Sunday, 16 April 2017

उनकी संवेदना उनका प्यार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

जनता बेचारी अबला नारी ,
नहीं समझी कभी क्यों हुई बलिहारी ,
जब जब जिस ने की प्रकट ,
झूठी संवेदना उसकी दुर्दशा को देख ,
उसकी सेज सजा दी बिना जाने समझे,
गले में उसके माला डारी।

जिस जिस ने भोली भाली जनता से ,
किया प्यार करने का वादा ,
उस उस को परमेश्वर समझ लिया ,
कदमों में उसके समझा स्वर्ग ,
हर प्रेमी झूठा निकला बस ,
उसका स्वामी बनकर लुत्फ़ उठाया।

नारी की  इक चाहत अपनापन और ,
अपनी प्रशंसा सुन खुश होना ,
कितनी बार यही किया ,
कितनी बार किस किस से धोखा खाया ,
सब उसी पर शासन करने आये ,
नहीं किसी ने उसको रानी बनाया।

नेताओं की संवेदना होती है
शोकसभाओं में दो पल का दिखावा ,
नहीं होता किसी को शोकसभा में,
किसी की मौत पर कोई दुःख ,
इक औपचरिकता निभाते हैं लोग ,
बेदिली से होती है प्रार्थना भी।

तब भी हम ये झूठी रस्म निभाते ,
चले जा रहे हैं बिना विचारे ,
ये सब तो हैं मझधार में जाकर ,
साथ छोड़ने वाले नाम को अपने ,
नहीं मिला करती मंज़िल ,
नहीं मिलते किनारे इनके सहारे।

हम फिर भी सुबह शाम उन्हीं की ,
आरती हैं गाते फूल चढ़ाते ,
मतलबी लोग शासक बनकर ,
नहीं कभी वादे किये निभाते ,
हम उनके झूठ पर कुर्बान जाते ,
झूठ को सच वो बताते।

वो सब सुख देना वो सब कुछ ,
तुम्हारा है की प्यारी बातें ,
मिला कभी नहीं कुछ जागते हुए ,
काटी हैं हमने रट रट सारी रातें ,
दिया कुछ नहीं सिवा कहने को ,
प्यार संवेदना की झूठी बातें।

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