Sunday, 11 June 2017

हम सब देशभक्त हैं ( बुरी लगे या लगे भली ) आठवां सुर ( डॉ लोक सेतिया )

               हम सब देशभक्त हैं ( बुरी लगे या लगे भली )

                           आठवां सुर  ( डॉ लोक सेतिया )

कल ही की बात है , टीवी देख रहा था , जबकि अब टीवी देखना मुझे अपराध जैसा लगता है।  किस दुनिया की बातें हैं समझ नहीं आता , असली दुनिया में तो नहीं ऐसा। विडंबना ही है टीवी अख़बार फिल्म क्या संगीत तक कहानी भी फिल्मों टीवी सीरियल की केवल मनोरंजन को हैं सब। क्या मनोरंजन जी जीवन है या जीवन से भटकाव है। इक तथाकथित रियल्टी शो में इक भगवा वस्त्र डाले बाबा जी कहलाने वाले अतिथि थे , चंद्रशेखर आज़ाद का अभिनय किया बच्चे ने और बाबा जी भावुकता जतलाते कहने लगे वो शहीदों की गाथाएं पढ़ते पढ़ते बड़े हुए हैं। आदत के अनुसार खूब नारे भी लगाए भारत माता की जय के , और महान देशप्रेमी बन गए। ये आसान तरीका है देशभक्ति प्रदर्शन का। विदेशी भी देश को इसी तरह लूटते रहे सस्ता लेते और कई गुणा महंगे दाम अपना सामान बेचते। दावा जो भी करो आप हज़ारों करोड़ के मालिक बन गए और जिन का सामान बेचा वो गरीब किसान भूखे है तो इसको शोषण नहीं तो और क्या समझा जाये। देश को तन मन धन अर्पित करना किसी को आता है , लोग बदहाल और कुछ कारोबारी मालामाल ये न तो देशभक्ति है न कोई धर्म है मानवता तो कदापि नहीं। आधी जनता को रोटी नहीं मिलती और उस की बात का भाषण भी जिस सभा में हर दिन देते नेता लोग उसके मंच की सजावट पर ही लाखों बर्बाद किये जाते। किसी मंत्री को सांसद विधायक को एहसास हुआ कभी , क्या उनका लाखों रूपये हर दिन खर्च करना अपने आप पर देश के प्रति अपराध नहीं है। जो भी उद्योगपति या कारोबारी सैंकड़ों प्रतिशत मुनाफा लेकर मालामाल होते हैं जबकि खेती किसानी करने वाले उनके सामान के खरीददार को लागत मूल्य को जूझना पड़ता है क्या देशभक्त हैं। आपने टीवी पर या मैदान में कोई खेल देखा और अपनी देशभक्ति साबित कर ली। वही खिलाड़ी इतना धन पाकर भी अपने नाम और शोहरत को बाज़ार में बेचते हैं और अमीर बनने को। मेरा मानना है देश की गरीबी का एक मात्र कारण ही थोड़े से मुट्ठी भर लोगों की अधिक पाने की हवस है। क्योंकि उनके पास ज़रूरत से बहुत अधिक है इसीलिए बाकी भूखे हैं गरीब हैं। और इस में नेता अधिकारी कारोबारी क्या अभिनेता तक शामिल हैं , इन को जो मिलता है वो आता उन्हीं गरीबों की जेब से है जो भूखे हैं बदहाल हैं। 
         साहित्य की बात और कला की बात सार्थक तभी होती है जब वास्तविक समाज की दशा दिखाई दे। बाहुबली की बात कितनी सार्थक है , आज की फ़िल्में क्या संदेश देती हैं। जो खुद भटक गए अपनी राह से उनसे आशा रखना मार्ग दिखाने की क्या मुमकिन है। जिसे देखो इक अंधी दौड़ में भाग रहा है धनवान बनने की। इक बात शयद भूल गए जो बचपन में पढ़ी थी हाउ मच लैंड ए मैन नीड्स , कितनी ज़मीन चाहिए आदमी को , बस दो गज़ मिलती है आखिर। इक बादशाह को वो भी नहीं मिली इसी का मलाल था उन्हें , ज़फ़र जी की ग़ज़ल याद है , ऐसा है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए , दो गज़ ज़मीन भी न मिली कुए यार में। 
आज बड़े बड़े खबरनवीस कहलाने वाले मीडिया पर काबिज़ लोग क्या जानते भी हैं खबर क्या होती है , खबर की परिभाषा उनको याद भी है। जिस बात का शोर हर तरफ हो रहा उसको खबर नहीं कहते। खबर तो वो सूचना है जो कोई जनता तक पहुंचने नहीं देता जिसको तलाश कर सब को बताना आपका कर्तव्य था। 
        अभी दो टीवी के रियल्टी शो फिर शुरू होने वाले हैं , बिग बॉस और कौन बनेगा करोड़पति। मैंने पहले भी लिखा है करोड़पति बनाने का ये ख्वाब इक धोखा है , साहस है तो किसी एपिसोड में अपना सच बताएं इसके आयोजक संचालक प्रस्तुत करने वाले। इस से कितने लोग अमीर बने और कितना धन आपको मिला , ये लूट का आधुनिक तरीका है। आप लोगों को जुआरी बना रहे हैं और खुद मालामाल हो रहे हैं। उसके बाद भले किसी मंदिर में करोड़ों का चढ़ावा देना पहले सोचना ये कमाई मेहनत की तो नहीं है। आप ध्यान से देखो आपको जो महान लोग लगते हैं वो वास्तव में कितने छोटे हैं , उनका कद उनकी ऊंचाई दूसरों पर चढ़कर मिली हुई है। जब तक देश के सब से बड़े पद पर आसीन राष्ट्रपति एक सौ पचास एकड़ के महल में शाही शान बान से अपने आप पर रोज़ लाखों खर्च कर गरीबी का मज़ाक उड़ाएगा तब तक आज़ादी और लोकतंत्र बेमतलब के जुमले ही रहेंगे असलियत कभी नहीं। 
              इक नशे के आदी हो गए हैं लोग , फेसबुक व्हाट्सएप्प पर दिन भर बड़ी बड़ी ज्ञान की बातें। आस पास कभी नज़र डाली क्या होता है। आपको अच्छा वेतन मिलता है सुख सुविधा है मगर आपका कर्तव्य भी कोई है अपने देश के लिए। अपना फ़र्ज़ निभाए बिना देशभक्त बन गए केवल भाषण देकर बातें कर के झूठे नारे लगा कर। बिग बॉस जैसे आयोजन से समाज को क्या मिलता है , गंदगी। आप उसका हिस्सा हैं पैसे के लिए और बीइंग ह्यूमन की बात भी साथ साथ। डाकू भी लूट कर दान भी दिया करते थे। दान धर्म कभी पाप की कमाई से नहीं किया जाता।  देश का नेता अगर जनकल्याण को भुला मंदिरों में पूजा पाठ करता है तो उसे धर्म ग्रंथों को फिर से पढ़ना होगा। सारी उम्र प्रचारक बने समझाते फिरे देश पहले बाकी बाद में , अब सत्ता पहला ध्येय और देश से पहले अपना राजनितिक दल। अंत कोई नहीं विषय का , मगर कहीं तो बात को विराम लगाना होगा , तो आखिर में दुष्यंत जी की ग़ज़ल के शेर हाज़िर हैं। 

               अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार ,

               घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार। 

               मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं ,

               बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार।

                                            

No comments: