Wednesday, 7 June 2017

भगवान धर्मराज की अदालत में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

               भगवान धर्मराज की अदालत में ( व्यंग्य )

                                  डॉ लोक सेतिया

सोचा ही नहीं था उसने , उसको तो लोग भगवान का दूसरा रूप ही मानते हैं , इक दिन उसे भी धर्मराज की अदालत में कटघरे में खड़ा किया जायेगा। और हिसाब लिया जायेगा अपने सारे कर्मों का , अपने हर कर्म को उम्र भर उचित ही माना है उसने। भला भगवान से कोई पूछता है उसने कुछ सही किया गलत किया , धरती पर तो उसको हर जगह विशेषाधिकार मिलते थे। न्याय करने की हर सरकारी जगह उसको न्याय देने वाला अपने बराबर कुर्सी पर बिठाया करता था , आखिर उसको भी मालूम ही होता था डॉक्टर की ज़रूरत कभी भी पड़ सकती है। हर कोई उसको हाथ जोड़ नमस्कार किया करता था सब जगह। धर्मराज ने पहला सवाल यही किया हे मनुष्य तुमने क्या क्या उचित कर्म किये क्या क्या अनुचित क्या याद हैं। डॉक्टर की आत्मा ने जवाब दिया मुझे अच्छी तरह याद है मैंने हमेशा बहुत अच्छे काम ही किये हैं , मैंने कितने लोगों की सेवा की है उनको रोगमुक्त किया है। धर्मराज बोले वह करना तो आपका कर्तव्य था आपने उस सब के लिए वेतन लिया सरकार से या फिर अपने हॉस्पिटल में अपनी फीस ली। मगर क्या आपने बदले में वही किया जो ईमानदारी पूर्वक आपको करना चाहिए था। आपने इक शपथ भी ली हुई थी , और आपने जाने क्या क्या तख्ती लगा रखी थी अपने बारे में अपने यहां उपलब्ध सेवा को लेकर ही नहीं ईश्वर की मूर्ति तस्वीर और बड़ी ऊंची आदर्शवादी बातें लिख कर। आप जो होने का दावा कर रहे थे क्या आप वही थे वास्तव में , आप कोई अनपढ़ नहीं थे अनजान नहीं थे पढ़े लिखे जानकर थे और खूब समझते थे अच्छा क्या है और बुरा किसको कहते हैं। आप की कहानी आपको फिर से याद दिलानी है ताकि आपको पता चले कि आज यहां आपको वास्तव में इंसाफ दिया जाना है आपके अच्छे और बुरे सारे कर्मों का हिसाब देखकर। और इक बात और समझ लो इस अदालत में ऐसा नहीं किया जाता कि अच्छे कर्मों का ईनाम जमा किया और बुरे का क़र्ज़ नाम लिखा और उसके बाद गणित लगाया क्या बचता है खाते में बनिये वाली बही की तरह। यहां अच्छा किया उसके अलग हिसाब और जो बुरा किया उसका अलग हिसाब किया जाता है। आपने जो किया संक्षेप में बताता हूं क्योंकि बाकी आप भी समझ सकते हो। 
                        आप डॉक्टर बन गए और सरकारी हॉस्पिटल में नौकरी मिली आपको , आप कभी समय पर हॉस्पिटल नहीं पहुंचे , आपने हॉस्पिटल जाने से पहले घर पर न केवल अनुचित ढंग से रोगी से पैसे लिए इलाज करने को बल्कि आपने तमाम लोगों से ऑप्रेशन की फीस भी वसूली जब कि आप सरकारी डॉक्टर थे। हैरानी की बात है कि तब भी आप मंदिर जाकर धार्मिक होने का दावा किया करते थे। आपने अपनी ड्यूटी अपने बड़े अधिकारी से मिलकर उस विभाग में लगवाई जिस में पुलिस केस वाले लोग आते और आप रिश्वत लेकर उनकी मर्ज़ी की रिपोर्ट लिखा करते थे। आपको वो सब करना कभी गलत नहीं लगा , रात को आपकी ड्यूटी होती तो आप अपनी जगह नहीं मिलते बल्कि कहीं जाकर सोया करते और आपकी जगह कोई चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी रोगी देख उनके स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया करता था। आपने इस तरह काली कमाई कर बहुत धन जमा कर लिया और फिर अपना निजि हॉस्पिटल बना लिया। आपने कभी किसी देश के कानून का आदर नहीं किया , अपना हॉस्पिटल भी आपने हर कायदे कानून की अवेहलना कर बनाया। आपने सड़क और फुटपाथ पर अनधिकृत कब्ज़ा किया अपने सामान को अपनी जगह में नहीं रख कर बाहर रखा। आपने बिना पूरी व्यवस्था किये गंभीर रोगियों के इलाज का दावा किया जबकि आपके पास उपचार का पूरा प्रबंध नहीं था। आपने अप्रशिक्षित लोग रख स्वास्थ्य सेवा के नाम पर रोगियों की जान को खिलौना समझ केवल पैसा बनाने को जो भी किया आप जानते हैं वो कितना गंभीर अपराध था। आपने कितनी बार रोगी को ध्यानपूर्वक देखना तक ज़रूरी नहीं समझा , बिना ज़रूरत उनके टेस्ट कराये बिना ज़रूरत एडमिट किया दवाएं लिखीं अपनी कमाई को , यहां तक कि आपने जानबूझकर घटिया दवाएं बिकवाईं अपने हॉस्पिटल में। आपने क्या क्या नहीं किया , आपके पास को ज़हर खाकर आया तो उसकी जान बचाने की बात से पहले आपने उसके घर वालों से अनुचित रूप से बहुत पैसा लिया ताकि उनकी सूचना पुलिस को नहीं देनी। आप इक अपराधी की तरह आचरण करते रहे और खुद को सभ्य नागरिक मानते रहे। याद करो जब कोई दुर्घटना का शिकार घायल आपके पास लाया गया तब आपने क्या किया। आपने किसी दलाल की तरह उन को बताया कि आपका ऑप्रेशन का खर्च तीस हज़ार आएगा जो आपको नहीं देना आपका जिस वाहन से टकराव हुआ उस से मांग कर मुझे दिलवाना है। मगर जब दूसरा पक्ष सामने आया और उसने बताया कि सब ने देखा गलती खुद इनकी ही थी हम तो मानवता की खातिर इसको हॉस्पिटल लेकर आये  हैं। ये बेशक एफ आई आर लिखवा दे हम साबित कर सकते दुर्घटना खुद इसी की गलती से हुई। और हमारे पर ड्राइविंग लाइसैंस और बीमा दोनों हैं , तब आपने बताया ऑप्रेशन ज़रूरी नहीं था पर जब रोगी को सलाह दे चुके तब करना तो होगा मगर उसकी फीस तीस हज़ार नहीं दस हज़ार ही होगी। आप डॉक्टर होकर ब्लैकमेलर की तरह काम करते रहे हैं। आपने कभी सोचा आपकी गलती से कितने रोगी जान से हाथ धो बैठे , आपने कभी मुफ्त कैंप की आड़ में कभी किसी और ढंग से रोगियों को छला है , कभी किसी को बाहर बड़े हॉस्पिटल में भेज कमीशन खाई तो कभी किसी अपने से छोटे डॉक्टर को या झोला छाप को कमीशन दी। 
             जब विश्व स्वास्थ्य संगठन के बार बार अनुरोध पर देश की सरकार ने कोई नियम कोई कानून बनाना चाहा ताकि रोगियों को स्वास्थ्य सेवा उचित तरीके से मिल सके तब आपको जनहित की बात अपनी मनमानी के खिलाफ लगी क्योंकि आपने असूल और मानवता के नियम को कभी समझा नहीं माना नहीं। हमारे पास कोई सॉफ्टवेयर नहीं जो आपके पल पल का हिसाब लगा झट से बताता। मगर इतना स्पष्ट है आपने जो भी किया खुद अपने पेशे को कलंकित ही किया। भगवान कहलाने की आड़ में आपने हैवानियत तक को शर्मसार किया है। अब आपको बहुत जन्म तक गंभीर रोगों का रोगी बन अपने कर्मों का हिसाब चुकाना होगा। बेशक आपने बहुत रोगियों को स्वास्थ्य सेवा देकर उनकी भलाई भी की मगर उसकी कीमत आपने ज़रूरत से कहीं ज़्यादा वसूली जो खुद धर्म करना ही अधर्म बन गया। आपने लूट की आमदनी से बहुत मज़े किये हैं , अब आपको बीमार भी बनना है और बेहद गरीब भी जिसको ईलाज करवाने को रोज़ मौत की तरह जीना हो। आप को फिर भेजा उसी देश में जायेगा जिस में सरकार अभी भी जनता को स्वास्थ्य सेवा या शिक्षा देना अपना कर्तव्य नहीं समझती। विकास के नाम पर विनाश जारी है आज भी , उसी देश में आपको जीने होगा शोषण का शिकार बनकर और हर सुविधा से वंचित होकर। और ये निर्णय केवल आपके लिए नहीं , न सिर्फ डॉक्टर्स की बात है , और भी तमाम पेशे वालों की गति यही होने वाली है। आपको पहले से मालूम तो था अच्छे बुरे कर्मों का फल इक दिन मिलना ही है।

     

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