Friday, 18 August 2017

ग़ज़ल 222 ( इन बेज़मीर लोगों के किरदार मत लिखो ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

      ग़ज़ल 222 ( इन बेज़मीर लोगों के किरदार मत लिखो )

                                डॉ लोक सेतिया " तनहा "

इन  बेज़मीर लोगों के किरदार मत लिखो  ,
बेदर्द शासकों को यूं अवतार मत लिखो। 

मारे गये सभी लोग ,  बस ऐतबार कर   ,
आईन देश का क्यों गया हार मत लिखो। 

सच झूठ ,झूठ सच , आज सब लोग जानते ,
झूठे बयान देती ये सरकार मत लिखो। 

मत पूछना हुआ क्या वो वादा बहार का ,
उनके फरेब की बात सौ बार मत लिखो। 

संतान शासकों की , खुली छूट है मिली ,
उनके गुनाह सब माफ़ , बदकार मत लिखो। 

उनसे सवाल क्या , और उनके जवाब क्या ,
कब कौन कर रहा क्या व्यौपार मत लिखो। 

सब चोर कह रहे , बन गये हम शरीफ हैं ,
"तनहा" इसे किसी का इश्तिहार मत लिखो।





No comments: