Sunday, 26 February 2017

आधा सच है आधा झूठ ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    सदा सच बोलो। ये तीन शब्द बेहद खतरनाक हैं। जो इनको मान ले उसकी दशा खराब हो जाती है। सच बोलने का सबक पढ़ाने वाले खुद सच ही बोलें ये लाज़मी नहीं है। एक बार झूठ को बेनकाब करने वाले भी झूठे साबित हो गये मगर तब भी उन्होंने अपने झूठ को झूठ मानने से इनकार कर दिया , कहने लगे ये उनका अपना नज़रिया है। इस तरह सच की इक और परिभाषा बना दी उन्होंने। सच वही जिसे आप माने। इस बात से अभिप्राय यूं निकला कि सच और झूठ परस्पर विरोधी नहीं हैं। दो जुड़वां भाई हैं , बस ये पता नहीं चलता कौन बड़ा है कौन छोटा। एक जैसे दिखते हैं हमशक्ल भाईयों की तरह , देखने समझने वाला धोखा खा जाता है। अंतर केवल रंग का है सच गोरा है झूठ सांवला सलौना सब का मन मोह लेता है। चाल ढाल दोनों की अलग अलग है , सच फटेहाल है झूठ सूटेड-बूटेड है चमक दमक लिये है। सब उसी को पसंद करते हैं सच को लोग दूर से देख कतरा कर निकल जाते हैं बचकर। सच अभी कुंवारा है बेघर है , भटकता रहता है किसी ऐसे की तलाश में जो उसको अपना बना ले। झूठ को हर दिन कोई न कोई वरमाला पहना देता है , उसके कितने ठिकाने हैं , बहुत घर हैं उसके। सच फुटपाथ पर रहता है तब भी खुश है इस बात पर लोग आचंभित हैं। झूठ का कुनबा दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है , खूब फल फूल रहा है। सच के भूखे मरने की नौबत आ गई है , इस ज़माने में उसका साथी कोई भी नहीं है। सच पर इल्ज़ाम है कि उसने बहुत लोगों की नींद उड़ा रखी है जिससे उनका जीना मुहाल है , वो चाहते हैं सच को सूली पे लटका दिया जाये। सच पर तमाम मुकदमें दायर हैं।
                इक और दुकान खुली है सच बेचने का धंधा करने वालों की बस्ती में , जो दावा करती है असली सच उन्हीं की दुकान से मिलता है। जिसे ज़रूरत हो उनसे जब जितना सच चाहे खरीद सकता है , मुंहमांगे दाम चुकाकर। कीमत बाक़ी की दुकानों से थोड़ी अधिक है मगर उनका सच प्रमाणित है गारंटी वाला। सब लोग उनसे प्रमाणपत्र वाला सच खरीद अपने ड्राइंगरूम की दीवार पर टांग रहे हैं सच्चे कहला रहे हैं। किसी किसी ने तो घर के बाहर प्रवेशद्वार पर ही सच को टंगवा लिया है ताकि सब देख सकें। सच को हर कोई नहीं खरीद सकता , जिसकी हैसियत है वही मोल चुका सकता है। आजकल सच अमीर लोगों का रईसी शौक बन गया है , हर महंगी वस्तु की तरह। महंगा कालीन , महंगे शोपीस , बहुमूल्य पेंटिंग की तरह ही सच सजावटी सामान बन गया है। सच अब बोलता नहीं है उसके होंठ सिल चुके हैं , पिंजरे वाले तोते और गमले के पौधे के साथ इक कोने में शोभा बढ़ा रहा घर के मालिक की। आजकल सजावट में सूखा ठूंठ या कैक्टस का कांटेदार पौधा , मिट्टी के बर्तन घड़े जाने क्या क्या ऊंचे दाम खरीद लेते हैं।
                सच बेचने वाले कमाल के अदाकार लोग हैं। झूठ के पांव नहीं हैं तो सच के पैर काट उन पे झूठ का बदन लगा बहुत तेज़ी से भगा सब को खुश कर देते हैं। उनको ये कला आती है तभी इस धंधे में उनका नाम है , उनके दफ्तर से निकल छोटे से कस्बे से चलता झूठ राजधानी पहुंच जाता है। सच हर जगह कत्ल किया जा रहा है , सभाओं में , बाज़ारों में , सरकारी भवनों में , अदालतों की चौखट पर , सब कहीं उसी के लहू की लाली है। मगर कोई स्वीकार करना नहीं चाहता कि सच को मार दिया गया है। सब कहते हैं सच ज़िंदा है , उनकी तिजोरी में अलमारी में या दफ्तरी फाइल में सुरक्षित है। अभी उसकी ज़रूरत नहीं है जब भी ज़रूरत हुई निकाल लेंगें। सच का दम घुटता रहे तब भी उसकी मौत नहीं हो सकती , सच कभी नहीं मरता ये मान्यता है। झूठ की जय-जयकार हो रही है , सच पर मुकदमा चल रहा है। कटघरे में खड़े सच को झूठ साबित किया जा रहा है। झूठ दावा कर रहा है बहुमत उसी के साथ है। शासन करने का अधिकार उसी को है। अदालत बेबस है उसको सबूत नहीं मिले सच को कैद करने अपहरण करने या मार दिये जाने के। जांच करने वाले सभी झूठ के साथी हैं , निष्पक्ष जांच हो सकती ही नहीं।  अदालत जांचकर्ता को चेतावनी देती रही है कितनी बार मगर उस पर कोई असर नहीं होता है। झूठ किसी की परवाह नहीं करता , वो सच बनकर वातानुकूलित घर दफ्तर  में रहता है। कोई भी मौसम हो उसको कुछ फर्क नहीं पड़ता , हर तरह के मौसम से ज़ेड केटगरी की सुरक्षा उसको मिली हुई है।

2 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "मैं सजदा करता हूँ उस जगह जहाँ कोई ' शहीद ' हुआ हो ... “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Kailash Sharma said...

बहुत सार्थक प्रस्तुति...