Tuesday, 15 August 2017

गंदी बातें लगती हैं अच्छी ( बेबाक ) डॉ लोक सेतिया

     गंदी बातें लगती हैं अच्छी ( बेबाक ) डॉ लोक सेतिया 

         काजल की कोठड़ी में कितना भी स्याना जाए दाग़ लगता ही लगता है। नहीं ये सियासत की बात नहीं है। जिस का भूत हर किसी पर सवार है आज उसकी बात करनी है। डर भी लगता है आजकल लोग सवाल करने वाले को ही सवाल के कटघरे में लेकर उसकी हालत खराब कर देते हैं। मेरे ब्लॉग पर आज भी जो चार पोस्ट रोज़ सब से अधिक पढ़ी जाती हैं वो , रसीली - कहानी इक जिस्म फरोश की और इसी तरह की हैं। ये अलग बात है कि पढ़कर उनको जो सोचते हैं वो नहीं मिलता पढ़ने को। मगर जब वो कहानी मैंने लिखी थी वास्तविकता जानकर इक अपना जिस्म बेचने वाली महिला की उसकी दर्दनाक मौत के बाद भूख से तब इक मैगज़ीन के संपादक का खत मिला था मुझे लताड़ता हुआ। और फिर मैंने उसको कहीं और नहीं भेजा छपने को। लगा मैं घोर पापी अपराधी समाज को गलत रास्ता दिखला रहा हूं , मगर उसमें ऐसी कुछ नहीं था आप पढ़ सकते हैं। आज जो बात कहनी है वो फेसबुक सोशल मीडिया टीवी शो फ़िल्मी सितारों और कला संगीत सभी को लेकर है। विज्ञापनों के मॉडल से कॉमेडी करने वालों तक सभी की बात है। 
     पांच साल पहले करीब ब्लॉग पर लिखना शुरू किया और फिर फेसबुक पर शामिल हुआ। बार बार लिखा भी कि दोस्ती मेरा सब कुछ है और लिखना मेरा जुनून भी इबादत भी है। दो ही मकसद थे फेसबुक पर आने के। तीन साल पहले देखा लोग फेसबुक की पोस्ट ही नहीं ब्लॉग से दिए लिंक को भी खोलकर पढ़ते थे। बात भी अच्छी हुआ करती थी। मगर आजकल साफ पता चलता है कोई नहीं पढ़ता अच्छी बात को सब को गंदी बात करना पसंद है क्योंकि गंदी बात से आपको मनोरंजन मिलता है जब कि अच्छी सच्ची बात आपको झकझोरती है। आजकल हर कोई फेसबुक व्हाट्सएप्प जैसे माध्यम पर है , मगर हर अच्छी चीज़ भी सीमा से अधिक नुकसानदेह होती है। मैं आयुर्वेद का डॉक्टर होने से दो बातें समझता हूं इक समस्या या रोग के लक्षण नहीं उसकी जड़ को समझना और दूर करना लाज़मी है और दूसरा जो अच्छी वस्तु हैं वो भी नासमझी से खराबी करती हैं। शहद भी अच्छा है और शुद्ध देसी घी भी , मगर इन दोनों को समान मात्रा में मिलाकर खिलाओ तो ज़हर का काम करती हैं। इधर तमाम लोग दवा के नाम पर ज़हर ही देते हैं। आओ मुद्दे की बात पर चर्चा की जाये। 
                समाज में महिलाओं के साथ अनाचार की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। लोग क्या करते हैं कैसे हैं दो दिन पहले की बात है इक महिला और उसका पति दोनों लिखते हैं फेसबुक बनाई इक साथ। दोनों की फेसबुक पर युगल की तस्वीर लगाई हुई थी। कुछ ही घंटों में महिला को दो सौ रिक्वेस्ट मिली और पुरुष को दो चार ही। और जिनको दोस्त बनती गई तमाम चैट  पर रोकने पर भी मैसेज करने लगे और शाम तक आंटी जी मैडम जी कहने वाले आशिकी की बातें करने लगे। बस यही देखकर और बनाये दोस्तों को हटाकर उन दोनों ने अपना अकाउंट बंद ही करवा दिया। हैरान थे क्या हमारा समाज इतना खराब हो गया है कि छिपी गंदी मानसिकता को बाहर आने में ज़रा भी देर नहीं लगती। टीवी शो को देखो तो लगता है संगीत का पावन माहौल भी एंकर किसी महिला से झूठी आशिकी की छेड़ छाड़ से दूषित कर रहा है। कॉमेडी शो में हर कोई दिल फेंक आशिक बना मंच पर दिखाई देता है। महमान कलाकार शो चलाने वाला और कोई जो अनावश्यक रूप से हिस्सा है वो भी अपनी गरिमा को भूल कर हर महिला को रिझाता हुआ वा दर्शक भी अवसर मिलते ही यही करने को बेताब। टीवी पर विज्ञापन देने वाले पैसे की चाह में किस सीमा तक समाज को प्रदूषित करते हैं। जब हर तरफ यही नशा है तब नतीजा क्या होगा। 
         कुछ लोग समझते हैं वो जो भी छुपकर करते हैं किसी को खबर नहीं होती।  भगवान की बात छोड़ो कौन डरता है भगवान से , उसे तो सोचते हैं मना लेंगे माफ़ी मांगकर अपराधों की या और तरीके पंडित मौलवी उपदेशक बताते हैं। मगर वास्तव में बच्चे देखते हैं बड़ों को क्या हो गया है जो सब काम छोड़ देते फेसबुक व्हाट्सऐप पर बात नहीं छूटती है। इक चमक दिखाई देती है बहन को बड़ी बहन के चेहरे पर और उसको पता चल जाता है ये खिला रंग रूप आशिकी का है। कोई महिला अपना दिल बहलाती है जब किसी से रात दिन बातें कर तब उस अकेली तलाक ले चुकी औरत की बेटी समझती है सब मगर कैसे समझाए अपनी नासमझ मां को कि जिसे अपना आशिक समझती उसका इरादा क्या है। मनोरंजन स्वस्थ होना चाहिए , फूहड़ बातों पर हंसिए नहीं झल्लाहट होनी चाहिए अगर आपकी मानसिकता सही है और उसे सही रखना भी है। बस इस पागलपन ने बहुत कीचड़ फैलाया हुआ है। इक दलदल है ये सब। दलदल से निकलना बहुत कठिन है , कोई आपको खींच कर बाहर नहीं निकालने वाला , वापस खींचने वाले तमाम लोग हैं। संभल जाओ इक अंधी सुरंग में जाते जा रहे जिस का अंत कहीं नहीं है , कोई रौशनी आगे आखिर तक नहीं है।


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