Wednesday, 2 August 2017

गंधारी की संतानें ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

           गंधारी की संतानें ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

             ( बात सत्ता से लेकर साहित्य और सोशल मीडिया की )

पहली बात 
आप नेता हैं या अधिकारी , कहते हैं जनता और देश के सेवक हैं। आपकी मर्ज़ी जब चले आते हैं जिस भी जगह जैसे भी आपकी सुविधा हो अपना गुणगान करने को। टीवी पर बोलते हैं तो हमें खामोश होकर सुनना ही है , आपके अखबारी बयान और इश्तिहार भी पढ़ना मज़बूरी है। मगर आप जब हमारे पास गली में गांव में बस्ती में शहर में आकर डंका पीटते हैं कि हमने क्या क्या कर दिया है , तब कोई आपको चाहता बतलाना कि हक़ीक़त क्या है तो उसे भगा देते हैं। आप को लगता है उसने रंग में भगं डाला है। सच दिखाना झूठ को झूठ कहना अपराध हो गया है। आपको लगता है आपने जो जो अनुचित किया अथवा उचित किया नहीं या जो करने की बात करते वो वास्तविकता में नहीं हुआ तब आपकी शिकायत आपके अपराध की बात भी आप ही को पास जाकर आपसे समय मांग कर आप को ही विनती के रूप में देकर उपकार की तरह आपसे रहम करने को कहे। शासक बनकर रहना जानते हैं आप लोग सेवक नहीं बन सकते , जबकि हैं सेवक ही। सेवक अपने मालिक को हड़काता है क्या यही लोकतंत्र कहलाता है। 
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दूसरी बात 
बड़ी बड़ी बातें लिखते हैं सोशल मीडिया पर खुद को समझते हैं समाज की बात कर रहे हैं। किसी नेता को मसीहा बताते हैं और गुणगान करते हैं उस जैसा न कोई हुआ न कभी होगा। आपको कोई कहता  है आपको मालूम भी है देश में क्या हो रहा है। आप शहर में अपने घर में बैठे समझते हैं टीवी अख़बार फेसबुक व्हाट्सएप्प पर दुनिया देख ली है। कभी आस पास देखते तो ज़रूर आपको गरीबी भूख और गंदगी ही नहीं तमाम अवैध धंधे होते नज़र आते। जो मुझे नज़र आता सरकारी लोगों को बार बार बताने पर  क्यों दिखाई देता नहीं। अनधिकृत कब्ज़े , लोग गली गली जाकर मौत का सामान बेचते हैं। कल ही मिले कुछ लोग शिक्षा पांचवी फेल और डॉक्टर बनकर आयुर्वेद की दवा के नाम पर ठगते फिरते हैं। सब रोग को ख़त्म करने की बात कहते हैं , भोले भले लोग झांसे में आ जाते हैं। नियम कानून की बात पर कहते हैं कौन नियम कानून मानता है। कल ही टीवी पर देख शर्मसार हुआ कि पढ़ेगा तो बढ़ेड़ा इंडिया की असलियत क्या है। किसी गांव में स्कूल सार्वजनिक शौचालय में लगता है और पूछने पर अधिकारी महिला जवाब देती है कि ठीक है मगर उस शौचालय का उपयोग उस तरह कभी किया नहीं गया। असंवेदनशीलता की हद है। 
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तीसरी बात 
अध्यापक को स्कूल में देखा बच्चों को पढ़ाते हुए भी फेसबुक मेसेंजर व्हाट्सएप्प पर मस्ती करते। ध्यान किधर है और क्या सिखला रहे हैं बच्चों को पागलपन। यही हाल पुलिस का देखा सरकारी दफ्तर का देखा। फेसबुक की बात समझना बहुत दुश्वार है। मैंने अपनी अलग अलग फेसबुक से लोगों से बात की तो वही लोग अपना सब दूसरा ही बताते दिखाई दिए। किसी ने तो अपनी जन्म तिथि भी दूसरी बताई। इक महिला को किसी समस्या पर राय लेनी थी तो बात बात में उसने बताया कि कोई उसका फेसबुक दोस्त सवाल कर रहा किस से बात कर रही हो। आपको अपने रिश्तों पर ऐतबार ही नहीं तो कैसा नाता है। महिलाओं की इक आदत की बात प्रचलित है कि उनके पेट में बात पचती नहीं है। मैंने ये नहीं देखा था पहले , बल्कि मुझे अधिकतर महिलाओं में बहुत लोगों के राज़ छुपाने की आदत को देखा ताकि ज़रा ज़रा सी बात पर हंगामा नहीं हो। जबकि पुरुषों को महिलाओं की बात को बढ़ा चढ़ा डींग हांकते देखा है। आपकी निजता की बात ये नहीं कि आपके कोई काम करने से किसी को क्या मतलब है , जब आप दिन भर चैट पर हल्की फुल्की बातें करोगे और अपनी नौकरी या कारोबार करते समय यही करते हैं तब आपकी बेटी बेटा छात्र या आम लोग जो आपके पास उचित काम से आएं हैं उनको अनावश्यक इंतज़ार भी करना होगा और लापरवाही की कीमत भी उन्हीं को चुकानी होगी। 
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चौथी बात 
आप अपना काम नौकरी जो भी करते हैं , अपने लिए बहुत किया होगा। घर बनाया बच्चे पैदा कर उनकी परवरिश की और धन दौलत जमा किया। मगर देश और समाज के लिए कोई दायित्व है कभी समझा और निभाया। किसी नेता के भक्त नहीं बनिये किसी उद्योगपति की नकल नहीं करिये , किसी अभिनेता या खिलाडी को आदर्श नहीं बनाइये , खुद को अपना आदर्श बनाओ कुछ सार्थक करिये। जीवन मनोरंजन करने मौज मस्ती करने या सुख सुविधा पाने का नाम नहीं है। और न ही इस गलतफ़हमी में जियो कि आपके बाद आपको कोई याद करेगा अथवा नहीं। बस खुद की संतुष्टि को कुछ तो बिना स्वार्थ करें देश और समाज की खातिर। जो भी करना हो इक बात को अपनाकर सच बोलना और आंखे खोल कर देखना ज़रूरी है। 
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बाकी बहुत बातें हैं , कभी फिर सही ,,,,,,,,,,,

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