन नहीं देखते हैं और न कोई मंदिर या किसी धर्म का स्थल पैसों से ज़मीन खरीद कर बनाया जाता है। आप जहां खाली  जगह कीमती ज़मीन सरकार की पड़ी दिखाई दे मेरे नाम का बोर्ड लगवा दो और शुरू करो सब लोग खुद -ब -खुद आएंगे सहयोग देने। कोई भी सरकार कोई भी दल कोई उद्योगपति कोई धनवान कोई मीडिया वाला कोई शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का कारोबारी झूठ का विरोध करने का साहस नहीं कर सकता है। उनका धंधा बिना मेरे सहारे चलता ही नहीं है। उन सभी की भलाई है मेरा मंदिर बनने में ताकि मेरे द्वार आकर मनचाही मुराद मांग सकें। सभी मन से आत्मा से मुझी को मानते हैं मेरी पूजा करते हैं। मेरा विरोध करने वालों के लिए आजकल कोई जगह नहीं बची है।

         सोच रहा हूं झूठ का इक मंदिर बनवा ही दूं , साथ दोगे आप।


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