Thursday, 1 June 2017

मुंह नहीं छिपाते वो मुखौटा लगाते हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        मुंह नहीं छिपाते वो मुखौटा लगाते हैं ( तरकश )

                                           डॉ लोक सेतिया

इसको कायाकल्प कहते हैं , मेकअप से चेहरे को सुंदर बनाना। ठेठ गंवार को सूट बूट पहना साहब बना देना। महंगे ब्रांडेड कपड़े पहन शान दिखाना। गंगू राम जब जी आर बन जाता तब चाल तक बदल जाती है। लड़का लड़की की कुंडली तक का मिलान नाम भर बदलने से संभव है। एच यू डी ए अर्थात हरियाणा अर्बन डेवलप्मेंट अथॉरिटी का नाम बदल कर एच इस वी पी अर्थात हरियाणा शहरी विकास प्रारधिकरण होने से सब सही हो जायेगा। लगता है ऐसी राय किसी पंडित या ज्योतिष विशेषज्ञ ने दी होगी , इधर सरकारें भगवान के दर पर अक्सर जाती रहती हैं ताकि जो जो उन्होंने वादे किये हैं उनको समझ नहीं आता कैसे ठीक होंगे तब भगवान की शरण चले जाते हैं। ये अलग बात है भगवान तक उनको समझ नहीं पाए , कभी मंदिर याद आता है कभी सत्ता बड़ी लगती है। विभाग का नाम बदनाम बहुत है , हर अनुचित काम सहूलियत से हो जाता है और उचित काम लाख कोशिश करो तब भी नहीं होता जब तक सिफारिश या रिश्वत नहीं दी जाये। कभी लोग चोरी करते पकड़े जाने पर गांव तक छोड़ देते थे , आजकल लूट डाका डालते पकड़े भी जाएं तब भी गली तक नहीं छोड़नी पड़ती। विभाग वही लोग वही नियम कायदे वही जो जैसे जब चाहो बदल सकते हैं तब कैसे सब बंद होगा , अधिकारी फाइलों में सब करवाई दिखाते रहेंगे और वास्तव में अनाधिकृत कब्ज़े करने वालों से घूस हर महीने वसूल करते और बांटते रहेंगे। शायद रिश्वत का नाम भी कुछ और बदल दिया जाये। आजकल दलाली को कमीशन नाम देकर सब किया जाता है। डॉक्टर तक केमिस्ट से लैब से दवा बनाने वाली कंपनी से हिस्सा कमीशन या उपहार मांगते हैं और इस में अनुचित कुछ नहीं लगता। जब सब करते हैं तब हर बात सब को उचित लगती है , सब करते हैं बिजली चोरी कह कर रईस लोग बेशर्मी से खड़े रहते हैं।
        इधर सब कितना बदल चुका है , सन्यासी का भगवा चोला पहन हर कारोबार कर करोड़ों कमाते हैं , सत्ता पर आसीन होकर राज करते हैं , राष्ट्र की सेवा की राह चलते चलते सत्ता के मोहजाल में फंस जाते हैं।  कहते हैं देश की खातिर सब छोड़ दिया था , मगर सत्ता की चाह में भूल जाते हैं उम्र भर प्रवचन किये घर परिवार नहीं देश के बन कर रहना है। सत्ता मिलते देश और जनता की भलाई से अधिक महत्वपूर्ण दल या अपना तथाकथित परिवार लगता है। चले थे हरि भजन को ओटन लगे कपास। अपने अपनों को रेवड़ियां बांटते हुए याद तक नहीं आता सच और झूठ क्या है। सब त्याग भूल शान से जनता का धन अपने पर ही नहीं अपने झूठे विज्ञापनों पर बर्बाद करते हैं। सत्ता पाने से पहले जो कहते थे आचरण उसके विपरीत करते हैं। सरकार होने से यही लाभ तो मिलता है कल तक जो अनुचित था नियम बदल उसको उचित बना लेते हैं। लोग आह भर भी बदनाम हो जाते हैं और सरकार कत्ल भी करती है तो चर्चा नहीं होता। अब तो मीडिया वालों की ज़ुबान सिल दी गई है , विज्ञापनों की हड्डी डाल कर। हरियाणा सरकार ने भी बीस साल तक पत्रकारिता करने वालों को हर महीने दस हज़ार की पेंशन देने का निर्णय किया है। बीस साल कोई और कुछ भी करता रहा क्या उसको भी बराबरी का ये हक मिलेगा। जाने ये कैसे नियम हैं जो ख़ास वर्ग को अलग प्लॉट्स या सुविधा देने को बनते हैं जबकि संविधान हर नागरिक को समानता का हक देने की बात कहता है और हर सत्ताधारी यही शपथ लेकर मंत्री बनता है सब के साथ निष्पक्षता से राग द्वेष से दूर रहकर न्यायपूर्ण कर्तव्य का पालन करने को। समाज को बदलने की बात कहने वाले खुद बदल जाते हैं , काम नहीं बदलते आचरण नहीं बदलता , नाम को बदल रहे हैं। कपड़े और सौंदर्य प्रसाधन कितने महत्वपूर्ण हो गए हैं। चेहरा नहीं बदल सकते तो मुखौटा लगा रहे हैं।

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