Tuesday, 14 March 2017

लाठी भैंस को ले गई ( हास्य कविता ) 2 3 - डॉ लोक सेतिया - भाग तीन हास्य व्यंग्य

 लाठी भैंस को ले गई (  हास्य कविता )  डॉ लोक सेतिया

भैंस मेरी भी उसी दिन खेत चरने को गई
साथ थी सारी बिरादरी संग संग वो गई।

बंसी बजाता था कोई दिल जीतने को वहां
सुनकर मधुर बांसुरी  सुध बुध तो गई।

नाचने लग रहे थे गधे भी देश भर में ही
और शमशान में भी थी हलचल हो गई।

शहर शहर भीड़ का कोहराम इतना हुआ
जैसे किसी तूफ़ान में उड़ सब बस्ती ही गई।

तालाब में कीचड़ में खिले हुए थे कमल
कीचड़ में हर भैंस सनकर इक सी हो गई।

शाम भी थी हुई सब रस्ते भी बंद थे मगर
वापस नहीं पहुंची भैंस किस तरफ को गई।

सत्ता की लाठी की सरकार देखो बन गई
हाथ लाठी जिसके भैंस उसी की हो गई।

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