Wednesday, 18 April 2018

हसरत ही रही ( अधूरा ख़्वाब ) डॉ लोक सेतिया

       हसरत ही रही ( अधूरा ख़्वाब ) डॉ लोक सेतिया 

अकेला चला जा रहा था ,
राह में मिले कुछ लोग ,
वही पुरानी पहचान थी , 
वही बचपन की बातें हुईं। 
उन्हें भी गांव ही जाना था ,
रास्ता कब कैसे कट गया ,
पैदल चलते चलते नहीं पता ,
कोई थकान नहीं थी किसी को। 
घर की गली में आते याद आया ,
किसी जगह जाना था सभा में ,
थोड़ा समय अधिक हो गया था ,
सोचा पहले मां से मिलता हूं। 
दिल में इक हसरत थी उठी ,
आज अपनी झाई ( मां ) से ,
पांव छूने की जगह पहले जाते ,
कस कर लगना है मुझे गले। 
याद नहीं आता मुझे कभी भी ,
हुआ होगा ऐसा वास्तव में ,
सोचा भी नहीं लगता अजीब ,
दरवाज़ा खोला गया करीब। 
सब अपनों से राम राम हुई ,
रसोई में बना रही थी मां कुछ ,
बाहर से खुशबू आ रही थी ,
सुनाई दिया स्वर मां गा रही थी। 
गले मिलता पांव छूकर तभी ,
पास जाता अपनी मां के करीब ,
नींद खुली अधूरा रह गया ख़्वाब ,
हसरत दिल की हसरत ही रही। 
कितने बरस बीत गए इस बीच ,
दुनिया से चली गई मां भी ,
बचपन कहां अब बुढ़ापा है ,
नहीं उस गली गांव से नाता है।

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