Sunday, 19 February 2017

श्री पूरन मुदगल ( मित्र लेखक ) की रचनाएं और परिचय

        श्री पूरन मुद्गगल जी का हरियाणा के साहित्यकारों में बहुत ऊंचा स्थान तो है ही , उनका लेखन राष्ट्र स्तर के तमाम उच्च कोटि के पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने से देश भर में विख्यात भी है। कविता कहानी आलोचना और कुछ महान लोगों की जीवनी लिखने के साथ इक पुस्तक वे पन्ने जिसमें , स्थान-शहर , व्यक्ति , पुस्तकों ,  कुछ जगहों के साथ तमाम घटनाओं के प्रसंग भी शामिल हैं। 8 5 वर्ष की आयु में उनकी कलम निरंतर चल रही है निडरता से और समाज की वास्तविकता को उजागर करती है। फाज़िलका पंजाब में 2 4 दिसंबर 1931  को जन्में मुदगल जी अब हरियाणा में साहित्य की राजधानी सिरसा में रहते हैं। किसी भी लेखक की शख्सियत को समझना हो तो उसके लेखन को पढ़ना और समझना ज़रूरी है। मगर इक बात महत्वपूर्ण होती है कि कौन क्या लिखता से पहले क्यों लिखता है इसको जानना। बहुत लोग कभी न कभी ऐसा कहते हैं कि मैं भी लिखना चाहता था , बस लिखने की चाहत और लिखने के लंबे सफर में ज़िंदगी गुज़र जाती है। लिखना उतना सहज नहीं जितना लिखने की चाह। आज इसी बात से समझते हैं कि मुदगल जी कैसे लिखने लगे। अभी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे इक छात्र के रूप में जब इक सहयोगी की रचना प्रकाशित हुई देख कर उनको प्रतीत हुआ कि मैं भी लिख सकता हूं। और उन्होंने एक रचना लिखी और उसी जगह भेजी छपने को जिस में मित्र की छपी थी , मगर वो खेद सहित लौट आई थी। कुछ दिन बाद यात्रा करते हुए उन्होंने जो देखा उस घटना ने उनको झकझोर दिया , इक किसान गठड़ी में चावल लेकर जा रहा था बेटी का शगुन देने , मगर तब चावल ले जाना वर्जित था यात्रा में बाहर कहीं। इस तरह इक लेखक का जन्म होता है जब वो कल्पना से नहीं जीवन की घटना से लिखने को प्रेरित से बढ़कर विवश होता है। वो कहानी , तीसरे दिन शीर्षक की 5 जून 1950 को जलंधर के हिंदी अख़बार मिलाप में प्रकाशित हुई थी। इसी तरह एक दिन रेडियो पर खबरें सुनते हुए उनसे श्रीमती जी ने सवाल किया कत्ल लूट की खबरें सुन कि ये बंदूक तलवार बनाते ही क्यों हैं। सुन कर उनको हिरोशिमा की याद आई , कहीं जाते रस्ते पर लुहार को छुरी की धार तेज़ करते देखा और ख्याल आया ,
इस को क्या पता तेज़ धार किसी का गला काटकर आदमी ही नहीं इक विचार को भी कत्ल कर सकती है , सिर्फ उंगली नहीं कटती दिशा दिखाने वाली राह भी गम हो जाती है। तब उनकी पहली कविता का जन्म हुआ इस बात को सोचते , धार शीर्षक की कविता। पेश हैं उनकी कुछ चुनी हुई रचनाएं।
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                         फ्रीज़ हुए दृश्य ( कविता )
अनुभव
जो एक-एक कर हुए संचित
धीरे-धीरे झर गए
समय की मुट्ठी से
बचे कुछ
रह गए सुरक्षित
तेरे-मेरे पत्रों में
फ्रीज़ हुए दृश्यों से से ,
तुम्हारे छुअन से भीगे हुए अक्षर
सूखने पर हो गए शिलालेख
जो पढ़े जाएंगे
हर युग में ,
ठहरी पलकें
रुकी हुई प्राणों की धड़कन
मोहक रूपाकार
नखशिख वर्णन-
महाकाव्य की कथा-कहानी
क्या होती है कभी पुरानी ,
वृक्ष से लिपटी लता को
अलग करने का जतन
एक नादानी।
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                 लटकी हवा ( कविता )
हवा हिली नहीं
वह लटकी हुई है
नाचते मोर के पंख पर

हवा लटकी रही
मरुस्थल में
पकी खजूर पर
कारवां के इंतज़ार में

हवा हिली नहीं
तुम बहुत चुपके से आई
और छोड़ गई बयार मेरी पलकों पर
जो एक मुद्दत से ठहरी है वहीं !

