Wednesday, 8 February 2017

अब अच्छे दिन आये हैं ( हास्य-व्यंग्य कविता ) 2 1 भाग तीन , डॉ लोक सेतिया

सुन लो  बहरो , देखो सारे अंधो , हम अच्छे दिन लाये हैं ,
तिगनी का नाच नचाने को हमने , लंगड़े सभी बनाये हैं ,
अब सब का इक जैसा होगा , काले भी गोरे बन जायेंगे ,
अपने रंग में रंगना सब को , अपनी फेसक्रीम ले आये हैं।
मुर्दों की अब बनेगी बस्ती , ऐसी योजना बनाई है ,
हर घर लाशों हैं मिलती , भाई का कातिल खुद भाई है ,
अपने दल की टिकेट देकर , जितने अपराधी खड़े किये हैं ,
माननीय बन शरीफ कहलायें , इंकलाब क्या लाये हैं।
सुन लो बहरो , देखो सारे अंधो , हम अच्छे दिन लाये हैं।
सब इश्तिहार हमारे देखो तुम , झूठे हैं या सच्चे हैं ,
हम सब छप्पन इंच के हैं अब , बाकी तो अभी बच्चे हैं ,
मत देखो जो कुछ भी बुरा है , तुम गांधी जी के बंदर हो ,
जो सत्ता कहती सच वही है , सच की परिभाषा बनाये हैं !
सुन लो बहरो , देखो सारे अंधो , हम अच्छे दिन लाये हैं।

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