Sunday, 6 August 2017

मेरे दोस्त और मेरे लिए दोस्ती ( दिल की बात ) डॉ लोक सेतिया

  मेरे दोस्त और मेरे लिए दोस्ती ( दिल की बात ) डॉ लोक सेतिया 

     यही मेरी कहानी है , दोस्ती मेरे लिए जीना है सांस लेने की तरह।  मैं ये बहुत गंभीरता से मानता हूं कि खुश रहने को सब से अधिक ज़रूरत अच्छे और सच्चे दोस्तों की है। वो लोग सब से खुशनसीब और दौलतमंद होते हैं जिन के पास उनके दोस्त होते हैं। मेरा तो पूरा लेखन ही किसी न किसी रूप में दोस्ती से जुड़ा हुआ है। मैं अपनी ग़ज़ल अपने कविता और कहानी तो क्या व्यंग्य से भी दोस्ती शब्द को निकाल दूं तो बाकी शेष खाली पन्ने रह जायेंगे। दोस्ती फिल्म का गीत मुझे पसंद है , चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे , मैंने उसे अपनी मुल्तानी भाषा में भी बदल कर गाया है बार बार सुनते हैं सभी। 

                  चाहसां तां मैं तेकूं तत्ते वेले ठढे वेले

बहुत गीत हैं दोस्ती पर , कुछ शायद लोग भूल भी गए  हैं जो सच्ची दोस्ती की परिभाषा थे। एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तो ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तो। लोग अक्सर दोस्तों की बेवफाई की बात किया करते हैं मुझे ये कभी भी उचित लगा नहीं। मैं तो सभी दोस्तों का सदा आभारी महसूस करता हूं जो मुझे दोस्त बनाने के काबिल समझा। दोस्त या प्यार करने वाला कोई हो कोई उसकी बुराई कैसे कर सकता है। 

                    किसी को बेवफा कहना मुझे अच्छा नहीं लगता ,

                    निभाई थी कभी उस ने भी उल्फत याद रखते हैं। 

आज मुझे कुछ दोस्तो को याद करना है और सब से मिलवाना है , और उन से कहना भी है कि आप शायद नहीं जानते आपकी दोस्ती मेरी इबादत की तरह है। बेशक पास हों अथवा दूर या चाहे कुछ दोस्त अब इस दुनिया में भी नहीं हैं तब भी मैंने उनको अपने अंदर ज़िंदा रखा हुआ है। कुछ बेहद दिल के पास हुए दोस्त ये हैं। 
डॉ बी डी शर्मा , भूपिंदर दत्त , भूपी। मेरी जान मेरा दोस्त कविता , साया कविता उसी की है। 
पंद्रह साल पहले दुनिया से चले गए यार। 
जुगिन्द्र मुंजाल स्कूल से साथ रहे , फिर दिल्ली में भी मिलते रहे और आजकल दोबारा आ गए हैं शहर में। 
सुरिंदर विज बहुत ख़ास रहे हैं , दिल्ली में हैं।  आजकल बात नहीं  हुई फोन नंबर बदल गया है। 
रूप देवगुण जी से बेहद गहरा संबंध है , दोस्त भी हैं हैं लेखन में भी अक्सर मेल जोल होता रहता है। 
जवाहर ठक्क्र ज़मीर भी बहुत साल रोज़ मिलते रहे और घंटों बातें की।  फोन पर भी जब कुछ लिखा इक दूजे को सुनते थे। इन दिनों चंडीगढ़ में हैं और अस्वस्थ्य हैं इसलिए दूरी मीलों की है दिलों की नहीं। 
सुशील मानव जी से भी बहुत बातें होती रही हैं और अच्छा संबंध रहा है। राजेश अरोरा भी बहुत प्यारे दोस्त हैं जो साहित्य से जुड़े हैं और डाकघर  काम करते हैं। मधुर स्वभाव है उनका। कवि हृदय हैं। 
विजय मेहता जी से तब से याराना है जब से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा।  बहुत स्थानीय लोग मुझे पहचानते ही उनकी सांध्य दैनिक अख़बार के माध्यम से ही हैं। भले इस बात से मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता फिर भी विचार आता है कि काश उनको मेरी पहचान इस से आगे की होती।  
आपको  भी बहुत दोस्त मिले होंगे जो आपको अपना रकीब समझते होंगे , अर्थात आपसे मुकबला करते हों। 
मुझे उन से भी बहुत मिला है और मैंने उनसे  भी सिर्फ दोस्ती की है बड़ा छोटा होने समझने की आदत ही नहीं। लोग हज़ारों दोस्त बनाये हुए हैं मगर मुझे बस कुछ ही दोस्त पसंद रहे हैं। 
सब से पहला नाम आता है सुमन वर्मा चड्ढा जी का , क्योंकि जब मैंने अपनी फेसबुक बंद रखी तब उन्हीं ने किसी तरह मेरा फोन नंबर पता कर पूछा था क्या बात है। परिवार की सदस्य जैसी हैं मेरे लिए। 
रघुविंद्र यादव , संजय तनहा , विकेश निझावन , सुभाष अरोरा , सुनीता अग्रवाल नेह सुनीता , हरभगवान चावला , जैसे दोस्त मिले हैं सोशल मीडिया पर भी। और भी नाम हैं जो अभी याद धूमिल होने से रह गए हैं। कुछ इन में से की तस्वीर ये हैं।  



















1 comment:

sushilmanav said...

Thank you doctor saab. I cherish your friendship...