Tuesday, 18 July 2017

मैं साकी भी मैं सागर भी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    मैं साकी भी मैं सागर भी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

साकी ने प्यासे से नहीं पूछा मयकदे में ,
धर्म जाति या किस देश के वासी हो ,
सुराही ने पैमाने को भरते नहीं सोचा ,
मैं सोने की पीतल की जाम है कांच का।
किसी पीने वाले ने समझी नहीं प्यास ,
कितनी है साकी के मन की सुराही की ,
भीतर कितनी रही है अधूरी हमेशा ही ,
जाम भी नहीं बुझा सके अपनी प्यास। 
नदी से नहीं पूछा सागर ने नाम पता ,
मैली है या साफ़ है नहीं डाली नज़र ,
बाहें फैला कर सब नदियों को अपनाया ,
लेकिन सागर का खारापन कहां मिट पाया। 
मेरा नाम मुहब्बत है ईमान है इश्क़ ,
हर आशिक़ मेरे पास चाहत ही लाया ,
कब कौन किस मोड़ तक साथ रहा है ,
जब रात अंधेरी थी नहीं पास रहा साया। 
मैं फूल हूं खुशबू ही लुटाता मैं रहा हूं ,
हर हुस्न को हर दिन सजाता मई रहा हूं ,
मैं बारिश नहीं बस ओस की बूंद हूं मैं ,
सर्दियों को तुम धूप बुलाता मैं रहा हूं। 
परिंदा बैठा कभी मंदिर मस्जिद कभी ,
इंसानों को रास्ता भी दिखाया है मैंने ,
मुझको पिंजरे में कैद नहीं करना तुम ,
आज़ादी का परचम लहराना है मैंने।

1 comment:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " "मैं शिव हूँ ..." - ब्लॉग बुलेटिन
, मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !