Thursday, 14 September 2017

आप कहलाते भगवान , किसलिये परेशान ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

आप कहलाते भगवान , किसलिये परेशान ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

           मुझे रात भर नींद नहीं आई , उनकी ही चिंता सताती रही। आप तो सब को करोड़पति बनाने में लगे हैं आशावादी सपने बेचते हैं और आप ने कहा आपको इस इत्तर की बहुत ज़रूरत है अपनी नकारात्मकता को मिटाने के लिए। इक साधु ने इक राजा से कहा आपसे क्या मांगना आप तो खुद खुदा के सामने झोली फैलाये खड़े थे। मुझे इक ग़ज़ल याद आ गई। आप क्यों रोये जो हमने दास्तां अपनी सुनाई , तबाही तो हमारे दिल पे आई , आप क्यों रोये। न ये आंसू रुके तो देखिये फिर हम भी रो देंगे , हम अपने आंसुओं में चांद तारों को डुबो देंगे। फ़ना हो जाएगी सारी खुदाई , आप क्यों रोये। हुआ ये कि हमारे हरियाणा से एक शख्स गया था भाग लेने और उपहार ले गया था इत्तर का जिस से उनके कहे अनुसार नकारात्मकता नहीं रहती घर में। ये इत्तेफाक है कि कल हिंदी दिवस था और अमिताभ जी ने बच्चन जी की मधुशाला की पंक्तियां सुनाई थी। बच्चन जी की कविता जीवन भर संघर्ष की बात समझाती है उसे भूल गए , कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती से भी बात नहीं बनी जो अब नकली उपाय करने को सोचने लगे। हिंदी दिवस कल मनाया गया और सभी हिंदी को चाहने वाले हिंदी का गुणगान करते रहे और सोचते रहे कि इस दिन तो हिंदी की बदहाली की बात नहीं की जाये। चलो आज तो कर सकते हैं , तो यही विचार किया जाये हर साल हिंदी दिवस मनाने से क्या हुआ है। महिला दिवस मनाकर क्या मिला , बाल दिवस , शिक्षक दिवस और मज़दूर दिवस ही नहीं , गणतंत्र दिवस मनाने से क्या मिला जनता को। अमिताभ जी को तो सब से पहले लोगों ने बाबू मोशाय के रूप में पसंद किया था जो मानता है कि मौत तू इक कविता है। अब तो आप शिखर पर हैं फिर भी घबरा रहे हैं। ये जो डियो बेचने वाले हैं दुर्गन्ध को छुपाते हैं सुगंध नहीं फैलाते। कुछ समझे क्या। खुशबू चाहते हैं तो चंदन बनिये और सांपों के लिपटने से नकारात्मक नहीं होईये। आपके घर में सब है बाहर क्या तलाश रहे हैं। इक गीत रफ़ी जी का बाज़ार में नहीं आया किसी कारण आपको पता होगा फिर भी याद दिलाना चाहता हूं। 

अभी साज़े -दिल के तराने बहुत हैं ,

अभी ज़िंदगी के फ़साने बहुत हैं। 

दरे -गैर से भीख मांगों न फन की ,

जब अपने ही घर में खज़ाने बहुत हैं। 

             अकेले आप ही नहीं वो भी बेहद परेशान हैं जो देश में सब से अधिक बहुमत पाकर सत्ता में हैं। जब सभी जुमले लगने लगे बेअसर होते जा रहे हैं तब इक खिलौना लाने की बात कर रहे हैं। बच्चों की रेलगाड़ी की तरह दो शहरों को इक बुलेट ट्रैन से जोड़ा जायेगा और बता रहे यही युवा वर्ग को सही जगह पंहुचा सकती है। अच्छे दिन तो घोषित किया जा चुका है कि इक चुनावी जुमला था , अच्छे दिन कोई होते ही नहीं हैं। कभी बाद में बुलेट ट्रैन की बात को भी हवा में उड़ा देंगे तो क्या करोगे। किसने सोचा था समय इतनी तेज़ गति से गुज़र जाता है सत्ता वालों का कि वादे गिनने तक की फुर्सत नहीं मिलती। मेरी धर्मपत्नी मुझे समझा रही हैं मोदी जी से ड्रेसिंग सेंस सीखनी चाहिए। उनको कौन बताये हम लोगों के पास करोड़ों रूपये हों कैसे इतनी महंगी शानदार पोशाकें खरीदने को। ये तो अमिताभ बच्चन जी भी नहीं कर सकते जो दो मिंट के विज्ञापन करने के करोड़ों रूपये लेते हैं। कहीं उनकी निराशा का कारण यही तो नहीं , उनकी शान उनकी शोहरत उनकी भक्ति ने उनको हीनभावना का शिकार कर दिया हो। तभी शायर कहते हैं , बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फासला रखना , जहां दरिया समंदर से मिला दरिया नहीं रहता। या फिर ये शेर भी है , शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है , जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है। अपना तो साफ फ़लसफ़ा है। 

                नहीं कुछ पास खोने को , रहा अब डर नहीं कोई ,

                 है अपनी जेब तक खाली , कहीं पर घर नहीं कोई।

                     ( डॉ लोक सेतिया "तनहा ")


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