तुम्हारे लौटते कदमों के इर्द-गिर्द
बरसों से झुका है आसमान
हवा के थिर कन्धों पर
और
उन कदमों के निशान
संग्रहालय में रखी कलाकृति जैसे
अतीत की मुखर ख़ामोशी -से !
हवा है कि हिलती ही नहीं !
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              ठहरा हुआ सच ( कविता )
जैसे गर्मी की रात में      
चाँद को ढाँप ले बादल-धूल    
पगडंडी से भटक जाएं कदम-
यात्री संभालने लगे
अपनी लाठी से बंधा पाथेय।
जैसे चित्र में अंकित रथ -
घोड़े फुलाते रहें नथुने
उठाए हुए पुख्ता कदम।
जैसे नदी
अधर से उतरे हिम राक्षस को देख
हो जाए यकायक सफेद
रुक जाए बहती धार।
फ़िलहाल इतना ही
तब तक के लिए
जब तक कि -
यात्री
अपनी लाठी से नहीं तोड़ता
अंधेरे की मकड़ी का बुना बादल जाल
घोड़े नहीं सिधाए जाते
सूर्य रथ खींचने की कला
सोई नदी
नहीं लेती अंगड़ाई
उठने के लिए।
तब तक के लिए
फ़िलहाल इतना ही।
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             अबीज ( लघुकथा )
अजनबी ने गेंहूँ की एक पकी बाल तोड़ी ,
बहुत मोटी है बाल , उसने किसान से कहा।
किसान ने बाल से कुछ दानें निकाल कर अपने हाथ पर रखे और अजनबी से कहा , देखो ,
देखते-देखते सब दानें दो दो टुकड़ों में खिल गए।
अजनबी ने कहा ये दानें साबुत क्यों नहीं रहे ?
यह नए बीज की फसल है !
पिछले पांच सालों से हम यही खा रहे हैं।
चार-पांच गुना झाड़ है इसका , लेकिन  . .  .  .
किसान के चेहरे पर अजाने में किसी गलत दस्तावेज़ पर किये दस्तखत - जैसी लिखाई उभर आई।
क्या . . . ?
यह विदेशी बीज है। मेरे बेटे इसे बाहर से लाए हैं , इसकी फसल तो अच्छी होती है पर बीज के काम नहीं आती।
क्यों ?
बाल से निकलते ही दाने के दो टुकड़े हो जाते हैं , देखा नहीं तुमने अभी।
मेरे बेटे निक्का और अमली चोरी छिपे ले आते हैं यह बीज।
लेकिन जिस फसल से बीज न बने वह किस काम की। किसी साल विदेश से बीज न आया तो  . . .  . अजनबी चिंता का स्वर पीछे छोड़ता हुआ चला गया।
लोग फसल काटने में व्यस्त थे। निकट ही हवा में तैर रही ढोल की आवाज़ किसान को पहली बार बेसुरी लगी।
वह अपनी हथेली पर रखे गेंहूँ के टुकड़ा-टुकड़ा दानों को देखने लगा जिनका धरती से रिश्ता टूट गया था।
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                  पहला झूठ ( लघुकथा )
   बच्चे ने कब मेरी जेब से पेन निकाला , मुझे पता ही नहीं चला। देखते-देखते उसने पेन की कैप उतार ली।
निब फर्श पर मारने को हुआ तो मैंने तुरन्त उसके हाथ से पेन छीन लिया।  वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा।
उसे शांत करने के लिए पेन देना पड़ा। उसने तुरन्त कैप खींची और पेन का रिश्ता फिर फर्श से जोड़ने लगा।
पेन बहुमूल्य था और मैं नहीं चाहता था कि बच्चा खेल खेल में उसे बेकार कर दे।
    मैंने बच्चे का ध्यान बंटाया। पेन उसके हाथ से छीनकर फुर्ती से अपना हाथ पीठ के पीछे किया , दूसरे हाथ से ऊपर की ओर संकेत करते हुए कहा - पेन .  .  . . चिया। इस बार वो रोने की बजाय आकाश की ओर नज़र उठाकर चिड़िया को देखने लगा। उसके भोले मन ने मान लिया कि पेन चिड़िया ले गई।
     एक दिन वह बर्फी का टुकड़ा खा रहा था। मैंने कहा - बिट्टू बर्फी मुझे दो।
उसने तुरन्त बर्फी वाला हाथ पीठ के पीछे किया और तुतलाती भाषा में कहा -
बफ्फी चिया।
   

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