Thursday, 19 January 2017

विकास हो रहा है ( कविता ) 125 भाग दो - डॉ लोक सेतिया

       हो रहा है विकास ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

धीरे धीरे चली हवा ,
सत्ता को आया नहीं मज़ा ,
और तेज़ करनी है रफ्तार ,
कहती रही हर सरकार।

हवा बन गई इक दिन आंधी ,
आंधी से बनी तूफ़ान ,
उड़ा ले गई झुग्गी झौपड़ी ,
तबाह होते गये किसान ,
बाहर रौशनी भीतर अंधकार ,
है ऐसा भारत महान।

इक राक्षस की नई कहानी ,
सुन लो आज मेरी ज़ुबानी ,
फैला इतना विकास देखो ,
विनाश की बन गया पहचान ,
जाने की राह चले हम ,
सोच सोच होते अब हैरान ,
कितने ऊंचे ऊंचे महल बने ,
कितने छोटे हैं इंसान।

किस को भगवान बनाया ,
किस को कहते शैतान ,
ऊंची ऊंची हैं दुकानें सत्ता की ,
फीके हैं सारे पकवान ,
इस राक्षस को मिली सुरक्षा ,
इसकी बड़ी निराली शान ,
पाया जनता ने क्या उससे ,
भाग भाग बचाई है जान।

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