Tuesday, 12 September 2017

दूरदर्शी सीधा प्रसारण ( महाभारत भी रामायण भी ) डॉ लोक सेतिया

दूरदर्शी सीधा प्रसारण ( महाभारत भी रामायण भी ) डॉ लोक सेतिया 

            उनको लगा अब तो खुद अपनी आंखों से देश का हाल देखना चाहिए। टीवी पर तो हर दिन उसी की महिमा दिखाई देती है। अपनी आंखों से गांधारी जैसी बांधी हुई पट्टी खोल कर विदुर की दिव्य दृष्टि से देश और जनता की बेहतर हुई हालत देखनी चाहिए। सवाल किया महात्मा जी बताओ स्वच्छ भारत कितना सुंदर लगता है। जवाब मिला स्वच्छ भारत तो टीवी पर इश्तिहार ही रह गया है और देश भर में गंदगी पहले जैसी क्या और भी अधिक हो गई है। जिस जिस जगह स्वच्छ भारत के पोस्टर लगे हैं हर उस जगह ही कूड़ा और गंदे पानी की बदबू से बुरा हाल है। स्वच्छता की परिभाषा बदलनी पड़ेगी ताकि जितना धन खर्च किया गया उसको उचित बताया जा सके। किसी ने स्वच्छता उप कर का हिसाब मांगा तो बताया गया कोई हिसाब नहीं है , हिसाब ही नहीं देंगे तो कोई गड़बड़ की बात कैसे कहेगा। 
          चलो और कोई सवाल करो अब , अच्छा बताओ मेक इन इंडिया से क्या क्या हुआ। मेक इन इंडिया तो खो गया कहीं मगर अब जापान से बुलेट ट्रैन बनवा रहे हैं। इक विदेशी के साथ मिलकर सड़क पर तमाशा दिखला रहे हैं , आधे घंटे के सफर की खातिर करोड़ों खर्च कर नौ किलोमीटर की सड़क को खूब सजा रहे हैं। लोग भूखे हैं और सत्ता वाले जनता का धन बेकार के आयोजनों पर उड़ा रहे हैं। 
         चलो ये बताओ सब की समानता कितनी हो चुकी है। सब आज़ादी का लाभ पा रहे हैं। मत पूछो देश को किस दिशा को ले जा रहे हैं। हर संस्था की धज्जियां उड़ा रहे हैं , उनकी बताई धुन सभी विवश हो गा रहे हैं। विपक्ष की बात नहीं सुनाई देती सत्ता वाले इतने ऊंचे स्वर में चिल्ला रहे हैं। हंसना रोना दोनों उनकी मर्ज़ी से , खुद हंस रहे बाकी सब को रुला रहे हैं। 
         ये तो बताओ उनके साथ जो पितामह हैं क्या उनको नहीं राह दिखला रहे हैं। उनकी अपनी हालत ऐसी हुई है न मर ही सकते न जी पा रहे हैं। शायद अपनी भूल पर मन ही मन पछता रहे हैं। धर्मयुद्ध नहीं अधर्मयुध है राजनीति , नए नए सबक लिखे जा रहे हैं। रामायण लिखने वाले सोचने लगे हैं , महाभारत क्या है समझने लगे हैं , गीता के अर्थ खोजने लगे हैं। इधर कौन क्या है क्या नहीं है कहीं पर सब कहीं कुछ नहीं है। जहां आस्मां था वहां अब ज़मीं है , ज़मीं पर आजकल कोई नहीं है। अभी तो न जाने क्या क्या है होना , जिन्हें आम मिले हैं खाने को , चाहते हैं अब वही बबूल ही बबूल सब जगह बोना। फूल और गुलदस्ते तो हैं सोशल मीडिया पर भेजने को , हर कोई सबकी राह में बिछाता है कांटें ही कांटे। 
         ( अचानक सरकार को खबर हो गई इसकी और नेटवर्क जैम कर दिया गया है )

             अभी कथा जारी है , आप जाईयेगा नहीं , थोड़ा अंतराल लेना है



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