Thursday, 31 August 2017

ग़ज़ल 223 - उन्हें कैसे जीना , हमें कैसे मरना - डॉ लोक सेतिया " तनहा "

        ग़ज़ल 223 - उन्हें कैसे जीना , हमें कैसे मरना 

                                डॉ लोक सेतिया  " तनहा "

उन्हें कैसे जीना   ,  हमें कैसे मरना ,
ये मर्ज़ी है उनकी , हमें क्या है करना।

सियासत हमेशा यही चाहती है ,
ज़रूरी सभी हुक्मरानों से डरना। 

उन्हें झूठ कहना , तुम्हें सच समझना ,
कहो सच अगर तो है उनको अखरना। 

किनारे भी उनके है पतवार उनकी ,
हमें डूबने को भंवर में उतरना। 

भला प्यास सत्ता की बुझती कहीं है ,
लहू है हमारा उन्हें जाम भरना। 

कहीं दोस्त दुश्मन खड़े साथ हों , तुम ,
नहीं भूलकर भी उधर से गुज़रना। 

सभी लोग हैरान ये देख " तनहा "
हसीनों से बढ़कर है उनका संवरना।

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