Monday, 20 March 2017

ग़ज़ल 220 ( खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ,
हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई।

इंसान की कीमत नहीं सिक्कों के इस बाज़ार में ,
सामान दुनिया का सभी की अब ज़रूरत बन गई।

बेनाम खत लिक्खे हुए कितने छुपा कर रख दिये ,
वो शख्स जाने कब मिले जिसकी अमानत बन गई।

मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां ,
कैसे बताएं अब तुम्हें ऐसी सियासत बन गई।
( मतलूब=मनोनित। तालिब=निर्वाचित )

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।

सब दर्द बन जाते ग़ज़ल , खुशियां बनीं कविता नई ,
मैंने कहानी जब लिखी पैग़ामे-उल्फ़त बन गई।

लिखता रहा बेबाक सच " तनहा " ज़माना कह रहा ,
देखो किसी की ज़िंदगी कैसी इबादत बन गई।  

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