Monday, 6 February 2017

ग़ज़ल 1 1 4 ( आया नहीं दाग अब तक छुपाना ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आया नहीं दाग अब तक छुपाना ,
मैली है चादर हमें घर भी जाना !
हम ने किया जुर्म इक उम्र सारी ,
बस झूठ कहना नहीं सच बताना !
सुन लो सभी यार मुझको है कहना ,
की जो  खताएं उन्हें भूल जाना !
मुझ से बुरा और कोई नहीं है ,
मैं खुद बुरा हूं भला सब ज़माना !
दस्तूर मेरा यही तो  रहा है ,
जीती लड़ाई को खुद हार जाना !
तुमने निकाला हमें जब यहां से ,
फिर ठौर अपना न कोई ठिकाना !
"तनहा" जहां छोड़ जाये कभी जब ,
सबको सुनाना उसी का फसाना !

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